Thursday, March 13, 2014

सारंडा में लोकतंत्र

                       
                                आजाद हो गया सारंडा का लाल गलियारा.......
 क्या आप सारंडा को जानते हैं? देश की बहुतायत आवादी को शायद ही इसके बारे में पता हो। देश के भूभाग पर नक्सलियों के चार प्रमुख केंद्रों में से एक है सारंडा।  झारखंड के पलामू का सारंडा। देश के 9 राज्यों  में नक्सलियों की जो पहुंच है उसका संचालन छत्तीसगढ के दंडकारण्य,झारखंड के कोयल शंख, सारंडा, जमुई बांका एवं उड़ीसा के जंगलो से होता है। छत्तीसगढ और महाराष्ट् के 80 हजार वर्ग किलोमीटर इलाके में नक्सलियों की धमक है। इस धमक की केंद्र बिंदु बस्तर के दंडकारण्य का अबूझमार है। यह वही अबूझमार है जिसे आजादी के इतने साल बाद भी हमारी सरकार जान नहीं पाई है। आप कह सकते हैं कि इस अबूझमार जंगल में आज भी दर्जनों आदिवासियों के गांव है जहां लोकतंत्र नहीं पहंचा है। शेष दुनिया को वहां की आवादी जानती है और ही शेष दुनिया उस आदिवासी को। नक्सलियों का यह लाल केंद्र आज भी सरकार के नाक में दम कर रखा है। इसी तरह झारखंड के कोयल शंख इलाके का रकबा 15 हजार 700 वर्ग किलोमीटर है जहां सरकार की हुकुमत कम नकलियों की नखरेबाजी ज्यादा चर्चित रही है। सारंडा भी इसी क्षेत्र का एक नक्सली मिलीट्ी आपरेशन का केंद्र है।उड़ीसा के 16 हजार 700 वर्ग किलोमीटर की जमीन पर आज भी नक्सली विचरन करते हैं और उनकी मन माफिक कानून चलती है। तो सारंडा क्या है और कहां है इसे आप जान गए होंगे। समय बदला है और इच्छा शक्ति बदली है तो सारंडा की तस्वीर भी बदल गई है।
एशिया का सबसे बड़ा साल पेड़ का जंगल  सारंडा आजाद हो गया है। कहने के लिए देश 1947 में आजाद हुआ था लेकिन झारखंड का सारंडा इसी 26 जनवरी को आजाद हुआ। देश अंग्रेजों का गुलाम था और सारंडा नक्सलियों का। आजादी के 64 सालों में काफी बदलाव आए। सरकार बदलती रही,नेता बदलते रहे, विकास की योजनाएं बदलती रही लेकिन सारंडा नहीं बदला था। बदलता भी कैसे? यहां जमाने से नक्सलियों की सरकार चल रही थी। पलामू का यह अंधकार जंगलों से भरा इलाका आदमी के जेहन में आते ही कंपकपी पैदा कर देती है। सारंडा के इलाके में खुलेआम घूमना मौत को आमंत्रित करना था। आम जनता की बात तो दूर जिनके उपर देश समाज को सुरक्षित रखने की जिम्मेदार है वे भी सारंडा में नहीं जा सकते थे। नक्सलियों के इस आपरेशनल केंद्र से बिहार ,झारखंड और उड़ीसा से लेकर बंगाल तक नक्सली एक्शन करते थे और अपने विरोधियों को इसी जंगल में लाकर खून से खेलते थे। सालो से यहां यही हो रहा था। लेकिन अब ऐसा नही है। इस घने जंगल में बसे 56 गांव के  7 हजार  से ज्यादा आदिवासी परिवार  की 36 हजार 500 आवादी अब आजादी के गीत गा रही हैं। इसी एरिया में देश के कुल लौह अयस्क का 25 फीसदी हिस्सा है। 12 में ज्यादा खनन कंपनिया यहां 50 ेम ज्यादा माइंस का संचालन कर रही है। इन्हीं कंपनियों से लेवी वसूल कर नक्सली देश में रक्तपात मचाते रहे हैं। जिस घने जंगल के बीच दाया हाथ बाएं हाथ को नहीं देख सकता था वहां अब विजली की बल्वे टिमटिमा रही है। चिकनी सड़के दिखाई पड़ रही है और स्कूल से लेकर इलाज  के लिए अस्पताल आदिवासियों के स्वागत में खड़े हैं। और सबसे अचंभा की बात यह है कि इसी साल के 26 जनवरी को केंद्रीय मंत्री जयराम रमेश ने सारंडा में गणतंत्र का झंडा फहरा कर नक्सलियों के दांत खट्टे कर दिए है। शायद यह देश का पहला मंत्री है जिसके जिद के आगे नक्सली पस्त हुए है। नक्सली हारे है और सारंडा के लोग आजाद हुए है। सारंडा का बदलना कोई मामूली बात नहीं है। देश की बेइमान राजनीति, भ्रष्ट नेता और सरकार भले ही जयराम के इस प्रयास को भूल जाए लेकिन तय मानिए सारंडा कभी जयराम को नहीं भूल सकता। 