Friday, December 13, 2013

कांग्रेस, पासवान और कुशवाहा की नई मंडली

बिहार में भाजपा-जदयू गठबंधन टूटने के बाद तरह-तरह के गठजोड़ बन रहे हैं। कभी कांग्रेस के जदयू के साथ जाने की बात होती है, तो कभी राजद-लोजपा के साथ। ऐसे में इससे भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि कांग्रेस लोजपा और उपेंद्र कुशवाहा को लेकर नया गठबंधन बना ले। आखिर क्या खिचड़ी पक रही है बिहार में?

बिहार में एक नई राजनीतिक मंडली की सुगबुगाहट हो रही है। अगर यह राजनीतिक मंडली तैयार हो जाती है, तो बिहार की राजनीति में एक नया खेल होने की संभावना बढ़ सकती है। पांच राज्यों के चुनाव परिणामों के बाद बिहार की राजनीति में ऐसे एक नए गठबंधन की संभावना बढ़ती दिख रही है। मोदी इफेक्ट से परेशान कांग्रेस को अब लगने लगा है कि अगर समय रहते आगामी लोकसभा चुनाव को लेकर माकूल गठबंधन नहीं किए गए, तो मोदी इफेक्ट कहीं मोदी लहर में बदल कर कांग्रेस की पूरी राजनीति को ही तहस-नहस न कर दे। यही वजह है कि कल तक जो कांग्रेस, जदयू से गलबहियां की संभावना पर विचार कर रही थी और लालू प्रसाद को भी अपने लॉलीपॉप में फांस रखी थी, अब माइनस जदयू और माइनस राजद की राजनीतिक संभावना को तलाश रही है। संभव है कि बिहार की राजनीति में इस नए विकल्प के सूत्रधार लोजपा प्रमुख रामबिलास पासवान बनें। माना जा रहा है कि कांग्रेस और लोजपा के बीच इस बात को लेकर चर्चा चल रही है कि बिहार में जिस तरह के जातीय समीकरण हैं और जिस तरह से मोदी इफेक्ट राजनीति को प्रभावित कर रहा है, वैसी हालत में कांग्रेस, लोजपा और उपेंद्र कुशवाहा की नई पार्टी को मिलाकर गठबंधन तैयार किया जाए, ताकि दलित, कोइरी, सवर्ण और मुसलमानों के वोट को बांधा जा सके। इस रणनीति के तहत चुनाव से पहले लालू प्रसाद की पार्टी राजद और नीतीश कुमार की पार्टी जदयू से दूरी बनाने की बात है। हालांकि इस तरह के गठबंधन को लेकर अभी कोई अंतिम फैसला नहीं लिया गया है, लेकिन रामबिलास पासवान और लालू प्रसाद के बीच बढ़ती दूरियों और पासवान के कांग्रेस प्रेम को देखते हुए पासवान खेमे के अधिकतर नेता इस गठबंधन की संभावना से इंकार नहीं कर रहे हैं। माना जा रहा है कि पासवान इस तरह के गठबंधन के अगुआ बनने की पूरी तैयारी भी कर चुके हैं। कांग्रेस के कई नेताओं समेत उपेंद्र कुशवाहा की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के भी कई नेता पासवान की इस रणनीति से सहमति जता चुके हैं।
इस राजनीतिक खेल की सबसे अहम धुरी लोजपा मुखिया रामबिलास पासवान बनते दिख रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या पासवान भी लालू से अपना पिंड छुड़ाने में लगे हुए हैं। लोजपा के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं कि ऐसा नहीं है कि पासवान के मन में लालू के प्रति कोई गलत भावना है, लेकिन राजद की राजनीति अभी जिस पटरी पर चल रही है, ऐसे में लगता है कि राजद की राजनीति सिर्फ लोजपा को साधने भर का है। ऐसे में पासवान क्या करेंगे? पिछले कुछ महीनों से बिहार की राजनीति में जो कुछ बदलाव आ रहे हैं, ऐसे में लोजपा को अपना राजनीतिक भविष्य भी देखना जरूरी है।’ तो क्या मान लिया जाए कि राजद और लोजपा में अब छत्तीस का आंकड़ा बनता जा रहा है? इस सवाल का जबाव देने से पहले लालू और लोजपा की राजनीति पर एक नजर।
