Wednesday, February 26, 2014

सवधान !दलाल खड़ा है


                      अखिलेश अखिल
दलाल उस ब्यक्ति या संस्था को कहते हैं जो क्रेता और विक्रेता के बीच सौदा तय कराने में मदद करता है और जब सौदा पक्का हो जाता है तो इसके बदले में दलाल को दलाली या कमीशन  मिलती है। दलाल की असली परिभाषा तो यही है लेकिन अब इसका दायरा बढ गया है । समाजवादी नेता रधु ठाकुर कहते हैं कि ‘बदलते समाज में जन्म से लेकर मरने तक दलालों की भूमिका तय कर दी गई है। समाज का इब कोई ऐसा क्षेत्र नहीं हैें जहां दलाल सक्रिय न हों और हमारा पाला उससे न पड़ता हो। कभी कभी तो लगता है कि दलाल ही इस देश की सरकार को चला रहे हैं। दलाल ही अपनी मर्जी से समाज को संचालित कर रहे हैं । दलालों का कोई नैतिक शास्त्र भी नहीं है। इन्हें हर हालत में पैसे चाहिए। इनका गठजोड़ सबके साथ होता है।’ आजादी के बाद देश में जिने घपले घोटाले हुए हैं सबमें दलालों की भूमिका है। रक्षा विभाग से जुड़े हुए घोटालों की ही बात की जाए तो देश न सिर्फ दलालों के कारण न सिर्फ युद्ध के मोर्चै पर कई दफा कमजोर हुआ है वल्कि अब तक खरबों की राशि भी लुटाई है।  अहमदाबाद में रह रहे प्रख्यात सर्वोदयी महादेव विद्रोही कहते हैं कि ‘समाज में बिना काम किए ही सब कुछ पा जाने वाला आदमी ही दलाल है । पहले किसानों  और शादी विवाह तक ही दलालों की भूमिका थी लेकिन अब ऐसा नहीं है। इनका सरोकार हर जगह है। इसका मतलब है कि समाज पतन की ओर है । ऐसे लासेगों के बारे में न तो गांधी दर्शन में कोई स्थान है और न हीं सर्वोदय आंदोलन में। महान सर्वोदयी नेता दादा धर्माधिकारी कहते थे कि पुरोहित भगवान और भक्त के बीच एजेंट है। लेकिन अब तो पूरा समाज ही ऐसे एजेंट के जाल में है।  अर्थ के महत्व के साथ ही दलाल के महत्व भी बढते गए हैं। ’
       राजनीति का गलियारा हो या सरकारी महकमा,टिकट काउंटर हो या पासपोर्ट का दफ्तर,अस्पताल हो या स्कूल, रक्षा सौदा हो या गरीबों के लिए अनाज,जमीन का मसला हो या फिर काल गर्ल का धंधा, पुलिस स्टेशन हो रेलवे स्टेशन, शादी विवाह का मसला हो या फिर जातीय वोट पाने की रणनीति, आपको हर जगह सक्रिय मिलेंगे दलाल। दलालों की अपनी कोई न जाति होती है और न हीं नैतिकता। इनकी आंखों में पानी नहीं होता। जितने बड़े दलाल उतने बड़े निर्लज्ज। देश में महिलाओं को बेचने, उससे ध्ंाधा कराने से लेकर सत्ता की दलाली तक में उनके कौशल का बार बार देश लोहा मानता रहा है । देश में दलालों की संख्या कितनी होगी, यह कहना तो मुश्किल है लेकिन इतना तय मानिए कि देश में जितने सांसद और विधायक हैं, सब या तो दलाल के चक्रब्यूह में हैं या कुछ को छोड़कर अधिकतर किसी न किसी रूप में दलाली करते हैं। झारखंड के पलामू इलाके में गरीबों के बीच काम कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता ठाकुर प्रसाद कहते हैं कि ‘दलाल पहले भी थे लेकिन इधर ग्लोबलाइजेशन के बाद अब यह वर्ग हर क्षेत्र में दिखने लगा है । अब तो समाज का यही वर्ग निर्णायक भूमिका में है । योजना क्या बनेगी, मंत्री को क्या करना है, दाम क्या तय होगा अब यह सब दलाल ही तय कर रहे हैं । हालात को देखते हुए देश के प्रधानमंत्री और उसके मंत्रीमंडल को भी  इसी भूमिका में देखा जा सकता है। राज्यों में वहां की सरकार इसी भूमिका में है। अभी राज्य सभा चुनाव में जो बातें सामने आई हैं उससे तो लगता है कि दलाल ही देश को चला रहे हैं और हम उनके रहमो करम पर हैं। झारखं डमें तो सालाना 10 हजार करोड़ से ज्यादा की दलाली तो केवल कोयला में ही हो जाता है।’
