Sunday, January 12, 2014

उभरा सत्ता का त्रिकोण

आगामी लोकसभा चुनाव की तैयारियां राजनीतिक पार्टियां करने लगी हैं। जाति-धर्म, भ्रष्टाचार, महंगाई जैसे मुद्दों के नाम पर जोड़-तोड़ जारी है। राष्ट्रीय राजनीति में अभी तक दो ही धुरंधर पार्टियां भाजपा और कांग्रेस ही एक दूसरे के आमने सामने थीं, लेकिन दिल्ली में आप की सरकार बनने के बाद आगामी लोकसभा चुनाव रोचक हो गया है। क्या है चुनावी समीकरण, कौन किस पर पड़ेगा ?

दिल्ली विधानसभा चुनाव में ‘आप’ की इंट्री और सरकार बनाने के बाद देश की राजनीति में एक नया कोण बनता जा रहा है। अब तक जो राजनीति कांग्रेस और यूपीए बनाम भाजपा और एनडीए के बीच चल रही थी, केजरीवाल के आने के बाद तीन ध्रुवों पर टिक गई है। अब देश की राजनीति के तीन कोण हो गए हैं। अब कोई भी पार्टी या नेता ‘आप’ जैसी पार्टी को नजरअंदाज नहीं कर सकती। कह सकते हैं कि बदलते परिवेश में सत्ता की असली चाभी अब कहीं ‘आप’ के पास न चली जाए।
विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को बुरी तरह मात देने वाली भाजपा को उम्मीद थी कि आगामी लोकसभा चुनाव में देश का जनमानस उनके पक्ष में होगा और मोदी के नेतृत्व में वह केंद्र में सरकार बना लेगी, लेकिन लोकपाल और भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के गर्भ से निकली केजरीवाल की पार्टी ‘आप’ के दिल्ली की कुर्सी पर कब्जा जमाने के बाद देश में भर में ‘आप’ के प्रति जिस तरह  लोगों में प्यार उमड़ रहा है, उसे देखकर कहा जा सकता है कि संघ और भाजपा की राजनीति को ‘आप’ ग्रहण लगा सकती है। मोदी की आक्रामक और मीडिया प्रबंधन कौशल से लबरेज राजनीति जिस तरह से कांग्रेस और राहुल की राजनीति को ध्वस्त करती दिख रही थी, ठीक उसी तरह भाजपा और मोदी की राजनीति केजरीवाल और ‘आप’ के सामने जमींदोज होती नजर आ रही है। कह सकते हैं कि अब तक की जो राजनीति कांग्रेस और भाजपा के दो नेताओं राहुल और मोदी के बीच एक दूसरे को बौना साबित करने की हो रही थी, अब केजरीवाल के आ जाने से मुकाबला त्रिकोणीय हो गया है। सत्ता के इस त्रिकोण में एक तरफ कांग्रेस और उसके संभावित एलांयस दल होंगे, तो दूसरी तरफ भाजपा और उसके समर्थक दल और तीसरी धुरी पर केजरीवाल की ‘आप’ होगी। आगामी राजनीति में  इस नए पॉवर ट्रैंगल की संभावित राजनीति क्या हो सकती है? कौन किसको मात देने की क्षमता रखता है? इस हम चर्चा करेंगे, लेकिन सबसे पहले देश भर में मोदी उभार पर एक नजर।