26 जनवरी को सारंडा के जंगल के बीच तिरंगा को जयराम रमेश ने सलामी दी जबकि सारंडा के लोगों ने जयराम  को सलामी ठोकी। इतिहास जयराम को याद रखेगा।  तिरंगा को सलामी दागते हुए जयराम ने कहा-‘ मैं चहता हूं मंेरा अंतिम संस्कार दीघा में हो।मैं यहां आता रहूंगा। मरने के बाद मेरा नाम जयराम रमेश  मंुडा रख देना।
      और आजाद सारंडा की तस्वीर बदल रही है। जिस सारंडा की लड़कियां,लड़के और बूढे नवजवान नक्सलियों के हाथ के खिलौना थे  और जबरन जिनके हाथे से गोलियां चल जाती थी अब उन हाथें में  पढाई के सामान  और रोजगाार के साधन है। टाटा स्टील ने सारंडा के 100 से ज्यादा लड़कियों को नर्स ट्ेनिंग देने का बीड़ा उठाया है। सारंडा के 100 लड़कियों को केंद्र सरकार ने हस्तशिल्प और बांस की कारीगरी सीखने के लिए आंध्रप्रदेश भेजा है। जिनलोगों को कुछ माह पहले तक जंगल से निकलने की मनाही थी ने अब रोजगार की तलाश में रांची और अन्य शहरों में जा रहे हैं। जिन लोगों की आंखें जीवन भर बंदुक और बम के साथ नाक्सलियों के परेड देखने से खुलते थे उनके बच्चे स्कूल में पढाई कर रहे हैं। सच्चाई ये भी है कि झारखंड के और इलाके में भले ही स्कूल में पढाई होती होए अस्पताल नहीं खुलते होए मनरेगा नहीं चलते हो और सुऱक्षा के इंतजाम नहीं रहते हो लेकिन सारंडा में सब कुछ चल रहा है।
     लेकिन सारंडा की दशा ऐसे नहीं सुधरी है। सरकार पिछले 3 सालों से यहां एनाकोंडा 1, एनाकोंडा 2 आपरेशन चला रही है। इस महती अभियान में सी आर पी एफ,कोबरा, झारखंड जगुआर और झारखंड आर्मड पुलिस जुटी रही है। दर्जनों लोगों की मौत भी हुई। केवल विकास की राजनीति नही हुई इस इलाके में 249 करोड़ की राशि खर्च की गई और उससे भी बढकर जयराम रमेश की इच्छा शक्ति लगी रही। अब सारंडा की आजादी सरकार के लिए एक माडल के रूप में सामने है। आप कह सकते हैं कि यहां विकास के सामने राजनीति मात खा गई है। आलम यह है कि केंद्र सरकार अब इस माडल को देश के अन्य नक्सली इलाकों में आजमाना चाह रही है और जय राम रमेश ने इसकी पूरी तैयारी भी कर ली है।  जयराम रमेश की नजर अब उड़ीसा के जंगलों पर टिकी है जहां के 10 हजार से ज्यादा की आवादी आजाद भारत की दुनिया को देखने के लिए आतुर हैं।
     इस पूरे खेल और प्रयास में एक भय यह सता रहा है कि जंगल से निकले और भागे नक्सली अंत में कहां जाऐंगे? एक चिंता यह भी सता रही है कि क्या जंगल से भागे नक्सली मैदानी इलाकों में रक्तपात करेंगे? ऐसा संभव भी है। लेकिन ऐक बात तय है कि आर्थिक विकास के दम पर लोगों का मिजाज बदला जा सकता है। सरकारें आती और जाती रहेंगी लेकिन नक्सलियों के खत्म के लिए अगर सही स्तर से प्रयास जारी रहे तो गरीबी और शोषण की आर में जड़े जमा चुका नक्सलवाद दम तोड़ देगा।
  
     


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