Tuesday, February 4, 2014

संसद की नसबंदी

देश के नेता बेकाबू जनसंख्या को तो नियंत्रित नहीं कर सके, लेकिन जनप्रतिनिधियों की बढ़ती जरूरतों को जरूर समेट कर रख दिया। आजादी के 66 साल बाद भी हमारे सांसदों की संख्या में सिर्फ 54 की बढ़ोत्तरी हुई है, जबकि जनसंख्या में पांच गुना से भी अधिक की वृद्धि हो चुकी है। चीन जैसे कम्युनिष्ट देश में भी  प्रत्येक चार लाख की आबादी पर एक सांसद है, जबकि हमारे यहां 24 लाख की जनसंख्या पर एक सांसद है। यह जनता की उचित भागीदारी के अभाव में सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का दावा खोखला तो नहीं है। जानने के लिए पढ़िए, अखिलेश अखिल की खास रिपोर्ट...

  पिछले साल के अंतिम महीनों में झारखंड की राजनीति में एक नया तूफान आया। तमाम विरोधी पार्टियों ने अपने-अपने तरीके से केंद्र सरकार की नीतियों को गलत बताया और कहा कि झारखंड के कुशासन के लिए अगर कोई जिम्मेदार है, तो है केंद्र सरकार की वह नीति, जिसके तहत राज्य बनने के बाद भी यहां के विधानसभा को विस्तारित नहीं किया। राज्य विधानसभा में सदस्यों की संख्या 81 है, जो आबादी के हिसाब से बहुत ही कम है। यही कमी सरकार बनाने और बिगाड़ने के लिए जिम्मेदार है। लगभग सभी विरोधी दलों ने इस तरह के बयान दिए और केंद्र सरकार से यहां जल्द सीटों की संख्या बढ़ाने की मांग की। भाजपा के वरिष्ठ नेता यशवंत सिन्हा का कहना है कि झारखंड में सीटों की संख्या जब तक 81 से बढ़ाया नहीं जाता, तब तक न तो किसी एक पार्टी की सरकार बन सकती है और न ही यहां का राजनीतिक संकट दूर हो सकता है। सीटों की कमी की वजह से ही राज्य बनने के बाद से ही घालमेल की सरकार बनती रही है, जिससे राज्य का विकास अवरोधित हो जाता है। ऐसा ही माहौल उत्तराखंड और छत्तीसगढ़ का भी है। इन राज्यों में राजनीतिक संकट तभी दूर होगा, जब यहां के विधानसभाओं की सीटें बढेÞंगी। लेकिन सवाल यह है कि केंद्र सरकार का गृहमंत्रालय इस मसले पर चुप्प क्यों है? जब सारे मर्ज की दवा हमारे संविधान में ही है, तो राजनीतिक संकट क्यों? कह सकते हैं कि अब तक देश की राजनीति संकट के लिए ही होती रही है। संकट दूर हो जाए, तो फिर राजनीति किस बात की?
