Thursday, December 19, 2013

कौन बनेगा पीएम उम्मीदवार?

भारतीय राजनीति में अभी सबसे ज्यादा कोई संकट के दौर से गुजर रहा है, तो वह हैं राहुल गांधी और उनकी पार्टी कांग्रेस। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में से चार में मिली हार ने राहुल गांधी की क्षमता पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। ठीक आम चुनाव के वक्त राहुल की गिरती साख ने कांग्रेस की परेशानियों को और बढ़ा दिया है। गत इतनी बुरी हो गई है कि प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के नाम पर भी पार्टी के बाहर के लोगों के नामों पर चर्चा हो रही है... 

 यह पहला मौका है कि आगामी लोकसभा चुनाव के लिए कांग्रेस पहले ही प्रधानमंत्री पद के लिए उम्मीदवार का फैसला करने जा रही है। इससे पहले कांग्रेस ऐसा नहीं करती रही है। ऐसा करना कांग्रेस संस्कृति के खिलाफ था। इसे देश की राजनीति में आए बदलाव के रूप में देखा जा सकता है या फिर चार राज्यों मेेंं बुरी तरह से पिटी कांग्रेस का रणनीतिक हिस्सा। जो भी हो, हालिया हार की धूल झाड़कर कांग्रेस फिर से खड़ी होना चाहती है। सोनिया गांधी ने साफ कर दिया है कि सही वक्त आने पर प्रधानमंत्री पद के दावेदार के नाम का ऐलान कर दिया जाएगा। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल है कि कांग्रेस की पीएम उम्मीदवार कौन होगा? और जो पीएम उम्मीदवार होगा, क्या वह मोदी का बराबरी कर पाएगा? फिर दूसरा सवाल यह भी है कि कांग्रेस के संभावित पीएम उम्मीदवार के नाम पर नई यूपीए में घटक दलों की संख्या बढेÞगी? याद रखिए, जब सोनिया गांधी प्रधानमंत्री उम्मीदवार की बात कर रही थीं, तो उनके ठीक बराबर में पार्टी उपाध्यक्ष और कांग्रेस की अब तक की सबसे बड़ी उम्मीद राहुल गांधी भी खड़े थे।
          हालिया चुनाव परिणाम के बाद राहुल गांधी अब सवालों के घेरे में हैं। उनकी राजनीति फेल हो चुकी है। पहले उत्तर प्रदेश और अब राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ जैसे अहम राज्यों में मिली शिकस्त ने राहुल फैक्टर पर सवालिया निशान लगा दिया है। ऐसे में इन कयासों को काफी हवा मिली है कि भाजपा के पीएम पद के दावेदार नरेंद्र मोदी के मुकाबले कांग्रेस जल्द ही कोई दावेदार उतार सकती है। इन संभावनाओं को काफी बल मिला है कि वह राहुल नहीं, कोई और हो सकता है। कांग्रेस के अंदरुनी सूत्र बता रहे हैं कि वैसे भी इस बार राहुल प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नहीं हैं। अब नई स्थिति में राहुल खुद नहीं चाहेंगे कि वे पीएम के उम्मीदवार बनें। अभी वे संगठन को और मजबूत करने में लगे हैं और पार्टी की कमजोरी को दूर करने में लगे हैं। इस हार से हमें सीख लेनी है। सोनिया गांधी सियासत के खेल में अपने मास्टरस्ट्रोक के लिए जानी जाती हैं। कुछ कांग्रेसियों का मानना है कि सोनिया को खुद विकल्प के रूप में सामने आना चाहिए, लेकिन सोनिया देश की राजनीति को भली प्रकार से समझ रही हंै। ऐसे में कांग्रेस के भीतर कुछ ऐसे लोग हैं, जिस पर कांग्रेस दांव खेल सकती है।
