Friday, January 17, 2014

प्रियंका शरणम् कांग्रेस

आम चुनाव के लिए कांग्रेस की खास रणनीति

केंद्र सरकार महंगाई, भ्रष्टाचार और घोटालों के आरोपों से पस्त है। कांगा्रेस नेतओं की लोकप्रियता घटती जा रही है। कार्यकर्ता निराश हैं। किसी ऐसे मसीहा के इंतजार में हैं कार्यकर्ता, जो कांग्रेस की डूबती नैया को पार लगा दे। ऐसे में कांग्रेस एक बार फिर से नेहरू-गांधी परिवार के तुरुप के पत्ते की ओर देख रही है। सोनिया और राहुल के बूते पिछले दस सालों से केंद्र और कई राज्यों में सत्तासुख भोगकर कांग्रेसियों ने पार्टी को एक बार फिर से संकट में फंसा दिया है। इस संकट से उबारने के लिए प्रियंका गांधी की ओर कांग्रेसी टकटकी लगाए बैठे हैं...

-अखिलेश अखिल
विवश, लाचार, कमजोर, राहविहीन और जनता के गुस्से की शिकार कांग्रेस जनता की सेवा करते-करते थक गई है या फिर जनता को लूटते-लूटते पस्त हो गई है, इसकी सही जानकारी भला कौन दे सकता है। इस पर न कांग्रेसी बोलेंगे और न ही अन्य दलों के नेता, क्योंकि हमाम में सभी नंगे हैं। देश की राजनीति से लेकर समाज और अर्थव्यवस्था में बहुत कुछ लाने वाली कांग्रेस इसी समाज व्यवस्था से लूटने में भी कभी पीछे नहीं रही। इसने देश को बहुत कुछ दिया, तो लिया भी है। इसी लेने की वजह से जनता ने कई दफा कांग्रेस को सबक भी सिखाया, लेकिन आॅक्टोपस जैसे समुद्री जीव के फांस में आने के बाद भला कोई बच सकता है? कई दफा साफ होने के बाद भी कांग्रेस जीवित होती रही है। यह कांग्रेस के प्रति जनता का मोह कहिये या फिर जनता पर कांग्रेस का जादू। इस बार फिर कांग्रेस रसातल की ओर जा रही है। केंद्र में लगातार 10 साल शासन चलाने के बाद भी कांग्रेस का नाम लेने में लोगों को घबराहट हो रही है, तो साफ है कि उसके पास विश्वसनीयता का संकट खड़ा हो गया है। विधानसभा चुनाव में अपना सब कुछ गंवा चुकी कांग्रेस के सामने लोकसभा चुनाव है, लेकिन देश की बदलती राजनीति, भ्रष्टाचार और महंगाई के दंश ने कांग्रेस को पस्त कर रखा है। जिस राहुल गांधी नाम के नेता पर कांग्रेस फिर दांव खेलने में लगी है, वह मोदी के सामने पहले से ही पस्त थे। अब आप जैसी पार्टी ने उसके लिए और संकट पैदा कर दिया है। एक-एक करके सभी सहयोगी दल भी अपना रास्ता ढूंढ रहे हैं। ऐसे में कांग्रेस की प्रियंका गांधी पर जाकर आस टिक गई है, इसमें गलत क्या है? इस नाम पर अक्सर कांग्रेस की निगाहें टिकती रही हैं, लेकिन इस बार कुछ ज्यादा ही है। आगे बढेÞं, इससे पहले प्रियंका के कुछ बोल पर आपका ध्यान आकर्षित करते हैं।
    1999 के चुनाव के वक्त एक साक्षात्कार में प्रियंका ने यह साफ कर दिया था कि वह राजनीति में नहीं आएंगी, लेकिन देश और जनता की सेवा करती रहेंगी। लेकिन प्रियंका को लेकर कांग्रेस के भीतर और बाहर राजनीतिक प्रपंच जारी है।  आगामी चुनाव को लेकर कांग्रेस के भीतर इस बात को लेकर मंथन जारी है कि आखिर कैसे कांग्रेस की साख लौटे और कैसे फिर कांग्रेस की नेतृत्व वाली सरकार बने। मंथन इस बात पर भी हो रहा है कि राहुल गांधी को आगे बढ़ाने का लाभ पार्टी को कितना मिलेगा? बहस इस बात पर भी हो रही है कि मोदी की आक्रामक राजनीति और आप जैसी पार्टी के उदय के बीच कांग्रेस अपनी राजनीति कैसे बचा पाए? हाल ही में विधानसभा चुनावों में करारी हार के बाद कांग्रेस के भीतर मंथन इस बात को लेकर भी है कि चाटुकारिता और जड़विहिन नेताओं की फौज क्या कांग्रेस की राजनीति को अब और आगे बढ़ाने में कारगर है? और इन तमाम बहसों के बीच मूल बहस इस बात पर टिकी है कि आखिर कैसे राहुल की अगुआई में पार्टी की नई तस्वीर सामने लाई जाए, ताकि जनता के बीच विश्वास जाग सके। जनता के बीच इसी विश्वास को जगाने के क्रम में कांग्रेसियों की नजरें बार-बार उस प्रियंका गांधी की तरफ जा रही हैं, जो अब तक सक्रिय राजनीति करने से अपने को बचा रही हैं। कांग्रेस का एक बड़ा धड़ा प्रियंका को तुरुप का इक्का मान