Thursday, December 26, 2013

‘आप’ बन सकती है ‘बाप’

हाल ही में संपन्न पांच राज्यों के चुनाव में दो बातें सकारात्मक रहीं। एक तो दिल्ली में आम आदमी पार्टी ने धमाकेदार एंट्री की, दूसरी बड़े पैमाने पर लोगों ने नोटा का इस्तेमाल किया। अगर आम चुनाव में दोनों का समन्वय ठीक से हो गया, तो देश की राजनीति ही बदल जाएगी...   

क्या आने वाले लोकसभा चुनाव में नोटा बटन दबाने वाले लोगों की संख्या में और बढ़ोतरी होगी? क्या देश के 60 से ज्यादा नक्सल प्रभावित और आदिवासी इलाकों में नोटा का बटन राजनीति की तस्वीर बदलेगा? और क्या  कांग्रेस और भाजपा के अलावा क्षेत्रीय दलों से आहत लोग नोटा पर बटन दबाने के बदले विकल्प के रूप में केजरीवाल की आप पार्टी को अपना समर्थन देंगे? और अंत में अगर ऐसा होता है, तो क्या आप इन नक्सली और आदिवासी इलाकों में सभी दलों को मात देगी? ये तमाम सवाल इसलिए किए जा रहे हैं कि अभी हाल ही में पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में जनता ने नोटा बटन दबाकर नेताओं के लिए स्पष्ट संकेत छोड़ दिया है। पहली बार मिले अवसर का उपयोग करते हुए वोटरों ने बड़ी संख्या में नोटा के बटन का इस्तेमाल किया है। पांच राज्यों के पन्द्रह लाख से अधिक मतदाताओं ने राजनीतिक दलों से नोटा के माध्यम से कहा है कि उनकी ओर से उतारे गए उम्मीदवार उन्हें स्वीकार्य नहीं हैं। ये उम्मीदवार चाहे कांग्रेस के हों या फिर भाजपा या अन्य पार्टियों के। बहुत ही कम समय में नोटा के बारे में लोगों को जितनी जानकारी मिली, उसके बाद की प्रतिक्रिया के रूप में इसे देखा जा रहा है। लेकिन आने वाले समय में लोग अपने इस अधिकार के बारे में पूरी तरह से जान जाएंगे, तब क्या होगा? आने वाले चुनावों में यह संख्या बढ़ी, तो पार्टियों को अपने उम्मीदवारों के संबंध में विचार करने को मजबूर होना पड़ेगा। नोटा का भले ही हालिया चुनाव परिणाम पर प्रत्यक्ष प्रभाव नजर नहीं आ रहा हो, लेकिन कई सीटों पर परोक्ष प्रभाव जरूर नजर आया है। ये वे सीटें हैं, जहां जीत के अंतर से अधिक नोटा वोट पड़े हैं। ये वोट किसी उम्मीदवार के पक्ष में डाले जाते तो परिणाम उलट भी सकते थे। मध्य प्रदेश में जागृति आदिवासी दलित संगठन को सालों से संचालित कर रही माधुरी कृष्णास्वामी कहती हैं कि  कांग्रेस, भाजपा और अन्य पार्टियों से आजिज आ चुकी जनता के सामने नोटा एक बेहतर विकल्प है। आने वाले दिनों में इस नोटा का असर और ज्यादा पड़ने वाला है। जब तक लोगों के पास कोई बेहतर राजनीतिक पार्टी बेहतर सोच के साथ सामने नहीं आती है, तब तक देश के ग्रामीण और नक्सल इलाके में नोटा का प्रभाव बढ़ता ही जाएगा। जहां तक आप जैसी पार्टी का सवाल है, उसके बारे में अभी कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी। आप ने दिल्ली में जिस तरह का प्रदर्शन किया है, उससे देश के जन संगठनों में आशा की किरण फूटी है, लेकिन दिक्कत यह है कि आप का आधार अभी ग्रामीण इलाकों तक नहीं है। अगर आप पार्टी जनसंगठनों को जोड़े, तो आने वाले चुनाव में यह पार्टी नोटा का विकल्प हो सकती है और एक नई राजनीति देश में शुरू हो सकती है।
