Monday, January 27, 2014

भूदानी जमीन की डकैती

देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ एक माहौल बना है। दिल्ली में तो इस मुद्दे को लेकर सरकार बदल गई, लेकिन दिल्ली समेत कई राज्यों में भूमिहीनों के साथ जो छल हो रहा है, उसका क्या होगा? बिहार के मुख्यमंत्री सुशासन बाबू हों या फिर अपने आपको ईमानदार कहने वाले दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, इनके पास भूमिहीनों के प्रति न्याय का कोई दरवाजा है या नहीं। इसी सवाल को लेकर फरवरी में दिल्ली कूच कर रहे हैं भूदान आंदोलनकारी... 

बदलते राजनीतिक परिवेश में फिर भूमिहीनों का मुद्दा देश में गरमाने जा रहा है। फरवरी के पहले सप्ताह में देश भर के आंदोलनकारी और भूदान आंदोलन से जुड़े लोग दिल्ली में आकर सरकार की लूटतंत्र की एक और पोल खोलने की तैयारी में हैं। भ्रष्टाचार को लेकर जिस तरह की राजनीति देश में हो रही है और पल-पल लोगों का मिजाज बदल रहा है। ऐसे में भूदान आंदोलन से जुड़े लोग विनोबा भावे द्वारा दान में ली गई हजारों लाखों एकड़ जमीन का हिसाब सरकार से लेने आ रहे हैं। कहा जा रहा है कि आजाद भारत में भूदानी जमीन की लूट जिस तरह से देश के नेताओं, अफसरों और दलालों ने की है- अगर इसकी जांच ठीक से कर दी जाए, तो यह आजाद भारत का सबसे बड़ी लूट साबित होगी। भूदानी जमीनों की लूट या फिर डकैती, इस घोटाले में मंत्री से लेकर संतरी और नौकरशाहों से लेकर देश को बड़ी-बड़ी गैरसरकारी संस्थाएं और बिल्डरों की संलिप्तता दिखेगी। देश के रहनुमाओं की करतूत ने भूदानी जमीन की डकैती की है और संत विनोबा भावे के सपने को रौंदा है।
देश भर में स्थापित भूदान यज्ञ समिति के अनुसार, सर्वोदयी नेता विनोबा भावे के भूदान आंदोलन के तहत कुल 47 लाख 63 हजार 676 एकड़ जमीनें भूमिहीनों के लिए दान में मिली थी। ये जमीनें देश के राजा महाराजाओं और जमींदारों ने दी थी। यहां पेश है, कुछ राज्यों में पिछले कुछ साल तक भूदानी जमीनों के
आंकड़ों का सच-

राज्य       दान की जमीन      बांटी गई जमीन    बची जमीन  
बिहार       6,48,593         2,78,320          3,40,273
आंध्र प्रदेश       2,52,119           1,8,770           1,43,349
झारखंड     14,69,280          4,88,735          9,80,545
उड़ीसा      6,38,706            5,79,984          58,722
राजस्थान    5,46,965            1,42,699          4,04,266
उत्तर प्रदेश   4,36,362           4,18,958         17,404
दिल्ली      300                180             120
मध्य प्रदेश  4,10,151             2,37,629         1,72,522
महाराष्ट्र    1,58,160             1,13,230         44,930
जम्मू-कश्मीर 211                 5               206
असम       877                 877             0
पंजाब      5168                 1026           4,152
तमिलनाडु  27677                22837          4,840
केरल      26,293                5,774          20,519
कर्नाटक   15,864                 5017          10,847
