Sunday, January 5, 2014

सत्ता के दावेदार

7, रेस कोर्स की दौड़ शुरू हो गई है। पांच राज्यों के चुनाव परिणाम ने इसे एक नया मोड़ दे दिया है। तीन राज्यों में जीत के बाद निश्चित तौर पर भाजपा और नरेंद्र मोदी के हौसले बुलंद हैं, लेकिन अरविंद केजरीवाल ने जिस तरह से इनके विजयी रथ को दिल्ली में रोका है, उससे नए समीकरण बनने शुरू हो गए हैं। अब तो यह भी संभव दिखने लगा है कि मोदी से मुकाबले में पिछड़ रही कांग्रेस के बजाय केजरीवाल उन्हें कड़ी टक्कर दे दें। पिछले 10 साल से केंद्र में सत्ता का सुख भोग रही कांग्रेस की राह जरूर थोड़ी मुश्किल हो गई है, लेकिन पार्टी होने के चलते कांग्रेस की उपस्थिति देश के हर कोने में है। इसका फायदा यह है कि हर राज्य से अगर उसे दो-तीन सीटें भी मिल जाए, तो यह आंकड़ा 100 के पार चला जाएगा। ऐसे में कांग्रेस सरकार तो नहीं बना पाएगी, लेकिन नई सरकार बनाने में अपनी भूमिका निभा सकती है। हां, यह बात और है कि राहुल गांधी की राह में अब रोड़े ही रोड़े हैं। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि क्या इस बार केंद्र में सरकार बनाने का मौका तीसरे मोर्चे के किसी क्षत्रप के हाथ लगेगा। आखिर कौन होगा वह क्षत्रप? मुलायम, मायावती, जयललिता, नीतीश या फिर शरद पवार। देश की राजनीति किस धारा में बह रही है? कौन है प्रधानमंत्री पद की रेस में आगे? 

अरविंद केजरीवाल ने जिस प्रकार से दिल्ली में जीत हासिल की है, वह काबिलेगौर है। यह तय है कि अब उनकी नजर लोकसभा चुनाव पर है। अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली की राजनीति को एक नई दिशा दी है, वह अपने आप में अजूबा और ऐतिहासिक है। अजूबा इस मायने में कि बिना किसी अनुभव और खिलाड़ी नेता के अपनी जगह तलाश लेने की कोशिश आप ने की और ऐतिहासिक इसलिए, क्योंकि भाजपा और कांग्रेस जैसी दो प्रतिद्वंद्वी पार्टियों के बीच में तीसरी ताकतवर पार्टी के रूप में आप उभरी है। अब तीसरे मोर्चे के नेता भी केजरीवाल की ओर देख रहे हैं। अगर केजरीवाल 10 से 15 सीट ले आते हैं, तो अपने आप वे मेनस्ट्रीम में आ जाएंगे। हो सकता है कि इनकी पार्टी इस बार ही राष्टÑीय पार्टी का दर्जा भी प्राप्त कर लें। केजरीवाल ने दिल्ली में सफलता हासिल करते ही यह ऐलान कर दिया कि देश भर के अच्छे लोग आप में शामिल हो जाएं। उन्होंने यह भी ऐलान कर दिया कि कई लोग संपर्क में हैं, जिसको लेकर कांग्रेस और भाजपा में हलचल है। कांग्रेस को लग रहा है कि अगर मोदी को रोकना है, तो इसमें केजरीवाल अहम भूमिका भी निभा सकते हैं, लेकिन आप पार्टी ने लोकसभा का अभियान सबसे पहले अमेठी से ही शुरुआत करने रही है, जहां से कुमार विश्वास राहुल को ललकार रहे हैं।
अरविंद केजरीवाल के पास दिल्ली में दो महीने का समय है। इसमें वे कुछ ऐसे कार्य करेंगे, जिसका सीधा फायदा लोकसभा में लिया जाए। केजरीवाल को सभी वर्गों का समर्थन मिल रहा है। खासकर निचले तबके को वे समझाने में सफल हुए हैं, जिनके बूते वे लोकसभा में बड़ा खेल कर सकते हैं। अरविंद केजरीवाल के पास प्लस प्वाइंट यह है कि इनके पास रणनीतिकार बहुत सुलझे हुए हैं, जिनमें सभी फील्ड के लोग हैं। केजरीवाल को युवाओं का जबर्दस्त समर्थन भी हासिल हो रहा है। गौरतलब है कि देश में आज 65 फीसदी युवा मतदाता हैं, जो मतदान में अहम भूमिका निभाते हैं। ऐसे में अगर केजरीवाल अपने प्रत्याशियों के चयन में पारदर्शिता बनाए रखा, तो यह तय है कि लोकसभा में अहम रोल में हो सकते हैं और स्वाभाविक तौर पर प्रधानमंत्री के उम्मीदवार होंगे। नरेंद्र मोदी को रोकने और तीसरे मोर्चे के विकल्प के तौर पर कांग्रेस केजरीवाल को 7 रेसकोर्स भेज सकती है। जिस प्रकार से उसे उन्होंने दिल्ली का मुखिया बनाया है, इसका फायदा कांग्रेस बाद लेना चाहेगी, क्योंकि कांग्रेस को अल्पमत सरकारें भाती हैं। पहले भी ऐसे मौके हाथ से जाना नहीं दिया है कांग्रेस ने। हालांकि इस बार यह चाल कांग्रेस के लिए भारी पड़ सकती है। जिस प्रकार की रणनीति पर केजरीवाल चल रहे हैं, उससे देश भर के एनजीओ इनके साथ आ सकते हंै। जो सीधे संसद प्रांगण में पहुंचने का ख्वाब पाले हुए हैं, उन्हें मौका मिलने वाला है। जो प्रयोग दिल्ली में केजरीवाल ने किया है, वह प्रयोग राज्यों के अन्य भागों में भी हो सकता है। केजरीवाल के आने भर से राजनीति के सभी समीकरण नए सिरे से बनने-बिगड़ते नजर आ रहे हैं। राजनीति पर तो इसका असर पड़ा ही है, सोशल मीडिया भी इससे अछूता नहीं है। इन दिनों भारतीय राजनीति में सोशल मीडिया का प्रभाव तेजी से बढ़ने लगा है और अब ऐसा अनुमान है कि 162 लोकसभा सीटों के परिणाम को सोशल मीडिया प्रभावित करेगा, जिसमें केजरीवाल बाजी मार सकते हैं। आप हिंदी भाषी राज्यों में लोकसभा चुनावों में ताल ठोकेगी। इन सात राज्यों में दिल्ली, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, झारखंड और बिहार में लोकसभा की 196 सीटें हैं। केजरीवाल की नजर अब इन राज्यों पर है, जहां से वे सीटें हासिल करने की रणनीति पर काम भी करेंगे। बहरहाल, अगर लोकसभा चुनाव में भी केजरीवाल दिल्ली के चुनाव की तरह उलटफेर कर दें, तो हैरानी नहीं होनी चाहिए।