   मध्य प्रदेश में हाल में संपन्न हुए विधानसभा चुनाव के दौरान 6 लाख 43 हजार 144 मतदाता ने ईवीएम और डाक मतपत्र में नोटा यानी ‘इनमें से कोई नहीं’ का इस्तेमाल किया। इनमें डाक मत पत्र में 2633 तथा ईवीएम पर 6 लाख 40 हजार 511 नोटा का उपयोग हुआ। मतदाताओं द्वारा नोटा का सबसे अधिक उपयोग छिंदवाड़ा जिले में हुआ, जहां 7 विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र में 39 हजार 235 बटन नोटा के दबाए गए। भिंड जिले में सबसे कम 3378 मतदाता ऐसे थे, जिन्होंने नोटा का उपयोग किया। विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रवार देखा जाए, तो सर्वाधिक 9412 नोटा का इस्तेमाल छिंदवाड़ा जिले के जुन्नारदेव में हुआ। सबसे अधिक 10 में से पानसेमल (बड़वानी) में 9288, अमरवाड़ा (छिंदवाड़ा) में 8232, भैंसदेही (बैतूल) में 7929, बड़वानी (बड़वानी) में 7430, शहपुरा (डिंडोरी) में 7214, मानपुर (उमरिया) में 6262, घोड़ाडोंगरी (बैतूल) में 5926, जोबट (अलीराजपुर) में 5689, आमला (बैतूल) में 5465 मतदाताओं ने नोटा के बटन दबाए अथवा डाक मतपत्र में ‘इनमें से कोई नहीं’ का इस्तेमाल किया। अकेले दिल्ली में 49 हजार से ज्यादा लोगों ने नोटा का इस्तेमाल किया। छत्तीसगढ़ में कुछ विधानसभा क्षेत्रों में, तो 10 फीसदी तक नोटा का प्रयोग हुआ। कई विधानसभा क्षेत्रों में तो विजेता और दूसरे स्थान के उम्मीदवार के बीच वोट का जितना अंतर था, उससे ज्यादा नोटा को वोट मिले। बस्तर संभाग के विधानसभा क्षेत्रों में नोटा का रुझान काफी चौंका देने वाला है। अब तक उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, दंतेवाड़ा सीट पर सबसे ज्यादा 9677 मत नोटा के पक्ष में पड़े। दंतेवाड़ा के बाद नक्सल प्रभावित बीजापुर में भी 7179 लोगों ने नोटा का चुनाव किया। मध्य प्रदेश में भोपाल गैसकांड पीडितों ने भी नोटा विकल्प अपनाने के लिए प्रदर्शन किए थे। दंतेवाड़ा में भाजपा के मौजूदा विधायक भीमा मंडावी का कड़ा मुकाबला दर्भा घाटी में हुए माओवादी हमले में मारे गए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सलवा जुडूम के जन्मदाता महेंद्र कर्मा की पत्नी देवती कर्मा से था। इस सीट पर सबसे ज्यादा नोटा का इस्तेमाल होना इस बात के संकेत हैं कि एक तबका ऐसा भी है, जो दोनों ही प्रमुख दलों के साथ-साथ चुनाव में शामिल सभी दलों को नकार रहा है। ये सब तब, जबकि बस्तर के जंगली इलाकों में नोटा के बारे में ढंग से प्रचार नहीं हो पाया। कई इलाके ऐसे रहे हैं, जहां चुनाव अधिकारी पहुंच नहीं पाए और ना ही मतदान में तैनात कर्मचारियों को ही इसके बारे में प्रशिक्षण दिया गया।
                   असल में नोटा यानी सभी उम्मीदवारों को नकारने का अधिकार मतदाताओं को इसके प्रभावी होने से पहले भी मिला हुआ था। लेकिन पहले ऐसे मतदाता की पहचान उजागर हो जाती थी। अब मशीन पर नोटा बटन भी होने के बाद मतदाता गुप्त पहचान रखकर अपनी भावना का इजहार कर सकते हैं। इस चुनाव में मतदाताओं ने यह दिखाने के लिए इसका इस्तेमाल भी किया है कि उन्हें कोई उम्मीदवार पसंद नहीं है। बदलते दौर के साथ यदि राजनीतिक दलों ने अच्छी छवि के उम्मीदवारों को तरजीह देना शुरू नहीं किया, तो नोटा का उपयोग करने वालों की संख्या बढ़ भी सकती है। कुछ विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि