Friday, December 13, 2013

अब निगाहें फाइनल पर

 लोकसभा चुनाव के पहले पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव को सेमीफाइनल माना जा रहा था और राजनीतिक टीकाकार इसे नरेंद्र मोदी बनाम राहुल गांधी भी देख रहे थे। हालांकि पिछले तीन बार काइतिहास यही रहा है कि इन चुनाव परिणाम का असर लोकसभा चुनाव पर नहीं पड़ता है, लेकिन भाजपा की जीत से इतना तो साफ हो गया है कि अभी देश का मूड कांग्रेस के खिलाफ है। आम चुनाव में कांग्रेस के मुकाबले भाजपा के कार्यकर्ता ज्यादा उत्साहित नजर आएंगे। ऐसे में कांग्रेस को अपनी रणनीति पर फिर से विचार करना होगा, तभी वह भाजपा को टक्कर दे पाएगी। वरना लोकसभा चुनाव में भाजपा और मोदी को वॉकओवर मिल जाएगा...

केंद्र सरकार के कुशासन और भ्रष्टाचार ने प्रदेश कांग्रेस की भी लुटिया डूबो दी। कांग्रेस की यह लुटिया कब तक डूबी रहेगी, इस पर मंथन करते रहिए और झूठे तर्कों के बाण छोड़ते रहिए। लेकिन सच यही है कि आजाद भारत में आने वाला हर कल कांग्रेस को तब तक हासिये की ओर ढकेलता रहेगा, जब तक कि कांग्रेस वंशवाद की राजनीति से ऊपर नहीं उठती। कांग्रेस की हार तब तक होती रहेगी, जब तक कांग्रेस दलालों के चंगुल में फंसी रहेगी। कांग्रेस तक जनता की उम्मीदों पर खरी नहीं उतरेगी, जब तक वह अपनी नीतियां नहीं बदलेगी और महंगाई से लेकर भ्रष्टाचार पर अंकुश नहीं लगाएगी। यह तो पांच राज्यों के चुनाव परिणाम हैं। आने वाले लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस, भ्रष्टाचार, कुशासन और महंगाई के मसले पर अपना रुख साफ नहीं करती है, तो तय मानिए कि वह रसातल में चली जाएगी। आजाद भारत के इतिहास में 77 के बाद का यह पहला राजनीतिक खेल है, जहां कांग्रेस कुशासन और भ्रष्टाचार के नाम पर धूल धूसरित नजर आ रही है। लोकनायक जयप्रकाश नारायण की अगुआई में कांग्रेस के कुशासन और भ्रष्टाचार के विरोध में खड़ा 1974 का संपूर्ण क्रांति आंदोलन और फिर जेपी के नेतृत्व में जनता पार्टी के बैनर तले लड़े गए चुनाव को भला कौन भूल सकता है? जेपी की इंदिरा के कुशासन और भ्रष्टाचार के विरुद्घ संपूर्ण क्रांति ने कांग्रेस की चूलें हिला दी थीं। इंदिरा के निरंकुश शासन का जेपी ने उखाड़ फेंका था। यह बात और है कि जनता पार्टी सरकार की असमय ही मौत हो गई और कांग्रेस फिर 1980 में सत्ता पर आ बैठी। लेकिन इस बदलाव के दो नतीजे निकले थे। एक तो यह कि जनता अगर ठान ले, तो किसी का भी सिंहासन छीन सकती है और बड़े से भी बड़े निरंकुश को जमींदोज कर सकती। दूसरा नतीजा यह था कि समाज में भ्रष्टाचार की जड़ें काफी गहरी हो गई हैं और इसके ऊपर पलने वालों की लंबी फौज भी तैयार हो गई है। मध्यम वर्ग के नाम से जाना जाने वाला यह वर्ग आज इसी श्रेण की राजनीति करता है। वह भ्रष्टाचार के खिलाफ भी दिखता है और सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार में शामिल भी रहता है। कांग्रेस इन्हीं भ्रष्टाचारियों के दम पर आज चलती दिख रही है। आप कह सकते हैं कि 77 के बाद यह पहला अवसर है, जब भ्रष्टाचार और कुशासन पर जनता ने अपने-अपने तरीके से हमले किए हैं। राजनीति के नाम पर इस हमले की वाहवाही भले ही कोई मोदी या फिर केजरीवाल ले लें, लेकिन यह भी तय है कि देश की एक बड़ी आबादी सत्ता  और सरकार सेबेहद नाराज है और जनता की यही नाराजगी कांग्रेस पर भारी पड़ रही है।
