Friday, March 28, 2014

नारों के भ्रमजाल से बचिए जनाव


                                                                      अखिलेश अखिल
क्या मुद्दे या नारे चुनावी जीत के कारण हो सकते है? क्या भाजपा के तरह तरह के जोश भरने वाले नारे भाजपा की जीत के कारण हो सकते है? क्या कांग्रेस की विकास से जुडे तरह तरह के नारे पार्टी की तकदीर बदल सकते है? और क्या आम आदमी पार्टी के नारे लोगों को आकर्षित कर सकते है? ये सवाल आज इसलिए किए जा रहे हैं कि नारे और मुद्दे भले ही कुछ समय के लिए आज लोगों को आकर्षित करते हो लेकिन उसका असलियत से कोई लेना देना नहीं है।  यह चुनाव जीतने का एक हथकंडा मात्र है। चुनाव के बाद सरकार बनते ही मुद्दे और नारों की राजनीति नहीं होती इस देश में। आजादी के बाद से अब तक चुनाव के दौरान तरह तरह के नारे राजनीतिक दलों ने उछाला लेकिन सरकार बनते ही मुद्दों की राजनीति पीछे चली गई। आप कह सकते है कि  यह एक प्रपंच और धोखा के सिवा कुछ भी नहीं है। लोगों को गुमराह करने का धोखा और किसी भी तरह से वोट उगाहने का नाटक। यह धोखा ठीक उसी तरह का है जिस तरह से मदारी पहले बंदर का नाच दिखाकर भीड़ इकटठा करता है और बाद में जड़ी बुटी बेचने लगता है। 90 के बाद देश में चुनावी मुद्दे और नारे की राजनीति होने लगी और ये सारे मुद्द,े नारे लोगों को ठगने से लेकर वोट उगाहने के लिए किए जाने लगे। यही वजह है कि  चुनावी मुद्दे और नारे अब लागों को आकर्षित नहीं करते। जनहित से जुड़े मुद्दे तो राजनीतिक पार्टियां उठाती ही नहीं,और जनता को प्रभावित करने वाले नारे बनते ही नहीं  हैं। आम आदमी के जीवन से जुड़ी जो समस्याएं हैं,उन्हें राजनीतिक दल अपने चुनावी मुद्दे ही नहीं बनाते। भाजपा के लिए चुनावी प्रचारतंत्र और मुद्दे, नारे का काम करने वाली एक विज्ञापन एजेंसी के अधिकारी कहते हैं कि ‘अब पार्टी की नीतियों से जुड़े मुद्दे नारों के दिन चले गए।कोई भी पार्टी मुद्दों पर आधारित राजनीति नहीं कर रही है, ऐसे में हमारा प्रयास लोगों को चुनाव के दिनों में भावना के स्तर पर उकसाने का रह गया है। पार्टियां भी चाहती है कि प्रचारतंत्र भले ही मुद्दाविहीन हो लेकिन जनता उससे स्वयं को जुड़ा हुआ महसूस करे।
     ऐसा नहीं है कि केवल भाजपा ही मुद्दाविहीन राजनीति कर रही है। कांग्रेस और तमाम पार्टियां इसी रास्ते पर चल रही है। नेहरू युग में हुए तीन लोकसभा चुनावों में मुख्यरुप से लोकतंत्र,समाजवाद और नियोजित आर्थिक विकास के मुद्दे छाए रहे। विपक्षी सोसलिस्ट पार्टियां अंग्रेजी भाषा का वर्चस्व खत्म करने,आर्थिक विकास का लाभ देश के आम आदमी को पहुंचाने के मुद्दे पर चुनाव मैदान में उतरा थी। 1967 के चैथी लोक सभा चुनाव में कुछ और मुद्दे उठे। जनसंघ ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में दो मुद्दे उठाए थे- बाजार और अर्थव्यवस्था पर से सरकारी नियंत्रण खत्म करने तथा देश में संघीय शासन प्रणाली की जगह केंद्रित शासन व्यवस्था स्थापित करना।
