Monday, January 27, 2014

पूर्वांचल को नाथने की तैयारी

जब देश में आम आदमी पार्टी की धूम हो और लोग भ्रष्टाचार और अपराध के खिलाफ खुल कर सड़कों पर आ रहे हों, ऐसे समय में पूर्वांचल में आठ दलों का एकता मंच क्या गुल खिला पाएगा, यह तो चुनाव परिणाम से पता चलेगा। लेकिन एक बात तो तय है कि इस गठबंधन के ज्यादातर उम्मीदवार आपराधिक पृष्ठभूमि के हैं, जिसे जनता आसानी से नहीं पचाएगी...  
‘हम कोई बाहुबली नहीं हैं, न ही हम पर कोई आपराधिक मामले दर्ज हैं। एकता मंच के नेताओं पर जो भी मामले दर्ज हैं, राजनीति से प्रेरित हैं और सरकारी साजिश के तहत दर्ज हैं। जनता सब जानती है। इस बार हम उत्तर प्रदेश की राजनीति को नया आयाम देंगे। हम प्रदेश की राजनीति को बदल देंगे।’ यह कहना है एकता मंच के नेता ओमप्रकाश राजभर का। हाल ही में उत्तर प्रदेश के आठ दलों ने मिलकर एक साझा एकता मंच का निर्माण किया है। ये आठ दल हैं- अफजल अंसारी की कौमी एकता दल, डीपी यादव की राष्ट्रीय परिवर्तन दल, केशव मौर्या की राष्ट्रीय महान दल, ओमप्रकाश चौहान की जनवादी पार्टी, गोपाल निषाद की फूलन सेना, रामसागर बिंद की सर्वजन विकास पार्टी, रामधनी पासवान की महादलित संघ और ओमप्रकाश राजभर की भारतीय समाज पार्टी। आठ दलों के आठ अध्यक्ष आगामी चुनाव को जीतने के लिए एकता मंच पर विराजमान हो गए हैं। ओमप्रकाश राजभर कहते हैं कि हम उत्तर प्रदेश में इस बार बड़ा खेल करेंगे। हमारे पास जनता है और जातीय वोट भी। फिर जनता के पास जाने के लिए हमारे पास मुद्दा भी है। हम पूर्वांचल राज्य की मांग कर रहे हैं और अब यह राज्य बन कर ही रहेगा। हम देश के तमाम मतदाताओं के लिए पेंशन की बात भी कर रहे हैं। सभी जाति के गरीबों को आरक्षण भी मिलनी चाहिए। महिलाओं को 50 फीसदी आरक्षण मिलनी चाहिए। स्नातकोत्तर तक मुफ्त शिक्षा होनी चाहिए और सबसे बड़ी बात की हम जाति नहीं, इंसानियत की राजनीति करने की बात कर रहे हैं। हमारी एकता मंच की तरफ से अब तक उत्तर प्रदेश में 36 उम्मीदवारों की सूची जारी कर दी है और बाकी के सीटों पर उम्मीदवार तैयार कर रहे हैं। प्रदेश की सभी सीटों पर हम लड़ेंगे। हम पंजाब, राजस्थान और कई अन्य राज्यों में भी अपना उम्म्ीदवार उतार रहे हैं। हम राजनीति को बदल देंगे।
राजभर की मासूमियत भरी बातों से आप अचरज में पड़ सकते हैं। वे किसी भी दल के साथ गठबंधन न करने की बात कर रहे हैं, लेकिन असलियत यह है कि इस मंच के रडार पर केवल सपा और बसपा है। चुनाव के बाद अगर इस मंच को कोई सीट मिल जाती है, तो वह सरकार बनाने वाली पार्टी के सामने जाने में नहीं पीछे रहेगी। चाहे वह कांग्रेस हो या फिर भाजपा। उत्तर प्रदेश में आठ छोटे दलों ने एक साथ मिलकर बड़ी पार्टियों का खेल बिगाड़ने का मन बना लिया है। कई दिग्गज और बाहुबली उम्मीदवार एकता मंच के बैनर तले लोकसभा चुनाव लड़ने जा रहे हैं। पूर्वांचल में अंसारी बंधुओं के साथ डीपी यादव और ओमप्रकाश राजभर सरीखे नेताओं का गठजोड़ नया गुल खिला सकता है। बाहुबली छवि के इन नेताओं की मौजूदगी मात्र से ही विरोधियों के कान खड़े हो गए हैं।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश और पूर्वांचल के आठ दलों के गठबंधन से बने एकता मंच ने लोकसभा चुनाव के लिए 36 उम्मीदवार घोषित कर दिए हैं। इस गठबंधन के सभी दलों के अध्यक्षों को चुनाव मैदान में उतारते हुए मंच ने सपा व बसपा को घेरने की खास रणनीति बनाई है। दिलचस्प बात यह कि पश्चिम उत्तर प्रदेश के सूरमाओं को भी पूर्वांचल से मैदान में उतारा गया है। उम्मीदवार घोषित करने में मंच ने जातीय समीकरण का भी खूब खयाल रखा है। डीपी यादव को गाजीपुर व केशवदेव मौर्य को कुशीनगर से उतारा गया है। अफजल अंसारी बलिया लोकसभा सीट से चुनाव लड़ेंगे। गाजीपुर में बसपा ने हालांकि अभी अपने उम्मीदवार के नाम की घोषणा नहीं की है, लेकिन कैलाश नाथ यादव को उम्मीदवार बनाए जाने की चर्चा है, जबकि सपा से बाबू सिंह कुशवाहा की पत्नी शिवकन्या चुनाव मैदान में उतर सकती हैं। अफजल अंसारी और ओमप्रकाश राजभर की ताकत और डीपी के बाहुबल के सहारे ही एकता मंच ने इस सीट पर दोनों दलों को घेरने की मुहिम तेज कर दी है।