रहा है, जबकि कांग्रेस के माहिर खिलाड़ी अब कांग्रेस में कुछ बदलाव की संभावनाओं को भी टटोल रहे हैं। इस बदलाव के खेल में माइनस राहुल किसी और को प्रधानमंत्री उम्मीदवार बनाने की बात है, लेकिन इस बात को कोई साहस के साथ रखने को तैयार नहीं है। ऐसे में प्रियंका गांधी पर जाकर फिर कांग्रेस की राजनीति केंद्रित हो जाती है। प्रियंका गांधी अभी तक सक्रिय राजनीति में आने से बचती रही हैं, लेकिन जब वह आधी अधूरी राजनीति करती ही हैं, तो इस बात की प्रबल संभावना बन सकती है कि वह देश की राजनीति भी करें। सत्ता की बागडोर संभालने में वह सहयोगी बनें। लेकिन प्रियंका की एक दिक्कत भी है कि अगर वह सीधे अपने भाई को मजबूत करने के साथ ही पार्टी को मजबूत करने के लिए सामने आती हैं, तो साफ है कि राहुल की राजनीति फीकी पड़ जाएगी और फिर राहुल पिटे मोहरे से ज्यादा कुछ नहीं रह जाएंगे। यही वजह है कि प्रियंका की राजनीतिक दांव खेलने से पहले कांग्रेस के रणनीतिकार बेहद पशोपेस में हैं। अब जब प्रियंका की चर्चा चल ही निकली है, तो आइए एक नजर प्रियंका पर भी डाल लें।
        42 वर्षीय प्रियंका गांधी वाड्रा गांधी-नेहरू परिवार से हैं और फिरोज गांधी और इंदिरा गांधी की पोती हैं। प्रियंका वाड्रा भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी और भारतीय राष्टÑीय कांग्रेस की वर्तमान अध्यक्ष एवं सत्तारूढ़ संयुक्त प्रगतिशील   गठबंधन की मुखिया सोनिया गांधी की दूसरी संतान हैं। उनकी दादी इंदिरा गांधी और परनाना जवाहर लाल नेहरू भी भारत के प्रधानमंत्री रहे हैं। उनके दादा फिरोज गांधी एक जाने-माने संसद सदस्य थे और उनके परनाना, मोतीलाल नेहरू भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक महत्वपूर्ण नेता थे। प्रियंका ने शिक्षा मॉडर्न स्कूल कॉन्वेंट आॅफ जीसस एंड मैरी, नई दिल्ली से प्राप्त की और वे दिल्ली विश्वविद्यालय से मनोविज्ञान विषय में स्नातक हैं। वे शौकिया रेडियो संचालक भी रही हैं। प्रियंका गांधी की भूमिका को राजनीति में विरोधाभास के तौर पर देखा जाता है। उन्होंने अपनी मां और भाई के निर्वाचन क्षेत्रों रायबरेली और अमेठी में नियमित रूप से कार्य किया है। इन निर्वाचन क्षेत्रों में उनकी लोकप्रियता भी है। अपनी तरफ जनता को आकर्षित करने में भी वह सफल रही हैं। अमेठी में प्रत्येक चुनाव के समय एक लोकप्रिय नारा रहा है अमेठी की डंका, बिटिया प्रियंका। इसका मतलब लोग कहते हैं कि अमेठी प्रियंका का है। उन्हें यहां से चुनाव लड़ना चाहिए। उन्हें अपनी मां का मुख्य राजनीतिक सलाहकार भी माना जाता है।
2004 और 2009 के आम चुनाव में वह अपनी मां के चुनाव अभियान की प्रबंधक थीं और अपने भाई राहुल गांधी के चुनाव प्रबंधन में मदद की थी। एक प्रेस वार्ता में इन्हीं चुनावों के दौरान उन्होंने कहा कि राजनीति का मतलब जनता की सेवा करना है, जिसे मैं पहले से ही कर रही हूं। मैं इसे पांच और अधिक सालों के लिए जारी रख सकती हंू। इस बात से यह अटकलें तेज हो गई कि वह उत्तर प्रदेश में कांग्रेस पार्टी के लिए कोई जिम्मेदारी वहन कर सकती हैं। बीबीसी हिन्दी रेडियो सेवा के एक साक्षात्कार में प्रियंका ने श्रीलंका में युद्घ का उल्लेख किया और टिप्पणी की तुम्हारे आतंकवादी बनने में केवल तुम जिम्मेदार नहीं हो, बल्कि तुम्हारी पद्घति जिम्मेदार है, जो तुम्हें एक आतंकवादी बनाती है।
