Wednesday, February 26, 2014

फांसी में आरक्षण


                  अखिलेश अखिल
 अब तक का ऐतिहासिक सत्य ये है कि इस देश में आजादी के बाद जितने लोगों को फंसी की सजा दी गई है उनमें कुछेक मामलों को हटा दे ंतो अधिकतर फंासी की सजा पाने वालों में दलित, पिछड़े, जनजाति और अल्पसंख्यक समाज के लोग ही शामिल रहे हैं । खासकर बिहार जैसे राज्य के जेलों में बंद फांसी की सजा पाने वाले लोगों की सूची को गौर से देखें तो कहा जा सकता है कि फांसी की सजा समाज के गरीब और दलितों के लिए ही मुकर्रर की दी गई है । लगता है इन वर्गोंं के लिए फांसी में 100 फीसदी का आरक्षण है।  हम इस मसले पर विस्तार से चर्चा करेंगे लेकिन इससे पहले देश की राजनीति पर एक नजर।
      समाज बांटों और राजनीति करो। अब तक देश में ऐसा ही होता आ रहा है। जाति को उभारो और वोट बनाओ। आरक्षण की राजनीति करो और चुनाव में कूद पड़ो। कुछ न कुछ तो मिलेगा ही। इस बार नहीं मिला तो आगे मिलेगा। देश में राजनीति करने की यह एक बड़ा अस्त्र होते जा रहा है। 90 के बाद आरक्षण की राजनीति आगे बढ़ी तो कई राज्यों में क्षत्रपों का जन्म हुआ। उनकी राजनीति भी चल निकली। चुनाव फिर सामने है और आरक्षण की राजनीति फिर कुंलाचे पार रही है।  कोई महिला आरक्षण को लेकर हंगामा करने की तैयारी कर रहा है तो कोई मुसलमानों को सचचर कमेटी के अनुसार आरक्षण देने की तैयारी में जुटा हुआ है। कोई सवर्णों को रिझाने के लिए सवर्ण आयोग  बना रहा है तो कोई जाटों के आरक्षण  से लेकर तमाम क्षेत्रों में आरक्षण देने के मसले पर राजनीतिक तैयारी कर रहा है।  अब आर्थिक मसले पर आरक्षण देने की बात भी सामने आ गई है। चुनाव सामने है और वोट के लिए चाहे देश भार में ही क्यों न चला जाए आरक्षण जरूरी है। लेकिन हम यहां एक ऐसे अनहोनी आरक्षण केी बात कर रहे हैं जहां सौ फीसदी आरक्षण पहले से ही जारी है और इस आरक्षण को लेकर किसी के मन में कोई टिस नही है। चूकि मामला वोट का नही है इसलिए जानते हुए भी इस आरक्षण के तरफ से हमारे नीति निर्माताओं ने अपनी आंखें फेर रखी है। यह आरक्षण है फांसी का।  आपको बता दें कि देश के इतिहास को देखें तो आजादी के बाद अब तक जितने लोगों को फांसी की सजा दी गई है उनमें  कुछ मामलों को छोड़कर अधिकतर फांसी की सजा दलितों, पिछड़ी जातियों,जनजातियों और अल्पसंख्यकों को ही दी गई है। देश की कोई भी राजनीतिक पार्टी इस आरक्षण को बांटने की कोशिश नहीं की है। चूकि यह राजनीतिक मुद्दा नही  है  इसलिए कोई भी राजनीतिक दल इस मसले पर बोलने को तैयार नहीं हैं ।  लेकिन जनता की आवाज को बुलंद करने वाले भला कैसे चुप रह सकते हैं? मानवाधिकार कार्यकर्ता प्रभात कुमार शांडिल्य गोबर्धन पर्वत की तरह इस सामाजिक मुद्दे को अकेले अपने सिर पर लेकर देशब्यापी अलख जगाने में लगे हुए हैं।
भारतीय कानून प्रक्रिया में  हत्यारों और जघन्य अपराध करने वालों के लिए फांसी की सजा मुकर्रर की गई है । अंग्रेजों का बनाया यह कानून आज भी हमारे देश में जारी है। यह बात ओर है कि  अंग्रेजों के जमाने में सभी भारतीय  एक ही तराजू पर तौले जाते थे। इतना जरूर था कि अ्रग्रेजों के जमाने में  अभियुक्तों को संदेह का लाभ देकर मामले से बड़ी कर देने , रिहा कर देने या कम अथवा हल्की सजा देने जैसी बेइमानी की जाती थी और गुलाम भारतीयों की