Tuesday, February 11, 2014

बदनाम बाबाओं की सियासत

अखिलेश अखिल    
राजनीति की काल कोठरी में देश के बाबाओं की भूमिका बहुत पहले से ही है। यह बात और है कि अब तक कोई  बाबा ने राजनीति में अपने को स्थापित नहीं कर पायाहै। लेकिन यह भी सही है कि बाबाओं ने देश की राजनीति को कलंकित जरूर किया है। कुछ बाबाओं, संतों, साधु और साध्वियों की राजनीति को अगर भुला दें, तो अब तक जितने भी साधु-संत राजनीति में दखल दिए हैं, वे बदनाम होकर ही बाहर गए। हम यहां ऐसे ही साधु महात्माओं की राजनीतिक प्रेम और उनकी करतूतों का पोल खोलेंगे, लेकिन उसके पहले लोगों के राजनीति के प्रति बढ़ते प्रेम पर एक नजर।
        यह राजनीति भी खूब है। जैसे आत्मा से साक्षात्कार होना ब्रह्म से मिलने के बराबर है, वैसे ही राजनीति में मिलन तमाम तरह की गड़बड़ियों में डुबकी लगाने जैसा है। इस राजनीति की तासीर ही ऐसी है कि इसके मायाजाल में एक बार फंसने के बाद इंसान से हटकर हैवान और शैतान तक हो जाता है। बहुत कम ही लोग हैं, जो राजनीति में डुबकी लगाकर भी पवित्र रह पाएं हों, लेकिन उनकी पवित्रता भी गंगा की तरह नहीं रही होगी, क्योंकि भले ही वे लूट के खेल में शामिल नहीं हुए हों, लेकिन झूठ, फरेब और अन्य कुकर्मों से वे शायद ही बचे हों। यही तो राजनीति का मायाजाल है, जो करे वह भी पछताये और जो न करें, वह जीवन भर आंसू बहाए। दुनिया में जितने भी कारोबार हैं, उसमें राजनीतिक कारोबार सबसे ऊंचा और ग्लैमरस है। यह सत्ता है, पावर है, सेक्स है, पैसा है और बेइंतहा ग्लैमर। यह ग्लैमर ही है कि यहां साधु-संत भी खिंचे चले आते हैं और जिन हीरो-हीरोइनों को देखकर दुनिया आहें भरती नजर आती है, वे भी इस राजनीति के मायाजाल को दुत्कार नहीं पाते। ये तमाम बातें इसलिए कही जा रही हैं कि हमारे देश में साधु-संत और महात्माओं ने लोगों की उम्मीदों पर पानी फेरकर, जगत कल्याण से मुंह फेरकर जिस तरह से राजनीति को अपने इशारे पर घुमाने की कोशिश की है, वैसी कोशिश किसी और देश में देखने को नहीं मिलती। फिर दूसरा सवाल यह भी है कि आखिर राजनीति करने वाले लोग इन साधुओं की फांस में कैसे फंस जाते हैं? इसका सीधा जवाब है- लोभ और लालच। दरअसल, ये सभी तथाकथित बाबा, गुरु या इन्हें जिस भी नाम से पुकारा जाए, मूलरूप से शाम-दंड-भेद सभी का एक मिश्रित रूप है, जो चाटुकारिता, अवसरवादिता या अन्य उपायों द्वारा भारतीय जनमानस की सबसे बड़ी कमजोरियों चाहे वह आध्यात्म से जुड़ा हो, धर्म से जुड़ा हो, संप्रदाय से जुड़ा हो, स्वास्थ्य से जुड़ा हो, को अपनी शक्ति बनाकर उनका मानसिक, आर्थिक, शारीरिक, धार्मिक रूप से बलात्कार करते हैं और देश और व्यवस्था को लूटते हैं। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि भारत के लोग अंधविश्वास में इतने गोते लगा चुके हैं कि उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता। वे मात्र अब ताली बजाने वाला ही रह गए हैं। चाहे नौटंकी में बजाएं या खुद नौटंकी करें।     