हिमाचल   5,240                  2,531           2,709
गुजरात    1,03,530               50,984          52,546

आंकड़े बता रहे हैं कि संयुक्त बिहार से सबसे ज्यादा जमीनें विनोबा भावे के भूदान आंदोलन को दान की गई थी। कोई 22 लाख एकड़ जमीनें संयुक्त बिहार से मिली थी। बिहार और झारखंड में दो लाख 32 हजार लोगों ने ये जमीनें दान दी थी। इनमें से बिहार के जमींदारों ने 6,48,593  एकड़ और झारख्ांड के जमींदारों ने 14,69,280 एकड़ जमीन विनोबा जी को दी थी, लेकिन 46 सालों के बाद भी ये जमीनें आज तक भूमिहीनों को नहीं दी गई हैं। बिहार में मात्र 2,78,320 एकड़ जमीनें ही आज तक बंट पाई हंै, जबकि झारखंड में मात्र 4,88,735 एकड़ जमीनें ही भूमिहीनों तक पहुंच पाई हंै। इनमें भी जिन भूमिहीनों को जमीनें दे भी दी गई है, उसका मालिकाना पट्टा आज तक अधिकतर लोगों को नहीं मिला है। राजस्व विभाग सारे कागजात अपने पास रखे हुए है और कागज देने के नाम पर मोटी रकम की मांग कर रहे हैं। बिहार और झारखंड से मिली लगभग 22 लाख एकड़ जमीन में से अधिकतर जमीनों को दलालों और भ्रष्ट नौकरशाहों से लेकर भूदान समिति से जुड़े लोगोें ने बेकार की जमीन घोषित कर रखी है। नदी, नाला और पहाड़ी जमीन के नाम पर ये जमीनें लूट की शिकार हो रही हंै। इसके अलावा बहुत सारी जमीनें तो ऐसी भी हैं, जिसे दानदाताओं ने नाम कमाने के लिए दान तो दे दी, किन्तु आज भी उन पर कब्जा उन्हीं का बना हुआ है। झारखंड के सामाजिक कार्यकर्ता ठाकुर प्रसाद कहते हैं कि आदिवासियों, गरीबों और भूमिहीनों की बात करने वाली बिहार और झारखंड सरकार से कौन पूछने जाए कि भूदानी जमीनें कहां हैं और उन जमीनों को सही तरीके से भूमिहीनों के बीच क्यों नहीं बांटी जा रही है? जो सरकार इतना भी काम नहीं कर सकती, भला उससे उम्मीद क्या की जाए? सही बात तो यह है कि अधिकतर भूदानी जमीनों को बिल्डरों ने हड़प लिया है और इसमें राज्य सरकार के लोगों की मिलीभगत है। कभी-कभी तो लगता है कि पूरे देश में नकली सरकार की भरमार सी हो गई है।’ ठाकुर प्रसाद की बातों में दम है। झारखंड बने 12 साल हो गए हैं और भूदानी जमीनों को लेकर आज तक किसी मुख्यमंत्री ने अपनी सक्रियता नहीं दिखाई। राज्य के पूर्व भू राजस्व मंत्री रहे हैं मथुरा महतो। जमीनी आदमी हैं और लोकप्रिय भी, लेकिन भूदान से संबंधित जमीन वितरण के बारे में जब इस संवाददाता ने सवाल किया, तो महतो साहब चुप हो गए। कहने लगे कि कुछ जमीन पहले भूमिहीनों को बांटी गई थीं। अभी इस पर फिर से काम किया जाना है। जमीन की मॉनिटरिंग की जा रही है, लेकिन सबसे बड़ी बात तो यह है कि यहां का भूदान समिति डिफंक्ट है। वह ठीक से काम नहीं कर रहा है। एक अन्य सवाल पर महतो साहब भड़क गए। कहने लगे कि आप लोग केवल निगेटिव सवाल ही करते हैं।  राज्य में अच्छा काम भी हो रहा है, उसे आप लोग नहीं दिखाते।
