Wednesday, February 19, 2014

मुनिलाल रोकेंगे मीरा की राह!

बिहार में इन दिनों दो खबरें छाई हुई हैं। एक खबर तो यह है कि इस बार के लोकसभा चुनाव में बिहार से आधा दर्जन नौकरशाह राजनीति में उतर रहे हैं, दूसरी यह कि लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार की सासाराम सीट पर घमासान होने वाला है।  एक तरफ मीरा कुमार और दूसरी तरफ तमाम विरोधी पार्टियों के नेता...
लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार इस बार चुनावी मुश्किल में फंसती जा रही हैं। उनके संसदीय क्षेत्र सासाराम में इस बार कई अन्य नौकरशाह उतर रहे हैं और मीरा कुमार को पानी पीलाने की तैयारी भी कर रहे हैं। सबसे पहले रिटायर आईएएस अधिकारी पंचम लाल सासाराम लोकसभा सीट पर मीरा कुमार का रास्ता रोकेंगे। सूत्रों के मुताबिक, यहां से भाजपा पंचम लाल को अपना उम्मीदवार बना सकती है और लगभग पंचम के नाम पर मुहर भी लग चुकी है। पंचम, बिहार कैडर से मुख्य सचिव स्तर के पद से रिटायर हुए हैं। उनकी गिनती कड़क अधिकारियों में होती रही है। राजनेताओं से भिड़ने में उन्हें महारत हासिल है। जब तक सेवा में रहे राजनीति करने वाले उनके नाम से पानी पीते रहे। प्रदेश के कई नेता उनके निशाने पर रहे और परेशान भी रहे। सेवा के अंतिम दिनों में सरकार ने इनके नाम की सिफारिश केंद्रीय सतर्कता आयोग के आयुक्त के लिए की थी, लेकिन बात नहीं बनी। कई नेताओं ने इसका विरोध भी किया। इधर, भाजपा में पूर्व केंद्रीय मंत्री मुनिलाल भी सासाराम से टिकट के प्रमुख दावेदारों में से एक हैं। मुनिलाल आईएएस अधिकारी रहे हैं।  रिटायरमेंट के बाद वह सासाराम से लोकसभा का चुनाव लड़े और अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में मंत्री भी बने। लेकिन अब उनकी वह हैसियत नहीं रह गई है।  देखना होगा कि पंचम और मुनीलाल में किसका पलड़ा भारी पड़ता है और भाजपा किस पर ज्यादा यकीन करती है।
      आईएएस अधिकारी पंचम के अतिरिक्त सासाराम से एक और आईएएस अधिकारी उम्मीदवार बनने की तैयारी में हैं। बिहार कैडर के आईएएस और सरकार के महादलित कंसेप्ट को जमीन पर उतारने वाले केपी रमैया को नीतीश कुमार  सासाराम से अपना उम्मीदवार बनाने जा रहे हैं। रमैया अभी सरकारी सेवा में हैं और  उन्होंने 28 फरवरी के प्रभाव से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति का आवेदन दिया है। ध्यान रहे कि रमैया मगध रेंज के दो बार कमिश्नर रह चुके हैं और उन्हें भरोसा है कि वहां के लोगों पर उनका खासा प्रभाव है। जदयू के एक सासंद ने कहा है कि रमैया को उम्मीदवार बनाए जाने को लेकर जदयू के भीतर सहमति बन चुकी है। रणनीति यह है कि रमैया को किसी भी तरह से सासाराम से चुनाव मैदान में उतारना है और मीरा कुमार की राजनीति को रोकना है। हालांकि, इस संबंध में न तो पार्टी ने आधिकारिक घोषणा की है और न ही रमैया इसकी पुष्टि कर रहे हैं। लेकिन उनकी उम्मीदवारी पर कोई इफ-बट नहीं दिख रहा है। गौरतलब है कि सासाराम से 2009 में कांग्रेस की निर्वाचित सांसद और वर्तमान में लोकसभाध्यक्ष मीरा कुमार भी भारतीय विदेश सेवा की अधिकारी रही हैं।  इस बार के चुनाव में भी कांग्रेस की ओर से उन्हें ही उम्मीदवार बनाया जाना तय माना जा रहा है। कांग्रेस के साथ यदि राजद का तालमेल हो गया, तो मीरा के पक्ष में राजद का बेस वोट भी उन्हें मिल सकता है। मीरा के लिए राजद से गठबंधन लाभकारी साबित हो सकता है, लेकिन अभी तक कांग्रेस की ओर से गठबंधन के बारे में कोई फॉर्मूला सामने नहीं आया है। पूर्व उपप्रधानमंत्री बाबू जगजीवन राम के प्रभाव वाले क्षेत्र सासाराम में 2009 के चुनाव में राजद के ललन पासवान तीसरे स्थान पर रहे थे। उस समय कांग्रेस व राजद में सीटों पर विवाद के बाद गठबंधन टूट गया था।
    बिहार में रिटायरमेंट के बाद अनेक नौकरशाहों ने चुनावी राजनीति का रास्ता चुना। इनमें कई खासे कामयाब रहे, तो कुछ ऐसे भी हैं, जो राजनीति की पेंचीदगियों में गुम हो कर रह गए। संयुक्त बिहार के पूर्व नौकरशाह यशवंत सिन्हा उन नौकरशाहों में से रहे हैं, जो न सिर्फ चुनावी राजनीति में सक्रिय हुए, बल्कि कई सालों तक कैबिनेट मंत्री भी रहे। वहीं ऐसे कई नौकरशाह भी रहे हैं, जिन्होंने अफसरी के दौरान काफी शोहरत तो हासिल की, लेकिन राजनीति में आकर गुमनाम होकर रह गए। इसी सूची में बिहार के पूर्व डीजीपी डीपी ओझा रहे हैं। ओझा उन नौकरशाहों में थे, जिन्होंने बिहार के आला पुलिस अधिकारी रहते काफी शोहरत तो कमाई, लेकिन  राजनीति में आना उनके लिए महंगा पड़ गया। न ही वे लोकसभा चुनाव जीत सके और न ही किसी राजनीतिक दल में सांगठनिक जिम्मेदारियों को हासिल कर सके। हाल के कुछ महीनों में आरके सिंह, जो कुछ महीने तक गृह सचिव थे, भाजपा में शामिल हो गए हैं और चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं। आरके सिंह बिहार कैडर के बेहतरीन अधिकारी रहे हैं और उनके काम करने के तरीके भी अलग तरह के रहे हैं, लेकिन राजनीति में वे कितना चल पाएंगे और जातीय राजनीति को कितना साध पाएंगे, अभी कुछ भी कहना ठीक नहीं। इसी तरह पूर्व पेट्रोलियम सचिव एसके पांडेय भी चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं। पांडेय नागालैंड कैडर के आईएएस हैं, लेकिन बिहार के रहने वाले हैं। इसके अलावा तीन अन्य नौकरशाह भी राजनीति में आने के लिए छटपटा रहे हैं। बिहार के ही रहने वाले ये तीनों नौकरशाह बारी-बारी से भाजपा और जदयू की दरबारी भी कर चुके हैं, लेकिन अभी तक उन्हें कहीं से कोई आश्वासन नहीं मिला है। रामबिलास पासवान के साथ राजनीति करने के लिए भी बिहार के एक अधिकारी लगे हुए हैं। देखना होगा कि नौकरशाहों की राजनीति इस बार बिहार में कितना फलती-फुलती है।



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