          अभी कांग्रेस में सबसे ईमानदार नेता के रूप में देश के रक्षा मंत्री एके एंटनी का नाम सामने आ रहा है। केरल के सीएम रह चुके एंटनी दक्षिण भारत के बड़े नेताओं में गिने जाते हैं। उनका दामन अभी तक साफ रहा है और रक्षा मंत्रालय जैसा अहम विभाग संभालने के बाद अब तक उन पर भ्रष्टाचार के कोई आरोप नहीं है। इसके अलावा स्वभाव से वह काफी विनम्र हैं और मिलनसार भी। यूपीए सरकार के जो मंत्री सोनिया गांधी के सबसे करीबी माने जाते हैं, उनमें एंटनी का नाम भी आता है। कांग्रेस अध्यक्ष कई अहम मामलों में उनकी राय लेती हैं और उनकी राय की इज्जत भी की जाती है। यह बात और है कि कांग्रेस उन्हें पीएम उम्मीदवार के तौर पर मैदान में उतारकर भ्रष्टाचार का आरोप लगाने वाले विरोधी तेवरों का दम तो निकाल सकती हैं, लेकिन मुश्किल यह है कि दक्षिण भारत का होने की वजह से उत्तर और मध्य भारत में उन्हें ज्यादा पहचान हासिल नहीं है, जो चुनाव जीतने की राह में सबसे बड़ी चुनौती साबित हो सकती है।
कांग्रेस में वित्त मंत्री चिदंबरम भी मजबूत नेताओं में गिने जाते हैं। पार्टी संगठन और सरकार में उनका क्या रुतबा है, यह बताने की जरूरत नहीं है। अनुमान है कि पीएम पद के दावेदार के रूप में उनके नाम पर भी सहमति बन सकती है। चिदंबरम चालाक, समझदार और अनुभवी नेता समझे जाते हैं। तीसरे मोर्चे की सरकार से लेकर यूपीए सरकार तक, उन्होंने अलग-अलग विभागों में अपनी काबिलियत का लोहा मनवाया है। कई बार सरकार के संकटमोचक भी साबित हुए। मनमोहन सिंह के करीबी माने जाते हैं, लेकिन चिदंबरम में राजनीतिक विनम्रता का अभाव नजर आता है। वह दक्षित भारत से आते हैं, ऐसे में हिंदी पट्टी और उत्तर भारत में उनकी कोई खास पैठ नहीं है। इसके अलावा वह ब्रीफ देकर काम करते हैं, जो आमतौर पर राजनीति में कम ही चलता है। चिदंबरम को लेकर कांग्रेस के भीतर भले ही आम सहमति बन भी जाए, लेकिन देश की जनता की नजरों में चिदंबरम वित मंत्री के रूप में विफल दिख रहे हैं। ऐसे में संभव है कि अंतिम समय में चिदंबरम इस दौड़ में पीछे न छूट जाए।
       कांग्रेस में प्रधानमंत्री पद की होड़ में सुशील कुमार शिंदे का नाम भी चल रहा है। शिंदे दलित हैं और राजनीति में बेहतर पकड़ भी रखते हैं। शिंदे महाराष्ट्र के  मुख्यमंत्री रह चुके हैं और 48 लोकसभा सीटों वाले महाराष्टÑ जैसे राज्य में अच्छी पैठ रखते हैं। इसके अलावा कांग्रेस को उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ जैसे अहम राज्यों में इसी तरह के चेहरे की तलाश है। दूसरी चीजें जो शिंदे के पक्ष में जाती हैं, वह गृह मंत्रालय का उनका अनुभव है। वह इन दिनों इसी मंत्रालय का जिम्मा संभाल रहे हैं। कांग्रेस अगर उन्हें सामने रखती है, तो दलित पीएम का जुमला सामने रखा जाएगा। कांग्रेस दलित वोटों में सेंध लगाने के लिए यह कार्ड खेल सकती है। लोकसभा चुनावों में इस वोट बैंक को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हालांकि गृहमंत्री के रूप में शिंदे बहुत पॉपुलर नहीं रहे हैं। बतौर गृहमंत्री कई बड़ी घटनाओं में न केवल उनके लिए, बल्कि कांग्रेस के गले की हड्डी बन चुके हैं। इसके अलावा गृहमंत्री के रूप में मजबूत छवि की कमी और उत्तर प्रदेश-बिहार जैसे राज्यों में कोई मास अपील न होना उनके खिलाफ जा सकता है।