पासवान की पार्टी लोजपा का गठन 28 नवंबर 2000 को हुआ था। तब पासवान  एनडीए सरकार के हिस्सा थे। गोधरा कांड के बाद पासवान ने 2002 में मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया और गुजरात से ही सांप्रदायिकता के खिलाफ अपनी यात्रा शुरू की। 2004 में धर्मनिरपेक्षता के मसले पर पासवान यूपीए सरकार का हिस्सा बने। यूपीए की साझेदारी में बिहार में कांग्रेस भी साथ थी। उस समय बिहार में राबड़ी की सरकार थी। पासवान की पार्टी लोजपा ने 2004 के चुनाव में बिहार से चार सीटें जीती थीं। चुनाव जीतने वाले थे रामबिलास पासवान, उनके भाई रामचंद्र पासवान, बिहार के नामी बाहुबली सूरजभान सिंह और बाहुबली पप्पू यादव की पत्नी रंजीता यादव। उधर राजद को 24 सीटें मिली थीं। लालू-पासवान के बीच बेहतर समझदारी थी। लेकिन जैसा कि कहा जाता है कि राजनीति में कोई किसी का न दोस्त होता है और न ही दुश्मन, इसे चरितार्थ होते भी ज्यादा समय नहीं लगा। केंद्र में बनने वाली सरकार में रेल मंत्री कौन बने? इसको लेकर लालू और पासवान में जंग छिड़ गई। लालू के पास 24 सांसदों की संख्या थी और पासवान के पास दिल्ली की राजनीति में मजबूत पकड़ के साथ ही सोनिया गांधी समेत कांग्रेस के कई आला नेताओं के साथ मजबूत याराना। रेल मंत्री कौन बने, इसको लेकर दोनों बिहारी नेता लड़ने लगे। पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने दोनों को बहुत समझाने की भी कोशिश की, लेकिन बात नहीं बनी। यह बात और है कि लालू यादव अगर पासवान को रेल मंत्री बनाने में आगे रहते, तो संभव था कि लालू, पासवान की पहुंच की बदौलत उपप्रधानमंत्री भी बन सकते थे, लेकिन लालू रेल मंत्री बनने के लिए अपनी जिद्द पर अड़े रहे। पासवान को सोनिया और वीपी सिंह के दबाव में इस्पात मंत्री के रूप में संतोष करना पड़ा। लालू पासवान के बीच पहली बार बगावत यहीं से शुरू हो गई।
2005 में बिहार में विधानसभा चुनाव की डुगडुगी बजी। पासवान अपनी सियासी हार का बदला लेने के लिए मैदान में उतर गए। पासवान ने नारा लगाया कि अब बिहार से जंगल राज को समाप्त करना है। याद रखिए, यह जंगल राज लालू और राबड़ी का था। चुनाव हुए और पासवान की पार्टी ने 29 सीटों पर जीत हासिल की और लालू की पार्टी 75 सीट पाकर बुरी तरह से हार गई। लालू अपनी हार को पचा नहीं पाए। उन्होंने मंथन किया और फिर पासवान के साथ संबंध बनाने की कोशिश की। पासवान नहीं माने। लालू प्रसाद ने पासवान के भाई पशुपति पारस को उपमुख्यमंत्री की कुर्सी का लालच दिया, फिर भी बात नहीं बनी। याद रहे इसी पशुपति पारस के दम पर 2004 में लोजपा, राजद और कांग्रेस के बीच गठबंधन हुआ था। नीतीश ने भी कोशिश की कि पासवान को प्रदेश का सीएम बना दिया जाए, लेकिन पासवान नहीं माने। पासवान की इस राजनीति के पीछे का सच यह था कि पासवान भाजपा के खिलाफ थे और नीतीश भाजपा के साथ। राजनीति ऐसी हुई कि पासवान के अधिकतर नेताओं को नीतीश ने अपने पाले में कर लिया। पासवान की पार्टी के नागमणि, अजीत कुमार, रामाश्रय प्रसाद, लवली आनंद और मुन्ना शुक्ला जैसे नेता नीतीश के पाले में चले गए। पासवान अडिग रहे। सब देखते रहे। छह माह बाद नवंबर में बिहार में फिर चुनाव हुए। लोजपा को 12 सीटें मिलीं और लालू की पार्टी राजद 75 से घट कर 57 पर आ गई। जदयू और भाजपा की साझा सरकार बन गई। लालू राज का खात्मा हो गया और बिहार में एक नई राजनीति ने जन्म लिया। यह राजनीति समाजवादियों और भाजपा की थी। चुनाव हारने के बाद  लालू को लगा कि पासवान के साथ उन्होंने, जो कुछ भी विरोध की राजनीति की वह सही नहीं थी। लालू को पासवान की कमी का अहसास हो गया। 