संघ और भाजपा की राजनीति करने वाले किसी भी नेता ने नहीं  सोचा होगा कि मोदी एक दिन इतने बड़े हो जाएंगे कि उन्हें देश की सबसे बड़ी गद्दी के दावेदार के तौर पर देखा जाएगा। मोदी  1991 से पहले भाजपा के उन नेताओं में हुआ करते थे, जो परदे के पीछे रहकर अपनी जिम्मेदारी निभाते रहे हैं। लेकिन मोदी को इसका भान था कि उनकी राजनीति रंग ला सकती है। वह सत्ता के शिखर तक भी पहुंच सकते हैं। यह मोदी की महत्वाकांक्षा ही थी कि जब वह 70 के दशक में गुजरात में संघ प्रचारक के तौर पर काम कर रहे थे, तब ही मोदी ने अपने  विजिटिंग कार्ड पर फ्यूचर मुख्यमंत्री लिखवा रखा था। उनके गांव बडनगर के बचपन के सहपाठी और बडनगर बीएन स्कूल के प्राचार्य नरेंद्र के शास्त्री ने इस संवाददाता को 2005 में बताया था, ‘मोदी में अति महत्वाकांक्षा बचपन से ही थी। पढ़ने-लिखने में सामान्य होने के बावजूद मोदी झटपट आगे बढ़ने के लिए तत्पर रहता था। 70-71 में जब मोदी संघ प्रचारक था, तो उसने अपने विजिटिंग कार्ड पर फ्यूचर मुख्यमंत्री लिख रखा था। उस समय ऐसे एक हजार कार्ड छपवाया था। हालांकि उस समय दोस्तों ने उसे घमंडी करार दिया था, लेकिन वह इसमें सफल भी रहा। अब उसके मन में पीएम बनने की तमन्ना है। लगता है कि वह इसमें भी सफल हो जाएगा।’ शास्त्री के इस बयान से आप समझ सकते हैं कि मोदी भविष्य की राजनीति को ताड़ गए थे और भाजपा की राजनीति को भी समझ गए थे।
समय का फेर देखिए कि मोदी भाजपा के सबसे कद्दावर नेता के रूप में सामने खड़े हैं। प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में। पार्टी के 33 साल के इतिहास में सिर्फ दो लोगों को यह सम्मन मिला था। पहले अटल बिहारी वाजपेयी, जो बाद में प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठने में सफल भी हुए और दूसरे लालकृष्ण आडवाणी, जो उप प्रधानमंत्री रहे। 2009 के चुनाव में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार बने, लेकिन असफल हो गए। 33 साल की इस अवधि में भाजपा के कई अध्यक्ष हुए, लेकिन इनमें सिर्फ वाजपेयी और आडवाणी थे जिन्हें प्रधानमंत्री पद के योग्य समझा गया। मोदी इस सूची में तीसरा नाम बन गए हैं। पिछले आम चुनाव में आडवाणी के नेतृत्व में मैदान में उतरी भाजपा को पराजय मिली थी। सवाल उठता है कि क्या मोदी पार्टी को विजय दिला पाएंगे? क्या वे उन मोर्चों पर सफल हो पाएंगे, जहां आडवाणी नाकामयाब रहे थे? क्या 2009 के आडवाणी के मुकाबले वोटरों में मोदी का ज्यादा आकर्षण है? क्या भाजपा के मौजूदा या संभावित सहयोगी प्रधानमंत्री के तौर पर मोदी को स्वीकार कर पाएंगे? क्या मोदी की मुस्लिम विरोधी छवि भारत की 80 फीसदी हिंदू जनसंख्या में भाजपा के समर्थन का तूफान पैदा कर सकेगी? या फिर इसके चलते भाजपा को एक बार फिर पराजय का सामना करना पड़ेगा? यह सवाल आज राजनीतिक वातावरण में तैर रहा है। सबसे बड़़ी बात है कि केजरीवाल का उभार भाजपा के लिए सबसे ज्यादा घातक है। पार्टी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी भी कह रहे हंै कि ‘आप’ जैसी पार्टी भाजपा के लिए संकट पैदा कर सकती है।