आइए देखते हैं बहुरंगी राजनीति में साधु-संतों के खेल को। जब तक बाबा रामदेव भक्तों को योग सिखा रहे थे, श्रद्घा के पात्र थे। देश-दुनिया में बाबा रामदेव की जय-जयकार हो रही थी। भारत को भी घमंड हो गया था कि हमारे देश का कोई ऐसा बाबा है, जिसके सामने पूरी दुनिया दंडवत हो। यह बाबा के योग की माया ही थी कि बाबा विरोधी धड़े के नेताओं को भी एक मंच पर लाने की कूबत रखते थे। पतंजलि योगपीठ के उद्घाटन समारोह में ये करिश्मा सबने देखा, लेकिन जैसे ही बाबा ने सियासी महत्वाकांक्षाओं के संकेत दिए, खलबली मच गई। बाबा ने देश को बदलने की ठानी, तो देश की राजनीति उबल पड़ी। विरोध शुरू हो गए। सवाल उठने लगे कि बाबाओं को राजनीति करनी चाहिए? फिर क्या था, रामदेव पर सरकारी जांच शुरू हो गई। उनके कारोबार की टोह ली जाने लगी। पता चला कि बाबा ने काफी काली कमाई की है और उसी को बचाने के लिए ही राजनीति में आना चाह रहे हैं। बाबा पर कई मुकदमे भी ठोके गए हैं। पहले अन्ना के साथ गए, फिर केजरीवाल के साथ हो लिए और आगे मोदी का गुणगान करते फिर रहे हैं। ऐसा नहीं है कि बाबा को किसी ने चेतावनी नहीं दी हो। सबसे पहले बाबा को उनके स्वजातीय नेता लालू यादव ने सियासत से बचने की सलाह दी, लेकिन नहीं माने। उन पर सियासत का भूत सवार है। वैसे राजनीति की काली कोठरी का रुख करने वाले बाबा रामदेव पहले योगी नहीं हैं। उनसे पहले भी अपनी पार्टी बनाने और चुनाव लड़ने वाले संतों, संन्यासियों का एक पूरा सिलसिला है।
          बाबाओं की बनाई अब तक की सबसे कामयाब पार्टी थी अखिल भारतीय राम राज्य परिषद। आजादी के तत्काल बाद बनी इस पार्टी के संस्थापक प्रख्यात संत स्वामी करपात्री जी महाराज थे। करपात्री जी पूर्वी उत्तर प्रदेश के थे। इस पार्टी ने 1952 के चुनाव में तीन लोकसभा सीटें और 1962 में भी दो लोकसभा सीटें जीतीं। कुछ राज्यों में विधानसभा सीटें भी मिलीं, मगर अंत में इसका हश्र भी वही हुआ। यह पार्टी अखिल भारतीय जनसंघ में समाहित हो गई। मथुरा के जयदेव गुरु को भला कौन नहीं जानता। अब वे नहीं हैं और उनकी अकूत संपत्ति को लेकर विवाद जारी है। संभव है कि आज की पीढ़ी को जयदेव गुरु के बारे में जानकारी नहीं हो। जयदेव गुरु ‘सतयुग आएगा’ का नारा लगाते फिर रहे थे। इस साधु के कई मजेदार किस्से हंै। 70 के दशक   में पूरे उत्तर भारत में जय गुरुदेव की धूम थी। गुरुदेव के भक्त टाट के कपड़े पहनते थे। सादा जीवन उच्च विचार पर अमल करते थे। गली-गली गांव-गांव लिखते घूमते थे ‘जयगुरुदेव, सतयुग आएगा।’ भक्तों की ये भीड़ देख जयगुरुदेव की महत्वाकांक्षाओं को भी पर लग गए। 1980 में गुरुदेव ने भी दूरदर्शी पार्टी का ऐलान कर दिया। देश तब भी राजनीतिक हताशा का सामना कर रहा था, मगर उसने गुरुदेव को नकार दिया। हताश जयगुरुदेव ने उस दौरान एक ऐसा नाटक किया कि उनकी बची-खुची साख भी मिट्टी में मिल गई। जयगुरुदेव ने ऐलान किया कि कानपुर में एक नियत तिथि को वे सुभाष चंद्र बोस को जनता के सामने लेकर आएंगे। सुभाष बाबू तब तक ऐसे मिथ थे, जिनका सामने आना प्रकट होने जैसा था। जनता की जबर्दस्त भीड़ जुटी, लेकिन जब जयगुरुदेव सामने आए, तो अकेले थे और उन्होंने खुद को ही सुभाष चंद्र बोस कह दिया। इसके बाद गुस्साई जनता ने जो किया, उससे गुरुदेव कभी उबर ही नहीं पाए। गुरुदेव बेइज्जत हुए और फिर लोगों के बीच नहीं गए, लेकिन एक बात और। चुनाव में तो उनकी दूरदर्शी पार्टी उतरी जरूर, लेकिन हाथ कुछ भी नहीं लगा। कहते हैं कि चुनाव में इस पार्टी ने तब करोड़ों रुपये खर्च किए थे।  