            आइए दलालों की एक करतूत से आपको दर्शन कराते हैं। एक ताजा जानकारी के मुताबिक  पश्चिम बंगाल के  सुंदरवन डेल्टा क्षेत्र में पिछले एक साल के अंदर दलालों ने 14 हजार से ज्यादा बच्चों को अपने घर से बेघर कर उसे सदा के लिए अपने मां बाप से जुदा कर दिया है। अभी पिछले दिनों गृह राज्य मंत्री जब इस तथ्य को लोकसभा को बता रहे थे तो संसद आहें भर रही थी। सुंदरबन  के टापूओं के बीच स्थित संदेशखली गांव को दलालों का अडडा माना जाता है। तथ्य बता रहे हैं कि सिर्फ इस गांव के दलालों ने एक साल के भीतर 8 हजार लड़कियों और और 5 हजार से ज्यादा लड़कों को बेचने का रिर्काउ कायम किया है । सरकार इसके बाद क्या करेगी अभी कहना मुश्किल है, लेकिन जिस हरि नामक दलाल की यहां सालों से तूती बोलती है उसके जाल कई नेता से लेकर अधिकारी तक फैले हुए हैं ।  इसे आप एक छोटी बानगी से ज्यादा कुछ नहीं मान सकते। हम आपको दलालों के समाजशास्त्र से लेकर समाज के हर  क्षेत्र में इनकी धमक से परिचय कराऐंगे लेकिन सबसे दिल्ली पर एक नजर। देश में जो बेहयाई संस्कृति पनपी है, उसमें दलालों की भूमिका सबसे ज्यादा बढी है । दिल्ली की चमचमाती सड़कों, होटलों और सरकारी दफ्तरों के इर्द गिर्द ब्रीफकेस लेकर ब्यस्त और सफल दिख रहे लोगों की सच्चाई जानकर आप दंग हो जा सकते हैं । उस आदमी की सफलता के पीछे उसका न तो कोई बुद्धिबल होता है और न हीं बाहुबल। दरअसल वह आदमी दलाल होता है और उसका पेशा दलाली करना होता है । ये दलाल सभ्यता के लारटपकाउ विज्ञापनों की दुनिया के आधार पर इतिहास नहीं रच सकता, लेकिन यह शायद हमारी सभ्यता के सबसे प्रमाणित साक्ष्य हैं । खुदकिश्मती यह है कि जब इन्हें साक्ष्य की तरह देखा जाएगा तब शर्म से डूब मरने के लिए हम नहीं होगे।  बिहार के प्रख्यात सामाजिक कार्यकर्ता और आरटीआई एक्टिविस्ट शिवप्रकाश राय कहते हैं कि ‘दलाल को समाज ही बढावा देता है और राजनीति सबसे ज्यादा। नेता और नौकरशाह दलाल के माध्यम से देश को लूटते हैं।  दलालों को देश से कोई मतलब नहीं होता। यही वह वर्ग है जिससे देश को सबसे ज्यादा खतरा है।’ कहते हैं कि यह दिल्ली ही है जिसने यह दलाली प्रथा की शुरूआत की। हलाकि इसमें पूरी सच्चाई नही हो सकती है क्योंकि दलाली और दलाल की कहानी काल के हर खंड में, हर मानव सभ्यता में हमें अलग अलग रूपों में देखने को मिलता है। लेकिन इतना सही है कि दिल्ली में दलालों की अपनी जमात है और उसके ब्यापक नेटवर्क भी। मंत्री के दलाल, सांसद के दलाल , सरकार के दलाल, अस्पताल के दलाल, रक्षा सौदों के दलाल से लेकर मजदूरों के दलालों की सीख दिल्ली ने हीं  पूरे देश को दी है। देश के कई नामचीन पत्रकारों ने बिहार, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश और दिल्ली में जो कारनामें किए हैं उसे पूरा देश जानता है। इनकी चर्चा हम बाद में करेंगे।