अब आप को ले चलते हैं सुशासन बाबू नीतीश कुमार के सूबे में। कहा जा रहा है कि वहां सब कुछ हरा-भरा हो गया है, लेकिन भूदानी जमीन के मामले में बिहार में भी लूटपाट कम नहीं हुई है। बिहार में भूमि सुधार के नाम पर डी बंदोपाध्याय आयोग का गठन किया गया था। आयोग ने अपनी रिपोर्ट 11 जून 2007 को राज्य सरकार को सौंप दी। आयोग का कहना था कि सरकार के पास भूदानी जमीन के अलावा किसी भी जमीन की सही जानकारी नहीं है और न ही उसका हिसाब-किताब है।  भूदान की जमीन में भारी गड़बड़ी हुई है। भूदान यज्ञ समिति और राजस्व विभाग के जमीन संबंधी आंकड़ों में काफी अंतर है। 1961 में भू हदबंदी कानून बनाया गया, लेकिन आज तक लागू नहीं हुआ। 500 एकड़ से ऊपर जमीन रखने वाले भूस्वामियों की नई-नई सूचियां तैयार होती रही हैं। इस प्रकार की सूची 1970-76 एवं 1982-83 और 29 जून 1990 को बिहार विधानसभा के अंदर 500 एकड़ से ऊपर जमीन रखने वाले 35 भूस्वामियों की सूची प्रस्तुत की गई थी, लेकिन मामला वहीं दब कर रह गया।
      बिहार में कई मामले तो चौंकाने वाले रहे हैं। उपरोक्त कमीशन की रिपोर्ट ने खुलासा किया था कि भूदान की 11,130 एकड़ जमीन 59 संस्थाओं को दे दी गई, जो भूदान कानून के विरुद्घ है। औसत एक संस्था को 189 एकड़ जमीन दी गई है। चंूकि यह मसला राज्य सरकार से संबंधित है, इसलिए कहा जा सकता है कि सरकार के बाबुओं और भूदान समिति के लोगों ने मिलकर यह सारा खेल किया है। बिहार में भूदानी जमीनों की कैसे लूट की गई है, इसकी कुछ बानगी आप देख सकते हैं। बिहार के पूर्णिया जिला में भूदान कार्यालय मंत्री हैं मुस्तफा रजा आलम। आलम ने अपनी पत्नी रेहाना खातून के नाम 4 एकड़ जमीन खाता नंबर 444, खसरा नंबर 405 के नाम 23 जुलाई 2008 को करवा ली हैं। यह जमीन पूर्णिया जिले के रूपौली थाना के मउआ परबल गांव में दी गई है। इसका प्रमाण पत्र संख्या है 778549। इसी महिला के नाम पूर्णिया जिले के गोपालपुर थाना के जहांगीरपुर बैसी में 2 एकड़ की एक और जमीन दी गई है। इस जमीन का खाता नंबर 866 और खसरा नंबर है 101। इसका प्रमाण पत्र संख्या है 768166। यह जमीन 3 नवंबर 2007 को दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट का इस मसले में साफ आदेश है कि भूमिहीनों को जमीन दी जाएगी और न ही स्थानीय भूमिहीनों को, लेकिन यहां तो एक ही आदमी को दो जगह जमीन दी गई है और वह भी स्थानीय आधार पर नहीं। इसे लूट नहीं तो और क्या कहा जाए? इसी परिवार से जुड़ा एक और केस है पटना का। पूर्णिया के मुस्तफा रजा के सगे भाई मो. इसराफिल पटना भूदान आॅफिस में काम करते हैं। इन्होंने अपनी पत्नी रजिया खातून के नाम 4 एकड़ जमीन पूर्णिया के ही भउआ परबल गांव में करवा ली है। इस जमीन का प्रमाण संख्या है 778530। यह जमीन 23 जुलाई 2008 को रजिया खातून के नाम की गई है। इसी महिला के नाम एक एकड़ जमीन जहांगीरपुर बैसी में भी की गई है, जिसका प्रमाण संख्या 768211 है। यह जमीन 3 नवंबर 2007 को लिखी गई है। इस परिवार के लोगों ने सरकार के लोगों से मिलकर या फिर राजनीति के तहत जमकर भूदानी जमीनों की लूट की है। 