अब एक बात तय है कि 2014 लोकसभा चुनाव में राहुल गांधी कांग्रेस की चुनाव कमान संभालेंगे। उन्हीं के नेतृत्व में जीत-हार होगी। यदि कांग्रेस चुनाव हार गई तो मामला खत्म और यदि जीत गई तो राहुल बाबा का प्रधानमंत्री बनना तय। वैसे कांग्रेस में प्रधानमंत्री पद के दावेदार और भी हैं। मसलन मौजूदा प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह, पी. चिदंबरम आदि। लेकिन जीत के बाद गांधी परिवार के सामने कोई कांग्रेसी नेता मुंह खोल पाएगा, इसमें शक है। ऐसे में प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने के लिए राहुल गांधी का रास्ता साफ है, लेकिन उनकी दावेदारी को लेकर कई सवाल खड़े होते हैं। क्या राहुल में भारत जैसे विशाल देश को नेतृत्व देने का कौशल है? वंशवाद की उपज राहुल की राजनीतिक उपलब्धियां क्या हैं? क्या राहुल खुद बड़ी जिम्मेदारी का बोझ उठाने के लिए मानसिक रूप से तैयार हैं? क्या राहुल में राजनीतिक परिपक्वता आ गई है? क्या राहुल अनुभवी व सुलझे हुए नेता बन गए हैं? प्रधानमंत्री बनने के बाद क्या राहुल खुर्राट नेताओं को सहज स्वीकार्य होंगे? आप की जीत के बाद क्या राहुल गांधी अरविंद केजरीवाल जितना युवाओं के बीच लोकप्रिय हैं? वैसे देखा जाए, तो कांग्रेस के ब्रांड एम्बेसेडर के तौर पर राहुल गांधी फेल हो चुके हैं। उनके इर्द-गिर्द जमा चापलूस नेताओं की भीड़ उनके विफल प्रयासों में भी चाहे जितना सफलता का बखान करे, लेकिन सच्चाई यह है कि हाल ही में संपन्न विधानसभा चुनाव में भी राहुल का जलवा कायम नहीं रह पाया। उत्तर भारत के चार राज्यों दिल्ली, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनाव में राहुल ने 100 से अधिक सभाएं और कई रोड शो किए। एंग्री यंग मैन स्टाइल में बार-बार बाजू चढ़ाकर प्रदेशवासियों को जागने-सोचने के लिए ललकारा। मनरेगा के गीत गाए। प्रदेश सरकार को कठघरे में खड़ा किया। इन सभाओं ने तालियां तो खूब बजवार्इं, पर ताली बजाने वाले हाथों से कांग्रेस के लिए ईवीएम का बटन नहीं दबवा पाए। राजस्थान व दिल्ली में सत्ता से कांग्रेस आउट हो गई। वैसे राहुल गांधी कोई पहली बार फेल नहीं हुए हैं। चार राज्यों से पहले राहुल उत्तर प्रदेश और उससे पहले बिहार में भी फेल हो चुके हैं। राहुल गांधी बार-बार फेल हो रहे हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री पद पर उनकी दावेदारी भी कमजोर हो रही है।
जमीनी हकीकत से बेखबर पार्टी सिर्फ राहुल के सहारे किसी चमत्कार की उम्मीद कर रही है और इस बार ऐसा चमत्कार होने से रहा। दिल्ली में आप पार्टी की जीत से यह बात साबित हो चुकी है कि चमत्कार का समय गया। मौजूदा परिस्थिति में राहुल से चमत्कार की उम्मीद रखना भी बेवकूफी होगी, क्योंकि इस समय कांग्रेस का नंबर एक संकट महंगाई है। दूसरा, युवाओं के दिमाग में यह बैठ गया है कि राहुल गांधी ढीले-ढाले नेता हैं। देश में समय-समय पर आई एक भी समस्या पर राहुल गांधी खुल कर कभी नहीं बोले। आखिर में लोकपाल बिल पास कराने का क्रेडिट पार्टी ने उन्हें दिलाने का भरपूर प्रयास किया, परंतु लोगों की समझ में यह खेल आ गया है। ऐसे में राहुल को बतौर प्रधानमंत्री देश देखना पसंद करेगा या नहीं, यह तो वक्त बताएगा।
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को भी अक्सर प्रधानमंत्री की दौड़ में शामिल बताया जाता है। हालांकि किसी भी चतुर राजनीतिक सुजान की तरह वे स्वयं कई बार इससे इंकार कर चुके हैं। यह कहते हुए कि हम न तो बिहार के आगे सोचते हैं, न देखते हैं। इसके बावजूद उनके करीबी कहते हैं कि उनकी भी महत्वाकांक्षा गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की तरह प्रधानमंत्री बनने की है, जो अक्सर छह करोड़ गुजरातियों की सेवा में ही खुश करने की बात किया करते थे। जब एनडीए के सहयोग से बिहार में सरकार चल रही थी, तब भाजपा के कई वरिष्ठ नेता इन्हें पीएम मेटेरियल मानते थे। सवाल यह उठता है कि क्या नीतीश कुमार सचमुच प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठ भी सकते हैं। उनकी पार्टी जनता दल यू की हैसियत एक क्षेत्रीय पार्टी की है और इसके मौजूदा लोकसभा में महज 20 सांसद हैं। हालांकि, कई ऐसी राहें हैं, जो उन्हें प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचा सकती हैं। वैसे भी राजनीति के बारे में कहा जाता है कि इसमें कुछ भी असंभव नहीं होता।
अगर लोकसभा चुनाव के बाद कोई ऐसी तस्वीर उभरती है, जिसमें न तो यूपीए को बहुमत मिले और न ही एनडीए को तो वैसी स्थिति में नीतीश कुमार प्रधानमंत्री पद के लिए आगे आ सकते हैं। अगर नीतीश कुछ और धर्मनिरपेक्ष पार्टियों के नेताओं, मसलन ममता बनर्जी, जयललिता, नवीन पटनायक, शिबू सोरेन जैसों को साधने में कामयाब हो जाएं, तो संभव है कि भाजपा को सत्ता से दूर रखने के लिए कांग्रेस ही नीतीश को समर्थन देकर प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बिठा दे। वैसे यह भी एक हकीकत है कि नीतीश ने कांग्रेस विरोध के सहारे ही राजनीति की सीढ़ियां चढ़ी हैं, लेकिन राजनीति में कब, किससे दोस्ती करनी पड़ जाए, कब किससे दुश्मनी यह परिस्थितियां देखकर तय किया जाता है। अभी कांग्रेस से नीतीश के अच्छे संबंध भी चल रहे हैं। शायद भविष्य की इसी संभावना के मद्देनजर एनडीए में रहते हुए भी नीतीश ने कांग्रेस के राष्टÑपति पद के उम्मीदवार प्रणब मुखर्जी का समर्थन भी किया था। उन्हें लग रहा था कि विकट स्थिति में बड़ी पार्टी का समर्थन हासिल होने पर छोटी पार्टियों को साधना आसान होगा। खंडित जनादेश की स्थिति में बाहर से भाजपा के समर्थन से भी नीतीश 7, रेसकोर्स की दौड़ पूरी कर सकते हैं। नीतीश के अगर एनडीए से अच्छे संबंध होते, तो संभावना ज्यादा बनती, क्योंकि अगर भाजपा की सरकार नहीं बनती, तो नीतीश का नाम आगे कर भाजपा दांव जरूर चलती। नीतीश भाजपा में अपना दांव चल चुके हैं, जब उन्होंने आडवाणी की रथयात्रा की अगवानी की थी। वैसे तीसरे मोर्चे के इकट्ठे होने पर कांग्रेस के समर्थन में सबसे पहला नाम नीतीश का ही हो सकता है। यह भी संभव है कि जब असली मौका आए, तो दूर-दूर तक औरों के साथ नीतीश कुमार का भी नाम न हो।