केंद्र में भाजपा की पहली सरकार सिर्फ 13 दिन चली थी। 1996 में तब उसे बहुमत के आंकड़े यानी 272 सीटों तक पहुंचने के लिए पर्याप्त दलों का समर्थन नहीं मिल पाया था। 1998 में बनी पार्टी की दूसरी सरकार 13 महीने चली। 1999 में बनी तीसरी सरकार ने अपना कार्यकाल पूरा किया। 1998 में भाजपा ने 182 सीटें जीती थीं। 1999 में यह आंकड़ा 183 हुआ। दोनों बार दूसरे दलों के समर्थन से भाजपा की सरकार बनी। माना जा सकता है कि अगर भाजपा अगले आम चुनाव में 190 सीटों के आस-पास पहुंच जाती है, तो वह केंद्र में सरकार बनाने की दावेदार होगी। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए मोदी के रास्ते में जो अड़चनें हैं, वे उन अड़चनों से कहीं बड़ी हैं जो 2009 में आडवाणी के सामने थीं। 2009 में जब भाजपा आडवाणी के नेतृत्व में मैदान में उतरी थी, तो उसके खाते में 2004 के आम चुनावों में मिली 137 लोकसभा सीटों की पूंजी थी यानी पार्टी को करीब 45 सीटों की खाई पाटनी थी। अभी भाजपा के पास 116 लोकसभा सीटें हैं यानी मोदी को दूसरी पार्टियों से 70 के करीब सीटें छीननी होंगी। जिस तरह से 2009 के बाद हुए विधानसभा चुनावों और लोकसभा उपचुनावों में भाजपा का प्रदर्शन गिरा है, उसे देखते हुए उनके सामने बहुत बड़ी चुनौती है। अपनी पार्टी को सत्ता में लाने और खुद प्रधानमंत्री बनने का जो सपना मोदी देख रहे हैं, वह तब तक पूरा नहीं हो सकता, जब तक वे उत्तर प्रदेश में पार्टी की किस्मत नहीं बदल देते। उत्तर प्रदेश में लोकसभा की 80 सीटें हैं, जो किसी भी राज्य की तुलना में सबसे ज्यादा हैं। इनमें से सिर्फ नौ ही आज भाजपा के पास हैं। 1996, 1998 और 1999 के तीन लोकसभा चुनावों में भाजपा उत्तर प्रदेश में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में सामने आई थी। इन चुनावों में उसने क्रमश: 52, 59 और 29 सीटें जीती थीं। 2004 में जब वाजपेयी सरकार सत्ता से बाहर हुई, तब भाजपा सिर्फ 10 सीटें जीत पाई थी।
यह रिकार्ड इशारा करता है कि दिल्ली की सत्ता में वापसी करने के लिए भाजपा को उत्तर प्रदेश में कम से कम 25 सीटें तो जीतनी ही होंगी यानी मौजूदा सीटों से 16 सीटें ज्यादा। अगले साल 25 सीटें जीतना भाजपा के लिए 1999 की स्थिति की तुलना में कहीं ज्यादा मुश्किल है। 1999 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने कुल 30 प्रतिशत वोट हासिल करके 25 सीटें जीती थीं। दरअसल 1991 से 1999 का दौर उत्तर प्रदेश में भाजपा का स्वर्णिम दौर रहा था। इस दौरान हुए चारों लोकसभा चुनावों में पार्टी ने 30 प्रतिशत से ज्यादा वोट हासिल किए। 