          देश की राजनीति ने संसद और विधानसभा के सीटों की 2026 तक नसबंदी कर दी है। संभव है कि इस सवाल से आप परेशान हो गए हों, लेकिन सच्चाई यही है कि मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था ने अपने स्वार्थ के लिए लोकतंत्र का ऐसा ताना- बाना खड़ा किया है कि देश और सरकार से जनता का जुड़ाव न हो और न ही नेता व सांसद से। लगता है कि इस सबके पीछे की राजनीति यह है कि नेता भी अपने अंदाज में देश को लूटते रहे और सरकार बनाने और बिगाड़ने का खेल करते रहे। यह बात इसलिए कही जा रही है कि 15 अप्रैल 1952 को हमारे देश में प्रथम लोकसभा का गठन हुआ था। उस समय हमारी संसद में सदस्यों की संख्या 489 थी,  तब देश में करीब 17 करोड़ मतदाता थे। 2009 में संसद में सदस्यों की संख्या बढ़कर 543 हो गई। यानी 57 साल में 54 सदस्यों की बढ़ोतरी। 1952 में मतदाताओं की संख्या जहां 17 करोड़ थी, वहीं 2009 में मतदाताओं की संख्या 72 करोड़ हो गई थी। उधर, चीन में 1954 में नेशनल पीपुल्स कांग्रेस का गठन हुआ। हमारे देश से ठीक दो साल बाद। चीन में तब संसद सदस्यों की संख्या 1226 थी। आज चीन की आबादी एक अरब 35 करोड़ के आसपास है और भारत की आबादी एक अरब 27 करोड़ है। आज की तारीख में चीनी संसद में सदस्यों की संख्या 1226 से बढ़कर 2987 हो गई है, जबकि भारत में संसद सदस्यों की संख्या 489 से बढ़कर केवल 543 ही हो पाई है। आज की तारीख में चीन की आबादी हमसे मात्र 10 करोड़ ज्यादा है, जबकि वहां सांसद सदस्यों की संख्या भारत से 2444 ज्यादा है। इन आंकड़ों से साफ हो जाता है कि चीन में भारत से ज्यादा बेहतर लोकतंत्र है। वहां की जनता अपने नेताओं के ज्यादा नजदीक भी है। चीन में लगभग चार लाख की आबादी पर एक सांसद है, जबकि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र कहे जाने वाले भारत में करीब 24 लाख पर एक सांसद है। जाहिर है कि जनता का अधिक प्रतिनिधित्व करने वाला देश भारत नहीं, चीन है। यही हाल भारत के विधानसभाओं की भी है। आजादी के बाद देश में कई राज्य बने। सरकारें बनीं, लेकिन केंद्रीय राजनीति में उनकी भूमिका न के बराबर रखी गई। कई राज्य कहने के लिए अपनी सरकार बनाते हैं, लेकिन उनके हिस्से एक या दो सांसदों को जिताने की ही जिम्मेदारी दी गई है। आइए, इस खेल की पूरी जानकारी आपके सामने रखते हैं, लेकिन पहले कुछ आंकडेÞ आपके सामने पेश है-
           जरा दुनिया के सबसे बड़े तथाकथित लोकतंत्र भारत से संबंधित इस आंकड़े को देखिए। झारखंड की आबादी कोई साढेÞ तीन करोड़ और विधानसभा में सीटों की संख्या कुल 81, हरियाणा की आबादी लगभग तीन करोड़ और 90 सदस्यों की विधानसभा, छत्तीसगढ़ की आबादी भी लगभग 2 करोड़ 55 लाख और 90 सदस्यीय विधानसभा। इसी तरह नागालैंड की आबादी 20 लाख और सांसद एक। मेघालय की आबादी 30 लाख और सांसद दो। त्रिपुरा की आबादी 36 लाख और सांसद दो। उत्तराखंड की आबादी एक करोड़ से ज्यादा और सांसद 5। थोड़ा केंद्र शासित प्रदेश को भी देख लें। अंडमान निकोबार की आबादी 38 लाख और सांसद एक। चंडीगढ़ की आबादी लगभग 11 लाख और सांसद एक। लक्षद्वीप की आबादी 65 हजार और सांसद एक।
