Sunday, January 5, 2014

मुद्दों की राजनीति : सफल या असफल?

धर्मनिरपेक्षता, हिंदुत्व, गरीबी हटाओ, कसम राम की खाते हैं, मंदिर वहीं बनाएंगे जैसे तमाम नारे भारतीय राजनीति में हिट रहे हैं। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि इन मुद्दों के बल पर जिस राजनीतिक दल ने सत्ता का सुख भोगा, क्या उस दल ने सत्ता में आने के बाद इस पर अमल भी किया...   

क्या मुद्दे या नारे चुनावी जीत के कारण हो सकते हैं? क्या भाजपा के तरह-तरह के जोश भरने वाले नारे भाजपा की जीत के कारण हो सकते हैं? क्या कांग्रेस की विकास से जुडेÞ तरह-तरह के नारे पार्टी की तकदीर बदल सकते हैं? और क्या आम आदमी पार्टी के नारे लोगों को आकर्षित कर सकते हैं? यह सवाल आज इसलिए किए जा रहे हैं कि आज के नारे और मुद्दे भले ही कुछ समय के लिए लोगों को आकर्षित करते हों, लेकिन उसका असलियत से कोई लेना-देना नहीं है। लेकिन पहले ऐसा नहीं था। 90 के बाद देश में चुनावी मुद्दे और नारे की राजनीति होने लगी और ये सारे मुद्दे और नारे लोगों को ठगने से लेकर वोट उगाहने के लिए दिए जाने लगे। यही वजह है कि चुनावी मुद्दे और नारे अब लोगों को आकर्षित नहीं करते। जनहित से जुड़े मुद्दे तो राजनीतिक पार्टियां उठाती ही नहीं और जनता को प्रभावित करने वाले नारे बनते ही नहीं हैं। आम आदमी के जीवन से जुड़ी जो समस्याएं हैं, उन्हें राजनीतिक दल अपने चुनावी मुद्दे ही नहीं बनाते। भाजपा के लिए चुनावी प्रचारतंत्र और मुद्दे, नारे का काम करने वाली एक विज्ञापन एजेंसी के अधिकारी कहते हैं कि अब पार्टी की नीतियों से जुड़े मुद्दे नारों के दिन चले गए। कोई भी पार्टी मुद्दों पर आधारित राजनीति नहीं कर रही है। ऐसे में हमारा प्रयास लोगों को चुनाव के दिनों में भावना के स्तर पर उकसाने का रह गया है। पार्टियां भी चाहती हैं कि प्रचारतंत्र भले ही मुद्दाविहीन हो, लेकिन जनता उससे स्वयं को जुड़ा हुआ महसूस करे।
     ऐसा नहीं है कि केवल भाजपा ही मुद्दाविहीन राजनीति कर रही है। कांग्रेस समेत  तमाम पार्टियां इसी रास्ते पर चल रही हैं। नेहरू युग में हुए तीन लोकसभा चुनावों में मुख्य रूप से लोकतंत्र, समाजवाद और नियोजित आर्थिक विकास के मुद्दे छाए रहे। विपक्षी सोसलिस्ट पार्टियां अंग्रेजी भाषा का वर्चस्व खत्म करने, आर्थिक विकास का लाभ देश के आम आदमी को पहुंचाने के मुद्दे पर चुनाव मैदान में उतरी थी। 1967 के चौथी लोकसभा चुनाव में कुछ और मुद्दे उठे। जनसंघ ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में दो मुद्दे उठाए थे। बाजार और अर्थव्यवस्था पर से सरकारी नियंत्रण खत्म करने और देश में संघीय शासन प्रणाली की जगह केंद्रित शासन व्यवस्था स्थापित करना।
        वरिष्ठ राजनीतिक चिंतक सुरेंद्र मोहन कहते थे कि आजादी के बाद कुछ सालों तक तो देश की राजनीति के केंद्र में जनता होती थी, लेकिन बाद के वर्षों में राजनीतिलोगों की लाभ के लिए होने लगी। वाजपेयी के एनडीए सरकार पर कटाक्ष करते हुए सुरेंद्र मोहन ने कहा था कि एनडीए की सरकार जबरन लोगों को फीलगुड के अपने नारे के सहारे गुडफील कराना चाह रही है। आज प्रमुख राजनीतिक मुद्दे गरीबी हटाने और बेकारी दूर करने की है, न कि देश की आधी गरीब आबादी को फीलगुड के जरिये विद्रोही बनाने की। इस संबंध में पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर का नजरिया भी साफ था। चंद्रशेखर मानते थे कि कथित विकास की डफली बजाने से लोगों की स्थिति नहीं बदल सकती, जिस तरह से राजनीतिक पार्टियां आम जनता से जुड़े मुद्दे को गायब कर रही हैं, उससे लोगों के मन में विद्रोह होना स्वाभाविक है।