1-2 एकड़ की तीसरी जमीन भी इसी रजिया खातून के नाम जहांगीरपुर बैसी में की गई है, जिसका खाता नंबर है 896 और खसरा नंबर है 101। इस जमीन का प्रमाण पत्र देने वालों में विजय कुमार शर्मा, कार्यालय मंत्री, भागलपुर भूदान कार्यालय के हस्ताक्षर हैं। आपको यह भी बता दें कि ये जमीन नीतीश कुमार के शासन में बांटी गई है। बंटी यह जमीन जायज है या नाजायज, यह जांच का विषय हो सकता है।  बिहार भूदान यज्ञ समिति के अध्यक्ष शूभमूर्ति उपरोक्त मामले पर अपनी चुप्पी तोड़ते हुए कहते हैं कि जिस मामले की आप चर्चा कर रहे हैं, वह सही है। लेकिन सही यह भी है कि मुस्तफा रजा और और इसराफिल की पत्नी के नाम से जो जमीनें दी गई थीं, उसे वापस ले ली गई है। गलती हुई थी, लेकिन उसे सुधार दिया गया है। अब उस जमीन के कागजात रद्द हो गए हैं और उसके प्रमाण पत्र भी वापस कर ले लिए गए हैं। आपको बता दें कि हमारे कुछ विरोधी हैं, जो हमें बदनाम करने की चाल खेल रहे हैं। गलती राज्य सरकार करती है और बदनाम भूदान कमेटी को किया जाता है। उधर, जैविक खेती अभियान के संयोजक क्रांति प्रकाश कहते हैं कि विनोबा जी ने देश में घूम-घूम कर जमीन हासिल की, ताकि गरीब और भूमिहीनों को जमीन दी जा सके, लेकिन इस देश की राजनीति ने विनोबा भावे के सपनों को भी तोड़ दिया। कुछ जमीन बांटी गई, जबकि अधिकतर जमीन लालफीताशाही के चक्कर में फंसी है। इसके अलावा कुछ जमीन तो अभी लठैतों के कब्जे में हैं या तो जमीन बंटनी चाहिए या फिर उस जमीन को वापस कर देनी चाहिए।
 भूदानी जमीन की लूट केवल बिहार या झारखंड में ही नहीं की गई है, जहां-जहां से जमीन मिली है, लूट की शिकार हुई है। आंध्र प्रदेश में कुल 2,52,119 एकड़ जमीन दान में मिली थी। इनमें से 1,08,770 एकड़ जमीन अनियमिततापूर्वक बंट तो गई है, बाकी लगभग एक लाख जमीन बिल्डरों और संस्थाओं के हाथ में चली गई है। बिल्डरों के कई मामले अभी अदालत में चल रहे हैं। तमिलनाडु में तो भूदानी जमीन को लूटने के लिए भूदान एक्ट में ही संशोधन कर दिया गया। तमिलनाडु में कुल 27,677 एकड़ जमीन दान में मिली थी। इनमें से 22,837 एकड़ जमीन किसी तरह तो बंट गई है, बाकी के 4840 एकड़ जमीन संस्थाएं और बिल्डरों के चंगुल में हंै। राज्य सरकार ने भूदान कानून में बदलाव करके कानून बना रखा है कि अगर भूदानी जमीन का उपयोग सार्वजनिक काम के लिए होता है, तो इसे बाजार दर से दोगुनी दर पर ली जा सकती है। उड़ीसा में भी भूदानी जमीन को लूटा गया है। उड़ीसा में भूदान आंदोलन के तहत कुल 6,38,706 एकड़ जमीन दान में मिली थी। इसमें से 5,79,984 एकड़ जमीन बांट दी गई है। इनमें भी कई जमीन ऐसे लोगों को दे दी गई है, जो भूमिहीन वर्ग में नहीं आते हैं। इसके अलावा खुर्दा जिले के पीपली तहसील में 171 एकड़ जमीन बिल्डर के हाथों बेच दी गई है। बिल्डरों ने इस पर निर्माण भी कर लिया था, जिसे एफआईआर के बाद खुर्दा के कलेक्टर ने तोड़ दिया है, लेकिन अभी तक जमीन बेचने वाले और खरीदने वाले पुलिस के हाथ नहीं लग पाए हैं। राज्य के राजस्व और आपदा मंत्री सूर्यनारायण पात्रों कहते हैं कि दोषी चाहे जो भी हो, हम उन्हें नहीं छोड़ेंगे। भूदानी जमीन किसी को नहीं दी जा सकती। यह भूमिहीनों के लिए है। जिन लोगों ने जमीन की लूट की है, हम उसे तलाश रहे हैं।