1998 में तो यह आंकड़ा 37.5 प्रतिशत तक भी पहुंचा, लेकिन 2004 में यह घटकर 22 प्रतिशत पर आ गया। 2009 में तो पार्टी को कुल 17.5 प्रतिशत वोट ही हासिल हुए। कोढ़ में खाज यह कि 14 साल में सपा और बसपा जैसे क्षेत्रीय दल उत्तर प्रदेश में मजबूत ही हुए हैं। सवाल उठता है कि उत्तर प्रदेश में भाजपा का यह हाल क्यों हुआ? इसकी प्रमुख वजह यह रही कि सवर्ण वोटों पर उसकी पकड़ लगातार कमजोर होती गई। प्रदेश में सवर्ण वोट लगभग 18 प्रतिशत हैं। पहले यह वोट कांग्रेस को जाता था, लेकिन 1989 के बाद से ही भाजपा लगातार इसे अपने पक्ष में करने में कामयाब हो रही थी। 1999 तक प्रदेश के सवर्ण ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य वोट का एक बड़ा हिस्सा पार्टी को मिल रहा था, लेकिन पिछले दस सालों में सपा और बसपा ने अपना प्रभाव बढ़ाकर और सवर्ण प्रत्याशियों को मैदान में उतार कर ऊंची जातियों के वोट का अच्छा-खासा हिस्सा अपनी तरफ खींच लिया।
1996 के विधानसभा चुनावों में भाजपा ने प्रदेश के कुल सवर्ण वोटों का 74 प्रतिशत हासिल किया था, यानी तीन-चौथाई सवर्ण वोट भाजपा के पास थे। लेकिन 2002 में यह घटकर मात्र 47 प्रतिशत रह गया। इसके ठीक उलट बसपा के पास जहां 1996 में सिर्फ चार प्रतिशत ब्राह्मण वोट थे, वे 2002 में बढ़कर 14 प्रतिशत हो गए। बसपा को मिलने वाले अन्य सवर्ण जातियों के वोट भी इस दौर में लगभग दोगुने हो गए। पिछले साल हुए विधानसभा चुनाव में सपा को लगभग 19 प्रतिशत ब्राह्मण वोट मिले थे। सपा और बसपा दोनों ही एक दौर में जाति आधारित पार्टियां मानी जाती थीं। लेकिन सवर्ण वोटों को अपने पक्ष में करने के बाद इन पार्टियों की राजनीति लगातार समावेशी हुई है। पिछले दो विधानसभा और दो लोकसभा चुनावों में सपा और बसपा ने ब्राह्मण, बनिया और ठाकुर प्रत्याशियों को रिकार्ड संख्या में टिकट दिए। इस कारण सवर्ण वोट का एक बड़ा हिस्सा उनके खाते में गया जिसने पिछड़े और दलित वोट के साथ मिलकर भाजपा की नैया डुबो दी। 2009 के लोकसभा चुनाव में तो बसपा का हर पांच में से एक प्रत्याशी ब्राह्मण था। बसपा में ब्राह्मण प्रत्याशियों की संख्या दलित प्रत्याशियों से भी ज्यादा थी, जबकि दलित ही बसपा के अस्तित्व का मुख्य कारण रहे हैं। ऐतिहासिक तौर पर उत्तर प्रदेश में हमेशा ठाकुर और ब्राह्मण की चुनावी लड़ाई रही है। भाजपा के वतर्मान राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह ब्राह्मण विरोधी छवि वाले ठाकुर हैं। मोदी के लिए राजनाथ सिंह के साथ मिलकर राज्य के ब्राह्मणों को अपने पक्ष में करना आसान नहीं होगा। फिर भी भाजपा किसी तरह से उत्तर प्रदेश में 25 सीटें जीत भी जाती है, तो भी मोदी को दौड़ में बने रहने के लिए पूरे देश से 165 सीटें और जोड़नी होंगी। ये सीटें वे कहां से लाएंगे?