         मुद्दे और नारे भारतीय चुनावी राजनीति के अहम अंग रहे हैं। चुनाव आते ही मुद्दों की राजनीति शुरू हो जाती है। इन मुद्दों के जरिये राजनीतिक पार्टियां यह दिखाना चाहती हैं कि आम आदमी की समस्याओं से उन्हें कितना सरोकार है, लेकिन सच्चाई यह है कि इनके जरिये राजनीतिक पार्टियां अपना उल्लू सीधा करती हंै। 1969 में कांग्रेस विभाजन के बाद कांग्रेस ने कुछ नए मुद्दे गढेÞ। बैंकों के राष्ट्रीयकरण और देशी राजाओं के वंशजों के प्रीवी पर्स को समाप्त करके कांग्रेस ने सोसलिस्ट पार्टी के मुद्दों को धराशाही कर दिया था। श्रीकांत वर्मा द्वारा गढ़ा गया गरीबी हटाओ नारा कांग्रेस का ऐसा नारा था, जिसके चलते ग्रामीण भारत के मतदाताओं ने कांग्रेस से अपने से सीधा जुड़ा हुआ महसूस किया। नतीजा, इंदिरा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने सरकार बना ली। कांग्रेस के एक बुजुर्ग नेता कहते हैं कि गरीबी हटाने का मुद्दा कांग्रेस के लिए नया नहीं था। कांग्रेस महात्मा गांधी स्वतंत्रता आंदोलन के समय ही देश से गरीबी दूर करने के लिए बचनबद्घ थी, लेकिन 1971 के चुनाव में इस नारे का चुनाव में पहली बार इस्तेमाल कांग्रेस ने ही किया। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता भाजपा के वर्तमान चुनावी मुद्दे से बिल्कुल इत्तेफाक नहीं रखते। वे भाजपा के किसी भी तरह के वोट फॉर इंडिया को स्वीकार नहीं करते। उनका मानना है कि नेहरू इंदिरा के जमाने में जो चुनावी मुद्दे हुआ करते थे, उसमें किसी तरह का छल कपट नहीं था। लेकिन वही कांग्रेस अब सत्ता में आने के लिए उस गौरवशाली इतिहास की अनदेखी कर रही है।
         आपातकाल के बाद 1977 में हुए चुनाव से पहले देश में कांग्रेस की स्थिति बेहद मजबूत थी और जनता के सामने कांग्रेस का राष्ट्रीय स्तर पर कोई विकल्प भी नहीं था। 18 जनवरी 1977 को देश की पांचवीं लोकसभा का कार्यकाल समाप्त हो गया था। 77 के चुनाव में कांग्रेस धर्मनिरपेक्षता, अल्पसंख्यकों की सुरक्षा, गरीबी दूर करना और मूल्य नियंत्रण जैसे मुद्दों को लेकर जनता के सामने आई। जनता पार्टी आपातकाल को समाप्त करने, मौलिक अधिकारों की बहाली, मीसा में बंद लोगों को न्याय दिलाना, प्रेस की आजादी बहाल कराना और लोगों को न्याय जैसे मुद्दे लेकर चुनावी मैदान में उतरी। सीपीआई ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली को मजबूत करना, महंगाई पर रोक, तालाबंदी पर रोक जैसे मुद्दे उठाए। इस चुनाव में जनता पार्टी को 41.3 फीसदी वोट के साथ 297 सीटें मिलीं और कांग्रेस की हार हो गई। कांग्रेस को 34 फीसदी वोट के साथ 152 सीटें मिलीं। आपातकाल का खामियाजा कांग्रेस को भुगतना पड़ा था। बाद में इंदिरा गांधी ने इसे स्वीकार भी किया।
