Thursday, March 13, 2014

राजनीति बदले तो देश बदले

                                         

 सोलहवीं लोकसभा चुनाव की दुदुंभी बजते ही देश के कोने कोने में तरह तरह के राजनीतिक दलों ने अपनी भाव भंगिमाओं  से फिर जनता को अपने बस में करने और सामने वालों को ध्वस्त करने की चालें शुरू कर दी है। इस खेल में हर कोई यही नारा लगा रहा है कि भ्रष्टाचारियों से सावधान और सेकुलरवाद जिंदावाद। लेकिन जब कोई पत्रकार या फिर आम आदमी उस दल पर महाभ्रष्ट होने से लेकर आपराधी होने का प्रमाण पेश करता है तो उनका जववा होता है कि यह सब विरोधी दलों की चाल है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर इस देश में कौन गलत पार्टी या नेता है और कौन भ्रष्ट है? संसदीय व्यवस्था में आ रही गिरावट और जनता में नेताओं और राजनीति के प्रति बढते आक्रोश को लेकर हमारे देश में बड़े पैमाने पर कई दफा संसद के भीतर और बाहर बहसें चलाई गई लेकिन सच यही है कि न तो राजनीति बदली और न ही जनता की हालत बदले।
         ढहते संसदीय प्रणाली,घोटाले, बढते भ्रष्टाचार, समस्याओं से जूझती जनता और संविधान पर उठ रही उंगलियों को लेकर अगस्त 1997 में तत्कालीन लोक सभा अघ्यक्ष पी ए संगमा ने संसद का विशेष सत्र बुलाया और इसे आजादी की दूसरी लड़ाई कहा । लोक सभा में देश की तमाम समस्याओं पर 65 घंटे  और राज्य सभा में 50 घंटे तक बहस चली और सभी नेताओं ने अपनी बातें रखी । लेकिन इस पूरे खेल में निकला कुछ नहीं । अगर कुछ निकलता तो आज अनना को आंदोलन करने पर विवश नहीं होना पड़ता । इसके बाद जनवरी 200 के आखिरी हफ्ते में तत्कालीन राष्ट्पति के आर नारायणन ने देश के बिगड़ते हालात, लंपट राजनीति,तार तार होता कानून ब्यवस्था और भ्रष्टाचार की भेंट चढते गरीब, आदिवासी को लेकर अपने तीन अभिभाषण दिए । अपने 28 जनवरी 2000 के अभिभाषण में नारायणन ने कहा कि ‘अदालते इबादतगाह नहीं,जुआघर है’ । फिर 27 जनवरी को संसद के केंद्रीय कक्ष के  अभिभाषण में नारायणन ने कहा कि ‘संविधान को हमने विफल कर दिया है’ ।फिर इसी सील 26 जनवरी को राष्ट्पति ने कहा कि ‘गरीबों के बारे ंमें सोंचिए वरना किसी का्रंति के लिए तैयार रहिए । दलित, आदिवासी और गरीबों को आज तक न्याय नहीं मिल रहा है जो कहीं से भी ठीक नहीं है’। लेकिन हमारे नेताओं और नौकरशाहों को इससे कोई मतलब नहीं रहा । थोड़ा और पीछे आपको ले चलते हैं। वीपी सिंह के समय में सर्वदलीय बैठक में प्रस्ताव आया कि राजनीतिक दलों की सदस्यता खुली हो जिसकी जांच की जा सके ।सभी दल अपने संविधान के आधार पर नियमित चुनाव कराए जिसकी देख रेख एक निष्पक्ष न्यायिक पंच करे औा सभी दलों के आय ब्यय व संपत्ति की जांच भी किसी निष्पक्ष सार्वजनिक आयोग द्वारा की जाए ।लेकिन आपको बता दें कि सभी दलों ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया । जब कोई भी दल और नेता कानून मानने को तैयार ही नही हैं तो इमानदारी की बात बेमानी ही है। जदयू  के पूर्व  नेता कैप्टन जयनारायण निषाद कहते हैं कि‘ भ्रष्टाचार जब लोबों के आचरण में आ जाए तो इसे दूर करना कठिन है लेकिन असंभव नहीं । सरकारी तंत्र के साथ ही नेताओं को भी इस बारे में सोचने की जरूरत है  और अगर देश को चलाने वाले लोग ठीक हो जाए तो न सिर्फ संसद की गरिमा लौट सकती है वल्कि भ्रष्टाचार पर भी लगाम लग सकता है।’  