  दमन दीव की आबादी लगभग ढाई लाख और सांसद एक। कुल मिलाकर 2011 की   जनगणना के मुताबिक देश की कुल आबादी एक अरब 21 करोड़ और संसद में कुल सदस्यों की संख्या 543। यानी औसतन एक सांसद के अंदर 23 लाख 30 हजार की आबादी। इन आंकड़ों को देखकर क्या यह कहा जा सकता है कि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कहलाने वाला भारत जनता के नजदीक है? क्या इन आंकड़ों के दम पर यह कहा जा सकता है कि एक सांसद इतनी बड़ी आबादी की समस्याओं को समझ और देख सकता है? क्या यह संभव है कि एक सांसद इतनी आबादी वाले क्षेत्र के सभी लोगों से मिल सकते हैं या फिर क्षेत्र के लोग अपने सांसद से अपना दुखड़ा कह सकते हैं? इससे जुड़े हुए कई और सवाल उठ सकते हैं, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि आजादी के 66 साल बाद देश की आबादी लगभग सवा सौ करोड़ हो जाने के बाद भी हम मात्र 543 सांसदों या जनप्रतिनिधियों के जरिए देश को चलाने का दम भरते आ रहे हैं। देश के भीतर तमाम तरह की विषमताओं, अलगाववाद, नक्सलवाद, क्षेत्रीय असमानताएं हैं। इस बहुदलीय देश में इतनी कम संसदीय सीटों की वजह से सरकार बनाने में जोड़-तोड़ की राजनीति के बावजूद सरकार संसद और विधानसभा सीटों को बढ़ाने में विफल रही है। 2003 में एक कानून के जरिये राजग सरकार ने साफ किया था कि 2026 तक संसद और विधानसभा की सीटें नहीं बढेंÞगी, चाहे देश की आबादी कितनी भी क्यों न हो जाए? सरकार के इस कानून को देखकर कहा जा सकता है कि देश की तमाम राजनीतिक पार्टियों ने आपस में मिलकर संसद और विधानसभा सीटों की नसबंदी कर दी है। सवाल है कि भारत में एक सांसद भीड़तंत्र का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं या फिर जनता का? जनता का प्रतिनिधि जनता के बीच होता है और जनता के लिए काम करता है, लेकिन 24 लाख की औसत आबादी को देखने वाले सांसद से यह अपेक्षा की जा सकती है कि वह अपनी जनता की समस्याओं को ठीक से देख सके? क्या कोई जनता यह दावे के साथ कह सकती है कि वह अपने सांसद से मिलकर अपनी बात कह सकेगा? क्या इलाके की सभी जनता अपने सांसद को पहचान सकती है?
   ऐसा नहीं है कि भारत की हालत चीन से ही खराब है। हमसे ज्यादा लोकतांत्रिक देश तो वह जर्मनी है, जहां की आबादी सिर्फ 8 करोड़ है, लेकिन उसके सदन ‘बुंडेस्टाग’ की सदस्य संख्या 631 है। साफ है कि जर्मनी में एक सांसद करीब एक लाख तैंतीस हजार की आबादी का प्रतिनिधित्व करता है और जर्मन सांसद जनता के प्रति ज्यादा उत्तरदायी हैं। वहां का एक सांसद अपने इलाके के सभी लोगों को जानता है। वहां की सभी समस्याओं से अवगत भी रहता है। प्रख्यात सामाजिक कार्यकर्ता ठाकुर प्रसाद कहते हैं कि आजादी के बाद से ही इस देश के साथ नेताओं ने छल किया है। हम लोकतंत्र की बात करते नहीं थकते, लेकिन असली लोकतंत्र तो तभी होगा, जब अधिक से अधिक लोगों की सहभागिता शासन और सरकार में होगी। लेकिन यहां ऐसा नहीं है। लाखों की आबादी को एक सांसद देखता है, जो सांसद अपने लोगों की समस्याओं को ही नहीं समझ पाए और जनता अपने नेता से नहीं मिल पाए। ऐसे में लोकतंत्र की सारी कहानी गलत साबित होने लगती है। दुनिया के कई देश हैं, जहां हमसे बेहतर लोकतांत्रिक प्रणाली है। उस तंत्र में जनता की भागीदारी ज्यादा है। अधिक से अधिक लोग जनप्रतिनिधित्व के काम में लगे हंै। आज सबसे जरूरी है कि संसद और विधानसभाओं की सीटें बढ़ाई जाएं, ताकि लोकतंत्र और ज्यादा मजबूत हो सके और लोगों की भागीदारी भी बढ़ सके।