      1977 की जनता सरकार आपसी गुटबाजी और खींचतान की शिकार हो गई। 1980 में मध्यावधि चुनाव हुए। इस चुनाव में कांग्रेस ने स्थायी सरकार का नारा दिया। यह मुद्दा इतना प्रभावी था कि जनता का एकमुश्त वोट कांग्रेस के खाते में चला गया। इस चुनाव में करीब 43 फीसदी वोट के साथ कांग्रेस को 353 सीटें मिलीं। जनता पार्टी को 432 में से महज 31 सीटें मिल सकीं। सातवीं लोकसभा का काल इंदिरा गांधी की हत्या के बाद अपनी निर्धारित अवधि से 21 दिन पहले समाप्त हो गया। 1984 के इस चुनाव में कांग्रेस को तीन चौथाई बहुमत मिला और ऐसा बहुमत कांग्रेस को नेहरू काल में भी नहीं मिला था। इस चुनाव में राजीव गांधी ने देश को 31वीं सदी में ले जाने का वादा किया था। चुनाव में न्यायिक स्वतंत्रता की रक्षा, केंद्र राज्य के संबंधों में सुधार, साफ और स्थिर सरकार, भ्रष्टाचार को हटाने, अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और 1 से 14 साल के बच्चों को मुफ्त शिक्षा देने की बात कही गई थी। भाजपा के मुद्दे थे कम खर्चीला और सही न्याय, चुनाव प्रक्रिया में सुधार और पूर्ण रोजगार। 1984 के चुनाव में सीपीएम के मुद्दे थे न्यायपालिका की स्वतंत्रता, रोजगार, भूमि सुधार और विदेशी ऋण। इस चुनाव में कांग्रेस ने 515 उम्मीदवार खड़े किए थे, जिनमें 415 सीटों के साथ उसे 48 फीसदी मत प्राप्त हुए। 1984 का चुनाव कांग्रेस की सबसे बड़ी उपलब्धि थी। जनता को विश्वास था कि कांग्रेस ही स्थिर सरकार दे सकती है और कांग्रेस ही उनकी अपेक्षाओं को पूरा कर सकती है। इस चुनाव के बाद सुरेंद्र मोहन ने कहा था कि जनता पार्टी सरकार के पतन के बाद जनता में नए सत्ता शासन के प्रति अविश्वास घर कर गया और मतदाता ने कांग्रेस को ही अपना उद्घारक समझा। लेकिन सच पूछा जाए, तो यह कांग्रेस भी जनता की भावनाओं का दोहन ही कर रही थी।
          1989 की लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने स्थिरता का नारा दिया। इसके साथ ही देश को 21वीं सदी की ओर ले जाने, राजीव गांधी को मिस्टर क्लीन बताने, धर्मपिरपेक्षता के मुद्दे उठाए गए। राष्ट्रीय मोर्चा जो 1988 में जनता पार्टी और लोकदल के विलय से बनी थी, ने परिवर्तन के और वोट, सुधार के लिए वोट का नारा दिया। भाजपा ने खुद को ज्योति का दीप स्तंभ के रूप में प्रचारित किया। सबके लिए न्याय, मूल्य आधारित राजनीति और सदचरित्र नेता अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी के नारे लगाए। जबकि इसी चुनाव में सीपीआई ने लोकतांत्रिक मूल्यों का ह्रास, सत्ता का विकेंद्रीकरण, महिलाओं की उपेक्षा, हरिजनों और आदिवासियों पर अत्याचार के नारे लगाए। सीपीएम के मुद्दे भुखमरी, गरीबी, रुपये का अवमूल्यन और राजस्व घाटे के नारे लगाए थे। इसी चुनाव में कांग्रेस को 39 फीसदी वोट के साथ197 सीटें मिलीं, जबकि भजपा को 11 फीसदी वोट के साथ 85 सीटें, जनता दल को 17 फीसदी वोट के साथ 143 सीटें, सीपीएम को 7 फीसदी वोट के साथ 33 सीटें और सीपीआई को 2 फीसदी वोट के साथ 12 सीटें मिली। सामाजिक चिंतक आनंद कुमार कहते हैं कि 1989 का चुनाव कांग्रेस के लिए भारी था। उस समय तक भाजपा का राजनीति में पूर्णत: प्रवेश हो गया था और चूंकि यह एक अवसरवादी पार्टी है, इसलिए यहीं से जोड़तोड़ करना शुरू कर दिया। भाजपा ने उसी समय से सत्ता में आने की रणनीति बना ली थी और उसे जनसरोकारों से कोई मतलब नहीं था।