हो सकता है कि नीतीश की संभावनाएं हकीकत में बदलते देख उनकी पार्टी के अध्यक्ष शरद यादव ही इसमें अड़ंगा लगा दें। वैसे भी वे खुद को राजनीति में नीतीश से वरिष्ठ ही मानते रहे हैं, लेकिन वक्त बुरा होने के कारण वे अनमने ढंग से नीतीश से चिपके हुए हैं। प्रधानमंत्री न बन पाने का गम उन्हें भी खूब सताता है। स्वयं एक बार वे कह चुके हैं कि हवाला कांड में क्लीन चिट मिलने के बाद वह प्रधानमंत्री बन सकते थे, लेकिन यह ताज एचडी देवगौड़ा के सिर रख दिया गया। बहरहाल, शरद यादव के अलावा मुलायम सिंह यादव और लालू यादव भी नीतीश के सपने को ढहाने की पूरी कोशिश कर सकते हैं। पहले भी यह यादव तिकड़ी अपनी अलग धुरी बनाने की बेचैनी जाहिर कर चुकी है।
बहुत हद तक नीतीश की दावेदारी बिहार में उनकी लोकप्रियता पर भी निर्भर करेगी, जो लगातार कम होती हुई सी लग रही है। कहा भी जाता है कि उगते सूरज को सब सलाम करते हैं, डूबते सूरज को कोई न तो तवज्जो देता है और न ही उसे बचाने की कोशिश। अगर आम चुनावों तक नीतीश की वैसी ही लोकप्रियता बनी रहेगी, जैसी कि बिहार की सत्ता में आने के वक्त थी, तो शायद लोग उनका साथ दें, वरना कोई उनके करीब आने से भी डरेगा।
लालकृष्ण आडवाणी की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वे सत्ता के खिलाफ संघर्ष का साकार रूप हैं। लालकृष्ण आडवाणी को भाजपा का शिखर पुरुष यों ही नहीं कहा जाता है। पार्टी को लगभग शून्य से शिखर तक पहुंचाने में उनकी भूमिका से शायद ही कोई इंकार कर सके। अटल से इतर आडवाणी को भाजपा का धुर हिंदूवादी चेहरा माना जाता रहा है। राममंदिर के मुद्दे को सांप्रदायिक, राजनीतिक रंग देकर भाजपा को कांग्रेस के मुकाबले खड़ा करने के लिए जिस वक्त उन्होंने पूरे देश में रथयात्रा निकाली थी, तब राष्टÑीय स्वयं सेवक संघ को उन पर नाज था। 1991 में बाबरी मस्जिद उनकी आंखों के सामने ही धाराशाही की गई थी। कहा जाता है कि उनका पूरा अभियान ही बाबरी मस्जिद को ढहाने के लिए था।
राजग की सरकार के मुखिया के तौर पर 1999 में जब अटल बिहारी वाजपेयी को नेता चुना गया, तो तब उनकी मजबूरी यह थी कि आडवाणी की हिंदूवादी छवि सभी घटकों को स्वीकार नहीं थी। आडवाणी उस वक्त प्रधानमंत्री बनने के लिए बेताब थे। इसी बीच उन्होंने इतना जरूर करवाया था कि गृहमंत्री से बदलवाकर अपना ओहदा उपप्रधानमंत्री का करवा लिया था और कोशिश की थी सत्ता की कमान उनके हाथों में रहे और वाजपेयी सरकार का मुखौटा बनकर रहें। भाजपा में जब वाजपेयी का दौर खत्म हुआ, तो लगा कि अब कमान सीधे आडवाणी के हाथ में आ जाएगी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं। जिस राष्टÑीय स्वयं सेवक संघ के स्वयंसेवक के तौर पर उन्होंने 14 साल की उम्र से अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत की थी, उस संघ ने उन्हें 2005 में बड़ी बेदर्दी से अपने से अलग करना शुरू कर दिया था। 2005 में आडवाणी पाकिस्तान की यात्रा पर गए थे, जहां उन्होंने पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना की मजार पर फूल चढ़ाने के बाद एक टीवी चैनल को दिए साक्षात्कार में कहा था कि जिन्ना धर्मनिरपेक्ष छवि वाले नेता थे। बस जिन्ना के सेक्युलरिज्म पर दिए गए उनके बयान के बाद संघ और आडवाणी के बीच संवादहीनता बढ़ती ही चली गई। बावजूद इसके आडवाणी ने स्थिति को बड़े कौशल से संभाल लिया। 2009 के चुनाव से पहले अपने को पार्टी की ओर से पीएम इन वेटिंग बनवा लिया था। मगर तबसे आडवाणी प्रधानमंत्री बनने की प्रतीक्षा कर रहे हैं, तो अब तक करते ही जा रहे हैं। हालांकि भाजपा ने पीएम उम्मीदवार के रूप में नरेंद्र मोदी का नाम घोषित कर दिया है। उनका अभियान भी तेजी से चल रहा है, लेकिन अब भी जानकार आडवाणी आउट आॅफ रेस नहीं मान रहे हैं। नरेंद्र मोदी अगर 272 के आंकड़े के आस-पास भाजपा को पहुंचाने में सफल नहीं होंगे, तो तय है ऐसे समय में भाजपा को सत्ता के लिए आडवाणी की तरफ ही देखना होगा। जो दल नरेंद्र मोदी के नाम पर एनडीए में नहीं आएंगे, वे सब लालकृष्ण आडवाणी के नाम पर साथ में आ सकते हैं, जिसमें सबसे पहला नाम जदयू का होगा। नीतीश कुमार ने ही आडवाणी का सिताब दियारा से जनचेतना यात्रा में साथ दिया था, जबकि संघ भी इस यात्रा से दूरी बनाए हुए था। लालकृष्ण आडवाणी को 24 दलों के साथ सरकार चलाने का अनुभव है। आडवाणी के नाम पर बीजद, ममता, मायावती भी साथ आने से इंकार नहीं करेंगे, जबकि नरेंद्र मोदी के नाम पर ये दल बाहर रहना ही पसंद करेंगे, क्योंकि इन्हें अपने मुस्लिम वोटर के खिसकने का डर है। यह सच है कि हिंदुत्व भाजपा की विचारधारा में प्राथमिक रहा है। संसद में दो सीटों से सरकार बनाने तक का सफर तय करने में इसी विचारधारा और इसके पोषक संघ व इसकी आनुषंगिक इकाइयां मददगार रही हैं। खुद आडवाणी को कभी फायर ब्रांड हिंदू राजनेता के खिताब से नवाजा जाता था, लेकिन वक्त के साथ कई चीजें बदल गईं। आडवाणी अपने सहयोगियों के साथ लेकर चलना जानते हैं। उन्हें पता है कि आखिर बूंद-बूंद से ही सागर भरता है। संभावनाओं को समेटे रखना जरूरी है, प्रधानमंत्री बनने के ख्वाह को पूरा करने के लिए।
मोदी मारेंगे मैदान?