भाजपा को पिछले 15 सालों में जो सीटें मिलीं-
वर्ष      सीटें
1998     182
1999      182
2004    138
2009    116
महाराष्ट्र में भाजपा क्षेत्रीय दल शिवसेना के साथ मिलकर चुनाव लड़ती है। यहां 48 लोकसभा सीटें हैं। इनमें सबसे ज्यादा 18 भाजपा ने 1996 में जीती थीं। 1999 में भी पार्टी का प्रदर्शन यहां ठीक रहा और उसे 14 सीटें हासिल हुईं। 2004 में भाजपा के खाते में 13 सीटें आईं, लेकिन 2009 में ये घटकर सिर्फ नौ रह गर्इं, जबकि 2009 में भाजपा को अपनी बड़ी जीत की उम्मीद थी। पश्चिम बंगाल में भाजपा का अस्तित्व लगभग शून्य ही रहा है। 2009 में पार्टी यहां की कुल 42 में से 40 सीटों पर चुनाव लड़ी थी। इनमें से सिर्फ पार्टी के दिग्गज जसवंत सिंह ही दार्जलिंग से जीत पाए थे। जहां तक आंध्र प्रदेश में भाजपा की संभावनाओं की बात है, तो इस बारे में जितना कम कहा जाए उतना अच्छा। 2009 के आम चुनाव में पार्टी ने प्रदेश की कुल 42 लोकसभा सीटों में से 37 पर उम्मीदवार खड़े किए थे, लेकिन किसी को संसद में जाने का मौका नहीं मिला। एक संभावना यह है कि अगर तेलंगाना की राजनीति साफ हो जाती है, तो भाजपा को कुछ फायदा हो सकता है। उधर टीडीपी नेता चंद्रबाबू नायडू भी भाजपा के साथ एलायंस की राह देख रहे है। संभव है कि इसका कुछ फायदा मोदी को मिल जाए। बिहार में मोदी को कितनी सीटें मिलेंगी, अभी इस पर कुछ भी कहना मुश्किल है। पिछले चुनाव में जदयू के साथ गठबंधन में उसे 12 सीटें मिली थीं। यह बात और है कि मोदी के नाम पर बिहार में राजनीति तो भाजपा के पक्ष में दिखती है, लेकिन सच्चाई यह है कि भाजपा को अब राजद, लोजपा, कांग्रेस व जदयू से लड़ाई लड़नी है। ऐसी हालत में मोदी की राह आसान नहीं लगती। और संभावना इस बात की है कि भाजपा बिहार में 2009 के मुकाबले अधिक सीटें नहीं ला सकती। तमिलनाडु की राजनीति में मोदी कितना असरदार होंगे? यहां लोकसभा की 39 सीटें हैं। अतीत में भाजपा के पास एक ऐसा मौका आया था, जब उसने इस राज्य से बड़ी उम्मीदें बांध ली थी। 1998 के आम चुनाव में सभी राजनीतिक पार्टियों को चौंकाते हुए उसने न सिर्फ यहां खाता खोला, बल्कि 1999 में हुए आम चुनाव में उसने अपनी सीटें बढ़ाकर पांच कर ली थीं। लेकिन खुशफहमी का यह किस्सा यहीं खत्म हो गया और इसके बाद वह राज्य में एक भी लोकसभा सीट नहीं जीत पाई। आज के हालात में राज्य की दोनों क्षेत्रीय पार्टियां द्रविड़ मुनेत्र कझगम (डीएमके) और आॅल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कझगम के बीच भाजपा के लिए गुंजाइश बहुत कम है। इन दोनों पाटिर्यों का अतीत बताता है कि वे खांटी अवसरवादी हैं। दोनों ही मोदी के नेतृत्व में बनने वाली सरकार में शामिल होने के लिए एक-दूसरे से होड़ कर सकती हैं।
भाजपा की असली पूंजी मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ,गुजरात और कर्नाटक तक ही सीमित है। ऐसे में मोदी को कोई बड़ा फायदा होगा। सबसे बड़ी बात है कि अगर आप जैसी पार्टी का अवतरण नहीं होता तो संभव था कि मोदी अपना सिक्का चलाने में कामयाब भी हो सकते थे लेकिन आप जैसी पार्टी के आने के बाद मोदी लहर पर ब्रेक सा लगता दिख रहा है।