        वरिष्ठ राजनीतिक चिंतक सुरेंद्र मोहन कहते थे कि आजादी के बाद कुछ सालों तक तो देश की राजनीति के केंद्र में जनता होती थी लेकिन बाद के वर्षों में राजनीति व्यक्ति की लाभ के लिए होने लगी ।वाजपेयी के एनडीए सरकार पर कटाक्ष करते हुए सुरेंद्र मोहन ने कहा था कि एनडीए की सरकार जबरन लोगों को फीलगुड के अपने नारे के सहारे गुडफील कराना चाह रही हैं।आज प्रमुख राजनीतिक मुद्दे गरीबी हटाने और बेकारी दूर करने की है न कि देश की आधी गरीब आवादी को फीलगुड के जरिए विद्रोही बनाने की।इस संबंध में पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर का नजरिया भी साफ था। चंद्रशेखर मानते थे कि ‘कथित विकास की डफली बजाने से लोगों की स्थिति नहीं बदल सकती।जिस तरह से राजनीतिक पार्टियां आम जनता से जुड़े मुद्दे को गायब कर रही हैउससे लोगों के मन में विद्रोह होना स्वाभाविक है।’
         मुद्दे और नारे भारतीय चुनावी राजनीति के अहम अंग रहे है।चुनाव आते ही मुदृदों की राजनीति शुरू हो जाती है।इन मुद्दों के जरिए राजनीतिक पार्टियां यह दिखाना चाहती है कि आम आदमी की समस्याओं से उन्हें कितना सरोकार है लेकिन सच्चाई ये है कि इनके जरिए राजनीतिक पार्टियां अपना उल्लू सीधा करती है। 1969 में कांग्रेस विभाजन के बाद कांग्रेस ने कुछ नए मुद्दे गढे।बैंकों के राष्ट्ीयकरण और देशी राजाओं के वंशजों के प्रीवी पर्स को समाप्त करके कांग्रेस ने सोसलिस्ट पार्टी के मुद्दों को धराशाही कर दिया था। श्रीकांत वर्मा द्वारा गढा गया गरीबी हटाओ नारा कांग्रेस का ऐसा नारा था कि जिसके चलते ग्रामीण भारत के मतदाताओं ने कांग्रेस से सीधा जुड़ा महसूस किया। नतीजा, इंदिरा गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने सरकार बना ली।कांग्रेस के एक नेता कहते हैं कि ‘गरीबी हटाने का मुद्दा कांग्रेस के लिए नया नहीं था। कांग्रेस में महात्मा गांधी स्वतंत्रता आंदोलन के समय ही देश से गरीबी दूर करने के लिए बचनबद्ध थी।’ लेकिन 1971 के चुनाव में इस नारे का चुनाव में पहली बार इस्तेमाल कांग्रस ने ही किया। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता भाजपा के वर्तमान चुनावी मुद्दे से विल्कुल इत्तेफाक नहीं रखते।वे भाजपा के किसी भी तरह के वोट फार इंडिया को स्वीकार नहीं करते। उनका मानना है कि  कि नेहरू इंदिरा के जमाने में जो चुनावी मुद्दे हुआ करते थे ,उसमें किसी तरह का छल कपट नहीं था। लेकिन वही कांग्रेस अब सत्ता में आने के लिए उस गौरबशाली इतिहास को अनदेखा कर रही है।’