भाजपा ने नरेंद्र दामोदर मोदी आज एक ऐसे मुकाम पर है, जहां उन पर दांव लगाना पार्टी को लोकसभा चुनाव के लिए सबसे ज्यादा फायदेमंद नजर आया। और इन्हें भाजपा ने अपना प्रधानमंत्री उम्मीदवार घोषित कर दिया। जिस प्रकार से इनके नाम की घोषणा के बाद चार राज्यों में भाजपा ने सफलता पाई है, उससे और मजबूती मिली है, लेकिन नरेंद्र मोदी के सामने 272 के आंकड़े के आस-पास पहुंचना काफी कठिन लग रहा है। ऐसा माना जा रहा है कि अगर नरेंद्र मोदी 200 सीटें तक भाजपा को पहुंचा देंगे, तो गठबंधन दल इनके साथ आएंगे। मोदी के लिए आगे चुनौतियां हजार हैं। केंद्र की सत्ता पर काबिज होने के लिए 272 सीटों की दरकार होती है, लेकिन यह आंकड़ा भाजपा तब भी हासिल नहीं कर पाई थी, जब देश में अबकी बारी, अटल बिहारी का शोर था।
1998 में भाजपा 338 सीटों पर चुनाव लड़ी थी और लोकसभा में एक वोट से विश्वास मत खोने की सहानुभूति के बीच भी पार्टी 339 सीटों पर चुनाव लड़कर 182 ही सीटें हासिल कर पाई थी। 2009 में उसने 443 सीटों पर चुनाव लड़ा, लेकिन उसके खाते में आई महज 116 सीटें। ऐसे में नरेंद्र मोदी इस आंकड़े को ढ़ाई गुना बढ़ाकर 272 तक ले जाएंगे, इसमें संदेह है। नरेंद्र मोदी की विकास पुरुष की छवि को भाजपा भुनाने में लगी हुई है। विचारधारा और विकास के गठजोड़ के साथ मोदी लगातार सफलता के पथ पर अग्रसर हैं। इस करिश्माई व्यक्तित्व के आगे पार्टी गौण हो चुकी है। ऐसा कहा जाता है कि करिश्माई नेतृत्व हो, तो जनता और नेता के बीच सीधा संवाद होता है। बिचौलिए अप्रासंगिक हो जाते हैं। भाजपा के सिद्धांत ब्रांड नेता और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के मामले में भी कुछ ऐसा ही है। यहां पार्टी की भूमिका बिचौलिए सी ही है और मोदी के करिश्मे के आगे वह अप्रासंगिक हो गई है।
मोदी ने कभी कहा था कि वह बहुत योजना बनाकर काम नहीं करते। शायद यही उनकी सफलता का मूलमंत्र रहा है। ऐसी सफलता जो निर्विवाद है। क्या भारतीय इतिहास में ऐसा कोई राजनेता हुआ है, जिससे मिलने का समय मांगने वालों की संख्या सिर्फ एक दिन में 600 से ज्यादा रही हो। मोदी के साथ भी ऐसा हो रहा है। पिछले दिनों जब वे दिल्ली में थे, तो सिर्फ एक दिन उनसे छह सौ लोगों ने मिलने की लिखित इच्छा जताई और वह थी अलग-अलग क्षेत्रों से।
छोटे से रेलवे स्टेशन वाडनगर पर कभी चाय बेचकर अपनी जिंदगी चलाने वाले मोदी आज गुजरात जैसे प्रदेश में सत्ता के शिखर पर पहुंचे हैं। उनके आडंबर रहित सादे जीवन एवं प्रभावी प्रशासन शैली के लोग उतने ही कायल हैं, जितने कि उनके हिंदुत्व नारों और करिश्माई भाषण शैली के। नरेंद्र मोदी में ऐसे गुण हैं, जो उन्हें अन्य भारतीय राजनेताओं से अलग करते हैं। चमचों और चाटुकारों से दूरी बनाकर रहने वाले मोदी कहीं न कहीं मध्यवर्गीय भारत की राजनीति के प्रति उदासीनता को अपने प्रति भुनाते रहे हैं। यही वजह है कि विरोधियों ने जितना उन्हें गुजरात दंगों और हिंदुत्व को लेकर कठघरे में लाने की कोशिश की, मोदी को उसका उतना राजनीतिक लाभ मिला।
भीड़ से खुद को अलग और काम कर इन्होंने दिखाया कि कैसे गुजरात जैसे तबाह हुए प्रदेश को विकास के सबसे ऊंचे पायदान पर लाया जा सकता है। ऐसा कौन- सा क्षेत्र है, जहां आज गुजरात का लाभ विकास के दायरे में नहीं आता। इसी सफलता में मोदी का असली मतलब छिपा है। मतलब ढूंढा जा चुका है विरोधियों द्वारा भी और खुद भाजपा के जरिये भी। मोदी ने इतना साबित कर दिया कि अब वह पार्टी से ऊपर अपनी पहचान रखते हैं। ऐसी पहचान जिनका अपना दायरा है, अपना रंग है। किसी और रंग से न उसे बेढंग नहीं किया जा सकता है और न उस पर चमक चढ़ाई जा सकती है। वह अलग रंग है और वक्त के थपेड़ों से उसमें और चमक आ रही है।
बहरहाल, अब देखा जा रहा है कि जो दूसरे दलों से उम्मीदवार घोषित हो रहे हैं या अघोषित हैं, उनमें सबसे ऊपर मोदी का ही नाम है। अब देखना है कि वे कितना सफल हो पाते हैं।
राजनीतिक गुणा भाग करते रहिये और पसंद व नापसंद के नाम पर पार्टी से लेकर नेता को वोट देते रहिए। लेकिन सच तो यही है कि आगामी लोकसभा चुनाव के बाद जिन 10 लोगों के नाम सत्ता के दावेदारों में शुमार हैं, वे सबके सब किसी न किसी मामले में आरोपों के घेरे में हैं। देश की जनता किसी पार्टी या फिर नेता के नाम पर, भले ही वोट डाल दे, लेकिन इन 10 उम्मीदवारों की करतूतों को देखें, पढेÞं तो साफ हो जाता है कि सत्ता की कुर्सी पर इस बार कोई आरोपी ही विराजमान होंगा। राजनीति संभावनाओं का खेल है। अगर सब कुछ ठीक ठाक रहा, तो 2014 के लोकसभा चुनाव में एक तीसरी शक्ति के भी उभरने की संभावना दिख रही है। यह शक्ति कैसी होगी? अभी ज्यादा नहीं कहा जा सकता, लेकिन इतना तय है कि लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव, अजीत सिंह, जयललिता, मायावती, ओमप्रकाश चौटाला, रामबिलास पासवान और चंद्रबाबू नायडू अपने भविष्य को मजबूत करने के लिए किसी मोर्चे की स्थापना करने से नहीं चूकेंगे। फिर वामपंथियों की राजनीति भी अवसान की ओर है। ऐसे में अगर राजनीति में कोई बदलाव आता है, तो जाहिर है, इनमें से भी कुछ लोग सत्ता की बागडोर संभालने के लिए जोर आजमाइश करेंगे। केजरीवाल की पार्टी के उभार के बाद आगामी राजनीति में सस्पेंस की स्थिति और बढ़ गई है। ऐसे में माइनस कांग्रेस और माइनस भाजपा के बाद क्षेत्रीय दलों के ऐसे गठजोड़ की संभावना को भी बल मिल रहा है, जिसके इशारे पर कांग्रेस या फिर भाजपा की राजनीति टिकी होगी। लेकिन याद रखिए, क्षेत्रीय दलों के नायकों में कई चेहरे ऐसे भी हैं, जो गठबंधन की संभावित राजनीति में अपने को प्रधानमंत्री उम्मीदवार के तौर पर पेश करने से बाज नहीं आ रहे हैं।