           और कांग्रेस की तो लुटिया ही डूबती नजर आ रही है।यकीन नहीं हो तो जरा इस आंकड़े को देख लीजिए। हालिया विधान सभा चुनाव के बाद जो तथ्य सामने आए है चैंकाने वाले है। एक आंकड़ा यह है कि हालिया चार विधानसभा चुनावों में कुल 589 विधानसभा सीटें दांव पर लगी हुई थीं। कांग्रेस को इनमें से महज 126 सीटें हाथ लगी हैं। प्रतिशत में यह 22 के आस पास बैठता है। देश की सबसे बड़ी और सबसे पुरानी पार्टी के बारे में यह आंकड़ा क्या कहता है? इसका मतलब यह है कि कांग्रेस देश के उत्तर और मध्य से लगभग विलुप्त हो चुकी है। जाहिर है कि कांग्रेस का दम निकल रहा है। लेकिन राजनीति में कभी किसी का अंत नहीं होता। कांग्रेस को अभी भी आशा है। उसे लग रहा है कि समय के साथ सब ठीक हो जाएगा। हां, अब जनता को ठगने से काम नहीं चलेगा। उसे यह भी लग रहा है कि वह भी केजरीवाल के रास्ते चलकर फिर जनता का विश्वास जीत सकती है। और इसके कारण भी हैं। आगामी लोकसभा चुनाव में चार फैक्टर ही महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले हैं। सबसे पहला फैक्टर है युवा वर्ग। यह वही युवा वर्ग है, जो पहले चुनाव से कटा रहता था, लेकिन आज सबसे ज्यादा सतर्क  और उत्साहित है। देश में 33 फीसदी आबादी युवाओं की है। ये सभी युवा 28 से कम उम्र के हैं। इसके अलावा करीब 15 करोड़ 18 से 23 साल के युवा ऐसे हैं, जो पहली दफा चुनाव में वोट डालने जा रहे हैं। याद रखिए, इन्हीं में से दिल्ली के युवाओं ने केजरीवाल की राजनीति को इस परिणाम तक पहुंचाया है। कांग्रेस को इन युवाओं पर भरोसा है और इन युवाओं पर कांग्रेस बड़े स्तर पर दांव खेलने को तैयार भी है। ये ऐसे युवा हैं जिन्हें देश की राष्ट्रीय समस्या की समझ है। ये किसी धर्म, जाति और किसी खास पार्टी से सरोकार नहीं रखते। दूसरा फैक्टर हैं महिलाएं। देश में 49 फीसदी महिला वोटर हैं यानी कुल 34 करोड़। कांग्रेस अगले चुनाव में महिलाओं को निभर्या फंड में एक हजार करोड़ रुपये की राशि देने और महिला बैंक बनाने के साथ ही महिलाओं के लिए कई योजनाओं के जरिए महिला वोट बैंक को फांसने की तैयारी कर रही है। यह बात और है कि 17 साल से संसद में फंसा महिला आरक्षण बिल अब तक पास नहीं हो पाया है। तीसरा फैक्टर है मुस्लिम राजनीति। यह 15 फीसदी की अबादी वाला देश का सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा भी है। आवादी 15 फीसदी, लेकिन मौजूदा लोकसभा में 6 फीसदी सांसद ही मुस्लिम हैं। देश की 35 सीटों पर 30 फीसदी से ज्यादा मुस्लिम आबादी है। इनमें 9 सीटें पश्चिम बंगाल में, 8 सीटें उत्तर प्रदेश में, 5 सीटें जम्मू कश्मीर में और 4-4 सीटें असम और केरल में हंै। इसके अलावा 145 सीटें देश में ऐसी हैं, जहां मुस्लिम आबादी 10 से 20 फीसदी है। 