मजबूरी थी कि वे इस प्रकार के नाइंसाफी के खिलाफ किसी तरह की आवाज नही उठा पाते थे। किंतु  आजादी के बाद स्थिति बदल गई। जिस प्रकार का नाजायज लाभ अंग्रेजों को मिला करता था , अब उस पर सवर्णों का एकाधिकार हो गया है। यह बात इसलिए कही जा रही है कि आजादी के बाद बिहार समेत पूरे देश में फांसी की सजा पाने वालों दो चार मामले  को छोड़  दिए जाएं तो  जो तस्वीर सामने आती है आंखें खोलने वाली है। बिहार के जेलों में 2 साल पहले तक  69 ऐसे कैदी बंद थे जिन्हें विभिन्न अदालतों ने फांसी की सजा दे रखी है।  फांसी की सजा पाए ये सभी लोग दलित, पिछड़ी, जनजाति और अल्पसंख्यक समुदाय से आते हैं। लेकिन पहले हम आपको ले चलते हैं भागलपुर केंद्रीय जेल जहां फांसी की सजा पाए 36 लोग मौत का इंतजार कर रहे हैं।  इनके बारे में आगे हम चर्चा करेंगे और कानून की राय भी जानेंगे लेकिन सबसे पहले इनकी सूची पर एक नजर-
नाम                जाति                    रहनेवाले
हरिबल्लभ सिह       यादव                    मधेपुरा
भूमि मंडल            यादव                    मधेपुरा
विनोद मंडल        यादव                      मधेपुरा
चंद्रदेव मंडल         यादव                     मधेपुरा
अर्जुन भुनी            पिछड़ी जाति             मधेपुरा
दुखो शर्मा              हजाम                 मधेपुरा
जगवीण सहनी          मलाह                 मधेपुरा
शिवेश मंडल             यादव               मधेपुरा
वैद्नाथ शमा्र                 हजाम           मधेपुरा
बिंदेश्वरी मंडल              यादव             मधेपुरा
उपेंद्र मंडल                 यादव             मधेपुरा
जालिम मंडल                यादव            मधेपुरा
फूनो शाह                  मुसलमान         समस्तीपुर
मो0 एहसान शाह            मु0             समस्तीपुर
रामसमुन तहतो              पिछडी जाति      समस्तीपुर
सिधेसर राय                यादव           समस्तीपुर
विनोद प्रसाद                पिछडी जाति      समस्तीपुर
मिथिलेश ठाकुर               हजाम           समस्तीपुर
मनोज राय                    यादव          समस्तीपुर
रघुनाथ सहनी                  मल्लाह       समस्तीपुर
अशोक कुमार गुप्ता             बनिया        समस्तीपुर
प्रभात कुमार राय              यादव          समस्तीपुर
महेंद्र यादव                   यादव         भागलपुर
दुर्गा मंडल                 पिछडी जाति     भागलपुर
शमशूल                      मुसलमान       भागलपुर
मनोज सिंह                 पिछडी जाति       गया
बीर कुंर पासवान                दुसाध          गया
कृष्णा मोची                     चमार          गया
नंदलाल मोची                   चमार           गया
धमेंद्र सिंह                       दुसाध          गया
शोभित चमार                    चमार          रोहतास
करे सिंह                                      बेगुसराय
नरेश यादव                      यादव          गोड्डा
मोे0 गयासुदीन                      मु0         भोजपुर
नौशाद आलम                      मु0           अररिया
...................................................................................................................................