नोटा वोटों को परिणाम के साथ जोड़ दिया जाए, तो यह और प्रभावी हो सकता है। उनका कहना है कि यदि कुल पड़े मतों में सर्वाधिक मत नोटा के हों, तो दोबारा चुनाव का प्रावधान हो। ऐसा किया गया और किसी एक भी सीट पर इतने नोटा पड़ गए, तो राजनीतिक दलों को आत्ममंथन करना पड़ेगा। इन विधानसभा चुनावों में पहली बार चुनाव आयोग ने इनमें से कोई नहीं, यानी नोटा का प्रावधान किया था, जिसका असर छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित बस्तर संभाग के इलाकों के साथ-साथ मध्य प्रदेश, राजस्थान और दिल्ली के विभिन्न विधानसभा क्षेत्रों में देखा गया है।
        कुछ समीक्षकों का कहना है कि दंतेवाड़ा में नोटा पर इतना रुझान इस बात का भी संकेत है कि लोगों ने सलवा जुडूम को नकार दिया है। वहीं समीक्षकों का एक तबका ऐसा भी है, जिसका मानना है कि नोटा का इस्तेमाल ज्यादातर नक्सली विचारधारा से सहानुभूति रखने वालों ने किया है। बस्तर में ही दूसरे नक्सल प्रभावित इलाके जैसे बीजापुर में 7179 मत नोटा के पक्ष में पड़ने की बात से भी इस मान्यता को बल मिलता है। हालांकि चुनाव के अंतिम आंकड़ों के उपलब्ध होने पर ही बताया जा सकता है कि नोटा का रुझान शहरी इलाकों में ज्यादा रहा या फिर जंगल के क्षेत्रों में। बस्तर में नक्सल प्रभावित सीट नारायणपुर में भी नोटा के पक्ष में 6 हजार से ज्यादा मत पड़े। उसी तरह बस्तर विधानसभा सीट पर भी पांच हजार से ज्यादा मत पड़े। यही हाल चित्रकोट, कोंटा, भानुप्रतापपुर और अंतागढ़ विधानसभा सीटों का भी रहा, जहां नोटा के पक्ष में पांच हजार के आसपास मत पड़े। हालांकि बस्तर में नोटा के लिए जागरूकता उतनी नहीं थी।
देश में चर्चा अब इस बात को लेकर शुरू हो गई है कि जिस तरह कांग्रेस, भाजपा और अन्य दलों से जनता का मोह भंग होता जा रहा है, क्या आगामी चुनाव में इस मोहभंग का लाभ आप जैसी पार्टी को मिलेगा? क्या दिल्ली में आप का प्रयोग पूरे देश में संभव है? दो भ्रष्ट पार्टियों के बीच आप जैसी पार्टी जनता की आवाज बन सकती है? और क्या नोटा वाला वोट आप के उम्मीदवार को मिल सकता है? नक्सल प्रभावित देश के 9 राज्यों की राजनीति को गौर से देखें और इन राज्यों के लगभग 60 से ज्यादा लोकसभा सीटों की राजनीति को देखें, तो साफ हो जाता है कि देश के गरीब, आदिवासी और नक्सली इलाके के लोग किसी भी राजनीतिक दलों से खुश नहीं हैं। नक्सल प्रभावित इन इलाकों में हजारों गैरसरकारी संगठन काम कर रहे हैं और यही संगठन लोगों की असली जानकारी भी रख रहा हंै। कह सकते हैं कि इन इलाकों में गैरसरकारी संगठन और जन आंदोलन से जुड़े संगठन इतने शक्तिशाली हैं कि इनके सामने राजनीतिक दलों की एक नहीं चलती। ऐसे में आप जैसी पार्टी इन इलाकों को टारगेट करके आगे बढ़ सकती है और पुरानी राजनीतिक पार्टियों से नाराज लोगों को अपने साथ जोड़ सकती है। कई संगठनों से जुड़ी और मानवाधिकार की लड़ाई लड़ रही सीमा आजाद कहती हैं कि जहां तक नोटा का सवाल है आने वाले दिनों में इसका प्रयोग और बढ़ सकता है। इस नोटा के बारे में लोगों को जितनी जानकारी मिलेगी, लोगों में अपने अधिकार के प्रति चेतना होगी और वे नोटा का प्रयोग करेंगे। