Tuesday, February 4, 2014

मीडिया कि प्रेत छाया

    अखिलेश सरकार पर हल्ला बोल

लोकतंत्र में मीडिया की भूमिका पहरेदार की है। सरकार के कामकाज पर निगरानी रखना, उसका दायित्व है। लेकिन जब इसमें भी भेदभाव होने लगे, तो तो सवाल उठेंगे ही। उत्तर प्रदेश की अखिलेश सरकार ने जब से कमान संभाली है, तभी से मीडिया की प्रेतछाया उस पर है। लेकिन दूसरी तरफ पड़ोस में ही मध्य प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में हो रहे गड़बड़झाले पर मीडिया मौन है। मीडिया ने सैफई महोत्सव पर तो खूब चटखारे लिए, लेकिन जब ऐसे ही महोत्सव दूसरे राज्यों में होते हैं, तो चुप क्यों रहता है? मीडिया पर उठने वाले  ऐसे तमाम सवाल हैं, जिसकी चर्चा करती है अखिलेश अखिल की यह रिपोर्ट...  
        से तो बदलते राजनीतिक परिवेश, लोगों के बदलते राजनीतिक मिजाज और  राजनेताओं समेत बदलती सरकार की नीतियों को लेकर देश की कई राज्य सरकारें मीडिया के रडार पर हैं, लेकिन देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश की अखिलेश सरकार पर मीडिया का हल्लाबोल कुछ ज्यादा ही है, जिससे लगता है कि इस सरकार पर मीडिया की प्रेतछाया कुछ ज्यादा ही है। अखिलेश सरकार मीडिया के लिए किसी मनोरंजन से कम नहीं। मीडिया की नजरों में यहां के हर नेता मनोरंजक हैं और सरकार की हर नीति और काम का एक निगेटिव दृश्य। वर्तमान मीडिया जिस तरह से खबरों की दुनिया को मनोरंजन चश्मे से देख रहा है, उसमें उत्तर प्रदेश का समाज और वहां की राजनीति से लेकर सरकार के लोग खासे निशाने पर रहे हैं। जनता की हित और लोकतंत्र की मजबूती के लिए मीडिया की टेढ़ी नजरों को हमेशा उसके धर्म के रूप में देखा जाता है। सार्थक आलोचना मीडिया की पूंजी है, लेकिन जब मीडिया किसी राजनीतिक विद्वेष या किसी को उपकृत करने की होड़ में अपने होश गंवा बैठता है, तो वह किसी प्रहसन से ज्यादा कुछ भी नहीं होता। जिस तरह से पिछले कुछ सालों में देश का राजनीतिक मिजाज बदला है और मीडिया में दलाली प्रथा की शुरुआत से लेकर काम के बदले दाम की परिपाटी शुरू हुई है, देश की कई राज्य सरकारें कुछ ज्यादा ही आहत होती जा रही हंै। इन राज्यों में बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड से लेकर कुछ और राज्य शामिल हैं, जो आए दिन मीडिया के चलते पानी मांगते फिर रहे हैं। कुछ करें, उसकी भी आलोचना और कुछ ना करें, उसकी भी आलोचना। ऐसा लगता है कि इन सरकारों का मीडिया ट्रायल चल रहा है। जैसे इन राज्यों पर मीडिया की प्रेतछाया हो। हम उत्तर प्रदेश सरकार पर मीडिया के लगातार हो रहे हमले और मीडिया की प्रेतछाया से आपको रूबरू कराएंगे और सरकार के कई गुण-दोषों की चर्चा भी करेंगे, लेकिन सबसे पहले प्रदेश के युवा और साफ-सुथरी छवि वाले मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के एक हालिया बयान की ओर  आपको ले चलते हैं। फिरोजाबाद की एक रैली में अखिलेश ने कहा कि मीडिया ने पिछले दिनों सैफई महोत्सव को लेकर अनर्गल प्रचार किया, जबकि यूपी सरकार की उपलब्धियों को वे लोग अनदेखा करते हैं। हमने जो भी वायदे किए, वे पूरे कर रहे हैं। किसानों को जमीन का उचित मुआवजा दिलाया गया है। मेधावी छात्रों को लैपटॉप और युवा बेरोजगारों को बेरोजगारी भत्ता भी दिलाया