   भागलपुर जेल में बंदी बना कर रखे गए ये सभी फांसी की सजा पाए लोग गरीब और भूमिहीन है।ये देश के आयकर दाता में शामिल नहीं है। इनके घर की हालत आप देखें तो इनके पास न खाने को अनाज है और न ही पीन को पानी। तन ढकने के लिए कपड़े की ब्यवस्था भी इनके घर वाले नहीं कर पाते । न इनके पास राशन कार्ड है और न ही किसी पार्टी के लोगों को चंदा देने की स्थिति में हैं।  इनमें से कइयों के नाम न तो मतदाता सूची में है न ही कइयों ने कभी मतदान किया है।  इनमें केवल पांच वीर कुंवर पासवान,कृष्णा मोची,नंदलाल मोची,धमेंग्र सिंह, और शोभित चमार की फांसी की सजा को सुप्रीम कोर्ट ने भी बहाल रखा है। इनमें से कइयों ने दया याचिका के लिए राष्ट्पति से भी फरियाद कर रखी है। लेकिन पिछले दिनों एक चैंकाने वाली खबरें भी सामने आई। बिहार में फांसी की सजा पाए जिन लोगों ने दया याचिका की गुहार लगाई है उनके बारे में न तो राज्य सरकार को कोई जानकारी है और न ही केंद्र सरकार को।  पहले चार कैदियों को गया टाडा कोर्ट ने तथा पांचवें अभियुक्त को रोहतास जिले की अदालत ने फांसी की सजा दी है। अन्य 31 के मामले उच्च न्यायालय और सुप्रीम कोर्ट में पुष्टि के लिए लंबित है। फांसी की सजा पाए कुल 69 कैदियों में से 67 ऐसे हैं जो अनुसूचित जातियों,जनजातियों, अन्य पिछड़ी जातियोंसे आते हैं या धार्मिक, भाषाई या क्षेत्रीय  अल्पसंख्यक की श्रेणी से आते हैं।  फांसी की सजा पाण् ये वे लोग जिनका मुकदमा लड़ने के लिए पैसे के अभाव में सही वकील नहीं मिल सके । लगता है कि फांसी की सजा में इन समुदायों को शत प्रतिशत आरक्षण मिला हुआ है।  भले ही यह आरक्षण अघोषित और अलिखित हो तथा कतिपय पूर्वाग्रहों एवं परम्पराओं से प्रेरित हों। और हां देश के दूसरे राज्यों की स्थिति कोई अलग हो यह बात भी नहीं है।
       आगे बढें,  इससे पहले  आपको बता दें कि आजाद भारत में 58 से ज्यादा  लोगों को अबतक फांसी पर लटकाया गया है।  सबसे ताजा घटना है अफजल गुरू को। इससे पहले 14 अगस्त 2204 को पश्चिम बंगाल की अलीपुर सेंट्ल जेल में हत्या और बलात्कार के आरोपी धनंजय चटर्जी को फांसी दी गई थी। इसके बाद अभी तक किसी को फांसी की सजा नहीं मिली है । इसके पहले बंगाल में ही 1993 में कार्तिक शील सुकुमार बर्मन को हत्या के मामले में फांसी दी गई थी ।बिहार में 1995 में सुरेशचंद्र नामक ब्यक्ति को फांसी दी गई थी । इंदिरा गांधी के हत्यारे सतवंत सिंह और केहर सिंह को 6 जनवरी 1989 को फांसी दी गई थी।  दिल्ली में संजय चोपड़ा और गीता चोपड़ा भाई बहन के हत्यारे  रंगा और बिल्ला को शूली पर चढाया गया था ।1983 में पंजाब में मच्छी सिंह, कश्मीर सिंह और जागीर सिंह को हम्या के मामले में फांसी दी गई थी ।असम में अनिल फूकन को फांसी मिली थी ।दक्षिण भारत के सिरियल किलर शंकर पिल्लई को फांसी दी गई ।आंध्रा में किष्टा गौड़ और भूमैयया नक्सली को फांसर मिली ।दोनेा आदिवासी थे । महात्मा गांधी के हत्यारे नाथुराम गोडसे तथा नारायण दत्तात्रेय आप्टे  को 15 नवंबर 1949 को पंजाब के अंबाला जेल में फांसी दी गई। ये दोनों आदिवासी,अछूत और अल्पसंख्यक नहीं थे। इसे अपवाद आप कह सकते हैं। इसी श्रेणी में धनंजय चटर्जी के मामले को आप रख सकते हैं।