तो फिर भ्रष्टाचार पर हाय तौवा क्यो? कहते हैं कि भ्रष्टाार का रोग हमारे खून में है। कुछ आंकड़ों से आपको दर्शन करा दूं। देश में करीब साढे पांच हजार आई ए एस अधिकारी हैं । यही लोग नौकरशाहों के शीर्ष अंग हैं।  नेताओं के बाद यही देश के रहनुमा हैं। इनके नीचे की सेवाओं को  पुलिस, राजस्व,वन और राज्य सेवाओं के अफसरों को भी जोउ़ लिया जाए तो करीब 15 हजार अफसर हैं जों सरकार को चला रहे हैं और लोकतंत्र को अपने तरीके से हांक रहे हैं ।ट्ांसपेरेंसी इंटरनेशनल के अनुसार 80फीसदी नौकरशाह भ्रष्ट हैं जो अपनी जिममेदारी का वहन नहीं कर रहे ।जब उपर के अफसरों का ये हाल हैं तो नीचे के कर्मचारी क्या करते हैं आप जानते हैं।  केंद्र और राज्य सरकार के कर्मचारियों की कुल संख्या को जोउ़ ले तो कोई 2 करोड़ सरकारी कर्मचारी हैं जो अपने तरीके से देश को चलाने की तरकीब निकाल चुके हैं। सीबीआई कहती है कि हर साल देश का 400 अरब रूपए भ्रष्टाचार की भेट चढते हैं। 2010 में 110 आईए एस,105 आईपीएस पर आपराघिक और आर्थिक मामले दर्ज हैं और ये सारे लोग काम भी कर रहे हैं। कुर्सी तंत्र का इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है। सतर्कता विभाग के मुताबिक  2006 से 2010 तक बिहार में करीब 365 सरकारी कर्मचारियों के यहां छापे मारे गए जिनमें 300 कर्मचारी करोड़पति पाए गए हैं। सीबीआई के पूर्व निदेशक जोगिंदर सिंह कहते हैं कि -‘देश में े करीब 2 करोड़ सरकारी कर्मचारी और 5300 नेता हैं। इनमें सबसे ज्यादा भ्रष्ट नौकरशाह होते हैं ।नौकरशाह उनके लिए कमाउ पूत की तरह हैं जो उन्हें बताते हैं कि कहां और किस तरह पैसे आ सकते हैं। सरकारे बदलती हैं, मंत्री बदलते हैं लेकिन नौरशाह वहीं रहते हैं। यही लोग हैं जो कानून को तोड़ मरोड़ कर गलत काम करते हैं । और नेता भ्रष्ट निकल गए तो ये लोग इनके काम को और आसान बना देते हैं ।’
 और जिस पुलिस के उपर कानून ब्यवस्था लागू करने की जिममेदारी है,वह खुद भ्रष्टाचार के दलदल में डूबी है । पैसा पुलिस के लिए सब कुछ हो गया है । आंकउ़े बता रहे हैं कि हर साल पुलिस वाले देश भर में 22200 करोड़ की वसूली करते हैं और इनमें से 214 करोड़ गरीबी रेखा से नीचे वालों से वसूला जाता हैं । पुलिस की लूट और इस महकमें में जारी भ्रष्टाचार को देखते हुए ही इसे लाइसेंसधारी गुंडा कहा जाता हैं 1967 में इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस आनंद नारायण भल्ला ने कहा था कि - ‘उत्तर प्रदेश पुलिस के दामन पर दाग ही दाग है।आमतौर पर उसकी छवि जनता के खिलाफ बर्बर गिरोह के रूप् में उभरती है,जिसे बर्दी की आड़ में कुछ भी करने की आजादी है।’ विकास और कल्याण के कई क्षे़त्रों में एनजीओ की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। वाकई में कई एनजीओं ने उदाहरण पेश किए हैं ।लेकिन इसके कुल खेल को देखा जाए तो पता चलता है कि समाज सेवा के नाम पर लूट का सबसे बड़ा माध्यम है।  अभी देश में 33 लाख से ज्यादा एनजीओ हैं यानि की 400 लोगों पर एक एनजीओ ।2003 में हुए एक सवे्र से पता चला कि 85 फीसदी एनजीओ काम नहीं करते और सिर्फ सरकारी  धन को लूटते हैं। इपने से 80 फीसदी एनजीओ तो सिर्फ 10 राज्यों में फैले हुए हैं। महाराष्ट्,आंध्रप्रदेश,उत्तरप्रदेश और केरल में सबसे ज्यादा एनजीओं चल रहे हैं । 11वी पंचवर्षीय योजन में सरकार ने सामाजिक क्षेत्र के विकास के लिए 18 हजार करोउ़ की राशि तय की थी। इस राशि का कितना उपयोग सही तरीके से हुआ है जांच का विषय बना हुआ है। भूतपूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन का मानना है कि -‘भ्रष्टाचार खुद एक बउ़ी बीमारी हैजिसे सिर्फ एक कदम उठाकर दूर नहीं किया जा सकता ।इससे निपटने के लिए जरूरी है कि सरकार उच्च सुरक्षा से जुड़े कुछ मामलों को छोड़कर अपने बाकी काम पारदर्शी बनाए।’