है। मेडिकल कॉलेजों में 500 सीटें बढ़ाई गई हंै। गरीबों को नि:शुल्क समाजवादी एम्बुलेंस सेवा 108 और 102 मुहैया कराई गई है। लेकिन ये तमाम बातें मीडिया को दिखाई नहीं देती। इसी फिरोजाबाद की एक सभा में अखिलेश यादव ने अपनी सरकार और अपने कामों की कुछ और चर्चा लोगों के सामने की। मुख्यमंत्री ने कहा कि गुजरात से कहीं बेहतर राज्य उत्तर प्रदेश है। गुजरात में तो दूध के नाम पर गोरखधंधा हो रहा है। माया सरकार और इससे पहले की भाजपा सरकारों ने राज्य में बिजली के क्षेत्र में कुछ नहीं किया, लेकिन हमारी सरकार जल्द ही ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में 20 से 24 घंटे बिजली देने की व्यवस्था में लगी है। ललितपुर कारखाने में बिजली उत्पादन का काम शुरू हो गया है। सरकार कई अन्य तरीके से भी बिजली की व्यवस्था कर रही है। सपा सरकार के गठन के बाद यूपी में विकास की लहर दौड़ी है, लेकिन हमारी सरकार को लगातार बदनाम करने की कोशिश जारी है। जनता इसका जवाब देगी।
         अखिलेश यादव के इन बयानों को देखें, तो साफ हो जाता है कि वे आगामी लोकसभा चुनाव को लेकर डरे हुए हैं और अपनी बात जनता के साथ ही मीडिया तक पहुंचाना चाह रहे हैं, लेकिन मीडिया है कि उनकी बातों पर यकीन करने को तैयार ही नहीं है। मीडिया के यकीन करने के पीछे की सच्चाई यह भी हो सकती है कि सपा की सरकार जो बोल रही है, उसमें कोई सच्चाई नहीं है। यानी उसने अभी तक कोई भी ऐसा काम नहीं किया है, जो लोगों को भाए। लेकिन सरकार के बातों पर विश्वास करने के पीछे की एक दूसरी राजनीति भी संभव है। वह राजनीति है कि सपा की चाल, चरित्र और चिंतन जिस यादव और मुस्लिम राजनीति के इर्द-गिर्द घूम रही है, वह सवर्ण समाज को पच नहीं रहा है। इसके साथ ही भाजपा की राजनीति को उफान देने के लिए किसी भी सूरत में एक साफ चेहरे पर कालिख लगाने की कोशिश भर है। उत्तर प्रदेश के सैफई प्रकरण को इसी रूप में देखा जा सकता है। सैफई मुलायम सिंह का गांव है और अब यह गांव पूरे देश में चर्चित है। लालू यादव बिहार के मुख्यमंत्री बने, तो उनका गांव   फुलवरिया काफी चर्चित हो गया। गांव की तस्वीर बदल गई और सुविधा संपन्न होकर शहरनुमा हो गया। ऐसा ही कुछ सैफई का हाल है। हर साल सैफई में मेले का आयोजन होता है और सपा मुखिया अपने दल-बल के साथ उसका आनंद लेते हैं और अपनी राजनीति को आगे बढ़ाते हैं। इस साल भी कुछ ऐसा ही हुआ, लेकिन सैफई महोत्सव मीडिया के रडार पर चढ़ गया। इस महोत्सव में बॉलीवुड के दर्जनों कलाकार आए और अपनी भाव भंगिमा से लोगों का खूब मनोरंजन भी किया। फिर क्या था? मीडिया ने इस महोत्सव को पश्चिम उत्तर प्रदेश में हुए दंगे से आहत लोगों की परेशानी से जोड़ना शुरू किया और उस आयोजन पर हुए खर्च की बानगी भी लोगों के सामने रखने की कोशिश की। किसी ने इस आयोजन पर 300 करोड़, तो किसी ने 100 करोड़ रुपये खर्च करने का ब्योरा जनता के सामने पेश किया। किसी ने आयोजन पर ही सवाल उठा दिया।