    दिल्ली में जमीन की दलाली के बाद जो सबसे सहज दलाली का पेशा है वह है लड़कियों की दलाली।  यह बात और है कि लड़कियों की दलाली का इतिहास हमारे देश में काफी पुराना है।  मुगलिया सल्तनत के समय से ही दिल्ली इसकी प्रमुख अड्डा भी रहा है । यह सबसे ज्यादा माल कमाने वाला धंधा है । इज्जत बिके किसी और का और धन आए दलाल के पास । बिना मेहनत किए करोड़ों रूपए कमाने वालों की यहां लंबी फौज है।  दलालों के रूप में सक्रिय इन फौजों को आप भले ही लाइजनिंग अफसर,विचैलिया,प्रोपर्टी डीलर,सेवा अधिकारी,ब्रोकर, सट्टेबाज या कुछ और कहें लेकिन इनका असली नाम दलाल या दल्ला ही है। यह बात और है कि दल्ला कहे जाने पर इनको तकलीफ भी होती है। दिल्ली में राशन कार्ड बनवाने वाले अजय कुमार बदला हुआ नाम , कहते हैं ‘ लोग हमें दलाल कहते हैं हमें दुख होता है। हम तो उनकी सेवा करते हैं। कुछ पैसे लेकर हम आपका काम करा देते हैं आप परेशानी से बच जाते हैं लेकिन हम बदनाम होते हैं।  यह बात और है कि हमारा परिवार इसी से चलता है लेकिन दोष तो उन अफसरों का भी है जो आपको काम सीधे नहीं करते । दलाली के पैसों में उनके भी शेयर होते हैं। असली दोषी तो वही हैं।’ दलालों को समाज में सम्मान की नजरों से नहीं देखा जाता लेकिन यही दिल्ली है जहां सबसे पहले दलालों ने संगठन भी बनाया । दिल्ली के नौर्थ एवन्यू और साउथ एवन्यू में हमारे देश के अधिकतर सांसद रहते हैं।  पांच साल पहले इस इलाके में दलाली करने वाले 34 दलालों ने मिलकर एक संगठन बनाया । इस संगठन की हर रोज शाम को बैठके भी होती थी और दलाली के को कैसे आगे बढाया जाए, उसका निपटारा भी । इस संगठन से जुड़े एक दलाल ने इस संबाददाता को बताया  कि ‘ हम सांसदों के इलाके से आने वाले लोगों को फंसाते हैं और उसका काम कराने के बदले पैसा लेते हैं। कभी कभी सांसदों को भी इसकी जानकारी होती है । लेकिन पूर्व सांसद और पूर्व विधायकों द्वारा जब से यह काम किया जाने लगा है हम लोगों को परेशानी हाने लगी है। ’
        इन दलालों के रहन सहन, पहनावे ओढावे से आप सकते में पड़ सकते हैं। सूट बूट और टाई से लैश इन दलालों के फाइल और ब्रीफकेस म क्या होता है आप नहीं जानते। इनमें होते हैं दलाली के कागजात और नोटों के बंडल। देश, राष्ट्, समाज से इनका कोई लेना देना नहीं होता।इन्हें हर हाल में पैसे चाहिए। जिन्हें आप वोट देकर संसद से लेकर विधान सभा भेजते हैं चुनाव जीतने के बाद आपके और उस नेता के बीच में एक दलाल खड़ा हो जाता है और अगर वह नहीं चाहे तो आप अपने नेता से नहीं मिल सकते। यही हाल सभी सरकारी लोगों, उनके  दफ्तरों, से लेकर गैर सरकारी दफ्तरों तक का हाल है।  मामला कोयले की दलाली को हो या फिर अस्पताल में किसी मरीज को भर्ती कराने का, आपको दलालों से होकर गुजरना ही पड़ेगा।
   देश में  उदारीकरण की शुरूआत के बाद जिन उद्योग धंधों को गति मिली उसमें दलाली का धंधा भी एक हैं । ऐसा नहीं है कि इसकी शुरूआत इसी जमाने में हुई हो।इतिहास के विद्वानों का मानना है कि मनुष्य की सभ्यता के विकास के साथ ही दलालों का भी विकास हुआ।  