    हालाकि आजादी के बाद से ही घोटाले और भ्रष्टाचार की शुरूआत हो गई थी लेकिन 1991 के बाद इस प्रवृति में तेजी आई। यह ीवह साल है जब प्रधानंत्री नरसिंम्हा राव और वित मंत्री मनमोहन सिंह ने उूबती अर्थब्यवस्था को बचाने के लिए नई आर्थिक नीति की शुरूआत की थी। फिर हर्षद मेहता कांडसे जो घोटाले की जो लाइन लगी ,आज तक जारी है । यहां हम कुछ  उन बउ़े घोटालों की बात कर रहे हैं जिसने देश राजनीति में उफान खड़ा कर दिया था। नौरशाही के चार घोटालों ने दी देश पर 2 लाख 646 करोउ़ की चोट । इनमें 2 लाख करोड़ का यूपी अनाज घोटाला,107 करोउ़ के कर्नाटक आईएडीबी घेटाला,225 करोड़ का सीआरपीएफ घोटाला और बिहार झारखंड का 314 करोड़ का फ्युचर ट्ेडिंग घोटाला। इसी के साथ पांच कारपोरेट घेटालों ने लगाई 50 हजार 700 करोड़ की चपत। इसमें 14 हजार करोड़ का सत्यम घोटाला,4 हजार करोड़ का शेयर घोटाला, 1200 करोड़ का सीआरबी घोटाला, 1500 करोड़ का सिक्याुरिटी घोटाला और 30 हजार करोड़ का सटांप घोटाला । इसके अलावा 2010 में  एक लाख 76 हजार करोड़ के 2जी स्कैम,1000 करोड़ का आदर्श घोटाला, 1000 करोड़ का सिकिकम में पीडीएस घोटाला, 600 करोड़ का कर्नाटक में जमीन घोटाला और 318 करोड़ का कामनवेल्थ घोटाला हुए। इसी 20 सालों में 950 करोड़ का लालू का चारा घोटाल,करीब 4 करोड़ का सुखराम से जुड़ा टेल्कम घोटाला,करोड़ों का जयललिता संपत्ति मामला 3 साढे तीन करोड़ का नरसिंम्हा राव घूस कांड, और एक लाख का बंगाय लक्षमण घूस कांउ सामने आया । जाहिर है इन नेताओं के दामन पर दाग लगे ।  इसी दौर में सेना भी दागदार हुई ।सेना में भी कई तरह के घपले सामने आए और इस तरह से 4 हजार करोड़ की राशि की लूट हुई । दागदार न्यायपालिका से जुड़े लोग भी हुए ।जस्टिस बी रामा स्वामी, जस्टिस शमित मुखर्जी,जस्टिस शौमित्र सेन,जस्टिस पीडी दीनाकरन और जस्टिस निर्मल यादव पर पैसा कमाने का मामला दर्ज हुए ।   दिल्ली के लोकायुक्त जस्टिस मनमोहन सरीन कहते हैं कि ‘ समाज में लालच बढ गया है। लालची लोगों को कड़ी सजा देकर ही दंडित किया जा सकता है । इमानदार लोगों की इस देश में कमी नही है लेकिन उसके सामने जब कोई रातों रात अमीर बनता दिखता है तो हरान हो जाता है ं। सरकार ने   गलत सरकारी तंत्र के लोगों के  साथ ही गलत नेताओं को  सजा देने की पहल कर दे तो बहुत हद तक लूट तंत्र से बचा जा सकता है ।’  सरीन की बातों में दम है। आज तक कई मामलों में  दोषी होने के बावजूद भी कोई भी आदमी सजा नहीं पा सका। कुछ लोगों को जेल के भीतर कुछ समय के लिए भेजा भी गया तो अतिथि बनाकर । लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिन पैसों की लूट की गई क्या वे पैसे वापस सरकारी कोष में आए? किसी नेता ने वह धन लौटाया? किसी नौकरशाह ने लूटे धन को वापस किया? किसी कारपोरेट घराने ने घोटाले की राशि वापस की? अभी तक एक भी ऐसा उदाहरण हमारे सामने नहीं है। और जब ऐसा नहीे हो सकता तब ये तमाम कायदे कानून बेकार है और जनता के धन की बर्बादी से ज्यादा कुछ नहीं । फिर किस आधर पर सरकार कह रही है कि नक्सलियों ने देश को तबाह कर रखा है? नक्सली तो संसदीय ब्यवस्था के विरोध में काम कर रहे हैं और ये  लोग संसदीय ब्यवस्था में रह कर लूट रहे हैं । अब तो जनता को ही निर्णय करना है कि देश का असनी नक्सली कौन हैं जो हमें तहस नहस कर रहे हैं।
        चुनाव के दौरान तमाम तरह के सपने बेचने का खेल फिर जारी है। हर पार्टी वाले सपने की सूची तैयार करने में जुट गए है। कोई जात पात का सपना आगे बढाने को आतुर है तो कोई आरक्षण का। कोई विकास की बात को आगे बढाने के लिए बेचैन है तो युवा भारत का सपना बेचने में लगा है। चुनाव के बाद सारे सपने कूड़ेदान में चले जाऐंगे और देश फिर उन्ही वाचाल राजनीति की राह में चलता रहेगा।
   

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