Monday, January 27, 2014

मोदी की दोगली नीति

नरेंद्र मोदी एक तरफ तो कांग्रेसमुक्त भारत का नारा देते हैं, लेकिन दूसरी तरफ वे कांग्रेसी सरदार बल्लभ भाई पटेल का महिमामंडन करते हैं। मोदी को तो इस बात की जानकारी होगी ही कि उनकी नर्सरी आरएसएस के बारे में पटेल की क्या राय थी? क्या वे इससे सहमत हैं? और अगर पटेल की विचारधारा से ही सहमत नहीं हैं, तो फिर पटेल राग अलापने का क्या फायदा? गुजरात की मोदी सरकार सरदार पटेल के स्टेच्यू पर 2500 करोड़ रुपये खर्च कर रही है, लेकिन जब यही काम मायावाती दलित पुराधाओं की मूर्तियों को लेकर करती हैं, तो उनकी पार्टी को यह बात चुभ जाती है। 
भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी देश भर में कांग्रेस के विरोध में अभियान चला रहे हैं कि देश को कांग्रेस से मुक्त हो जाना चाहिए। जब तक देश कांग्रेस मुक्त नहीं होगा, भारत नहीं बचेगा। देश में सारी बुराइयों की जड़ यही कांग्रेस है। कांग्रेस ने ही देश को लूटा और कांग्रेस ने ही देश की जनता को बर्बाद किया, इसलिए आगामी लोकसभा चुनाव में देश की जनता को भाजपा को जीत दिलाकर कांग्रेस मुक्त भारत कर देना चाहिए। अपने पिछले कई सभाओं में मोदी ने कांग्रेस पर हमले कुछ इसी तरह से किए हैं।
       लेकिन मोदी को कांग्रेस के नेता और आजाद भारत के पहले गृहमंत्री रहे सरदार बल्लभ भाई पटेल से कोई गुरेज नहीं है। मोदी, पंडित जवाहर लाल नेहरू से लेकर सोनिया गांधी तक की राजनीति की बात करते हैं और सबको कोसते भी हैं, लेकिन सरदार पटेल के वे दीवाने हैं। 2500 करोड़ रुपये की लागत से गुजरात में पटेल की भव्य मूर्ति लगाने की पूरी राजनीति मोदी कर रहे हैं। कहा जा रहा है कि यह मूर्ति दुनिया की सबसे ऊंची और बड़ी मूर्ति होगी। कांग्रेस को पानी पी-पी कर कोसने  वाले मोदी अचानक कांग्रेसी पटेल पर क्यों दीवाने हैं, यह समझ से परे की बात है। मोदी देश को कांग्रेस से मुक्त करना चाहते हैं, लेकिन पटेलयुक्त होकर। इस दीवानगी के पीछे की राजनीति क्या है? यह आज तक मोदी कह नहीं पा रहे हैं। संभवत: एक कारण यह भी हो सकता है कि मोदी कांग्रेसी पटेल को आत्मसात कर गुजरात की राजनीति में नया वोट बैंक खोज रहे हों। शायद यह भी संभव है कि मोदी पटेल की मूर्ति लगाकर देश भर में फैले पटेल समुदाय के लोगों को अपनी ओर खींचने की राजनीति कर रहे हों? शायद यह भी संभव है कि चुनाव में अपनी बाजी मारने के लिए उत्तर प्रदेश और बिहार में रह रहे पटेल वोटरों को अपनी ओर खींचकर पिछड़ों की राजनीति करने वाले नेताओं की राजनीति पर नकेल कसने की कोशिश कर रहे हों? और एक कारण यह भी हो सकता है कि मोदी, पटेल की राजनीति करके यह दिखाना चाह रहे हों कि जिस तरह से पटेल ने आजादी के बाद देश के तमाम देशी रजवाड़ों को भारत में विलय कराया था और राष्ट्रीय एकता का बेजोड़ नमूना पेश किया था, ठीक उसी तरह मोदी एकता और अखंडता की राजनीति को आगे बढ़ाएंगे और देश को और शक्तिशाली बनाएंगे? इसके अलावा भी मोदी की पटेल प्रेम के पीछे की कुछ और कहानी भी हो सकती है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या पटेल ने कभी संघ, हिंदू महासभा या फिर भाजपा को पसंद किया था? सवाल यह भी है कि क्या पटेल ने कभी जनसंघियों को आदर की दृष्टि से देखा था? सवाल यह भी है कि पटेल ने कभी