       आगामी सत्ता के दावेदारों में ऐसा ही एक चेहरा है मायावती का। बसपा की सिरमौर मायावती की राजनीति दलित एजेंडे के साथ ही मनुवाद के विरोध में शुरू हुई और अंत में उत्तर प्रदेश की सत्ता पाने तक बरकरार रही। मायावती अभी केंद्र सरकार के साथ गलबहियां डाले हुए हैं, लेकिन आगामी चुनाव में वह भी दांव खेलने के फेर में हैं। मायावती ने पिछले साल के जुलाई महीने में खुले मंच से देश का प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षी प्रकट की थी। ब्राह्मण सम्मेलन में जुटी भारी भीड़ से उत्साहित बहुजन समाज पार्टी प्रमुख एवं उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने मंत्रोच्चार, शंख, घंटे, घड़ियाल और नारों के बीच हुंकार भरी। यूपी में कई महीने से चल रहे ब्राह्मण सम्मेलनों के दौर के समापन मौके पर राजधानी में हुए इस बड़े सम्मेलन में मायावती के भाषण से साफ था कि वे कमजोर पड़ चुके दलित-ब्राह्मण गठजोड़ को फिर से जिंदा करके अगला लोकसभा चुनाव में दांव लगाना चाहती हैं, लेकिन उनकी नजर अब अन्य अगड़ी जातियों के वोटों पर भी है। पार्टी कार्यकर्ताओं का आह्वान करते हुए मायावती ने कहा कि आप सब कोशिश करो, तो हम केंद्र की सत्ता का पांच वर्ष में कायापलट कर देंगे। मायावती ने कहा कि सर्वसमाज के निर्माण का मार्ग बनाकर हम जल्द ही दिल्ली की कुर्सी पर काबिज होंगे। हम पांच वर्ष में ही वह काम कर लेंगे, जो कांग्रेस और भाजपा बीस-बीस साल में भी नहीं कर सकीं।
 15 जनवरी, 1956 को जन्मी मायावती नैना कुमारी भारत की एक राजनीतिज्ञ महिला होने के साथ-साथ उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री भी रह चुकी हैं। वे बहुजन समाज पार्टी की नेता भी हैं। सन् 2007 के विधानसभा चुनावों में बसपा ने राज्य में पूर्ण बहुमत प्राप्त किया और वे मुख्यमंत्री बनीं। मायावती इससे पहले भी तीन बार छोटे-छोटे कार्यकाल के लिए सन् 1985, सन् 1997 और भारतीय जनता पार्टी के समर्थन के साथ सन् 2002 से 2003 तक उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रह चुकी हैं। वे पहली दलित महिला हैं, जो भारत के किसी राज्य की मुख्यमंत्री बनीं। मायावती के साथ एक और रिकॉर्ड कायम है। वे 26 करोड़ आयकर देने वाली पहली भारतीय राजनेता रही हैं। राजनीति में आने से पूर्व मायावती दिल्ली के एक स्कूल में शिक्षिका के रूप में कार्य करती थीं। सन् 1977 में कांशीराम के संपर्क में आने के बाद उन्होंने एक पूर्णकालिक राजनीतिज्ञ बनने का निर्णय ले लिया। कांशीराम के संरक्षण में वे उस समय उनकी कोर टीम का हिस्सा रहीं, जब सन् 1984 में बसपा की स्थापना हुई थी।
         मायावती ने अपना पहला चुनाव उत्तर प्रदेश में मुजफ्फरनगर के कैराना लोकसभा सीट से लड़ा था। वे अविवाहित हैं और अपने समर्थकों में बहनजी के नाम से जानी जाती हैं। मायावती के व्यक्तित्व एवम कृतित्व पर कई पुस्तकें लिखी जा चुकी हैं। इनमें पहला नाम आयरन लेडी कुमारी मायावती का है, जो पत्रकार मोहमद जमील अख्तर ने लिखी है। उनके द्वारा स्वयं हिन्दी भाषा में मेरे संघर्षमयी जीवन और बहुजन मूवमेंट का सफरनामा तीन भागों में लिखा गया। अंग्रेजी भाषा में वरिष्ठ पत्रकार अजय बोस द्वारा लिखी गई ‘बहनजी ए पॉलिटिकल बायोग्राफी आॅफ मायावती’ अब तक की सर्वाधिक प्रशंसनीय जीवन गाथा है, जो मायावती के व्यक्तिगत जीवन पर लिखी गई है। आजकल लखनऊ  की एक आरटीआई कार्यकर्ता डॉ. नूतन ठाकुर की पत्नी अमिताभ ठाकुर आईपीएस मायावती के सामाजिक, सांस्कृतिक व राजनीतिक महत्व को रेखांकित करते हुए एक पुस्तक लिख रही हैं, लेकिन इन तमाम अच्छाइयों के बीच मायावती पर भी भ्रष्टाचार के अनेक मामले दर्ज किए गए। आय से अधिक संपत्ति के मामले से लेकर ताज कॉरिडोर और अंबेडकर पार्क बनाने में हुए घोटालों में मायावती अक्सर विवादों में रही हैं।
      मायावती के पास अपना वोट बैंक है। उत्तर प्रदेश में पूरे दलित वोट पर मायावती का कब्जा है। साथ ही उसके साथ एक बड़ा वोट बैंक मुसलमानों का भी है। अगर पिछले विधानसभा चुनाव की बात करें, तो प्रदेश के 17 फीसदी ब्राह्मण वोट बसपा के पक्ष में पड़े थे। इसके अलावा बसपा का वोट बैंक कमोबेस हर राज्यों में है। आगामी लोकसभा चुनाव को लेकर बसपा की रणनीति कांग्रेस के साथ गठबंधन करके पूरे देश में 100 सीटों पर अपना उम्मीदवार उतारने की है। मायावती इस चुनाव में कम से कम 40 सीटों पर जीत हासिल करने की तैयारी कर रही हैं। कांग्रेस के साथ गठबंधन होने पर मायावती को इसका लाभ भी मिल सकता है, लेकिन दिक्कत यह है कि अभी कांग्रेस मायावती के साथ केवल उत्तर प्रदेश तक ही गठबंधन करने को सोच रही है। आगामी चुनाव में बसपा की हालत क्या होगी? अभी कहना मुश्किल है, लेकिन राजनीतिक संभावनाओं को देखते हुए और सत्ता  के दावेदारों में मायावती को कमतर नहीं आंका जा सकता।
ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल की वर्तमान मुख्यमंत्री एवं तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख हैं। ये अपने समर्थकों में दीदी के नाम से अत्यधिक लोकप्रिय हैं। सूती साड़ी, हवाई चप्पल, कंधे पर कपड़े का थैला और चेहरे पर हमेशा संघर्ष के भाव, इनकी मुख्य पहचान है। तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी अपनी सादगी और संघर्ष की बुनियाद पर पश्चिम बंगाल में वाममोर्चा के 34 साल पुराने किले को ढहाने में सफल रहीं। ममता का व्यक्तित्व एक जमीनी, संघर्षशील, तेजतर्रार और मुखर नेता के समान है। वे छोटे फायदे के लिए कभी अपने लक्ष्य से नहीं भटकीं। ममता का जन्म कोलकाता में 5 जनवरी, 1955 को हुआ था। उन्होंने बसंती देवी कॉलेज से अपनी स्नातक की शिक्षा और जोगेश चंद्र चौधरी लॉ कॉलेज से अपनी कानून की डिग्री प्राप्त की। अब भी वह लाल खपरैल की छत वाले घर में रहती हैं। ममता बनर्जी को गरीबी से संघर्ष करते हुए दूध बेचने का काम भी करना पड़ा था। उनके लिए अपने छोटे भाई-बहनों के पालन-पोषण में अपनी विधवा मां की मदद करने का यही अकेला तरीका था।