प्रियंका की शादी रॉबर्ट वाड्रा से हुई है। वाड्रा व्यापारी हैं और विवादों में भी खूब रहे हैं। इस बात में क्या सच्चाई है, कहना मुश्किल है, लेकिन कहा जाता है कि वाड्रा से प्रियंका की मुलाकात संभवत: उनके पारिवारिक मित्र ओत्तावियो क्वात्रोची के घर पर हुई। लेकिन बेचारगी के सामने कोई भविष्य की योजना नहीं होती। तमाम राजनीतिक अटकलों के बीच कांग्रेस ने प्रियंका को वैतरणी पार उतरने के लिए राजनीतिक मैदान में उतार भी दिया, तो कुछ बदलाव तो सामने आएगी ही। हमेशा विवादों से दूर रहने वाली प्रियंका गांधी वाड्रा को गांधी परिवार का वास्तविक उत्तराधिकारी माना जाता रहा है, लेकिन उन्होंने राजनीति के बजाय परिवार को ज्यादा तरजीह दी है और अपने भाई राहुल गांधी की राह के कांटों को हटाती रही हैं। इनकी राजनीति समझ लाजवाब है, इसलिए कहा जाता है कि जब भी राहुल किसी महत्वपूर्ण मौके पर भाषण देते हैं, तो वही तय करती हैं कि क्या कहना है और क्या नहीं। प्रियंका कभी विवादों में नहीं रही हैं। उनकी इसी छवि को कांग्रेस अगले आम चुनाव में भुनाना चाहती हैं। प्रियंका अपने आकर्षक व्यक्तित्व के कारण युवाओं के बीच काफी लोकप्रिय हैं। लोगों का ऐसा मानना है कि प्रियंका यदि राष्टÑीय स्तर पर लोगों से सीधा संवाद करें और कांग्रेस के लिए वोट मांगें, तो इसका काफी प्रभाव पड़ सकता है। एक बात साफ है कि जिस तरह से कांग्रेस के प्रति जनता में अविश्वास की भावना घर कर गई है और कांग्रेस के प्रति जनता का मोह भंग होता जा रहा है,ऐसी हालत में कांग्रेस को एक ऐसे चेहरे की तलाश तो है ही, जो पार्टी की मलिन छवि को सफेद कर सके। प्रियंका की राजनीति कितनी सफल हो सकेगी और आज की बदलती राजनीति के साथ ही लोगों के बदलते मिजाज को भुनाने में वे कितना सफल हो पाएंगी, इसे भरोसे के साथ तो नहीं ही कहा जा सकता है। और अगर प्रियंका भी चूक गर्इं, तब क्या होगा? यही वजह है कि कांग्रेस प्रियंका को भविष्य के लिए तुरुप का पत्ता मान रही है। संभव है कि इस तुरुप के पत्ते को आगे की राजनीति में इस्तेमाल किया जा सके। अपनी लुक और स्टाइल की वजह से प्रियंका में लोग उनकी दादी दिवंगत प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की झलक देखते हैं। चेहरा, ब्वॉय कट बाल, साड़ी पहनने का ढंग, चलने का अंदाज, लोगों से आत्मीयता से मिलने आदि में दोनों में काफी समानता है। इंदिरा गांधी को कठोर निर्णय लेने वाला नेता माना जाता था और इसी संकट से आज कांग्रेस जूझ रही है, इसलिए पार्टी ऐसा मानती है कि प्रियंका को लोग हाथोंहाथ लेंगे। प्रियंका को वाकपटु माना जाता है। वे भाषण के दौरान जनता से संवाद करती नजर आती हैं। उनकी वाणी में कभी कठोरता नहीं रहती है।
वे लोगों से बातचीत के दौरान मुस्कुराती नजर आती हैं। वे दिल्ली में भले वेस्टर्न परिधानों में नजर आएं, लेकिन ग्रामीण इलाकों में इंदिरा जैसी साड़ी में ही दिखती हैं और देश के कई हिस्से ऐसे हैं, जहां आज भी इंदिरा गांधी के नाम पर कांग्रेस को वोट मिलते हैं। प्रचार के दौरान भी देखा गया कि प्रियंका गांधी किस तरह महिलाओं के बीच में पहुंच जाती हैं। उनके कंधे पर हाथ रखकर बातचीत आगे बढ़ाती हैं। इंदिरा गांधी के भाषण की झलक भी प्रियंका में देखी जा सकती है। जाहिर है, लोकसभा चुनावों में प्रियंका के करिश्माई व्यक्तित्व का फायदा कांग्रेस को मिल सकता है। मोदी के खिलाफ कांग्रेस अपने सारे हथियार आजमाएगी और   प्रियंका उसके तरकश का सबसे धारदार तीर साबित हो सकती हैं। जिन दो तबकों पर चुनावों के नतीजे काफी हद तक निर्भर करते हैं, उनमें महिलाएं और नौजवान शामिल हैं। इत्तेफाक से प्रियंका गांधी, इन दोनों समूहों में अच्छी पैठ रखती हैं। महिलाएं उनमें इंदिरा गांधी को तलाशती हैं और युवा उनमें एक नौजवान-वाइब्रेंट नेता देखते हैं। जाहिर है, आगामी चुनावों से पहले जिस तरह का माहौल देश में बना हुआ है, केवल राहुल गांधी के मैदान में उतरकर मुकाबला करना मुश्किल होगा। ऐसे में अगर प्रियंका का साथ मिला, तो कांग्रेस कुछ वोट बचा सकती है। उत्तर भारत में प्रियंका गांधी का रुतबा खास है और कांग्रेस को अच्छी तरह पता है कि वह तुरुप का इक्का साबित हो सकती हैं। हालांकि, अभी यह पूरी तरह तय नहीं है कि उन्हें किस भूमिका में इस्तेमाल किया जाए। अगर चुनावों से पहले कमान संभालने में वह भी हाथ बंटाती हैं, तो पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं में नया जोश फूंका जा सकता है। राजनीतिक