बुढ़ापे में महेश योगी के मन में भी राजनीति की महत्वाकांक्षा कुलांचे मारने लगी थी। इस कुलांचे के पीछे की सच्चाई थी काले पैसों को सफेद करना। योगी ने 1992 में एक अंतर्राष्टÑीय नेचुरल पार्टी का ऐलान कर दिया। भारत में इसकी ब्रांच थी अजेय भारत पार्टी। मगर अजेय भारत पार्टी एक चुनाव में बस एक ही उम्मीदवार को संसद तक भेज पाई। 2004 में यह पार्टी अपनी मौत मर गई। दरअसल, सत्तर के दशक में जब इंदिरा गांधी पर शनि की दशा मंडरा रही थी, तब इस अवसर का फायदा उठाया महेश योगी ने। आध्यात्म गुरु के रूप में गांधी से योगी की नजदीकी बढ़ी। भारत सहित विश्व के अन्य देशों में शांतिदूत वाहक के रूप में योगी भेजे गए। कई देशों का भ्रमण किया और पूरे विश्व में हजारों-हजार तथाकथित शांति वाहक बनाए। बाद में महेश जोगी महर्षि महेश योगी बन गए। कहा जाता है कि मृत्यु के समय उनके और उनके द्वारा स्थापित संस्थान की चार मिलियन डॉलर से अधिक की संपत्ति थी। आज उनके परिवार और उनके लोग शांति वाहक तो नहीं रहे, अलबत्ता, भारत सहित विश्व के अन्य देशों में विद्यालय, अन्य शैक्षणिक संस्थानों, और विभिन्न प्रकार के व्यावसायिक उद्योगों के वे मालिक हैं।
          इसी सत्तर के दशक में ही एक और योगीराज का पदार्पण हमारे देश में हुआ। इस महोदय का नाम था धीरेंद्र ब्रह्चारी। महेश योगी आध्यात्मिक संत थे, तो ब्रह्मचारी योग पुरुष थे। इन्होंने भारतीय जन-मानस को आध्यात्म नहीं, योग सिखाने का ठेका लिया। चूंकि उस वक्त रामदेव की उत्पत्ति नहीं हुई थी, इसलिए उन्होंने सीधा निशाना साधा इंदिरा गांधी को। माध्यम थे आध्यात्म गुरु महेश योगी। धरेंद्र ब्रह्मचारी का असली नाम था धीरेन्द्र चौधरी। बिहार के मधुबनी जिले के रहने वाले थे। कहते हैं कि गीता के ज्ञान से प्रभावित चौधरी पहले कार्तिकेय के शिष्य बने और बनारस के समीप ज्ञान प्राप्त किया। सोवियत रूस से वापस आते ही पंडित जवाहरलाल नेहरू ने इन्हें इंदिरा गांधी को योग सिखाने का भार सौंपा था। गुरु-शिष्य की परंपरा का निर्वाह करते जब 1975-76 में श्रीमती गांधी पर फिर से शनि-राहु-केतु ग्रहों का प्रभाव उमड़ पड़ा, तब धीरेन्द्र चौधरी इंदिरा गांधी के समीप आते गए और तत्कालीन सत्ता के गलियारे में बहुत ही ताकतवर व्यक्ति के रूप में अवतरित हुए। इंदिरा गांधी के दौर में धीरेंद्र ब्रह्मचारी की तूती बोलती थी। ब्रह्मचारी प्रधानमंत्री के योगगुरु थे। वो सीधे प्रधानमंत्री निवास जाकर इंदिराजी को योग सिखाते थे। देश में तब एक ही चैनल था दूरदर्शन। दूरदर्शन पर उनका योग शिक्षण का कार्यक्रम खूब मशहूर था। इंदिराजी की मेहरबानियां थीं कि उन्होंने दिल्ली और जम्मू-कश्मीर में योग केंद्र स्थापित किए। 