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में नोटा का जिस तरह से प्रयोग हुआ है, उसके मूल में जन आंदोलन का होना है। पहले नक्सली लोग चुनाव बहिष्कार करते थे। अब वे नोटा पर बटन दबा रहे हैं। यही हाल अन्य राज्यों में भी होगा और बड़े स्तर पर होगा। जहां तक आप जैसी पार्टी का सवाल है, वह अभी दिल्ली तक सीमित है, लेकिन इस पार्टी को विकल्प के रूप में लाभ मिल सकता है। अगर आप पार्टी नक्सली और आदिवासी इलाकों में ठीक से काम करे, तो संभव है कि वह कई इलाकों में जीत हासिल कर सकती है, लेकिन यह अभी दावे के साथ नहीं कहा जा सकता कि देश के तमाम जन संगठन उनका सपोर्ट करेंगे। गैर सरकारी संगठन तो उनके साथ जा सकते हैं, क्योंकि आप की उत्पत्ति भी गैर सरकारी संगठनों के गर्भ से ही हुई है।’
        देश में भ्रष्टाचार के शिकार सबसे ज्यादा आदिवासी और पिछड़े इलाके के लोग ही हुए हैं। यही इलाके आज नक्सलवाद की चपेट में भी हैं। यह बात और है कि कहने के लिए सरकार के लोग इन इलाकों में हजारों करोड़ की योजनाएं चलाने की बात तो कर रहे हैं, लेकिन वहां की जनता आज भी शोषण और लूट की शिकार है। इन इलाकों में आप जैसी पार्टी बेहतर काम तो कर सकती है, लेकिन अभी यह शहरी क्षेत्र तक ही अपनी ईकाई बनाने में लगी है। पीयूसीएल के नेता चितरंजन सिंह कहते हैं कि आने वाले समय में नोटा का उपयोग तो और ज्यादा बढेÞगा। जनता को यह पहली बार अपनी ताकत दिखाने का अधिकार मिला है। अब हम लोग ‘राइट टू रिजेक्ट’ पर काम कर रहे हैं और इसके लिए अदालत में अपील भी करेंगे। जहां तक आने वाले समय में  आप की राजनीति का सवाल है। इसके बारे में निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि कांग्रेस और भाजपा से ऊब चुकी जनता के लिए वह एक मजबूत विकल्प तो हो सकती है, लेकिन आगामी चुनाव में वह कितना विकल्प देगी, अभी कहना मुश्किल है। इसकी वजहें भी हंै। कांग्रेस और भाजपा की आर्थिक नीतियों का नक्सली विरोध करते हैं और साथ ही देश के कई जन संगठन भी इनकी नीतियों से सहमत नहीं हैं। यह जो नोटा के पक्ष में वोट गया है, उसके पीछे आर्थिक नीतियों का ही विरोध है। आप जैसी पार्टी के पास तो अभी कोई स्पष्ट आर्थिक नीति ही नहीं है। ऐसे में नोटा वाले वोट आप को नहीं मिल सकते हैं। हां, एक बात तय है कि आप अगर व्यापक स्तर पर जन संगठनों में अपनी पैठ बनाए, तो आने वाले समय में उसकी पहुंच देशभर में हो सकती है। लेकिन अभी आप पार्टी की राजनीति को भी देखना होगा। अपने देश में आंदोलन से कई पार्टियों का जन्म हुआ है, लेकिन बाद में चलकर उसका नाम लेवा भी कोई नहीं रहा।’
        उधर, झारखंड और उड़ीसा से जुड़े कई जन संगठन आप की राजनीति को वैकल्पिक राजनीति के रूप में देख रहे हैं। संभव है, आगामी लोकसभा चुनाव में आदिवासी और नक्सल प्रभावित इलाके में आप को भले ही कोई बड़ी सफलता नहीं मिले, लेकिन यह भी तय है कि जनता का मूड बदल गया, तो देश का यही इलाका आप को मजबूत पार्टी के रूप में संसद में पहुंचा सकता है। देश के चार दर्जन से भी ज्यादा बड़े जन संगठन और दर्जनों गैर सरकारी संगठन जिस तरह से आप की राजनीति में यकीन कर रहे हैं, उससे लगता है कि आप जैसी पार्टी नोटा का विकल्प बन सकती है।

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