विश्लेषक अवधेश कुमार कहते हैं कि यह बात और है कि राजनीति में प्रियंका को लाने की बात पिछले कई सालों से की जा रही है, लेकिन प्रियंका इसे नकारती रही हैं। अभी तक वह अपने भाई और मां की सीटों तक ही काम करती रही हैं और वहां संगठन स्तर पर भी उसने बेहतर काम किया है। जहां तक इस बार के चुनाव में उसे लाने की बात हो रही है साफ है कि इसका फायदा कांग्रेस को हो सकता है। राहुल की बजाए प्रियंका का चेहरा ज्यादा आकर्षक है और पार्टी नेताओं से लेकर कार्यकर्ताओं में उसकी बेहद मांग भी है। उसके आने से पार्टी कार्यकर्ताओं में उत्साह बढ़ सकता है, लेकिन चुनावी गणित में वह कोई बदलाव ला सकें, इसकी संभावना कम ही दिख रही है। लेकिन तय मानिए प्रियंका कांग्रेस के लिए लाभकारी हो सकती हैं।’
कांग्रेस के काफी नजदीक माने जाने वाली पार्टी में लोक जनशक्ति पार्टी भी प्रियंका को कांग्रेस की राजनीति में उतारने के प्रयास को बेहतर मान रही है। लोजपा के प्रवक्ता रोहित कुमार सिंह कहते हैं कि कांग्रेस अगर प्रियंका को राजनीति में लाती है, तो इसका व्यापक असर पड़ेगा। प्रियंका में इंदिरा गांधी का अक्स दिखाई


पड़ता है और उनका युवाओं में पकड़ है। ऐसे में प्रियंका की राजनीति कांग्रेस को उबार सकती है। अगर चुनावों से पहले कमान संभालने में वह भी हाथ बंटाती हैं, तो पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं में नया जोश फूंका जा सकता है। विधानसभा चुनावों की हार के जख्म सहला रही कांग्रेस को इस वक्त संजीवनी चाहिए और प्रियंका उसका इंतजाम कर सकती हैं, क्योंकि पार्टी कार्यकर्ताओं में उन्हें लेकर गजब का उत्साह है और नेताओं के बीच जोरदार सम्मान है। लेकिन जितनी राजनीति प्रियंका को लेकर मीडिया में हो रही है, उतनी हलचल अभी पार्टी के भीतर नहीं है। कांग्रेसी नेता प्रियंका की सक्रियता को सामान्य बता रहे हैं। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जनार्दन द्विवेदी कहते हैं कि प्रियंका गांधी अहम राजनीतिक परिवार की सदस्य हैं। वह कांग्रेस पार्टी की सक्रिय सदस्य हैं। प्रियंका अमेठी और रायबरेली में चुनाव का काम देखती हैं।’
जाहिर है, प्रियंका को लेकर अभी पार्टी में सब कुछ साफ नहीं है। फिर प्रियंका को राजी हुए बगैर प्रियंका के नाम जपने से भी कुछ होने को नहीं है। इसलिए सबसे ज्यादा जरूरी है कि प्रियंका राजनीति में आने को राजी हो जाएं। आगामी चुनाव को लेकर कांग्रेस में बड़े स्तर पर बदलाव की बात की जा रही है। अगर सार्थक बदलाव होते हैं, तो संभव है कि कांग्रेस की राजनीति डूबने से उबर जाए। इसी बदलाव के तहत एक मंथन इस बात पर भी हो रहा है कि इस बार के चुनाव में पार्टी के महासचिवों दिग्विजय सिंह, शकील अहमद, मधुसूदन मिस्त्री, अंबिका सोनी और मुकुल वासनिक को चुनाव मैदान में उतारा जाए।  इन तमाम राजनीतिक बहसों के बीच असली सवाल यही है कि क्या कांग्रेस बिहार, उत्तर प्रदेश, समेत उत्तर भारत से लेकर मध्य भारत में अपनी सीटें बचा पाएगी? क्या दक्षिण भारत में कांग्रेस की जीत इस बार संभव है? और सबसे बड़ी बात यह कि क्या मोदी और तमाम तरह के क्षत्रपों के बीच केजरीवाल की दुदुंभी के सामने कांग्रेस कोई चमत्कार कर सकने की हालत में है? फिर यही सवाल प्रियंका के सामने भी है। भाजपा दावा करती रही है कि मोदी में एक तरह का करिश्मा है और प्रियंका से कांग्रेस को कोई फायदा नहीं होने वाला। लेकिन जिस तरह पिछले दिनों संघ प्रमुख भागवत ने केजरीवाल की पार्टी आप के प्रति लोगों में जुनून की बातों से भाजपा के नेताओं को आगाह किया है, उससे साफ लगता है कि भाजपा के लिए भी आप सिरदर्द से कम नहीं। मोदी राहुल के सामने होते, तो संभव था कि मोदी बाजी मार लेते, लेकिन अब आप की राजनीति ने मोदी की राजनीति पर ब्रेक सा लगा दिया है। मोदी पर यही ब्रेक कांग्रेस के लिए संजीवनी साबित हो सकती है और वह संजीवनी हैं प्रियंका, लेकिन राजनीति तो राजनीति होती है। अगर प्रियंका ने राजनीति में एक्शन लिया, तो वह भी विरोधियों के रडार से बच नहीं पाएंगी। अगर प्रियंका मैदान में उतरीं, तो भाजपा समेत सभी विपक्षी दल उन्हें भी निशाने पर लेंगे और ऐसी सूरत में उनके पति रॉबर्ट वाड्रा के दामन पर लगे दाग उनके खिलाफ प्रचार में काम आएंगे।