1994 में उनकी दर्दनाक मौत हुई, जब उनका खुद का हेलीकॉप्टर दुर्घटना ग्रस्त हुआ। मगर धीरेंद्र ब्रह्मचारी का रसूख कितना था, इसका अंदाजा सिर्फ इंदिरा गाधी की हत्या के एक वाकये से लगाया जा सकता है। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद सबसे पहले एम्स अस्पताल में उनकी लाश तक पहुंचने वाले ब्रह्मचारी ही थे। बाहर निकल कर पत्रकारों को ब्रह्मचारी ने ही बताया कि सब कुछ खत्म हो गया है, लेकिन देशहित में इस खबर का प्रसारण तब तक नहीं हुआ, जब तक राष्टÑपति जैल सिंह देश नहीं लौटे।
        30 वर्षों के तथाकथित योग साधना के दौरान, धीरेन्द्र ब्रह्मचारी ने न केवल जम्मू में आर्म्स निर्माण करने के उद्योग लगाए, बल्कि हजारों-हजार एकड़ क्षेत्र में अपना फॉर्म हाउस भी बनाया। निजी हेलिकॉप्टर रखा, हेली-पैड बनाया, निवास स्थान बनाया और जम्मू में सात-मंजिला मकान भी खड़ा किया। धीरेन्द्र ब्रह्मचारी को लोग फ्लाइंग स्वामी के नाम से भी जानते थे। इन पर कई आरोप भी लगे। अन्वेषण विभाग के लोगों का कहना है कि धीरेन्द्र ब्रह्मचारी अवैध आर्म्स डील के अतिरिक्त, कई ऐसे गैर-कानूनी क्रियाकलापों में लिप्त थे, जो गुरु शब्द को कलंकित करता है।
          भला उस चंद्रास्वामी को कोई भूल सकता है, जिसके कदमों तले देश के कई नेता लोटे रहते थे। 90 के दशक में चंद्रास्वामी राजनीतिक गलियारे के सबसे विवादास्पद संत हुए हैं। तंत्र-मंत्र के इस माहिर खिलाड़ी के शिष्यों में   पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर से लेकर पीवी नरसिम्हाराव तक शामिल थे। हथियारों के कुख्यात तस्कर अदनान खशोगी से लेकर ब्रुनेई के सुल्तान तक से इनके रिश्ते जाहिर रहे। उद्योगपतियों से लेकर हवाला कारोबारियों तक से नाम जुड़ा। एनआरआई उद्योगपति लखू भाई पाठक ने ठगी का इल्जाम लगाया, जो अब तक कायम है। फेरा के आधा दर्जन से ज्यादा मामले अब भी चंद्रास्वामी के सिर पर हैं। इस कुख्यात तांत्रिक की सबसे बड़ी खूबी थी कि सत्ता के गलियारों में फंसे काम वह चुटकी बजाते कराता था। मगर दुर्दिन शुरू हुए कांग्रेस से पंगा लेने के बाद। हद तो तब हो गई, जब राजीव गांधी हत्याकांड के तार चंद्रास्वामी से जुड़ते दिखे। उन पर लिट्टे से संबंधों का शक था। हालांकि चंद्रास्वामी का कहना था कि उन्हें जबरन इस केस में फंसाया जा रहा है। उनके मुताबिक फंसाने वाले थे पूर्व मानव संसाधन मंत्री अर्जुन सिंह। चंद्रास्वामी के जाल में  एलिजाबेथ टेलर भी फंस गई थीं। प्रीति जिंटा भी पिछले कुंभ के दौरान चंद्रास्वामी से मिलने गई थीं और बाद में उसने एक यज्ञ भी कराया था। चंद्रास्वामी के दरबारियों में राजेश खन्ना भी थे, आशा पारिख भी थीं और चंकी पांडे भी। चंद्रास्वामी के साथ अरुण शौरी जैसे पत्रकार भी विदेश की यात्रा कर चुके हैं। स्वामी के चरणों में टीएन शेषन, कैप्टन सतीश शर्मा भी बैठते थे। दिवंगत पत्रकार आलोक तोमर ने चंद्रास्वामी के खेल को बड़े ही नजदीक से देखा था। उन्होंने स्वामी के बारे में काफी कुछ लिखा भी है। आलोक तोमर लिखते हैं कि चंद्रास्वामी का उदय महागुरु बनने के पहले राजनीति में