तब के जनसंघ को भारत की आजादी की लड़ाई में कभी शाबाशी दी? और सबसे बड़ा सवाल यह कि आखिर भाजपा के लोग और प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार मोदी, श्यामा प्रसाद मुखर्जी और दीनदयाल उपाध्याय जैसे नेताओं की जगह पटेल की मूर्ति लगाने की राजनीति क्यों कर रहे हैं? जिस संघ की राजनीति पर भाजपा थिरक रही है और मोदी मतवाले दिख रहे हैं, सबसे पहले उन्हें यह साफ करना चाहिए कि भाजपा के लिए दीनदयाल उपाध्याय बड़े हैं या फिर कांग्रेसी पटेल? पहले पटेल की मूर्ति लगनी चाहिए या फिर दीनदयाल उपाध्याय की? पटेल की स्टेच्यू आॅफ यूनिटी की राजनीति से जुड़े कई और सवाल खड़े होते हैं, लेकिन सबसे पहले पटेल की राजनीति पर एक नजर-
     अपने आप को पटेल का वारिस घोषित करने की जल्दीबाजी में कई सारे ऐसे सवाल छिपे हैं, जो खुद मोदी और संघ परिवार के लिए बेहद असुविधाजनक हो सकते हैं। समय आने दीजिए। यही देश मोदी की राजनीति को लेकर कई सवाल पूछने वाला है। दुनिया सरदार बल्लभ भाई पटेल को एक ऐसे शख्स के तौर पर जानती है, जो राष्टÑीय स्वयं सेवक संघ या हिंदू महासभा की वास्तविकता से और उनकी घृणा की राजनीति से बखूबी परिचित थे। महात्मा गांधी की हत्या के महज चार दिन बाद राष्टÑीय स्वयं सेवक संघ पर पाबंदी लगाने वाला आदेश जारी हुआ। तब बल्लभ भाई पटेल गृहमंत्री थे। संघ के खिलाफ जारी आदेश में लिखा था कि संघ के सदस्यों की तरफ से अवांछित यहां तक कि खतरनाक गतिविधियों को अंजाम दिया गया है। यह देखा गया है कि देश के तमाम हिस्सों में संघ के सदस्य हिंसक कार्रवाइयों में- जिनमें आगजनी, डकैती और हत्याएं शामिल हैं- मुब्तिला रहे हैं और वे अवैध ढंग से हथियार और विस्फोटक भी जमा करते रहे हैं।’ फिर सत्ताइस फरवरी, 1948 को प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को लिखे अपने खत में पटेल  कहते हैं कि सावरकर की अगुवाई वाली हिंदू महासभा के अतिवादी हिस्से ने ही हत्या के इस षड्यंत्र को अंजाम दिया है। जाहिर है, उनकी हत्या का स्वागत संघ और हिंदू महासभा के लोगों ने किया, जो उनके चिंतन और उनकी नीतियों की मुखालफत करते थे। पटेल फिर 18 जुलाई, 1948 को हिंदू महासभा के नेता और बाद में राष्टÑीय स्वयं सेवक संघ की सहायता और समर्थन से भारतीय जनसंघ की स्थापना करने वाले श्यामा प्रसाद मुखर्जी को लिखते हैं। ़हमारी रिर्पोटें इस बात को पुष्ट करती हैं कि इन दो संगठनों की गतिविधियों के चलते खासकर राष्टÑीय स्वयं सेवक संघ के चलते, मुल्क में एक ऐसा वातावरण बना, जिसमें ऐसी त्रासदी (गांधीजी की हत्या) मुमकिन हो सकी। मेरे मन में इस बात के प्रति तनिक भी संदेह नहीं कि इस षड्यंत्र में हिंदू महासभा का अतिवादी हिस्सा शामिल था। राष्टÑीय स्वयं सेवक संघ की गतिविधियां सरकार और राज्य के अस्तित्व के लिए खतरा हैं। हमारी रिपोर्ट इस बात को पुष्ट करती है कि पाबंदी के बावजूद उनमें कमी नहीं आई है। दरअसल, जैसे-जैसे समय बीतता जा रहा है, संघ के कार्यकर्ता अधिक दु:साहसी हो रहे हैं और अधिकारिक तौर पर तोड़फोड़ विद्रोही कार्रवाइयों में लगे हैं।’ लगता है कि संघ के प्रति बल्लभ भाई पटेल के विचारों से नरेंद्र मोदी जरूर सहमत हुए हों। ऐसा है तो मोदी को इस बारे में साफ बोलना चाहिए। क्या मोदी जी अब बताएंगे कि सरदार पटेल ने संघ के बारे में जो टिप्पणी की थी, वह सच थी या गलत? क्या मोदी यह भी बताएंगे कि वे पटेल की बातों से सहमत हंै? याद रखिए, सरदार पटेल ने उस समय जो भी बातें कही थीं, वह एक राष्ट्रवादी नेता की बातें थीं। वह एक गृहमंत्री की बातें थीं और वह एक सच्चे कांग्रेसी की बातें थीं। मोदी और संघ वाले इसे साफ करें, तो बेहतर होगा। साफ है कि मोदी और संघ के लोग पटेल की राष्ट्रीय एकता वाली नीति को भुनाना चाहते हैं, लेकिन पटेल की बातों में यकीन नहीं करते। कांग्रेस नेता जनार्दन द्विवेदी कहते हैं कि मोदी और भाजपा के लोगों की राजनीति क्या है, इसे कौन नहीं जानता? पटेल कांग्रेस के नेता हैं और एक गृहमंत्री के रूप में गांधी जी की हत्या के बारे में उन्होंने जो भी कहा है, सब जानते हैं। संघ और मोदी के लोगों को यह बताना चाहिए कि पटेल ने जो कहा था, वह सच है या नहीं? संभव है कि इन सवालों के जवाब मोदी और भाजपा कभी नहीं देंगे। मोदी की यह रणनीति गुजराती अस्मिता के नाम पर लोगों को गुमराह कर गुजरात की सभी लोकसभा सीटें जीतने की है और देश भर में फैले पटेल समुदाय के वोट झटकने की है।
       अब संघ और मोदी से एक और सवाल? जो संघ अपने पूर्वजों की कहानी को लोगों में प्रचारित कर भाजपा की राजनीति को गति दे रहा है। मोदी को प्रधानमंत्री के रूप में आगे बढ़ा रहा है, वह संघ दीनदयाल उपाध्याय जैसे महान व्यक्तित्व की महान मूर्ति लगाने से आखिर बाज क्यों आ रहा है? जरा इन वाक्यों पर गौर करें।  ‘विलक्षण बुद्घि, सरल व्यक्तित्व एवं नेतृत्व के अनगिनत गुणों के स्वामी, पं़डित दीनदयाल उपाध्याय जी की हत्या सिर्फ 52 वर्ष की आयु में 11 फरवरी 1968 को मुगलसराय के पास रेलगाड़ी में यात्रा करते समय हुई थी। उनका पार्थिव शरीर मुगलसराय स्टेशन के वार्ड में पड़ा पाया गया। भारतीय राजनीतिक क्षितिज के इस प्रकाशमान सूर्य ने भारतवर्ष में सभ्यतामूलक राजनीतिक विचारधारा का प्रचार एवं प्रोत्साहन करते हुए अपने प्राण राष्टÑ को समर्पित कर दिया।’ ये वाक्य संघ और भाजपा के तमाम पुस्तकों में आप देख सकते हैं।            पंडित दीनदयाल जी घर गृहस्थी की तुलना में देश की सेवा को अधिक श्रेष्ठ मानते थे। दीनदयाल देश सेवा के लिए हमेशा तत्पर रहते थे। उन्होंने कहा था कि हमारी राष्टÑीयता का आधार भारत माता है, केवल भारत ही नहीं। माता शब्द हटा दीजिए, तो भारत केवल जमीन का टुकड़ा मात्र बनकर रह जाएगा। पंडित जी ने अपने जीवन के एक-एक क्षण को पूरी रचनात्मकता और विश्लेषणात्मक गहराई से जिया है। पत्रकारीय जीवन के दौरान उनके लिखे शब्द आज भी उपयोगी हैं। प्रारंभ में समसामयिक विषयों पर वह पॉलिटिकल डायरी नामक स्तंभ लिखा करते थे। पंडित जी ने राजनीतिक लेखन को भी दीर्घकालिक विषयों से जोड़कर रचना कार्य को सदा के लिए उपयोगी बनाया है। पंडित जी ने बहुत कुछ लिखा है, जिनमें एकात्म मानववाद, लोकमान्य तिलक की राजनीति, जनसंघ का सिद्घांत और नीति, जीवन का ध्येय राष्टÑ जीवन की समस्याएं, राष्टÑीय अनुभूति, कश्मीर, अखंड भारत, भारतीय राष्टÑधारा का पुन: प्रवाह, भारतीय संविधान, इनको भी आजादी चाहिए, अमेरिकी अनाज, भारतीय अर्थनीति, विकास की एक दिशा, बेकारी समस्या और हल, टैक्स या लूट, विश्वासघात, द ट्रू प्लान्स, डिवैलुएशन ए, ग्रेटकाल आदि हैं। उनके लेखन का केवल एक ही लक्ष्य था भारत