अखिलेश अखिल
विवश, लाचार, कमजोर, राहविहीन   और जनता के गुस्से की शिकार कांग्रेस जनता की सेवा करते-करते थक गई है या फिर जनता को लूटते-लूटते पस्त हो गई है, इसकी सही जानकारी भला कौन दे सकता है। इस पर न कांग्रेसी बोलेंगे और न ही अन्य दलों के नेता, क्योंकि हमाम में सभी नंगे हैं। देश की राजनीति से लेकर समाज और अर्थव्यवस्था में बहुत कुछ लाने वाली कांग्रेस इसी समाज व्यवस्था से लूटने में भी कभी पीछे नहीं रही। इसने देश को बहुत कुछ दिया, तो लिया भी है। इसी लेने की वजह से जनता ने कई दफा कांग्रेस को सबक भी सिखाया, लेकिन आॅक्टोपस जैसे समुद्री जीव के फांस में आने के बाद भला कोई बच सकता है? कई दफा साफ होने के बाद भी कांग्रेस जीवित होती रही है। यह कांग्रेस के प्रति जनता का मोह कहिये या फिर जनता पर कांग्रेस का जादू। इस बार फिर कांग्रेस रसातल की ओर जा रही है। केंद्र में लगातार 10 साल शासन चलाने के बाद भी कांग्रेस का नाम लेने में लोगों को घबराहट हो रही है, तो साफ है कि उसके पास विश्वसनीयता का संकट खड़ा हो गया है। विधानसभा चुनाव में अपना सब कुछ गंवा चुकी कांग्रेस के सामने लोकसभा चुनाव है, लेकिन देश की बदलती राजनीति, भ्रष्टाचार और महंगाई के दंश ने कांग्रेस को पस्त कर रखा है। जिस राहुल गांधी नाम के नेता पर कांग्रेस फिर दांव खेलने में लगी है, वह मोदी के सामने पहले से ही पस्त थे। अब आप जैसी पार्टी ने उसके लिए और संकट पैदा कर दिया है। एक-एक करके सभी सहयोगी दल भी अपना रास्ता ढूंढ रहे हैं। ऐसे में कांग्रेस की प्रियंका गांधी पर जाकर आस टिक गई है, इसमें गलत क्या है? इस नाम पर अक्सर कांग्रेस की निगाहें टिकती रही हैं, लेकिन इस बार कुछ ज्यादा ही है। आगे बढेÞं, इससे पहले प्रियंका के कुछ बोल पर आपका ध्यान आकर्षित करते हैं।
    1999 के चुनाव के वक्त एक साक्षात्कार में प्रियंका ने यह साफ कर दिया था कि वह राजनीति में नहीं आएंगी, लेकिन देश और जनता की सेवा करती रहेंगी। लेकिन प्रियंका को लेकर कांग्रेस के भीतर और बाहर राजनीतिक प्रपंच जारी है।  आगामी चुनाव को लेकर कांग्रेस के भीतर इस बात को लेकर मंथन जारी है कि आखिर कैसे कांग्रेस की साख लौटे और कैसे फिर कांग्रेस की नेतृत्व वाली सरकार बने। मंथन इस बात पर भी हो रहा है कि राहुल गांधी को आगे बढ़ाने का लाभ पार्टी को कितना मिलेगा? बहस इस बात पर भी हो रही है कि मोदी की आक्रामक राजनीति और आप जैसी पार्टी के उदय के बीच कांग्रेस अपनी राजनीति कैसे बचा पाए? हाल ही में विधानसभा चुनावों में करारी हार के बाद कांग्रेस के भीतर मंथन इस बात को लेकर भी है कि चाटुकारिता और जड़विहिन नेताओं की फौज क्या कांग्रेस की राजनीति को अब और आगे बढ़ाने में कारगर है? और इन तमाम बहसों के बीच मूल बहस इस बात पर टिकी है कि आखिर कैसे राहुल की अगुआई में पार्टी की नई तस्वीर सामने लाई जाए, ताकि जनता के बीच विश्वास जाग सके। जनता के बीच इसी विश्वास को जगाने के क्रम में कांग्रेसियों की नजरें बार-बार उस प्रियंका गांधी की तरफ जा रही हैं, जो अब तक सक्रिय राजनीति करने से अपने को बचा रही हैं। कांग्रेस का एक बड़ा धड़ा प्रियंका को तुरुप का इक्का मान रहा है, जबकि कांग्रेस के माहिर खिलाड़ी अब कांग्रेस में कुछ बदलाव की संभावनाओं को भी टटोल रहे हैं। इस बदलाव के खेल में माइनस राहुल किसी और को प्रधानमंत्री उम्मीदवार बनाने की बात है, लेकिन इस बात को कोई साहस के साथ रखने को तैयार नहीं है। ऐसे में प्रियंका गांधी पर जाकर फिर कांग्रेस की राजनीति केंद्रित हो जाती है। प्रियंका गांधी अभी तक सक्रिय