2009 के चुनावी समय में पासवान और लालू फिर एक-दूसरे के नजदीक आए। 2009 के लोकसभा चुनाव में लालू और पासवान गठबंधन के तहत चुनाव लड़े। राजद 25 सीटों पर चुनाव लड़ी, जबकि पासवान को 12 सीटें दी गर्इं। कांग्रेस के लिए लालू ने अपने दंभ का परिचय देते हुए मात्र तीन सीटें छोड़ीं। कांग्रेस की ये सीटें थीं सासाराम, औरंगाबाद और मधुबनी। पासवान ने कांग्रेस की सीटों पर तो अपना प्रत्याशी नहीं उतारा, लेकिन लालू ने ऐसा नहीं किया। लालू ने सासाराम सीट से कांग्रेस उम्मीदवार मीरा कुमार के विरोध में जदयू से निकाले गए विधायक ललन पासवान को टिकट दे दिया। औरंगाबाद से कांग्रेस उम्मीदवार निखिल कुमार थे। उनके विरोध में लालू ने शकील अहमद को उतार दिया और मधुबनी से कांग्रेस के निवर्तमान दिल्ली प्रभारी शकील अहमद के खिलाफ लालू ने अब्दुल बारी सिद्दिकी को मैदान में खड़ा कर दिया। चुनाव हुए और पासवान की पार्टी सभी सीटों पर हार गई और पासवान भी हाजीपुर से रुखसत हो गए। माना जा रहा है कि पासवान की हार इसलिए हुई कि लालू के समर्थक यादवों ने पासवान के पक्ष में वोट नहीं डाला, जबकि पासवान समर्थक लोग लालू को वोट दिए थे। इस चुनाव में लालू को भी चार सीटें ही मिलीं।
2010 के विधानसभा चुनाव में लोजपा 75 सीटों पर चुनाव लड़ी, जबकि लालू की पार्टी राजद ने 158 पर अपने उम्मीदवार उतारे। पासवान की पार्टी को 3 सीटें मिलीं और राजद 22 सीटों पर सिमट गई। नीतीश ने फिर पासवान की पार्टी पर हमला किया और उनके दो विधायकों को अपने पाले में ले गए। नीतीश यहीं तक नहीं माने। नीतीश कुमार ने लोजपा के विधान पार्षद संजय सिंह, राजेंद्र राय, इजराइल राइन और राजू यादव को अपने पाले में ले लिया। नीतीश ने लोजपा के राज्य सभा सांसद शाबीर अली को भी जदयू में मिला लिया। राजनीतिक घटनाक्रम को देखा जाए, तो पासवान के लिए लालू से ज्यादा खतरनाक नीतीश कुमार ही रहे हैं। पासवान इन तमाम राजनीतिक हमलों के बावजूद टूटे नहीं। राजद के साथ उनका गठबंधन पहले से ज्यादा मजबूत हुआ है। यह गठबंधन पंचायत स्तर पर है।
 भाजपा से संबंध टूटने के बाद नीतीश की राजनीति भी, अब वैसी नहीं रही जो पहले थी। आगामी चुनाव में जदयू की क्या हालत होगी, इसे अभी कहना मुश्किल है, लेकिन इतना तय है कि बिहार की राजनीति अब एक नई करवट ले रही है। लालू प्रसाद जेल में हैं। उनके नेता लगातार अब बयान दे रहे हैं कि राजद 40 सीटों पर चुनाव अकेले लड़ेगी। राजद का यह बयान और खेल फिर पासवान को सोचने के लिए बाध्य कर रहा है। अभी हाल में ही नवादा की एक सभा में राजद के एक वरिष्ठ नेता ने पूर्व मंत्री राजबल्लभ यादव को उस लोकसभा सीट से चुनाव लड़ाने की बात कही है, जहां से 2009 के चुनाव में लोजपा उम्मीदवार सूरज भान की पत्नी चुनाव लड़ चुकी हैं। राजद आरा से भी चुनाव लड़ने की बात करने लगी है, जबकि इस सीट से लोजपा के रामाकिशोर सिंह चुनाव लड़ चुके हैं। बेतिया से लोजपा की टिकट पर प्रकाश झा चुनाव लड़ चुके हैं, जबकि अभी इस सीट से