          पश्चिम बंगाल में यूथ कांग्रेस की अध्यक्ष के तौर पर ममता बनर्जी ने राजनीति की शुरुआत की। वह पहली बार 1984 में सोमनाथ चटर्जी को हराकर जादवपुर सीट से लोकसभा में पहुंची। कांग्रेस से अलग होने के बाद इन्होंने 1997 में तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की। दक्षिण कोलकाता सीट से 1991, 1996, 1998, 1999, 2004 और 2009 में इन्हें लोकसभा के लिए चुना गया। ममता बनर्जी दो बार रेल मंत्री रह चुकी हैं। इन्होंने पहले राजग के साथ गठबंधन में और फिर संप्रग सरकार-दो में यह जिम्मेदारी संभाली। करीब 13 साल के संघर्ष के बाद आखिरकार पश्चिम बंगाल में वाममोर्चा को हटाकर ममता बनर्जी इतिहास रचने में सफल रहीं। बंगाल में ममता की राजनीति वामदलों के विरोध पर टिकी है। जहां वामदल वहां ममता नहीं। राज्य की राजनीति में दलित, पिछडेÞ, मुसलमान और सवर्ण सब ममता की राजनीति के मुरीद हैं और वोटर भी। पिछले लोकसभा चुनाव में  ममता की पार्टी टीएमसी को 19 सीटें मिली थीं। वर्तमान राजनीति में ममता जितनी कांग्रेस से दूर हैं, उतनी ही भाजपा से। ममता की सोच है कि समान विचार वाले नेताओं से मिलकर एक संघाीय मोर्चा बनाने की, लेकिन अभी इसकी शुरुआत नहीं हुई है। बदलती राजनीति में ममता की नजर अब पूरी तरह बंगाल से अधिक से अधिक सीटें लाने की है। बंगाल से लोकसभा की 42 सीटें हैं और ममता इस बार 30 से ज्यादा सीटें लाने की रणनीति पर काम कर रही हैं। चुनाव के बाद समान विचारधारा वाली पार्टियों को मिलाकर ममता अगर कोई मोर्चा बनाने में कामयाब हो जाती हैं और मोर्चा में सबसे ज्यादा सीटें लाने में सफल हो जाती हैं, तो वह कांग्रेस और भाजपा के साथ अपनी शर्तोंं पर जा सकती हैं। उसके लिए प्रधानमंत्री का रास्ता सुगम हो सकता है। लेकिन ममता भी आरोपों से वंचित नहीं हैं। शारदा चिटफंड घोटाले में टीएमसी के कई नेताओं के फंसने के साथ ही उस कंपनी को आगे बढ़ाने के मामले में ममता वामदलों के निशाने पर हैं। इसके साथ ही पिछले चुनाव में जिन नक्सलियों ने ममता को बड़ी तादाद में वोट दिए थे, अब उनका ममता के प्रति मोह भी भंग हो रहा है।  
            आगामी चुनाव में सत्ता के दावेदारों में मुलायम सिंह यादव की राजनीति सबसे ज्यादा है। मुलायम सिंह यादव का जन्म 22 नवम्बर 1939 को इटावा जिले के सैफई गांव में मूर्ति देवी व सुघर सिंह के किसान परिवार में हुआ था। मुलायम सिंह अपने पांच भाई-बहनों में रतन सिंह से छोटे व अभयराम सिंह, शिवपाल सिंह यादव, रामगोपाल सिंह यादव और कमला देवी से बड़े हैं। पिता सुघर सिंह उन्हें पहलवान बनाना चाहते थे, किन्तु पहलवानी में अपने राजनीतिक गुरु नत्थू सिंह को मैनपुरी में आयोजित एक कुश्ती-प्रतियोगिता में प्रभावित करने के पश्चात उन्होंने नत्थू सिंह के परंपरागत विधानसभा क्षेत्र जसवंत नगर से अपना राजनीतिक सफर शुरू किया। राजनीति में आने से पूर्व मुलायम सिंह आगरा विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर एवं जैन इंटर कॉलेज करहल मैनपुरी से बीटी करने के बाद कुछ दिनों तक इंटर कॉलेज में अध्यापन कार्य भी कर चुके हैं।
सन् 1960 में जैन इंटर कॉलेज, करहल (मैनपुरी) में आयोजित एक कवि सम्मेलन में उस समय के विख्यात कवि दामोदर स्वरूप विद्रोही ने अपनी चर्चित रचना दिल्ली की गद्दी सावधान! सुनाई तो पुलिस का एक दरोगा मंच पर चढ़ आया और विद्रोही जी से माइक छीन कर बोला-बंद करो ऐसी कविताएं, जो शासन के खिलाफ हैं। उसी समय गठे शरीर का एक लड़का बड़ी फुर्ती से वहां पहुंचा और उसने उस दरोगा को मंच पर ही उठाकर दे मारा। विद्रोही जी ने मंच पर बैठे कवि उदय प्रताप सिंह से पूछा ये नौजवान कौन है, तो पता चला कि यह मुलायम सिंह यादव हैं। उस समय मुलायम सिंह उस कॉलेज के छात्र थे और उदय प्रताप सिंह वहां प्राध्यापक थे। बाद में यही मुलायम सिंह यादव जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने, तो उन्होंने विद्रोही जी को उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान का साहित्य भूषण सम्मान प्रदान किया। लोहिया की राजनीति से प्रेरित मुलायम सिंह 1967 में पहली बार विधानसभा के सदस्य चुने गए और मंत्री बने। 1992 में उन्होंने समाजवादी पार्टी बनाई और तीन बार क्रमश: 5 दिसंबर 1989 से 24 जनवरी 1991 तक, 5 दिसंबर 1993 से 3 जून 1995 तक और 29 अगस्त 2003 से 11 मई 2007 तक उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। इसके अतिरिक्त वे भारत सरकार में रक्षा मंत्री भी रह चुके हैं।
मुलायम सिंह पर कई पुस्तकें लिखी जा चुकी हैं। इनमे पहला नाम मुलायम सिंह यादव चिंतन और विचार का है। इसके अतिरिक्त राम सिंह और अंशुमान यादव द्वारा लिखी गई ‘मुलायम सिंह ए पॉलिटिकल बायोग्राफी’ अब उनकी प्रामाणिक जीवनी है। लखनऊ  की पत्रकार डॉ. नूतन ठाकुर ने भी मुलायम सिंह के सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक महत्व को रेखांकित करते हुए एक पुस्तक लिखने का कार्य किया है। अशोक कुमार शर्मा ने उन पर चौदह खंडों में ग्रंथमाला लोकसभा और राज्यसभा में मुलायम सिंह यादव पर लिखी, जो मुलायम सिंह यादव पर सब से प्रामाणिक और अत्यन्त सफल ग्रन्थमाला मानी जाती है।