राजनीति में आने से बचती रही हैं, लेकिन जब वह आधी अधूरी राजनीति करती ही हैं, तो इस बात की प्रबल संभावना बन सकती है कि वह देश की राजनीति भी करें। सत्ता की बागडोर संभालने में वह सहयोगी बनें। लेकिन प्रियंका की एक दिक्कत भी है कि अगर वह सीधे अपने भाई को मजबूत करने के साथ ही पार्टी को मजबूत करने के लिए सामने आती हैं, तो साफ है कि राहुल की राजनीति फीकी पड़ जाएगी और फिर राहुल पिटे मोहरे से ज्यादा कुछ नहीं रह जाएंगे। यही वजह है कि प्रियंका की राजनीतिक दांव खेलने से पहले कांग्रेस के रणनीतिकार बेहद पशोपेस में हैं। अब जब प्रियंका की चर्चा चल ही निकली है, तो आइए एक नजर प्रियंका पर भी डाल लें।
        42 वर्षीय प्रियंका गांधी वाड्रा गांधी-नेहरू परिवार से हैं और फिरोज गांधी और इंदिरा गांधी की पोती हैं। प्रियंका वाड्रा भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी और भारतीय राष्टÑीय कांग्रेस की वर्तमान अध्यक्ष एवं सत्तारूढ़ संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की मुखिया सोनिया गांधी की दूसरी संतान हैं। उनकी दादी इंदिरा गांधी और परनाना जवाहर लाल नेहरू भी भारत के प्रधानमंत्री रहे हैं। उनके दादा फिरोज गांधी एक जाने-माने संसद सदस्य थे और उनके परनाना, मोतीलाल नेहरू भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक महत्वपूर्ण नेता थे। प्रियंका ने शिक्षा मॉडर्न स्कूल कॉन्वेंट आॅफ जीसस एंड मैरी, नई दिल्ली से प्राप्त की और वे दिल्ली विश्वविद्यालय से मनोविज्ञान विषय में स्नातक हैं। वे शौकिया रेडियो संचालक भी रही हैं। प्रियंका गांधी की भूमिका को राजनीति में विरोधाभास के तौर पर देखा जाता है। उन्होंने अपनी मां और भाई के निर्वाचन क्षेत्रों रायबरेली और अमेठी में नियमित रूप से कार्य किया   है। इन निर्वाचन क्षेत्रों में उनकी लोकप्रियता भी है। अपनी तरफ जनता को आकर्षित करने में भी वह सफल रही हैं। अमेठी में प्रत्येक चुनाव के समय एक लोकप्रिय नारा रहा है अमेठी की डंका, बिटिया प्रियंका। इसका मतलब लोग कहते हैं कि अमेठी प्रियंका का है। उन्हें यहां से चुनाव लड़ना चाहिए। उन्हें अपनी मां का मुख्य राजनीतिक सलाहकार भी माना जाता है।
2004 और 2009 के आम चुनाव में वह अपनी मां के चुनाव अभियान की प्रबंधक थीं और अपने भाई राहुल गांधी के चुनाव प्रबंधन में मदद की थी। एक प्रेस वार्ता में इन्हीं चुनावों के दौरान उन्होंने कहा कि राजनीति का मतलब जनता की सेवा करना है, जिसे मैं पहले से ही कर रही हूं। मैं इसे पांच और अधिक सालों के लिए जारी रख सकती हंू। इस बात से यह अटकलें तेज हो गई कि वह उत्तर प्रदेश में कांग्रेस पार्टी के लिए कोई जिम्मेदारी वहन कर सकती हैं। बीबीसी हिन्दी रेडियो सेवा के एक साक्षात्कार में प्रियंका ने श्रीलंका में युद्घ का उल्लेख किया और टिप्पणी की तुम्हारे आतंकवादी बनने में केवल तुम जिम्मेदार नहीं हो, बल्कि तुम्हारी पद्घति जिम्मेदार है, जो तुम्हें एक आतंकवादी बनाती है।
प्रियंका की शादी रॉबर्ट वाड्रा से हुई है। वाड्रा व्यापारी हैं और विवादों में भी खूब रहे हैं। इस बात में क्या सच्चाई है, कहना मुश्किल है, लेकिन कहा जाता है कि वाड्रा से प्रियंका की मुलाकात संभवत: उनके पारिवारिक मित्र ओत्तावियो क्वात्रोची के घर पर हुई। लेकिन बेचारगी के सामने कोई भविष्य की योजना नहीं होती। तमाम राजनीतिक अटकलों के बीच कांग्रेस ने प्रियंका को वैतरणी पार उतरने के लिए राजनीतिक मैदान में उतार भी दिया, तो कुछ बदलाव तो सामने आएगी ही। हमेशा विवादों से दूर रहने वाली प्रियंका गांधी वाड्रा को गांधी परिवार का वास्तविक उत्तराधिकारी माना जाता रहा है, लेकिन उन्होंने राजनीति के बजाय परिवार को ज्यादा तरजीह दी है और अपने भाई राहुल गांधी की राह के कांटों को हटाती रही हैं। इनकी राजनीति समझ लाजवाब है, इसलिए कहा जाता है कि जब भी राहुल किसी महत्वपूर्ण मौके पर भाषण