38 सीटें ऐसी हं,ै जहां मुस्लिम आबादी 20 से 30 फीसदी के बीच है। कांग्रेस इस पर पूरा गुणा भाग कर रही है। चौथा फैक्टर दलित है। दलितों की आवादी देश में 17 फीसदी है। दलितों के लिए 84 सीटें आरक्षित हैं। पिछले चुनाव में कांग्रेस से 28 दलित जीतकर आए थे, जबकि भाजपा से 14 दलित जीत सके थे। सपा से 10 और अन्य से 32 दलितों ने जीत हासिल की थी। साफ है कि 50 फीसदी दलित सीटें क्षेत्रीय दलों के खाते में जाती रही हैं। कांग्रेस अपने इस वोट बैंक को और अधिक मजबूत करने के फेर में है। लेकिन सिक्के का दूसरा पहलू भी है। कांग्रेस प्रधानमंत्री उम्मीदवार के रूप में अगर राहुल गांधी को मैदान में उतारती है, तो संभव है कि मोदी, केजरीवाल और क्षेत्रीय पार्टियों के भंवरजाल में कांग्रेस की सीटें और भी कम हो जाएं, लेकिन यह भी सच है कि कांग्रेस अगर 100 का आंकड़ा भी पार कर जाती है, तो मोदी और भाजपा का सबसे बड़ा सपना टूट जाएगा। केजरीवाल की राजनीति का असर कांग्रेस पर भी पड़ना तय है। लेकिन कांग्रेस के लिए बेहतर है कि अगर केजरीवाल लोकसभा चुनाव में कुछ सीटें लाने में सफल भी हो जाते हैं, तो तय मानिए सरकार बनते समय वह कांग्रेस के साथ जा सकते हैं। केजरीवाल ऐसा नहीं करेंगे, तो संभव है कि उनकी दिल्ली की सरकार चली जाए। जरा इस आंकड़े को देखिए। कांग्रेस के पिछले 15 साल की उपलब्धि से जुड़े तथ्य हैं।
 वर्ष        सीटें
1998       141
1999       114
2004       145
2009       206
    कांग्रेस के उपरोक्त आंकड़ों को देख लें और देश में क्षेत्रीय पार्टियों की मजबूती को समझें, तो साफ हो जाता है कि चुनाव के बाद यूपीए की स्थिति एनडीए से ज्यादा मजबूत हो सकती है। 2009 के चुनाव में क्षेत्रीय दलों को 157 सीटें मिली थीं और इस बात की संभावना अधिक हो गई है कि आगामी चुनाव में भी इन दलों को 200 से ज्यादा सीटें मिल सकती हैं। ऐसे में आप की राजनीति और उसकी सीटें कांग्रेस के लिए रामबाण सावित हो सकती है। कांग्रेस नेता शकील अहमद कहते हैं कि राजनीति में हार और जीत होती रहती है, लेकिन जनता की राजनीति कौन कर रहा है, यह ज्यादा महत्वपूर्ण है। लोकसभा चुनाव में हम अपनी गलतियों को नहीं दोहराएंगे। और तय मानिए कि कांग्रेस धर्म की राजनीति करने वालों को ब्क़ने नहीं देगी। थोड़ा और इंतजार करें। हम आत्म मंथन करके आगे जनता की उम्मीदों पर खड़ा उतरने की कोशिश करेगे।’ देश के विभिन्न इलाकों में आज 14 से ज्यादा पार्टियां चुनावी राजनीति को प्रभावित कर रही हंै। नीतीश कुमार अब भाजपा के साथ नहीं जा सकते हैं। लालू प्रसाद यादव की राजनीति भाजपा के खिलाफ ही है। नवीन पटनायक अभी कांग्रेस और भाजपा से समान दूरी बनाकर चल रहे हंै। जगनमोहन रेड्ड़ी अभी कुछ भी बोलने को तैयार नहीं हैं ममता बनर्जी अभी कांग्रेस से नाराज जरूर हैं, लेकिन चुनाव के बाद हालात को देखकर वह अपने पत्ता खोलेंगी। मुलायम सिंह यादव एक बड़ी ताकत हैं। तीसरा मोर्चा बनाने में जुटे हैं। मायावती देश की बड़ी दलित नेता और उत्तर प्रदेश में खास प्रभव रखती हैं। सत्ता के लिए इन्हें कांग्रेस और भाजपा से परहेज नहीं है। जयललिता मोदी के पक्ष में भी दिख रही हैं और तीसरा मोर्चा के पक्ष में भी। और केजरीवाल की राजनीति का सबको इंतजारहै। लेकिन इतना तय है कि जात-पात से लेकर धर्म के आधार पर होने वाली राजनीति में केजरीवाल के पक्ष में बड़ी आबादी खड़ी है और जनता का मिजाज बदल गया तो केजरीवाल राजनीति में बड़ा उलट फेर कर सकते है।

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