  दिसंबर 2003 में संसद में 91वां संशोधन विधेयक पास किया गया। इस विधेयक  में कहा गया कि केंद्र और राज्य सरकारें सदन में कुल सदस्य-संख्या की पंद्रह प्रतिशत सीटें मंत्रिपरिषद के लिए आवंटित कर सकती हैं। तब से इसका पालन भी हो रहा है। इससे पहले मनमुताबिक मंत्री बनाए जाते थे और सबको खुश करने की कोशिश की जाती थी, लेकिन इस विधेयक के बाद मंत्रिपरिषद की सीमा तय कर दी गई। लेकिन इसी विधेयक में एक प्रस्ताव यह था कि 2026 तक लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की सीटें नहीं बढ़ाई जाएंगी। उस समय केंद्र में एनडीए की सरकार थी, लेकिन 2004 में यूपीए की सरकार आने के बावजूद, इस खेल को कांग्रेस ने भी आगे नहीं बढ़ाया। यह जनप्रतिनिधित्व को सीमित बनाए रखने का कुचक्र नहीं तो और क्या है? लोकसभा और विधानसभाओं में सीटों के परिसीमन के लिए 1952, 1962, 1972 और 2002 में समितियां बनाई गई थीं। लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों का मौजूदा परिसीमन 2001 में हुई जनगणना के आधार पर है।
  जुलाई 2002 में सर्वोच्च न्यायालय के अवकाशप्राप्त न्यायाधीश कुलदीप सिंह की अध्यक्षता में बनी परिसीमन समिति की रिपोर्ट को मील का पत्थर मान लिया गया। इसे स्वीकार कर लिया गया कि 2026 के बाद जब जनगणना होगी, तब नए निर्वाचन क्षेत्र बनाए जाएंगे। लेकिन जनगणना तो उसके पांच साल बाद, 2031 में होगी। जाहिर है कि संसद और विधानसभाओं की सीटें अब 2031 के बाद ही बढ़ सकेंगी। गांधी के नाम की राजनीति देश में खूब होती है, लेकिन विकेंद्रीकरण की नीति को अब तक हम अपनाने से बचते रहे हैं। आज इसके दुष्परिणामों को देश की जनता भुगत रही है। कांग्रेस नेता और ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश कहते हैं कि ‘ समय बदल गया है। जब तक आबादी के अनुसार सीटों की संख्या नहीं बढ़ेगी, देश में राजनीतिक संकट बना रहेगा। जनता का शासन तभी संभव है, जब अधिक से अधिक लोग संसद और विधानसभाओं में जीत कर   आएंगे। तभी सच्चा लोकतंत्र सामने आएगा। हालांकि जयराम रमेश ने यह बातें झारखंड की राजनीति के मद्देनजर कही है, लेकिन इसे पूरी संसदीय व्यवस्था के लिए एक जायज मांग के रूप में देखा जाना चाहिए।

        जरा इस तालिका को देखिए। इस तालिका से साफ हो जाता है कि देश में लोकसभा और विधानसभा की सीटें राज्यों के लिए जो तय की गई है। आबादी के हिसाब से कितनी न्यायसंगत है? फिर ऐसे राज्यों की भी यहां सूची दर्ज है, जो कहने के लिए एक राज्य है, लेकिन संसद में उनका प्रतिनिधित्व न के बराबर है। इसलिए जरूरी इस बात की है कि देश की समस्याओं के निदान और लोकतंत्र को और अधिक मजबूत करने के लिए संसद और विधानसभाओं की सीटें जल्द बढ़ाई जाए। सरकार के लोगों को 2026 तक की संसदीय सीटों की बढ़ोतरी पर लगी रोक को खत्म कर मजबूत लोकतंत्र के रूप में सामने लाने की ओर काम करने की जरूरत है।

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