देते हैं, तो वही तय करती हैं कि क्या कहना है और क्या नहीं। प्रियंका कभी विवादों में नहीं रही हैं। उनकी इसी छवि को कांग्रेस अगले आम चुनाव में भुनाना चाहती हैं। प्रियंका अपने आकर्षक व्यक्तित्व के कारण युवाओं के बीच काफी लोकप्रिय हैं। लोगों का ऐसा मानना है कि प्रियंका यदि राष्टÑीय स्तर पर लोगों से सीधा संवाद करें और कांग्रेस के लिए वोट मांगें, तो इसका काफी प्रभाव पड़ सकता है। एक बात साफ है कि जिस तरह से कांग्रेस के प्रति जनता में अविश्वास की भावना घर कर गई है और कांग्रेस के प्रति जनता का मोह भंग होता जा रहा है,ऐसी हालत में कांग्रेस को एक ऐसे चेहरे की तलाश तो है ही, जो पार्टी की मलिन छवि को सफेद कर सके। प्रियंका की राजनीति कितनी सफल हो सकेगी और आज की बदलती राजनीति के साथ ही लोगों के बदलते मिजाज को भुनाने में वे कितना सफल हो पाएंगी, इसे भरोसे के साथ तो नहीं ही कहा जा सकता है। और अगर प्रियंका भी चूक गर्इं, तब क्या होगा? यही वजह है कि कांग्रेस प्रियंका को भविष्य के लिए तुरुप का पत्ता मान रही है। संभव है कि इस तुरुप के पत्ते को आगे की राजनीति में इस्तेमाल किया जा सके। अपनी लुक और स्टाइल की वजह से प्रियंका में लोग उनकी दादी दिवंगत प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की झलक देखते हैं। चेहरा, ब्वॉय कट बाल, साड़ी पहनने का ढंग, चलने का अंदाज, लोगों से आत्मीयता से मिलने आदि में दोनों में काफी समानता है। इंदिरा गांधी को कठोर निर्णय लेने वाला नेता माना जाता था और इसी संकट से आज कांग्रेस जूझ रही है, इसलिए पार्टी ऐसा मानती है कि प्रियंका को लोग हाथोंहाथ लेंगे। प्रियंका को वाकपटु माना जाता है। वे भाषण के दौरान जनता से संवाद करती नजर आती हैं। उनकी वाणी में कभी कठोरता नहीं रहती है।
वे लोगों से बातचीत के दौरान मुस्कुराती नजर आती हैं। वे दिल्ली में भले वेस्टर्न परिधानों में नजर आएं, लेकिन ग्रामीण इलाकों में इंदिरा जैसी साड़ी में ही दिखती हैं और देश के कई हिस्से ऐसे हैं, जहां आज भी इंदिरा गांधी के नाम पर कांग्रेस को वोट मिलते हैं। प्रचार के दौरान भी देखा गया कि प्रियंका गांधी किस तरह महिलाओं के बीच में पहुंच जाती हैं। उनके कंधे पर हाथ रखकर बातचीत आगे बढ़ाती हैं। इंदिरा गांधी के भाषण की झलक भी प्रियंका में देखी जा सकती है। जाहिर है, लोकसभा चुनावों में प्रियंका के करिश्माई व्यक्तित्व का फायदा कांग्रेस को मिल सकता है। मोदी के खिलाफ कांग्रेस अपने सारे हथियार आजमाएगी और प्रियंका उसके तरकश का सबसे धारदार तीर साबित हो सकती हैं। जिन दो तबकों पर चुनावों के नतीजे काफी हद तक निर्भर करते हैं, उनमें महिलाएं और नौजवान शामिल हैं। इत्तेफाक से प्रियंका गांधी, इन दोनों समूहों में अच्छी पैठ रखती हैं। महिलाएं उनमें इंदिरा गांधी को तलाशती हैं और युवा उनमें एक नौजवान-वाइब्रेंट नेता देखते हैं। जाहिर है, आगामी चुनावों से पहले जिस तरह का माहौल देश में बना हुआ है, केवल राहुल गांधी के मैदान में उतरकर मुकाबला करना मुश्किल होगा। ऐसे में अगर प्रियंका का साथ मिला, तो कांग्रेस कुछ वोट बचा सकती है। उत्तर भारत में प्रियंका गांधी का रुतबा खास है और कांग्रेस को अच्छी तरह पता है कि   वह तुरुप का इक्का साबित हो सकती हैं। हालांकि, अभी यह पूरी तरह तय नहीं है कि उन्हें किस भूमिका में इस्तेमाल किया जाए। अगर चुनावों से पहले कमान संभालने में वह भी हाथ बंटाती हैं, तो पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं में नया जोश फूंका जा सकता है। राजनीतिक विश्लेषक अवधेश कुमार कहते हैं कि यह बात और है कि राजनीति में प्रियंका को लाने की बात पिछले कई सालों से की जा रही है, लेकिन प्रियंका इसे नकारती रही हैं। अभी तक वह अपने भाई और मां की सीटों तक ही काम करती रही हैं और वहां संगठन स्तर पर भी उसने बेहतर काम किया है। जहां तक इस बार के चुनाव में उसे लाने की बात हो रही है साफ है कि इसका फायदा कांग्रेस को हो सकता है। राहुल की बजाए प्रियंका का चेहरा ज्यादा आकर्षक है और पार्टी नेताओं से लेकर कार्यकर्ताओं में उसकी बेहद मांग भी है। उसके आने से पार्टी कार्यकर्ताओं में उत्साह बढ़ सकता है, लेकिन चुनावी गणित में वह कोई बदलाव ला सकें, इसकी संभावना कम ही दिख रही है। लेकिन तय मानिए प्रियंका कांग्रेस के लिए लाभकारी हो सकती हैं।’