जरा मोदी की राजनीति तो देखिए, जो देश का प्रधानमंत्री बनने का दम भर रहे हैं। भूदानी जमीन की सबसे ज्यादा लूट मोदी के प्रदेश में ही हुई है। गुजरात सरकार और राज्य भूदान समिति के लोगों ने मिलकर पैसे की लालच में भूदानी जमीनों को बिल्डरों के हाथ बेच दी है। ऐसा कोई एक मामला नहीं है। जरा इन मामलों पर आप भी गौर कर लें। गुजरात का ब्लॉक नंबर 542। गांव भदज। इस इलाके को आधुनिक समय में साइंस सिटी के नाम से जाना जाता है। राज्य सरकार और भूदानी समिति से जुड़े लोगों ने यहां की लगभग 12 एकड़ भूदानी जमीन एक बिल्डर रश्मिकांत छगन भाई पटेल को मात्र एक करोड़ 18 लाख में बेच दी। वर्तमान समय में यहां एक एकड़ जमीन की कीमत 2 करोड़ के आसपास है। यानी 24 करोड़ की जमीन लगभग सवा करोड़ में बिल्डर लोगों को खिला-पिला कर ले उड़े। आज तक किसी की इस पर नजर नहीं गई है।
गुजरात के ही खेड़ा जिला के राधु गांव की ही भूदानी पांच एकड़ जमीन भूदान समिति और राज्य सरकार के लोगों ने सभी नियमों को ताख पर रखकर मात्र तीन लाख में बिल्डर दिनेश भाई रमण भाई पटेल को बेच दी है। इस जमीन का सर्वे नंबर है 1662 और 1664। आपको बता दें कि भूदान के तहत पहले यह जमीन अलेफ खान और गुलाब खान पठान को दी गई थी। बाद में इन खानों से जमीन छीन कर बिल्डर के हवाले कर दिया गया। अहमदाबाद शहर में ही साबरमती आश्रम के पास ग्राम स्वराज आश्रम स्थित है। यहां की लगभग आधा एकड़ जमीन 3 नवंबर 2009 को एक व्यापारी के हाथ मात्र 39 लाख रुपये में बेच दी गई है। बेची गई जमीन पर आश्रम के पांच कमरे थे, एक बड़ा हाल था और खुली जमीन थी। अभी अहमदाबाद में 40-45 लाख में एक कमरा मिलना भी मुश्किल है। चंूकि व्यापारी के हाथ में सीधे जमीन बेचने में दिक्कत आ सकती थी, इसलिए दलालों ने पहले एक संस्था बनाई, फिर इस जमीन को बेच दी।
गुजरात के ही बड़ोदरा शहर में भी दलालों और भूदान समिति से जुड़े लोगों ने भूदानी जमीन को बेचने में कोई कोताही नहीं बरती है। बाघोरिया रोड पर पापोद मुहल्ला की 14 हेक्टेयर भूदानी जमीन प्रणब पंचाल, बैकुंठनाथ बिल्डर को 2004 में बेच दी गई है। अहमदाबाद के ही नरोदा में एक और भूदानी जमीन को बिल्डर के हवाले किया जा चुका है। 0.43.43 हेक्टेयर जमीन वर्ष 2008 में प्रवीण भाई मणि भाई पटेल के हाथ बेच दी गई है। इस जमीन का रजिस्ट्री नंबर है 5160/2008।   विनोबा भावे के भूदान आंदोलन के तहत भूमिहीनों के लिए देश भर से दान में मिली जमीनों की पहली शर्त यह है कि स्थानीय भूमिहीनों के अलावा किसी और को न तो दी जा सकती है और न ही किसी भी सूरत में किसी को भी यह जमीन बेची जा सकती है। भूदानी कानून के अलावा सुप्रीम कोर्ट का भी यही आदेश है, लेकिन इस आदेश की धज्जियां सबसे ज्यादा गुजरात सरकार और राज्य भूदान समिति से जुड़े लोगों ने उड़ाई है।