       अब जरा नए मुकदमों पर नजर डाले । राजीव गांधी के हत्यारे जेल में है। अभी हाल में ही  इन आपराधियों की मौत की सजा को सुप्रीम कोर्ट ने आजीवन कारावास में बदल दिया है। इस आजीवन कारावास की सजा को अब तमिलनाडू की जयललिता सरकार रिहाई में बदलने की तैयारी में है। यह बात और है कि अभी सुप्रीम कोर्ट ने राजीव गांधी के हत्यारे की रिहाई पर रोक लगा दी है लेकिन यह भी यह रोक कब तक बरकरार रहती है इस पर आगे की राजनीति टिकी हुई है। असम का दास मामला और भुल्लर का मसला भी निपट गया है। दोनों को उम्र कैद की सजा हो गई है। ये तमाम मामले राजनीति से प्रेरित हैं । मामला इतना ही नहीं है। कुछ मामले तो ऐसे हैं जिनमें जुर्म एक है और सजा अलग अलग । बिहार के जेलों में बंद उम्रकैदियों और फांसी की सजा पाए लोगों का अध्ययन करें तो आपको यकीन हो जाएगा कि गरीबों के साथ क्या होता है? उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने निचली अदालत की फांसी के फैसले को सही ठहराया था ।निचली अदालत ने हत्या के जुर्म में जीता सिंह, कश्मीरा सिंह और हरबंश सिंह को फांसी की सजा दी थी ।महामहिम से भी क्षमादान नही मिला । फांसी की तिथि, स्थान और समय निश्चित हो गया ।निर्धरित समय पर केवल जीता सिंह को फांसी पर लटकाया गया ।शेष दो अभियुक्तों को किसी कारण से उस समय फांसी नही दी गई । दोनों अभियुक्तों ने एक बार फिर पनुर्विचार याचिका दायर की। कश्मीरा सिंह की फांसी की सजा को उम्र कैद में बदल दिया गया और हरबंश सिंह को क्षमा देकर मुक्त कर दिया गया।  दोष एक सजा एक किन्तु क्रियान्वयन में तीन तरह के ब्यवहार । यह प्र्याप्त आधार बनता है कि न्याय की तराजू में सब कुछ ठीक ठाक नही है।  इसी मसले पर सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रह चुके पी एन भगवती ने कहा था कि - ‘दीस इज ए क्लासिक केस,व्हिच इलेस्ट्ेटस दि जुडिशियल बेगरीज इन द इंपोजिशन आफ  डेथ पेनाल्टी।  अर्थात मृत्युदंड दिए जाने के मामले में कानूनी अहं को प्रदर्शित करने का यह शास्त्रीय उदाहरण है ’।
      देश में मृत्युदंड के विरोध में अब आवाजें उठने लगी है। 2005 में अपना पद भर ग्रहण के पहले ही  सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश वाई के सब्बरवाल ने मृत्युदंड को भारतीय दंडसंहिता से हटाने की बात कही थी । इसे उन्हांेने सामाजिक और राजनैतिक मामला बताते हुए कहा था कि   इसके लिए भारतीय संसद ही सक्षम है  और उसे यह तय करना होगा कि मृत्युदंड के प्रावधान को भारतीय दंड संहिता में रखा जाए या उसे हटाया जाए । वरिष्ठ वकील एस नारीमन का मानना है कि मृत्युदंड को समाप्त किया जाना चाहिए । इस पर ज्यादा राजनीति करने की जरूरत नही है । लेकिन सबसे बड़ी बात पूर्व राष्ट्पति कलाम की है। कलाम ने गरीब, असहाय और बूढे लोगों की फांसी सजा को कम करने की बात सरकार से कही थी। यह कोई मामूली बात नही है। और इसका श्रेय भी प्रभात शांडिल्य को ही  दिया जा सकता है।
         देश की संसद को अब यह तय करना है कि जो संसद देश के गरीबों, आदिवासियों  और अल्पसंख्यकों  को  लेकर आए दिन कानून बना रही है और उनकी हिफाजत के लिए योजना पर योजन बना रही है उनकी100 फीसदी  फांसी की सजा पर गंभीरता से सोचें। हालाकि यह आसान काम नही है लेकिन  इस पर पहल तो की ही जा सकती है ।  और जिन दलितों और पिछड़ों  आदिवासियों को फांसी के नाम पर सजा मिली हुई है उस मामले को गंभीरता से परखने की भी जरूरत है । मानवाधिकार कार्यकर्ता प्रभात शांडिल्य कहते हैं कि ‘ अब समय आ गया है कि देश से फांसी की सजा समाप्त हो जाएगी। जिस तरह से फासंी की सजा के विरोध में लोग जागरूक हो रहे है ऐसे में अब इस तरह की सजा पर रोक लग जाएगी और लगनी भी चाहिए।  राजीव के हत्यारे की सजा पर जिस तरह की राजनीति शुरू हुई है इसके पीछे राजनीति चाहे जिस तरह की हो लेकिन इतना तय है कि फासंी की सजा की कहानी ज्यादा दिनों तक नहीं चलेगी।’ कवि दुष्यंत ने ठीक ही कहा था कौन कहता है आसमान में सुराख नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारो। देश का कानून अब इस मसले पर आगे क्या कुछ करता है उसे देखना होगा लेकिन अगर धीरे धीरे फांसी की सजा पर रोक लग जाती है तो गरीबों का बड़ा कल्याण होगा।
       

No comments:

Post a Comment