  मुख्यमंत्री अखिलेश यादव मुजफ्फरनगर दंगों की विभीषिका के बीच अपने पैतृक गांव सैफई में महोत्सव आयोजित किए जाने की आलोचना को लेकर मीडिया पर बरस गए। उन्होंने कहा कि महोत्सव प्रदेश में पर्यटन और संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए आयोजित किया जाता है और इस पर 300 करोड़ रुपये खर्च होने से जुड़ी खबर लिखने वाले लोगों को माफी मांगनी चाहिए। जानबूझकर कहा गया कि सैफई महोत्सव पर 300 करोड़ रुपये का बजट रखा गया। जो लोग 300 करोड़ रुपये का दावा कर रहे हैं, वे माफी मांगें, नहीं तो हिसाब-किताब दें। जिस व्यक्ति ने यह कहानी या खबर बनाई, उसको सजा दी जानी चाहिए। महोत्सव में हमारी कमेटी है, जो हिसाब-किताब रखती है, हम लोगों को संघर्ष के लिए मजबूर करें, फिर दंगा पीड़ितों के लिए उनकी सरकार ने जितनी सहायता दी है, उतनी आज तक किसी अन्य राज्य की सरकार ने नहीं दी होगी। फिर भी पूरा मीडिया उनके खिलाफ है।ह्ण अखिलेश यादव के इस बयान से प्रदेश की मीडिया और घायल हो गया। फिर क्या था? एक दूसरी कहानी रची गई कि जब प्रदेश की हालत खराब है और कोई नेता ठीक से काम नहीं कर रहे हैं। फिर भी प्रदेश के मंत्री   विदेश में घूम रहे हैं। अखिलेश ने प्रदेश के आठ मंत्रियों समेत 17 सदस्यों के प्रतिनिधिमंडल की विदेश यात्रा का भी बचाव करते हुए कहा कि स्टडी टूर पर या कॉमनवेल्थ टूर पर कौन सी सरकार के लोग नहीं जाते। मीडिया के लोगों को हर प्रदेश के नेताओं की सूची तैयार करनी चाहिए, जो विभिन्न कामों के लिए अक्सर विदेश दौरे पर जाते हैं। दरअसल, महोत्सव के आखिरी दिन सैफई में जमकर धमाल हुआ था। सलमान, माधुरी, मल्लिका, रणवीर सिंह, सना खां के साथ ही मशहूर जोड़ी साजिद-वाजिद ने भी जौहर दिखाए। इस दौरान मुलायम सिंह यादव का पूरा कुनबा मौजूद रहा। अखिलेश सरकार ने माधुरी दीक्षित को रिटर्न गिफ्ट देते हुए उनकी फिल्म डेढ़ इश्किया को एक करोड़ रुपये की सब्सिडी देने का ऐलान किया। हद तो तब हो गई, जब मौज-मस्ती में डूबी सरकार के सामने एक पुलिसवाले ने मंच पर चढ़ कर काफी देर तक डांस किया।
  पुलिसवाला मंच पर रंग जमा रहा था, तो तमाम बड़े अधिकारी भी सरकार की खिदमत करते नजर आए। तीन दिन पहले हुए दंगल में आईजी आशुतोष पांडेय मुख्यमंत्री के सामने घुटनों पर बैठे नजर आए। आशुतोष पांडेय मुलायम परिवार के करीबियों में गिने जाते हैं। सरकार ने उन्हें एक साथ दो जोन का इंचार्ज बना रखा है। मुजफ्फरनगर और शामली की जिम्मेदारी इन्हीं पर है। लेकिन आईजी साहब दंगा पीड़ितों की मदद करने के बजाय सरकार की वाहवाही लूटने में लगे रहे। एक आरटीआई के मुताबिक, सीएम अखिलेश यादव ने पिछले 22 महीनों के दौरान अपने गांव सैफई की पचास से ज्यादा बार हवाई यात्राएं कीं। महोत्सव के इन आठ दिनों के दौरान भी अखिलेश लगातार सरकारी जहाज से सैफई और लखनऊ  आते जाते रहे। विपक्ष का आरोप है कि इस आयोजन में सरकार ने आम जनता की गाढ़ी कमाई के करीब सौ करोड़ रुपये लुटा डाले। रामगोपाल यादव ने विपक्ष और मीडिया की इस राजनीति का विरोध किया और कहा कि सच क्या है, यह सब लोग जानते हैं। विरोध करने वाले लोग जानबूझकर एक लोकप्रिय सरकार को बदनाम कर रहे हंै और मीडिया विपक्ष के इशारे पर काम कर रहा है।