जरा दिल्ली का हाल तो देखें। भूदान यज्ञ में दिल्ली के लोगों ने विनोबा भावे को 300 एकड़ जमीन दान में दी थी। इन जमीनों में से 180 एकड़ जमीनों का वितरण दिल्ली सरकार कर देने का दावा कर रही है। बाकी 120 एकड़ जमीन कहां है और किसके कब्जे में है? इसका कोई रिकॉर्ड किसी के पास नहीं है। आप को बता दें कि यहां की अधिकतर भूदानी जमीनों पर माफियाओं का कब्जा हो चुका है। दिल्ली के नए मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को अब इस ओर नजर दौड़ाने की जरूरत है। फरीदाबाद और नोएडा की भूदानी जमीनों पर बिल्डरों ने कब्जा रखा है। डिफेंस हाउसिंग के नाम पर माफियाओं ने यहां की 30 एकड़ जमीन लूट ली है। यह मामला अदालत में है। कहा जा रहा है कि दिल्ली और हरियाणा के तीन नेताओं ने मिलकर यह धंधा किया था और करोड़पति बन गए थे। इसी तरह महाराष्ट्र से भूदान के तहत 1,58,160 एकड़ जमीन मिली थी। इसमें से 1,13,230 एकड़ जमीन बंट चुकी है। बाकी की 44,930 एकड़ जमीन अभी विवादों में फंसी हुई है। विनोबा भावे ने सबसे पहले भूदान आंदोलन की शुरुआत बर्धा से की थी, लेकिन बाद के दिनों में बर्धा और थाने इलाके में भूदानी जमीन की जमकर लूट की गई। बर्धा में सबसे ज्यादा बिल्डरों ने भूदानी जमीन पर कब्जा कर रखा है और थाने इलाके में भूदान समिति और सरकार से मिलकर बिल्डरों और कई संस्थाओं ने सैकड़ों एकड़ जमीन कम भाव में ले रखी है।
 भारत जैसे देश में आजादी के बाद से ही आबादी का एक बड़ा हिस्सा भूमिहीनों का रहा है। इनके पास खेती करने की जमीन की बात तो दूर, दफन होने के लिए 6 गज जमीन भी मयस्सर नहीं है। भूमिहीनों का यह तबका हर बार चुनाव में झुंड के झुंड चुनाव केंद्रों पर जाता है, लेकिन कोई भी नेता या पार्टी ने इन्हें आज तक भूमिहीन की श्रेणी से ऊपर लाने की कोशिश नहींकी है। भूमिहीनों की हालत को देखकर ही विनोबा भावे ने भूदान आंदोलन की शुरुआत की थी। इसके लिए सबसे पहले विनोबा जी 1951 में अपने पनवार आश्रम से चलकर हैदराबाद के दक्षिण में शिवरामपल्ली गांव पहुंचे। वहां तीसरे सर्वोदय सम्मेलन का आयोजन था।  18 अप्रैल 1951 को विनोबा जी नांगलोंड पहुंचे। यह इलाका तब भी लाल सलाम के नारों से गूंजता था। विनोबा जी पोचमपल्ली गांव में ठहरे। 700 की आबादी वाले इस गांव में दो तिहाई लोग भूमिहीन थे। भूमिहीनों ने विनोबा जी से 80 एकड़ जमीन की मांग की। विनोबा जी के आग्रह पर गांव के जमींदार रामचंद्र रेड्डी 100 एकड़ जमीन देने की घोषणा की। इसके बाद विनोबा जी ने इसे आंदोलन का रूप देकर पूरे देश से अपने जीवन में 47 लाख एकड़ जमीन दान में ली। जमीन बांटने का काम राज्य और जिला भूदान समिति को दी गई। चूंकि भूमि राज्य का मामला है, इसलिए राज्य सरकार का सहयोग जरूरी है। लेकिन देखा जा रहा है कि भूदान की जमीन लूट की शिकार होती गई है। अब मोदी, राहुल, मुलायम से लेकर देश के तमाम नेताओं से यह सवाल पूछा जा रहा है कि आखिर इस देश के नेताओं ने भूमिहीनों को छला है या फिर विनोबा भावे को ठगा है? इस सवाल का जवाब अगले माह फिर राजनीति के गलियारों में उठने वाला है।


     
   

 


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