         आपातकाल के बाद 1977 में हुए चुनाव से पहले देश में कांग्रेस की स्थिति बेहद मजबूत थी और जनता के सामने कांग्रेस का राष्ट्ीय स्तर पर कोई विकल्प भी नहीं था। 18 जनवरी 1977 को देश की पांचवी लोक सभा का कार्यकाल समाप्त हो गया था। 77 के चुनाव में कांग्रेस धर्मनिरपेक्षता,अल्पसंख्यकों की सुरक्षा,बरीबी दूर करना और मूल्य नियंत्रण जैसे मुद्दों को लेकर जनता के सामने आई।जनता पार्टी आपात काल को समाप्त करने ,मौलिक अधिकारों की बहाली,मीसा में बंद लोगों को न्याय दिलाना ,प्रेस की आजादी बहाल कराना और लोगों को न्याय जैसे मुद्दे लेकर चुनावी मैदान में उतरी। सीपीआई ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली को मजबूत करना ,महंगाई पर रोक, तालाबंदी पर रोक,जैसे मुद्दे उठाए। इस चुनाव में जनता पार्टी को 41 फीसदी वोट के साथ 297 सीटें मिली और कांग्रेस की हार हो गई। कांग्रेस को 34 फीसदी वोट के साथ 152 सीटें मिली। आपातकाल का खामियाजा काग्रेस को भुगतना पड़ा था। बाद में इंदिरागांधी ने इसे स्वीकार भी किया।
      1977 की जनता सरकार आपसी गुटबाजी और खींचतान की शिकार हो गई।1980 में मध्यावधि चुनाव हुए। इस चुनाव में कांग्रेस ने स्थायी सरकार का नारा दिया। यह मुद्दा इतना प्रभावी था कि जनता का एकमुश्त वोट कांग्रेस के खाते में चला गया। इस चुनाव में करीब 43 फीसदी वोट के साथ कांग्रेस को 353 सीटें मिली। जनता पार्टी को 432 में से महज 31 सीटें मिल सकी। सातवीं लोक सभा का काल इंदिरा गंाधी की हत्या के बाद अपनी निर्धारित अवधि से 21 दिन पहले समाप्त हो गया।1984 के इस चुनाव में कांग्रेस को तीन चैथाई बहुमत मिले और ऐसा बहुमत कांग्रेस को नेहरू काल में भी नहीं मिला था।इस चुनाव में राजीव गांधी ने देश को 21 वीं सदी में ले जाने का वादा किया था।चुनाव में न्यायिक स्वतंत्रता की रक्षा,केंद्र राज्य के संबंधों में सुधार, साफ और स्थिर सरकार,भ्रष्टाचार को हटाने,अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और 1 से 14 साल के बच्चों को मुफ्त शिक्षा देने की बात कही गई थी।भाजपा के मुद्दे थे- कम खर्चीला और सही न्याय,चुनाव प्रक्रिया में सुधार और पूर्ण रोजगार।1984 के चुनाव में सीपीएम के मुद्दें थे न्यायपालिका की स्वतंत्रता,रोजगार,भूमि सुधार और विदेशी ऋण । इस चुनाव में कांग्रेस ने 515 उम्मीदवार खउ़े किए थे  जिनमें 415 सीटों के साथ उसे 48 फीसदी मत प्राप्त हुए। 1984 का चुनाव कांग्रेस की सबसे बड़ी उपलब्धि थी। जनता को विश्वास था कि कांग्रेस ही स्थिर सरकार दे सकती है और कांग्रेक ही उनकी अपेक्षाओं को पूरा कर सकती है। इस चुनाव के बाद सुरेद्र मोहन ने कहा था कि ‘ जनता पार्टी सरकार के पतन के बाद जनता में नए सत्ता शासन के प्रति अविश्वास घर कर गया और मतदाता ने कांग्रेस को ही अपना उद्धारक समझा।लेकिन सच पूछा जाय तो यह कांग्रेस भी जनता की भावनाओं का दोहन ही कर रही थी।’