  हालिया पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव परिणाम को चुनावी विश्लेषक लोकसभा चुनाव के लिए सेमीफाइनल के रूप मे देख रहे हैं। इन चुनावों में जनता के मिजाज जिस तरह से बदले हैं, उससे साफ हो गया है कि आगामी लोकसभा चुनाव में मोदी इफेक्ट को कोई भी राजनीतिक दल रोक नहीं सकता, लेकिन इस चुनाव परिणाम के एक और संकेत मिल रहे हैं कि अरविंद केजरीवाल की पार्टी को भी कोई हल्के में नहीं ले। संभव है कि आने वाली राजनीति में केजरीवाल की पार्टी केंद्र की सरकार बनाने और नहीं बनने देने में एक खास भूमिका में आ जाए। दिल्ली में केजरीवाल की पार्टी का पहला प्रदर्शन राष्ट्रीय राजनीति में बदलाव का संकेत भर है। कह सकते हैं कि अगर कोई पार्टी ईमानदारी से चुनाव लड़ती है और जनता के मुद्दों को आगे लाती है, तो आज भी जनता अपना बेस्ट उसी के हवाले कर देती है। आगामी चुनाव की राजनीति पर हम फिर चर्चा करेंगे और देश की बदलती राजनीति में उभरते मोदीवाद से भी आपका परिचय कराएंगे, लेकिन सबसे पहले हिंदी पट्टी के चुनावी परिणामों के संकेतों पर।
संकेत यह है कि सब कुछ बदल रहा है। कांग्रेस इस चुनाव में गर्त में चली गई। उसका सूपड़ा साफ हो गया। अब मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ भी एक लंबे समय के लिए कांग्रेस के हाथ से निकल गया। कह सकते हैं कि आगामी चुनावों में इन दोनों राज्यों में कांग्रेस का नाम लेना तक लोग भूल जाएंगे। और दिल्ली में? कांग्रेस के लिए फख्र की बात हो सकती है कि उसने दिल्ली में लगातार 15 सालों तक राज किया है। फख्र इस बात की भी हो सकती है कि उसने जी जान से दिल्ली को संवारा है और बनाया है। फख्र इस बात की भी हो सकती है कि इसी दिल्ली को बनाने और संवारने के फेर में दिल्ली को लूटा भी गया और देखते-देखते लाखों लोग दिल्ली में ऐसे पैदा हो गए, जो आज से 15 साल पहले दाने-दाने को तरसते थे या फिर छोटी मोटी दलाली या फिर प्रॉपर्टी का काम करते थे। इन्हीं सालों में वे करोड़पति से अरबपति हो गए। दिल्ली दलालों की हो गई। दिल्ली भ्रष्टाचारियों की हो गई। याद रखिए, इस चुनाव में अगर केजरीवाल की पार्टी ड्यूट्ी नहीं करती, तो फिर कांग्रेस की सरकार बनती। लेकिन केजरीवाल ने दलालों की राजनीति को रोक दिया है। इसी केजरीवाल की बदौलत आज भाजपा फुदक रही है। उसे जो भी सीटें आई हैं, उसमें केजरीवाल का फैक्टर ज्यादा अहम है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या कांग्रेस की मर्सिया पढ़ने का समय आ गया है? लेकिन इस सवाल के जवाब के लिए अभी लोकसभा चुनाव तक इंतजार करना पड़ेगा।