राजद के विधान पार्षद गुलाम गौसा और पूर्व सांसद सीताराम सिंह चुनाव लड़ने को लेकर लगातार बयान दे रहे हैं। इसके अलावा राजन तिवारी की पत्नी या उनके भाई या लोजपा के पूर्व विधायक महेश्वर सिंह भी यहां से चुनाव लड़ना चाह रहे हैं। मामला यहीं तक नहीं है। राजद नेता रामचंद्र पूर्वे मुजफ्फरपुर से चुनाव लड़ने की बात कर रहे हैं, जबकि पिछले चुनाव में लोजपा से भगवान लाल सहनी यहां से चुनाव लड़ चुके हैं। अभी यहां से लोजपा के कद्दावर नेता विजेंद्र चौधरी चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं। अररिया सीट से लोजपा के वर्तमान विधायक कम वोट से चुनाव हार गए थे, अब इस सीट से दलबदलू राजद नेता तस्लीमुद्दीन लड़ना चाह रहे हैं। पूर्णिया और कटिहार सीट पर पिछले चुनाव में लोजपा लड़ चुकी है, लेकिन अभी इन दोनों सीटों पर राजद नेताओं के बयान आ रहे हैं। बेगूसराय सीट भी लोजपा के खाते में थी, लेकिन अब इस सीट पर भी राजद की नजरें हंै। कहा जा सकता है कि 2009 के चुनाव में लोजपा जिन 12 सीटों पर चुनाव लड़ी थी, उनमें से 8 सीटों पर राजद की नजरें हैं।
राजद नेताओं के हालिया बयान से पासवान बेहद आहत हैं और आगे की राजनीति कैसे की जाए? इसको लेकर वे बेहत सतर्क भी हो गए हैं। यही वजह है कि पासवान बिहार में एक नई राजनीति की बात कर रहे हैं। हाल में पटना में एक प्रेस सम्मेलन के दौरान लोजपा संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष चिराग पासवान ने बिहार की सभी 40 सीटों पर चुनाव लड़ने की बात कह डाली। इतना ही नहीं, पिछले 28 नवंबर को पटना के श्री कृष्ण मेमोरियल हॉल में लोजपा के सभी बड़े नेताओं के बीच में इस बात का फैसला लिया गया कि बिहार के सभी 40 सीटों पर पार्टी चुनाव लड़ेगी। रामचंद्र पासवान ने यहां तक कह डाला कि ताली दोनों हाथों से बजती है। अगर राजद को ताली बजाने के लिए अपना हाथ नहीं बढ़ाना है, तो ताली कैसे बजेगी? लालू के जेल जाने के बाद पासवान हमेशा लालू की सुध ले रहे हैं। राबड़ी से भी मिल रहे हैं, लेकिन लोजपा के भीतर इस बात की चर्चा है कि जब छठ के दिन पासवान राबड़ी के घर गए, तो उन्हें सम्मान नहीं दिया गया।
 अब बिहार की राजनीति को देखें। बिहार में लालू के विरोध में अभी सवर्ण समाज है। वे लालू की राजनीति को पसंद नहीं करते। पासवान के प्रति सवर्णों में सम्मान तो है, लेकिन लालू के साथ होने की वजह से पासवान भी सवर्णों के निशााने पर आते रहे हैं। बिहार में आज भी दलित वोट पासवान के साथ है और अगड़ी जाति के वोट पर भी पासवान की पकड़ है। पिछड़ों के वोट पर कांग्रेस की राजनीति है और पासवान चाहते हैं कि कोइरी वोट को काटने के लिए उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी को अगर साथ ले लिया जाए, तो कांग्रेस, पासवान और कुशवाहा के बीच का गठबंधन बिहार में एक नई राजनीति दे सकती है। कुशवाहा की हालांकि भाजपा से भी बातचीत चल रही है, लेकिन कुशवाहा की शर्त यह है कि वह नीतीश जहां होंगे, वहां वे नहीं जाएंगे। इसी आधार पर कुशवाहा भाजपा से बात कर रहे थे। लेकिन पासवान की नई राजनीति में अगर लालू और नीतीश को अलग कर दिया जाए, तो कुशवाहा को कोई परेशानी नहीं होगी। इस गठबंधन में मुसलमान को आने में भी कोई परहेज नहीं होगा।

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