          1989 की लोक सभा चुनाव में कांग्रेस ने फिर  स्थिरता का नारा दिया। इसके साथ ही देश को 21 वीं सदी की ओर ले जाने, राजीव गंाधी को मिस्टर क्लिन बताने, धर्मपिरपेक्षता के मुद्दे उठाए।राष्ट्ीय मोर्चा जो 1988 में जनता पार्टी और लोकदल के बिलय से बनी थी, ने परिवर्तन के लिए वोट ,सुधार के लिए वोट का नारा दिया।भाजपा ने खुद को ‘ज्योति का दीप स्तंभ’के रूप में प्रचारित किया। सबके लिए न्याय, मूल्य आधारित राजनीति और सचरित्र नेता वाजपेयी और आडवाणी के नारे लगाए।जबकि इसी चुनाव में सीपीआई ने लोकतंात्रिक मूल्यों का ह्ास, सत्ता का विकेंद्रीकरण,महिलाओं की उपेक्षा और हरिजनों व आदिवासियों पर अत्याचारके नारे लगाए।सीपीएम के मुद्दे भूखमरी,गरीबी, रूपए का अपमूल्यन और राजस्व घाटे के थे। इसी चुनाव में कांग्रेस को 39 फीसदी वोट के साथ197 सीटें मिली जबकि भजपा को 11 फीसदी वोट के साथ 85 सीटें,जनता दल को 17 फीसदी वोट के साथ 143 सीटें सीपीएम को 7 फीसदी वोट के साथ 33 सीटें और सीपीआईको 2 फीसदी वोट के साथ 12 सीटें मिली। सामाजिक चिंतक आनंद कुमार कहते हैं कि 1989 का चुनाव कांग्रेस के लिए भारी था।उस समय तक भाजपा का राजनीति में पूर्णतः प्रवेश हो गया था।और चूकि यह एक अवसर वादी पार्टी है इसलिए यहीं से जोड़ तोड़ करना शुरू कर दिया। भाजपा उसी समय से सत्ता में आने की रणनीति बना ली थी और उसे जन सरोकारों से कोई मतलब नहीं था।
 1991 के चुनाव में कांग्रेस एक बार फिर स्थिर सरकार के नारे के साथ मैदान में आई। भाजपा ने राम, रोटी और इंसाफ का नारा दिया।जनता दल तथा वामपंथी दलों  ने मंडल कमीशन लागू करने के वादे तथा सजपा चार माह बनाम 40 साल के नारे के साथ चुनाव मैदान में उतरी।इस चुनाव में संभवतः कांग्रेस की स्थिति खराब होती लेकिन पहले चरण के चुनाव के बाद राजीव गांधी की निर्मम हत्या, दूसरे चरण के चुनाव में कांग्रेस को सहानुभूति वोट दिलाने में मददगार सावित हुई। इस तरह कांग्रेस को कुल 224 सीटें मिली जबकि भाजपा के हाथ 119 सीटें लगी।सीपीएम 35, जनता दल 55,सीपीआई 13,और सजपा 5 सीटें जीतने में सफल रही।नरसिंहा राव के नेतृत्व में पांच साल तक कांग्रेस ने सरकार चलायी लेकिन 1996 के चुनाव में कांग्रेस को भ्रष्टाचार के मुद्दे पर भारी पराजय का सामना करना पड़ा।  
         1996 में भाजपा की सरकार बनी लेकिन 13 दिनों के भीतर गिर गई।1998 में मध्यावती चुनाव हुए। यह चुनाव मुद्दावीहिन था। चुनाव के बाद फिर एनडीए की सरकार बनी लेकिन 13 माह के बाद ही यह सरकार गिर गई। फिर देवगौड़ा और इंद्रकुमार गुजराल की सरकार बनी जो आपसी खींचतान की भेंट चढ गई। 1999 में पुनः चुनाव हुए और भाजपा के नेतृत्व में एनडीए की सरकार बनी।