       यहां सरकार की खिंचाई के पीछे मीडिया की प्रेतछाया की कहानी तो समझ में आती है। लेकिन असली कहानी भाजपा का मीडिया प्रबंधन भी है। अखिलेश सरकार ने अब तक राज्य में फ्री पढ़ाई, फ्री दवाई, फ्री सिंचाई के साथ ही छात्रों को लैपटॉप बांटने की योजना चला रखी। गरीबों के कल्याण के लिए दर्जनों स्कीमें लागू थी, अल्पसंख्यकों की हिफाजत के लिए दर्जनों योजनाओं की शुरुआत की और फिर प्रदेश के छात्रों को साइकिल देने की बात कही, लेकिन ये तमाम योजनाएं भी निगेटिव खबरें ही बनीं। संभव है कि इतने बड़े प्रदेश में सरकार की ये तमाम योजनाएं ऊंट के मुंह में जीरा के समान हों, लेकिन यही सवाल तो कई अन्य राज्यों के बारे में हो सकते हैं। क्या मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों से भी ज्यादा कहीं और घपले और घोटाले हुए हैं? क्या इन राज्यों की विकास योजनाएं जनता तक पहुंच रही हंै? क्या दागदार नेताओं की कमी इन प्रदेशों में है? और फिर क्या गुजरात से लेकर महाराष्ट्र और राजस्थान से लेकर हरियाणा और पंजाब की राजनीति में सब कुछ ठीक-ठाक ही चल रहा है?   क्या इन प्रदेशों की सरकार जनता की उम्मीदों पर खरी उतर रही हंै? अगर ऐसा है, तो इन राज्य के सरकारों को तो आगामी चुनाव से भय होना चाहिए और ही चुनाव प्रबंधन का खेल करना चाहिए। क्या मीडिया इन राज्यों की निगेटिव कहानी दिखाने की कूबत रखता है? जहां तक मुजफ्फरनगर दंगे का सवाल है, उसके बारे में यह कहने में कोई गुरेज नहीं कि यहां के आपसी झगड़े को दंगे में तब्दील कर दिया गया। आपसी झगड़ा यह था कि एक मुस्लिम युवा ने एक हिंदू लड़की की इज्जत को तार-तार करने की कोशिश की। इस तरह की घटनाएं पूरे देश में हो रही हैं और यही समाज चुप्पी मारे सब देख रहा है। लेकिन चंूकि अखिलेश सरकार को बदनाम करना था, इसलिए इस सामाजिक झगड़े को दो समुदायों के बीच दंगे के रूप में परिणत कर दिया गया। कल्पना कीजिए। अगर लड़का और लड़की पक्ष एक ही समुदाय के होते, तो क्या यह दंगा संभव था? लेकिन राजनीति तो अखिलेश को बदनाम करने की थी। इसमें स्थानीय मीडिया की भूमिका कम नहीं थी। दरअसल, ऐसी ही छोटी-छोटी घटनाओं को मीडिया ने दंगे का नाम देना शुरू किया, जिसकी परिणति मुजफ्फरनगर दंगे के रूप में हुई। अगर इन घटनाओं को ज्यादा बढ़ा-चढ़ाकर नहीं दिखाया होता, तो शायद मुजफ्फरनगर की घटना नहीं होती।दरअसल, मीडिया को इन्हीं राज्यों से विज्ञापन मिलते हैं।  इन्हीं के सहारे मीडिया का पूरा खेल चलता है। साफ है कि मीडिया का यह हल्लाबोल बहुत हद तक अखिलेश सरकार पर ज्यादा केंद्रित है। इसके पीछे की पूरी राजनीति क्षेत्रीय दलों की राजनीति को निशाना बनाना और कांग्रेस और भाजपा की राजनीति को स्थापित करना भर है। संभव है कि अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी में हर तरह के दागदार लोग शामिल हों, लेकिन इस युवा मुख्यमंत्री की राजनीति को कलंकित करने में मीडिया की भूमिका सवालों के घेरे में है। यह बात इसलिए कही जा सकती है कि अगर इस देश के युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की राजनीति और सरकार ठीक नहीं है, तो फिर युवाओं की राजनीति पर भला कौन यकीन कर सकता है? युवाओं की नई केजरीवाल सरकार, युवा मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की सरकार, युवा मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की सरकार से लेकर राहुल समेत सैकड़ों उन युवाओं की राजनीति इच्छाओं का क्या होगा? जो भारत की राजनीति को बदलने के लिए आगे बढ़ते दिख रहे हैं।



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