         तय मानिए सांप्रदायिकता की कथित राजनीति करते हुए, जो भी राजनीतिक पार्टी जनता के सामने होगी, जनता उसका बैंड बजा देगी। राजनीति चाहे जैसे भी बदली हो, मोदी की राजनीति को अब कोई रोक नहीं सकता। मोदी के लिए रास्ता साफ है। संभव है कि चार राज्यों में हुई हार से आहत कांग्रेस लोकसभा चुनाव में इसका बदला लेने की राजनीति खेल जाए, लेकिन जनता तो अभी मोदीमय होती दिख रही है। आज के परिणाम को देखें, तो लोकसभा में एनडीए की सरकार से कोई इंकार नहीं कर सकता है। यह बात और कि आगामी एनडीए का रूप रंग कैसा होगा? यह भी संभव है कि भाजपा में मोदी इफेक्ट को देखते हुए अब तक मोदी का विरोध कर रही कई क्षेत्रीय पार्टियां भाजपा के साथ दोस्ती का हाथ बढ़ा लें, लेकिन कुल मिलाकर अब सभी दलों की और खासकर भाजपा और कांग्रेस की निगाहें  लोकसभा की फाइनल लड़ाई पर जा टिकी हंै। चुनाव के बाद आने वाले दो साल भारी उथल-पुथल भरे होने वाले हैं। यह 1990 जैसा ही होगा, इसलिए अभी से अब उस स्थिति की तैयारी शुरू कर दीजिए, जिसमें नरेन्द्र मोदी पीएम होंगे और उनकी सरकार जातिवादी अंतर्विरोधों की शिकार होगी। आप या हम मोदी को पीएम बनने से अब रोक नहीं सकते। उनके नेतृत्व में भाजपा को हर हाल में 200 से ज्यादा सीटें मिलने जा रही हैं। यह संख्या 225 तक भी पहुंच सकती है। हिन्दुत्व, चायवाला और ओबीसी की राजनीति की त्रिवेणी भाजपा को उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड की 134 सीटों में से 100 से 120 तक दिला देगी। कॉरपोरेट का समर्थन उनको अलग से मिल रहा है़, इसलिए किसी मुगालते में नहीं रहिए। जो लोग दिल्ली में केजरीवाल फैक्टर को नजरअंदाज करते दिखाई दे रहे थे। सच तो यह है कि दिल्ली में अगर कांग्रेस की हार हुई है, तो जीत भी किसी की नहीं हुई है।  राजनीतिक गुणा भाग को गौर से देखिए, तो समझ में आ जाएगा कि केजरीवाल की पार्टी ने भविष्य की राजनीति की ओर संकेत किया है। केजरीवाल की पार्टी ने उन मठाधीश पार्टियों के होश उड़ा दिए हैं, जो अब तक यह मान कर चल रहे थे कि दिल्ली में कांग्रेस या भाजपा के अलावा कोई नहीं। आप ने दिल्ली में जो प्रदर्शन किया है, आगामी लोकसभा चुनाव में उन तमाम दलों के लिए किसी तमाचे से कम नहीं है। संभव है कि देश और प्रदेश की राजनीति करने वाली तमाम राष्ट्रीय और क्षत्रप पार्टियों के बीच आप पार्टी जनता का सबसे ज्यादा विश्वास जीते और पूरी राजनीतिक खेल को ही बिगाड़ दे। सच्चाई को नजरअंदाज करके हम सिर्फ अपनी इच्छाओं के घोड़े पर तो सैर कर सकते हैं, लेकिन हकीकत नहीं बदल सकते। मोदी और आप पार्टी इस देश के अहम फैक्टर हो गए हैं। अभी मोदी की राजनीति लोगों के दिमाग में बैठ सी गई है। जनता को लग रहा है कि मोदी उनका और देश का कुछ अलग तरीके से भला करेंगे। उसके बाद देश में नई राजनीति शुरू होगी, जो हमारे और आपके मनमाफिक होगी। अभी मुलायम, माया, लालू और नीतीश जैसों से किसी प्रकार की उम्मीद करना अपने आपको धोखे में रखना है, तो चलने दीजिए मोदी की राजनीति को। सात साल तक भाजपा की सरकार को जनता भी देख चुकी है। उसके अच्छे बुरे अहसास भी जनता को है। कितना अच्छा होता कि मोदी और केजरीवाल जनता की उम्मीदों पर खरे उतरते और दोनों की आपसी मिलीभगत से केंद्र की सरकार बन जाती।


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