        मुलायम के पक्ष में बहुत सारी बाते हैं, तो विरोध में भी तर्क कम नहीं हैं। उत्तर प्रदेश में उनकी पार्टी की सरकार है और बेटा अखिलेश यादव प्रदेश का मुख्यमंत्री। मुलायम सिंह के परिवार के अधिकतर लोग राजनीति ही करते हैं और आगे भी करेंगे। मुलायम सिंह प्रदेश में मुसलमानों के सबसे बड़े पैरोकार माने जाते हैं, लेकिन उन्हीं की सरकार में मुसलमानों की सबसे ज्यादा हत्याएं भी हुई हैं। चुनावी राजनीति को ताख पर रख दें, तो मुलायम सिंह यादव पर भी कई आरोप लगे हैं। भ्रष्टाचार से लेकर कई अन्य तरह के आरोपों में वे घिरे रहे हैं, लेकिन इस बार की राजनीति मुलायम सिंह के लिए करो या मरो वाली है। कई दफा 40 से ज्यादा सीटें लाकर भी मुलायम सिंह प्रधानमंत्री की कुर्सी तक नहीं पहुंच पाए। इस बार उस कुर्सी को पाने के लिए वे कुछ भी करने को तैयार हैं। बार-बार कांग्रेस की सरकार को बचाने वाले मुलायम सिंह अब एकला चलो की राजनीति पर चल रहे हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश से सपा को 22 सीटें मिली थीं। इस बार 40 सीटें पाने की राजनीति कर रहे हैं। तीसरा मोर्चा बनाने की भी बात कर रहे हैं। यह बात और है कि देश की बदलती राजनीति में मोदी के आने से कांग्रेस अगर परेशान है, तो मुलायम सिंह भी कम परेशान नहीं हैं। यह भी उतना ही सच है कि अगर चुनाव के बाद कांग्रेस और भाजपा को सरकार बनाने के लिए सीटें नहीं मिलीं, तो मुलायम सिंह की राजनीति चमक सकती है। अगर वे 40 से ज्यादा सीटें लाने में सफल हो जाते हैं और किसी भी मोर्चा के तहत 70 से 80 सीटों का अलायंस बना लेते हैं, तो उनकी किस्मत का ताला खुल सकता है। फिर वे भाजपा के साथ भी जा सकते हैं और कांग्रेस के साथ भी। जरूरत पड़ने पर वे वाम दलों को भी छोड़ सकते हैं।
      पिछले दिनों अन्नाद्रमुक ने प्रस्ताव पास कर कहा कि अगर पार्टी लोकसभा में 30 सीटें जीतती हैं, तो जयललिता दिल्ली में बड़ी भूमिका निभाएंगी। तमिलनाडु की राजनीति बड़ी निराली है। वह देश का ऐसा राज्य है, जहां राष्टÑीयता के साथ हिंदू भावना भी मजबूती से जुड़ी हुई है। ऐसे में, अन्नाद्रमुक और द्रमुक, दोनों पार्टियों ने तय किया है कि वे भाजपा और कांग्रेस के साथ कोई गठजोड़ नहीं करेंगी। फिल्मी दुनिया की चकाचौंध से निकल कर एमजी रामचंद्रन की बैसाखी के जरिये राजनीति में आने वाली जयललिता की अपनी राजनीति है। उसके अपने वोट बैंक हैं और केंद्र की राजनीति से लेकर प्रदेश की राजनीति में उनके चाहने वालों की लंबी सूची है। आगामी चुनाव में अभी यह तय नहीं हुआ है कि जयललिता भाजपा के साथ जाएंगी या फिर कांग्रेस की सहयोगी बनेंगी। अभी यह भी तय नहीं है कि वह मुलायम सिंह के संभावित तीसरे मोर्चा की हिस्सा होंगी या फिर ममता बनर्जी के संभावित संघीय मोर्चा के साथ रहेंगी, लेकिन एक बात तय है कि वह इस बार अधिक से अधिक सीटें लाने की र्कोिशश में हैं। यह बात और है कि करुणानिधि की पार्टी डीएमके किसी भी सूरत में जयललिता को आगे बढ़ाने में रुचि नहीं लेंगी। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि दक्षिण भारतीय प्रधानमंत्री के नाम पर दक्षिण के सभी दल एक भी हो सकते हैं, लेकिन इसके लिए जरूरी है कि जयललिता को 30 से ज्यादा सीटें मिलें।
वैसे तमिलनाडु में राष्टÑीय पार्टियों की कोई भूमिका नहीं है, लेकिन इस बार दिलचस्प यह है कि तमिलनाडु के कई सुदूर जिलों में नरेंद्र मोदी बड़े हीरो बनकर उभरे हैं। सर्वेक्षण कहते हैं कि वहां मोदी के प्रशंसकों की संख्या 10 से 12 प्रतिशत तक है, लेकिन वे भाजपा के समर्थक नहीं हैं। तमिलनाडु की राजनीति को देखते हुए कहा जा सकता है कि हिंदू धर्म और विश्वास की नींव तमिलनाडु में गहरी होने की वजह से मोदी वहां काफी वोट बटोर सकते हैं।
इधर जयललिता दस रुपये में अम्मा इडली और अम्मा सांभर जैसी अद्भुत योजनाओं के कारण तमिलनाडु के दक्षिणी जिलों में काफी लोकप्रिय हो चुकी हैं। दस रुपये में लंबी यात्रा की बसों और बस अड्डों पर अम्मा थानीर (अम्मा पानी) की बोतल देने की उनकी योजना भी ग्रामीण बस अड्डों पर उन्हें शोहरत दिला रही है। इसके अतिरिक्त उन्होंने अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों का भी अंत कर दिया है, जैसे कि विजयकांत का गुट काफी कमजोर हो गया है। लेकिन भ्रष्टाचार को लेकर इस बार सतर्क होने के बावजूद उनके लिए आगे की राह मुश्किल हो सकती है। देवगौड़ा सरकार के दौरान 1996 में जब पी. चिदंबरम वित्त मंत्री थे, तब सीबीआई ने उन पर आय से अधिक धन का मुकदमा दर्ज किया था। उस मुकदमे का फैसला 2014 की शुरुआत में हो सकता है। ऐसे में यह कहना गलत नहीं कि तमिलनाडु में राष्टÑीय राजनीतिक पार्टियों के लिए कोई जगह नहीं है। कहा जा रहा है कि जयललिता के वास्तविक दोस्त नरेंद्र मोदी हैं। आंतरिक सर्वेक्षण के अनुसार, अन्नाद्रमुक 25 से 30 लोकसभा सीटें जीत सकती है। वैसी स्थिति में जयललिता न सिर्फ प्रधानमंत्री पद की मजबूत दावेदार होंगी, बल्कि प्रधानमंत्री न बन पाने की स्थिति में नरेंद्र मोदी को मदद पहुंचा सकती हैं। यहां कांग्रेस की सबसे बड़ी पराजय दिख रही है। राज्य से शायद उसका पूरी तरह सफाया हो जाएगा।