कांग्रेस के काफी नजदीक माने जाने वाली पार्टी में लोक जनशक्ति पार्टी भी प्रियंका को कांग्रेस की राजनीति में उतारने के प्रयास को बेहतर मान रही है। लोजपा के प्रवक्ता रोहित कुमार सिंह कहते हैं कि कांग्रेस अगर प्रियंका को राजनीति में लाती है, तो इसका व्यापक असर पड़ेगा। प्रियंका में इंदिरा गांधी का अक्स दिखाई पड़ता है और उनका युवाओं में पकड़ है। ऐसे में प्रियंका की राजनीति कांग्रेस को उबार सकती है। अगर चुनावों से पहले कमान संभालने में वह भी हाथ बंटाती हैं, तो पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं में नया जोश फूंका जा सकता है। विधानसभा चुनावों की हार के जख्म सहला रही कांग्रेस को इस वक्त संजीवनी चाहिए और प्रियंका उसका इंतजाम कर सकती हैं, क्योंकि पार्टी कार्यकर्ताओं में उन्हें लेकर गजब का उत्साह है और नेताओं के बीच जोरदार सम्मान है। लेकिन जितनी राजनीति प्रियंका को लेकर मीडिया में हो रही है, उतनी हलचल अभी पार्टी के भीतर नहीं है। कांग्रेसी नेता प्रियंका की सक्रियता को सामान्य बता रहे हैं। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जनार्दन द्विवेदी कहते हैं कि प्रियंका गांधी अहम राजनीतिक परिवार की सदस्य हैं। वह कांग्रेस पार्टी की सक्रिय सदस्य हैं। प्रियंका अमेठी और रायबरेली में चुनाव का काम देखती हैं।’
जाहिर है, प्रियंका को लेकर अभी पार्टी में सब कुछ साफ नहीं है। फिर प्रियंका को राजी हुए बगैर प्रियंका के नाम जपने से भी कुछ होने को नहीं है। इसलिए सबसे ज्यादा जरूरी है कि प्रियंका राजनीति में आने को राजी हो जाएं। आगामी चुनाव को लेकर कांग्रेस में बड़े स्तर पर बदलाव की बात की जा रही है। अगर सार्थक बदलाव होते हैं, तो संभव है कि कांग्रेस की राजनीति डूबने से उबर जाए। इसी बदलाव के तहत एक मंथन इस बात पर भी हो रहा है कि इस बार के चुनाव में पार्टी के महासचिवों दिग्विजय सिंह, शकील अहमद, मधुसूदन मिस्त्री, अंबिका सोनी और मुकुल वासनिक को चुनाव मैदान में उतारा जाए।  इन तमाम राजनीतिक बहसों के बीच असली सवाल यही है कि क्या कांग्रेस बिहार, उत्तर प्रदेश, समेत उत्तर भारत से लेकर मध्य भारत में अपनी सीटें बचा पाएगी? क्या दक्षिण भारत में कांग्रेस की जीत इस बार संभव है? और सबसे बड़ी बात यह कि क्या मोदी और तमाम तरह के क्षत्रपों के बीच केजरीवाल की दुदुंभी के सामने कांग्रेस कोई चमत्कार कर सकने की हालत में है? फिर यही सवाल प्रियंका के सामने भी है। भाजपा दावा करती रही है कि मोदी में एक तरह का करिश्मा है और प्रियंका से कांग्रेस को कोई फायदा नहीं होने वाला। लेकिन जिस तरह पिछले दिनों संघ प्रमुख भागवत ने केजरीवाल की पार्टी आप के प्रति लोगों में जुनून की बातों से भाजपा के नेताओं को आगाह किया है, उससे साफ लगता है कि भाजपा के लिए भी आप सिरदर्द से कम नहीं। मोदी राहुल के सामने होते, तो संभव था कि मोदी बाजी मार लेते, लेकिन अब आप की राजनीति ने मोदी की राजनीति पर ब्रेक सा लगा दिया है। मोदी पर यही ब्रेक कांग्रेस के लिए संजीवनी साबित हो सकती है और वह संजीवनी हैं प्रियंका, लेकिन राजनीति तो राजनीति होती है। अगर प्रियंका ने राजनीति में एक्शन लिया, तो वह भी विरोधियों के रडार से बच नहीं पाएंगी। अगर प्रियंका मैदान में उतरीं, तो भाजपा समेत सभी विपक्षी दल उन्हें भी निशाने पर लेंगे और ऐसी सूरत में उनके पति रॉबर्ट वाड्रा के दामन पर लगे दाग उनके खिलाफ प्रचार में काम आएंगे।

No comments:

Post a Comment