गाजीपुर में भाजपा के जिलाध्यक्ष कृष्ण बिहारी राय का हालांकि साफ तौर पर कहना है कि गाजीपुर की जनता अपराधियों को पसंद नहीं करती है और ऐसी उम्मीद है कि आने वाले चुनाव में भी बाहर से आकर यहां लड़ने वाले उम्मीदवारों को जनता करारा जवाब देगी। गाजीपुर के अलावा बलिया लोकसभा सीट पर  अफजल के उम्मीदवार बनाए जाने के बाद से ही समीकरण एकदम बदल गए हैं। अफजल अंसारी यहां सपा के वर्तमान सांसद और पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के पुत्र नीरज शेखर के लिए भी कड़ी चुनौती पेश करेंगे। बसपा और भाजपा की तरफ से हालांकि अभी उम्मीदवारों की घोषणा नहीं की गई है। यादवों और मुसलमानों का गठजोड़ हुआ, तो डीपी यादव की दावेदारी बड़े दलों पर भारी पड़ सकती है। एकता मंच ने घोसी से मुख्तार अंसारी, वाराणसी से उनकी पत्नी अफशां अंसारी, चंदोली से शशिप्रताप सिंह, देवरिया से उमेश मणि त्रिपाठी, कैसरगंज से डॉ़  संतोष पांडेय, महराजगंज से कविलास राजभर, डुमरियागंज से गंगाराम निषाद और राबर्ट्सगंज से नक्सली लालब्रत कौल को उम्मीदवार बनाया है। एकता मंच के इस लालब्रत कौल को बहुत लोग नहीं जानते। कोल भाकपा (माओवादी) के पूर्व कमांडर व जिले के मोस्ट वांटेड कुख्यात नक्सली माने जाते हैं और इस समय जेल में बंद हैं। इन पर लाखों का ईनाम भी था। राबर्ट्सगंज का अधिकांश भाग नक्सल प्रभावित जिले की सीमा में आता है। झारखंड के नक्सली कमांडर कामेश्वर बैठा के बाद लालव्रत कोल दूसरा ऐसा नक्सली कमांडर होगा, जो जंगलों से संसद तक का सफर तय करने की कोशिश करेगा। कौल को चुनाव मैदान में उतारने की कौमी एकता दल की घोषणा के साथ वर्षों से शांत नक्सल प्रभावित इस जिले में जहां फिर से नक्सली आहट महसूस की जाने लगी है, वहीं इसे लेकर लोगों कि चिंताएं भी बढ़ती जा रही हैं। लगातार कई दिल दहला देने वाली घटनाओं को अंजाम देकर पुलिस की नाक में दम कर देने वाले कौल की राजनीति से ही लोग घबरा रहे हैं।
    फिर अफजल अंसारी, ओमप्रकश राजभर, डीपी यादव, मुख्तार अंसारी की राजनीति को भला कौन नहीं जानता? इन सभी लोगों पर कई आपराधिक मामले हैं। दबंगई ऐसी की किसी की सुनते ही नहीं। इनके लिए राजनीति एक पड़ाव से ज्यादा कुछ भी नहीं। ये लोग कानून के साथ अक्सर आंख मिचौली खेलते रहे हैं, लेकिन यह भी तय है कि राजनीति में इनकी अपनी हैसियत भी है। इनके पास लोग हैं और पैसा भी। साम, दाम, दंड, भेद की राजनीति करने से भी नहीं चूकते। देखना होगा कि इस बार इस एकता मंच की असली राजनीति क्या होती है? पूर्वांचल के कुछ इलाकों में इनकी पैठ भी हो सकती है। इस मंच पर जितने लोग शामिल हैं, उसे गौर से देखें, तो जाहिर होता है कि समाज में जितनी भी ताकतवर पार्टियां हैं, जो वोट बैंक के रूप में किसी न किसी दल का समर्थन करती रही हैं, सभी जातियों के नेता इस मंच पर खड़े हैं। प्रदेश विधानसभा चुनाव के वक्त भी इसी तरह के एकता मंच की तैयाराी की गई थी, लेकिन बात नहीं बनी। आपसी विवाद में ही एकता टूट गई। अब इस बार क्या होता है? इस पर सबकी नजरें टिकी हुई हैं।



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