      2004 में 14 वीं लोकसभा के चुनाव में भाजपा फिलगुड इंडिया के नारे के साथ चुनाव मैदान में उतरी जबकि कांग्रेस फिर स्थिरता के साथ ही उदारीकरण की नीति को और आगे बढाने के साथ ही कांग्रेस का हाथ गरीबों के साथ वाले नारों के साथ चुनाव मैदान में उतरी। एनडीए शासन काल में हुए घोटालों के अलावा बड़े पैमाने पर सरकारी कंपनियों की विक्री को लेकर जनता में फैले आक्रोश की वजह से चुनाव में भाजपा की हार हुई लेकिन कांग्रेस को भी बहुमत नहीं मिला । बाद में एनडीए की तर्ज पर यूपीए की रचना की गई और मनमोहन सिंह की अगंवाई में सरकार बनी।  2009 के चुनाव में कांग्रेस फिर स्थिरता के नारों के साथ चुनाव मैदान में उतरी जबकि भाजपा कांग्रेस पर भ्रष्टाचार का मामला उछाला। लेकिन चुनाव में फिर भाजपा की हार हुई और वह 116 सीटों पर आकर सिमट गई। कांग्रेस को 206 सीटें मिली और फिर यूपीए 2 की सरकार बनी।अब 16 वीं लोक सभा के महा समर में भांति भांति की पार्टियां चुनाव मैदान में उमर घुमर रही है। सबके अपने एजेंडें है तो सबके अपने नारे और मुद्दे भी। क्या भाजपा, क्या कांग्रेस, क्या आप वाले और क्या सपा, बसपा,राजद, जदयू,माकपा, भाकपा और न जाने कौन कौन सी पार्टियां। अरबों का खेल इस प्रचारतंत्र पर जारी है और जहां अरबों का बिजनेश हो रहा हो वहां सत्कर्म की क्या जरूरत है? कुल मिलाकर जनता को गुमराह करने का खेल है। लेकिन देश हैए राजनीति है और पक्ष विपक्ष है तो जनता के बीच में जादू का खेल तो होगा ही। अब किसका जादू कितना प्रभावी है यह देखने की बात है। जिसका जादू चल गया उसकी राजनीति चल निकली।
       गौरतलब है कि 1952 से लेकर 2014 तक के चुनाव में पार्टियों की पहचान में जिस तरह परिवर्तन हुए हैं उसी अनुपात में उनके पंचारतंत्र में भी बदलाव आए है। समाजशास्त्री आनंद कुमार कहते हैं कि कांग्रेस हमेशा गरीबों के साथ होने का दंभ भले ही भरती हो लेकिन इसके इरादे ठीक नहीं है।लेकिन भाजपा के मुद्दे तो आम जनता के लिए है ही नहीं।जनता के लिए कांग्रेस मां है तो भाजपा उसकी मौसी है।अब तक के अनुभव के आधार पर तो यही कहा जा सकता है कि दोनों पार्टियां चुनाव में घोषित अपने मुद्दों से हटकर काम करती रही है।’ लेकिन कांग्रेस नेता ऐसा नहीं मानते। कांग्रेस नेता शकील अहमद कहते हैं कि ‘कांग्रेस की राजनीति जनता के विकास से जुड़ी होती है। आजतक देश में गरीबी से लेकर जितने तरह के मसले हों उस पर सबसे ज्यादा काम किसी पार्टी ने किया है तो वह कांग्रेस ही है। कांग्रेस चुनाव में भले ही हार जाए लेकिन जनता की समस्याओं की असली राजनीति वही करती है ओर करेगी भी।’
जाहिर है अब इन नारों का जनता की समस्या से कोई मतलब नहीं रह गया है। अरबिंद केजरीवाल के उस बयान पर नजर डाले तो साफ हो जाता है कि ‘उनके पास कोई जादू की छड़ी नहीं है। वे प्रयास करेगे।’ लेकिन चुनाव से पहले तो सब कुछ बदल देने की बात कही गई और उस बदलाव की बात को जनता के सिर आंखों ले लिया था।







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