दुनिया में दलाली प्रथा की शुरूआत कब से शुरू हुई,  इसका कोई ऐतिहासिक साक्ष्य तो मौजुद नहीं है, लेकिन भारत में प्राचीन काल से ही दलाली की प्रथा जीवंत रही है । ग्रामीण भारत के ऐतिहासिक  तह में जाएं तो किसानों के बीच इस प्रथा का चलन सबसे ज्यादा रहा है। गांव के  पशु हाट, बाजारों और मेलों में गाय, भैंस खरीदने में दलाल की भूमिका देश के हर कोने में दिखाई पड़ती है । इसके बाद शादी बिवाह के मामले में  भी दलाल प्राचीन काल से ही अपनी महता बनाए हुए हैं। गांव से बहते इस  यह धंधे को  शहरों तक आने में  भले ही कई सदियां लग गई हो लेकिन अब दलाली शहरी समाज के रगों में दौड़ रहा है। देश में दलाली कितने की होती है  इसका कोई प्रमाणिक आंकड़ा  इस देश के पास नहीं हैं। लेकिन गैरसरकारी आंकड़ों पर नजर डाले तो हर साल दलाली का ब्यापार ढाई लाख करोड़ से ज्यादा का हो रहा हैं । यह बात और है कि दलाली के इस पूरे खेल में बड़े बड़े दलाल शामिल हैं लेकिन देश के भीतर छोटे मोटे दलाली करने वालों की आय भी करोड़ों में हैं । दलाली के इस पवित्र धंधा में कौन शामिल है और कौन नहीं इस पर नजर डालें तो कई चैंकाने वाले तथ्य सामने आऐंगे। डाक्टर से लेकर वकील, नेता से लेकर अभिनेता, गायक से लेकर डांसर, पत्रकार से लेकर अफसर, पुलिस से लेकर मुखिया तक इस धंधे को आगे बढाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं।  जिसकी हाथ जब लगी, दलाली को अंजाम देने से नहीं चुके।
        राजीव गंाधी 1985 में प्रधानमंत्री बने पेप्सिको ने देश में धुसने की अनुमति मांगी।  जनता पार्टी की सरकार में उद्योग मंत्री रहते हुए जार्ज फर्नाडीस ने इसे देश से बाहर निकाल दिया था। राजीव के काल में पेप्सिको के आवेदन को कैबिनेट सचिव ने नामंजुर कर दिया था। पेप्सिकों ने इसके लिए दलाल को पकड़ा। उसने दक्षिण भारत में अरक किंग के नाम से मशहूर एक सांसद को अपने पाले में किया और सरकार पर दबाव देने का खेल शुरू कर दिया। पेप्सिको पंजाब के गुरूदासपुर में अपना प्लांट लगाना चाह रही थी। गुरूदासपुर के किसान इसका विरोध कर रहे थे। इधर संसद के भीतर और बाहर  दक्षिण के 40 सांसद पेप्सिकों के समर्थन में नारे लगा रहे थे। नजारा विचित्र था। पंजाब में विरोध और दक्षिण में समर्थन। अंत में पेप्सिको को मंजुरी मिली। कहते हैं कि इस खेल में दक्षिण के 40 सांसदों को कई सौ करोड़ दिए गए थे।
      राव के शासन काल में भी दलालों की भूमिका दिखी। सांसद घूस कांड को किन किन  दलाल पत्रकारों और नेताओं ने अंजाम दिया यह सब जानते हैं। राव शासन में पेटेंट बिल पर बहस चल रही थी। विपक्ष इस बिल के विरोध में थे। लेकिन जब संसद में बहस शुरू हुई तो संसद से कई वरिष्ठ नेता चंद्रशेखर, जार्ज और बाजपेयी बाहर निकल गए।मात्र दो मतों से संसद में पेटेंट बिल पास हो गया। इस घटना के दूसरे दिन अमेरिकी अखवार वाल स्ट्ीट जर्नल में दवा कंपनी ग्लैक्सों की तरफ से एक खबर छपी जिसमें कहा गया कि भारत में पेटेंट बिल पास कराने में उसने 600 करोड़ की दलाली दी। इस पर काफी हंगामा हुआ लेकिन कुछ हुआ नहीं। मध्यप्रदेश में दिलीप सिंह जुदेव और अजित जोगी कांड में दलालों ने जो भूमिका निभाई थी , उससे पूरा देश सकते में पड़ गया था।  जब केंद्र में एनडीए की सरकार थी,इसी मध्यप्रदेश में आठ सांसदों के बेटों ने एक ऐसा क्लव बना रखा था जहां से  संगठित रूप से दलाली को अंजाम दिया दिया जाता था। आठ सांसदों के पुत्र पहले मुर्गा फंसाते थे और अपने पिता के लेटरहेड पर संबंधित मंत्रालय को अनुमोदित करते थे। करोड़ें की कमाई इस संगठन ने की थी। बाद में इसका पर्दाफास हुआ लेकिन कार्रवाई कुछ भी नहीं हुई।      

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