      महाराष्ट्र के दिग्गज नेता शरद पवार भारतीय राजनीति में एक चर्चित चेहरे के रूप में विराजमान हैं। 73 साल की उम्र में भी शरद की राजनीति अपने दम पर चलती है और देश की राजनीति पर असर डालने वाली होती है। शरद की राजनीति कांग्रेस से शुरू हुई। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री रह चुके शरद केंद्र की राजनीति को भी हमेशा नचाते रहे हैं। किसानों के भी नेता हैं और कारोबारियों से भी उनके बेहतर संबंध हैं। इनका भी पूरा परिवार राजनीति में शरीक है, लेकिन वंशवादी राजनीति की ये निंदा भी करते दिखते हैं। कांग्रेस से अलग होकर एनसीपी पार्टी चला रहे हैं और वर्तमान में इनकी पार्टी यूपीए सरकार के साथ है। पिछले लोकसभा चुनाव में एनसीपी को 9 सीटें मिलीं, लेकिन इस बार शरद पवार महाराष्ट्र और अन्य राज्यों से 20 से ज्यादा सीटें हासिल करने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। पैसा और पावर दोनों है शरद पवार के पास। देश भर में पार्टी की शाखाएं हैं, लेकिन असली राजनीति महाराष्ट्र तक ही सीमित है। शरद पवार कृषि मंत्री हैं, लेकिन महंगाई दूर करने में हमेशा विफल साबित हुए हैं। कई बार अपने ही बयानों में फंसे हैं, तो कई दफा कांग्रेसी नेताओं को झिड़कने से भी बाज नहीं आए। अभी पांच राज्यों में कांग्रेस की हार पर शरद ने कांग्रेस पार्टी को झोलाछाप नेताओं की मंडली तक कह डाला।
        शरद इस बार कुछ अलग तरह की राजनीति करने में लगे हुए हैं। वे भी प्रधानमंत्री के उम्मीदवार हैं। चाहे कांग्रेस के समर्थन से प्रधानमंत्री बने या फिर भाजपा के पाले में जाकर। शरद पवार देश में संभावित हर मोर्चे के अंग हो सकते हैं। उन्हें किसी से कोई गुरेज नहीं है।  
       अपनी पार्टी को सत्ता में लाने और खुद प्रधानमंत्री बनने का जो सपना मोदी देख रहे हैं, वह तब तक पूरा नहीं हो सकता, जब तक कि वे उत्तर प्रदेश में पार्टी की किस्मत नहीं बदल देते। उत्तर प्रदेश में लोकसभा की 80 सीटें हैं, जो किसी भी राज्य की तुलना में सबसे ज्यादा हैं। इनमें से सिर्फ नौ ही आज भाजपा के पास हैं। 1996, 1998 और 1999 के तीन लोकसभा चुनावों में भाजपा लोकसभा में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में आई थी। इन चुनावों में उसने क्रमश: 52, 59 और 29 सीटें जीती थीं। 2004 में जब अटल बिहारी वाजपेयी सरकार सत्ता से बाहर हुई, तब भाजपा सिर्फ 10 सीटें जीत पाई थी।
यह रिकॉर्ड इशारा करता है कि दिल्ली की सत्ता में वापसी करने के लिए भाजपा को उत्तर प्रदेश में कम से कम 25 सीटें तो जीतनी ही होंगी। यानी मौजूदा सीटों से 16 सीट ज्यादा। अगले साल 25 सीटें जीतना भाजपा के लिए 1999 की स्थिति की तुलना में कहीं ज्यादा मुश्किल है। 1999 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने कुल 30 प्रतिशत वोट हासिल करके 25 सीटें जीती थीं। दरअसल, 1991 से 1999 का दौर उत्तर प्रदेश में भाजपा का स्वर्णिम दौर रहा था। इस दौरान हुए चारों लोकसभा चुनावों में पार्टी ने 30 प्रतिशत से ज्यादा वोट हासिल किए। 1998 में तो यह आंकड़ा 37.़5 प्रतिशत तक भी पहुंचा, लेकिन 2004 में यह घटकर 22 प्रतिशत पर आ गया और 2009 में तो पार्टी को कुल 17.़5 प्रतिशत वोट ही हासिल हुए। कोढ़ में खाज यह कि 14 साल में सपा और बसपा जैसे क्षेत्रीय दल उत्तर प्रदेश में मजबूत ही हुए हैं। 90 के दशक में हुए विधानसभा और लोकसभा चुनावों में भाजपा का वोट प्रतिशत या तो सबसे ज्यादा होता था या फिर वह इस मामले में दूसरे स्थान पर रहती थी। लेकिन अब स्थिति ऐसी नहीं है। अपवाद के रूप में 2009 के लोकसभा चुनाव को छोड़ दें, जब कांग्रेस ने बसपा से एक ज्यादा यानी 21 सीटें हासिल की थीं, तो वोट प्रतिशत का सबसे बड़ा हिस्सा अब सपा और बसपा में बंटता है।
सवाल उठता है कि उत्तर प्रदेश में भाजपा का यह हाल क्यों हुआ? इसकी प्रमुख वजह यह रही कि सवर्ण वोटों पर उसकी पकड़ लगातार कमजोर होती गई। प्रदेश में सवर्ण वोट लगभग 18 प्रतिशत हैं। पहले यह वोट कांग्रेस को जाता था, लेकिन 1989 के बाद से ही भाजपा लगातार इसे अपने पक्ष में करने में कामयाब हो रही थी। 1999 तक प्रदेश के सवर्ण (ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य) वोट का एक बड़ा हिस्सा पार्टी को मिल रहा था, लेकिन पिछले दस साल में सपा और बसपा ने अपना प्रभाव बढ़ाकर और सवर्ण प्रत्याशियों को मैदान में उतार कर ऊंची जातियों के वोट का अच्छा-खासा हिस्सा अपनी तरफ खींच लिया।
1996 के विधानसभा चुनावों में भाजपा ने प्रदेश के कुल सवर्ण वोटों का 74 प्रतिशत हासिल किया था। यानी तीन-चौथाई सवर्ण वोट भाजपा के पास थे़, लेकिन 2002 में यह घटकर मात्र 47 प्रतिशत रह गए। इसके ठीक उलट बसपा के पास जहां 1996 में सिर्फ चार प्रतिशत ब्राह्मण वोट थे, वे 2002 में बढ़कर 14 प्रतिशत हो गए। बसपा को मिलने वाले अन्य सवर्ण जातियों के वोट भी इस दौर में लगभग दोगुने हो गए। पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव में सपा को लगभग 19 प्रतिशत ब्राह्मण वोट मिले थे। सपा और बसपा दोनों ही एक दौर में जाति आधारित पार्टियां मानी जाती थीं। लेकिन सवर्ण वोटों को अपने पक्ष में करने के बाद इन पार्टियों की राजनीति लगातार समावेशी हुई है। पिछले दो विधानसभा और दो लोकसभा चुनावों में सपा और बसपा ने ब्राह्मण, बनिया और ठाकुर प्रत्याशियों को रिकॉर्ड संख्या में टिकट दिए। इस कारण सवर्ण वोट का एक बड़ा हिस्सा उनके खाते में गया, जिसने पिछड़े और दलित वोटों के साथ मिलकर भाजपा की नैया डुबो दी। 2009 के लोकसभा चुनाव में तो बसपा का हर पांच में से एक प्रत्याशी ब्राह्मण था। बसपा में ब्राह्मण प्रत्याशियों की संख्या दलित प्रत्याशियों से भी ज्यादा थी, जबकि दलित ही बसपा के अस्तित्व का मुख्य कारण रहे हैं। ऐतिहासिक तौर पर उत्तर प्रदेश में हमेशा ठाकुर और ब्राह्मण की चुनावी लड़ाई रही है। भाजपा के वर्तमान राष्टÑीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह ब्राह्मण विरोधी छवि वाले ठाकुर हैं। मोदी के लिए राजनाथ सिंह के साथ मिलकर राज्य के ब्राह्मणों को अपने पक्ष में करना आसान नहीं होगा।



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