 1991 के चुनाव में कांग्रेस एक बार फिर स्थिर सरकार के नारे के साथ मैदान में आई। भाजपा ने राम, रोटी और इंसाफ का नारा दिया। जनता दल और वामपंथी पार्टियों ने मंडल कमीशन लागू करने के वादे और सजपा चार माह बनाम 40 साल के नारे के साथ चुनाव मैदान में उतरी। इस चुनाव में संभवत: कांग्रेस की स्थिति खराब होती, लेकिन पहले चरण के चुनाव के बाद राजीव गांधी की निर्मम हत्या, दूसरे चरण के चुनाव में कांग्रेस को सहानुभूति वोट दिलाने में मददगार साबित हुई। इसी तरह कांग्रेस को कुल 224 सीटें मिली, जबकि भाजपा के हाथ 119 सीटें लगी। सीपीएम 35, जनता दल 55, सीपीआई 13 और सजपा 5 सीटें जीतने में सफल रही। नरसिंहा राव के नेतृत्व में पांच साल तक कांग्रेस ने सरकार चलाई, लेकिन 1996 के चुनाव में कांग्रेस को भ्रष्टाचार के मुद्दे पर भारी पराजय का सामना करना पड़ा।  
         1996 में भाजपा की सरकार बनी, लेकिन 13 दिनों के भीतर गिर गई। 1998 में मध्यावधि चुनाव हुए। यह चुनाव मुद्दाविहीन था। चुनाव के बाद फिर एनडीए की सरकार बनी, लेकिन 13 माह बाद ही यह सरकार गिर गई। फिर देवगौड़ा और इंद्र कुमार गुजराल की सरकार बनी, जो आपसी खींचतान की भेंट चढ़ गई। 1999 में पुन: चुनाव हुए और भाजपा के नेतृत्व में एनडीए की सरकार बनी।
      2004 में 14वीं लोकसभा के चुनाव में भाजपा फीलगुड इंडिया के नारे के साथ चुनाव मैदान में उतरी, जबकि कांग्रेस फिर स्थिरता के साथ ही उदारीकरण की नीति को और आगे बढ़ाने के साथ ही ‘कांग्रेस का हाथ गरीबों के साथ’ वाले नारों के साथ चुनाव मैदान में उतरी। एनडीए शासनकाल में हुए घोटालों के अलावा बड़े पैमाने पर सरकारी कंपनियों की बिक्री को लेकर जनता में फैले आक्रोश की वजह से चुनाव में भाजपा की हार हुई, लेकिन कांग्रेस को भी बहुमत नहीं मिला। बाद में एनडीए की तर्ज पर यूपीए की रचना की गई और मनमोहन सिंह की अगुवाई में सरकार बनी। 2009 के चुनाव में कांग्रेस फिर स्थिरता के नारों के साथ चुनाव मैदान में उतरी, जबकि भाजपा कांग्रेस के खिलाफ भ्रष्टाचार का मामला उछाला, लेकिन चुनाव में फिर भाजपा की हार हुई और वह 116 सीटों पर आकर सिमट गई। कांग्रेस को 206 सीटें मिलीं और फिर यूपीए 2 की सरकार बनी।
       गौरतलब है कि 1952 से लेकर 2013 तक के चुनाव में पार्टियों की पहचान में जिस तरह परिवर्तन हुए हैं, उसी अनुपात में उनके प्रचारतंत्र में भी बदलाव आए हैं। समाजशास्त्री आनंद कुमार कहते हैं कि कांग्रेस हमेशा गरीबों के साथ होने का दम भले ही भरती हो, लेकिन इसके इरादे ठीक नहीं हैं। लेकिन भाजपा के मुद्दे तो आम जनता के लिए हंै ही नहीं। जनता के लिए कांग्रेस मां है, तो भाजपा उसकी मौसी। अब तक के अनुभव के आधार पर तो यही कहा जा सकता है कि दोनों पार्टियां चुनाव में घोषित अपने मुद्दों से हटकर काम करती रही हैं। लेकिन कांग्रेसी नेता ऐसा नहीं मानते। कांग्रेस नेता शकील अहमद कहते हैं कि कांग्रेस की राजनीति जनता के विकास से जुड़ी होती है। आज तक देश में गरीबी से लेकर जितने तरह के मसले हों, उस पर सबसे ज्यादा काम किसी पार्टी ने किया है, तो वह कांग्रेस ही है। कांग्रेस चुनाव में भले ही हार जाए, लेकिन जनता की समस्याओं की असली राजनीति वही करती है और करेगी भी।
जाहिर है, अब इन नारों का जनता की समस्या से कोई मतलब नहीं रह गया है। अरविंद केजरीवाल के उस बयान पर नजर डालें, तो साफ हो जाता है कि उनके पास कोई जादू की छड़ी नहीं है। वे प्रयास करेंगे, लेकिन चुनाव से पहले तो सब कुछ बदल देने की बात कही गई और उस बदलाव की बात को जनता के सिर आंखों पर ले लिया था।

No comments:

Post a Comment