हुआ था। नरसिंह राव जब आंध्र प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष थे, तो उन्होंने युवा चंद्रास्वामी को- उनका नाम तब नेमि चंद्र जैन हुआ करता था- हैदराबाद युवा कांग्रेस का महासचिव बनाया था। इसके बाद चंद्रास्वामी दिल्ली आ गए और उस समय युवा कांग्रेस के महासचिव और मध्य प्रदेश कांग्रेस के बड़े नेता रहे महेश जोशी के बंगले के बाहर नौकरों वाले क्वार्टर में उन्हें जगह मिल गई थी। फिर पता चला कि चंद्रास्वामी अमर मुनि नामक एक साधु के शिष्य हो गए हैं और बिहार-नेपाल सीमा पर तांत्रिक साधना कर रहे हैं। कुछ दिन बाद वे गुरु चंद्रास्वामी बन कर प्रकट हुए और जैसा कि आपको भी मालूम है कि बाद में चलकर राजा-महाराजाओं की एक लाइन उनकी भक्ति और चमत्कारों में लीन हो गई। नरसिंह राव के जमाने में चंद्रास्वामी को सुपर प्रधानमंत्री कहा जाता था। झारखंड मुक्ति मोर्चा के वोट खरीदने के लिए चंद्रास्वामी ने कैप्टन सतीश शर्मा के साथ मिल कर अभियान चलाया था और यह बात अदालत में साबित हो चुकी है। चंद्रास्वामी आज भी हैं और फिर से अपना मायाजाल फैलाने के लिए इन दिनों इलाहाबाद में धूनी रमा रहे हैं। उनसे मिलने के लिए वहां भी भीड़ इकटठा है।
80 के दशक में एक और स्वयंभू स्वामी अवतरित हुए हैं हिंदू सामाजिक सेवक के रूप में। नाम है स्वामी अग्निवेश। आर्य समाज के ज्ञान को बढ़ाबा देने के लिए आगे बढेÞ हैं। इस स्वामी जी ने पहले हरियाणा की राजनीति की और 1979- 1982 तक हरियाणा के शिक्षा मंत्री भी रहे। राजनीति में भविष्य को ‘अधर में लटके’ देख एक संस्था खोली और बंधुआ मजदूरी पर काम कराने लगे। यह अलग बात है कि उनके कार्यालय में आज भी 14 साल से कम उम्र के बच्चे कार्य करते हैं, अपने पेट की भूख को मिटाने के लिए। जैसे-जैसे मजदूरों के लिए सरकार की नीतियां बदलती गर्इं और मजदूरों को उचित मजदूरी के साथ-साथ ज्ञान भी मिलने लगा, अग्निवेश साहेब, भ्रष्टाचार के खिलाफ छिड़े जंग में कूद पड़े। कुल मिलाकर अखबार के पन्नों पर, टीवी चौनलों पर आना इन्हें अच्छा लगता है। इतना ही नहीं, स्वामी जी अभी अभी बिग-बॉस में भी मोहतरमाओं के सानिध्य में तीन दिन बिताए हैं। वैसे देश के विभिन्न जांच एजेंसियों की नजर इनकी हरकतों पर है, देखते हैं आगे क्या होता है?
         मगर कुछ बाबा तो चुनाव लड़कर सीधे संसद में पहुंच गए हैं। इनमें एक अहम नाम योगी आदित्यनाथ। योगी अक्सर अपनी हरकतों की वजह से विवादों में रहते हैं। गोरखपुर से भाजपा सांसद योगी आदित्यनाथ ने पूर्वी उत्तर प्रदेश में हिंदू युवा वाहिनी नाम की एक सेना ही बना रखी है। संन्यासिन उमा भारती को ही लीजिए। कई बार कई तरह के विवादों में रही उमा भारती की राजनीति जारी है। आप कह सकते हैं कि यह राजनीति ही ऐसी चीज है, जो हर पेशेवर को अपनी ओर खींचती है। यहां सब आकर एकाकार हो जाते हैं। चाहे आसाराम बापू हों या फिर कोई और। आसाराम सीधे राजनीति में तो नहीं आ पाए, लेकिन देश के कई नेता आसाराम के खास हैं। इन नेताओं में आडवाणी भी शामिल हैं।

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