      सोनिया की नजर में आज की राजनीति में लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार सबसे महत्वपूर्ण हो सकती हैं। कांग्रेस के दिग्गज नेता रहे बाबू जगजीवन राम की बेटी के रूप में वह दलितों के लिए जानी-मानी प्रतीक बन सकती हैं। इसके अलावा मीरा कुमार आईएफएस रह चुकी हैं, इसलिए ज्ञान की कोई कमी नहीं है। अंग्रेजी और हिंदी, दोनों भाषाओं पर बराबर पकड़ और मृदुभाषी होना उनकी दावेदारी में इजाफा करता है।
मीरा कुमार को कांग्रेस उत्तर प्रदेश में मायावती की काट के रूप में पेश कर सकती है। साथ ही उनके दम पर महिलाओं को अहम जिम्मेदारी देने का ढोल पीट सकती है। लोकसभा स्पीकर के रूप में अपनी मौजूदगी का अहसास करा चुकी मीरा कुमार से उत्तर भारत में कांग्रेस को फायदा हो सकता है। इसके अलावा मीरा अब तक किसी भी बड़े विवाद से अलग रही हैं। यह बात और है कि गांधी-नेहरू परिवार से उनकी एक समय अनबन भी रह चुकी है। इसके अलावा समाज कल्याण मंत्रालय में उन्हें लेकर विवाद उठ चुका है। इसके अलावा नरेंद्र मोदी के आक्रामक अंदाज के सामने मीरा कुमार जरूरत से ज्यादा विनम्र साबित हो सकती हैं, जिससे कांग्रेस के बैकफुट पर रहने का संदेश जा सकता है।
      राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सोनिया गांधी और कांग्रेस मास्टरस्ट्रोक के तहत आधार कार्ड से जुड़ी योजना को परवाज देने वाले नंदन निलकेणी को पीएम पद का दावेदार बना सकती है। इंफोसिस जैसी कंपनी को सींचने वाले निलकेणी बेहद ईमानदार माने जाते हैं। वह खुद भी अब सक्रिय राजनीति में कदम रखना चाहते हैं।
निलकेणी के पास प्राइवेट सेक्टर और सरकारी दफ्तर, दोनों में काम करने का अनुभव है। वह बेहद पेशेवर, टेक्नोक्रेट, ईमानदार, प्रशासनिक मजबूती वाले अधिकारी बताए जाते हैं। उनकी पत्नी सामाजिक क्षेत्र में काफी काम कर चुकी हैं। और सबसे बड़ी बात यह है कि वह मोदी और केजरीवाल, दोनों तरह की चुनौतियों का परफेक्ट जवाब बन सकते हैं, लेकिन नंदन को राजनीति नहीं आती। ऐसे में यह कहना मुश्किल है कि नंदन को पीएम उम्मीदवार बनाकर कांग्रेस फिर मनमोहन सिंह जैसे गैरराजनीतिज्ञ के रूप में आफत मोल न ले ले। कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं कि पीएम उम्मीदवार की लाइन में बहुत से लोग खड़े रहते हंै। राजनीति करने वाले हर लोग पीएम बनना चाहेंगे। लेकिन सवाल है कि देश को कौन चला सकता है? पीएम के लिए इस देश में वही आदमी फिट हो सकता है, जो देश की जनता को समझता हो और राजनीति भी जानता हो। कांग्रेसी नेता के इस बयान से साफ लगता है कि इस बार कांग्रेस ऐसे आदमी को पीएम उम्मीदवार बनाएगी, जो राजनेता भी हो और देशी राजनीति भी करता हो। फिर कांग्रेस अपना दांव उसी आदमी पर खेल सकती है, जिसमें मोदी का जबाव देने की ताकत हो, जिसके नाम पर आगे चलकर यूपीए का विस्तार संभव हो सके।



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