की विश्व पटल पर लगातार पुनर्प्रतिष्ठा और विश्व विजय, लेकिन इस विराट मानव की हत्या की गुत्थी आज तक सामने नहीं आई। संघ और भाजपा के लोगों ने कभी भी इस हत्या की जांच की मांग नहीं की। केंद्र में भाजपा की सरकार भी बनी, लेकिन पंडित जी की हत्या की जांच अटल सरकार ने भी नहीं कराई। जाहिर है कि इस हत्या के पीछे कहीं न कहीं संघ और जनसंघ की राजनीति रही हो। जनसंघ के अध्यक्ष रहे बलराज मधोक ने पंडित जी की हत्या को लेकर कई सवाल भी उठाए थे। उन्होंने अपनी पुस्तक ‘जिंदगी का सफर’ में साफ लिखा है कि पंडित जी की हत्या के लिए अटल बिहारी वाजपेयी, बाला साहब देवरस और नानाजी देशमुख जैसे लोग जिम्मेदार हैं। पंडित जी की हत्या के बाद ही इन लोगों की राजनीति चमक पाई और ये सभी आगे बढ़ते चले गए। अब सवाल यह है कि इतने विशाल और विराट चिंतन वाले नेता की राजनीति भाजपा और संघ आज नहीं कर रही है, जिस पटेल की राजनीति के दम पर मोदी और भाजपा के लोग आगामी चुनाव के लिए वोट बैंक का खेल कर रही है, वहीं खेल वह पंडित दीनदयाल के नाम पर भी कर सकती थी। वह इस आदमी की मूर्ति बनाकर भी ब्राह्मण वोटों की राजनीति कर सकती थी, लेकिन भाजपा को इस बात पर यकीन है कि ब्राह्मण वोट तो उसके पास है ही और पंडित जी के नाम की राजनीति की तुलना में पटेल की राजनीति ज्यादा चमकदार भी हो सकती है। यह राजनीति भाजपा के लिए एक नया वोट बैंक तैयार कर सकता है। याद करिये एक कांग्रेसी पटेल जैसे नेता को मोदी जिस तरह से भाजपा के रंग में रंगने की कोशिश कर रहे हैं, अगर देश का ब्राह्मण समुदाय और खासकर संघ और भाजपा की राजनीति कर रहे ब्राह्मण नेता पटेल की जगह पंडित जी की मूर्ति लगाने की बात कह दें, तो मोदी की राजनीति पर लगाम लग सकती है और भाजपा के उन तमाम शूर- वीरों की भी कलई खुल सकती है, जिसकी तरफ बलराज मधोक ने इशारा किया था।  
जरा एक और विरोधाभास पर गौर करें। मोदी के इस पटेल की मूर्ति वाले  ‘ड्रीम प्रोजेक्ट’ पर मीडिया ने या तो चुप्पी साध रखी है या उसे महिमामंडित किया है। याद करें, मायावती के मुख्यमंत्रित्व-काल में दलित महापुरुषों की मूर्तियां स्थापित करने को लेकर मीडिया का स्वर किस हद तक आलोचना से भरा हुआ था। अखबारों या टीवी स्टूडियो में प्रतिष्ठित तमाम बौद्घिक लोग बार-बार इसी बात को दोहराते रहते थे कि इन मूर्तियों पर खर्च करने के बजाय अगर वे रोड बनाने, स्कूलों और अस्पतालों के निर्माण पर जोर देतीं, तो प्रदेश का कल्याण होता। अपनी खुद की मूर्ति का अनावरण करने के लिए मायावती का मजाक उड़ाने वाला यही मीडिया इसमें पैसे की बर्बादी देख रहा था। मायावती के विरोधियों के लिए ये पार्क और मूर्तियां ‘अनुत्पादक परिसंपत्ति’ में शुमार थे। फिर, एक व्यक्तिविशेष की राजनीतिक महत्वाकांक्षा की पूर्ति के लिए इतने बड़े पैमाने पर हो रहे व्यय, जो अनुमान है कि मायावती सरकार द्वारा व्यय की गई राशि से पांच गुना होगा, को लेकर मीडिया क्यों मौन है? जबकि गुजरात के मानव विकास सूचकांक सहारा-अफ्रीका के कई मुल्कों की तरह ही औसत से कम दर्जे के हैं। साफ है कि मोदी और भाजपा की राजनीति दोगली है। वह कांग्रेस के विरोध की राजनीति करती है और एक कांग्रेसी नेता को भुनाकर चुनाव की वैतरणी पार करना चाहती है।


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