Friday, November 7, 2014

इस राजनीति की ऐसी की तैसी

सत्ता के लिए फिर वही खेल।हां इसे खेल ही कहिए। किसी भी तरह अपनी जीत और और दुष्मनों की हार। लेकिन खेल के कुछ नियम होते हैं। आचार संहिताऐं होती है। उसके ब्याकरण होते है। लेकिन राजनीतिक खेल में ऐसा कुछ नहीं होता। पहले नेता लोग मूंह से झूठ बोलते थे और अब उस झूठ को और ग्लैमराइज करके बाजार उसे फांस रहा है।जनता हकबाए हुए है। जनता हतप्रभ है। कल तक जो नेता रूपी जन्तु दूसरे का झंडा उठाए फिर रहे थे आज किसी और में समर्पित हो रहे है। अपने पराए हो गए और पराए अपने। इस चरित्र को क्या कहा जाए? नेताओं का यही चरित्र प्रदेष के चरित्र को दिखा रहा है। क्या दलबदलुओं की भी कोई जाति होती है? जवानी में उछल कूद तो ठीक है लेकिन यहां तो बुढापे में भी लोग अगियाबैताल बने हुए है। जीवन भर आदिवासी, सौदान, गैर आदिवासी की राजनीति करते रहे और जनता को लूटते रहे इनकी भूख आज भी षांत नहीं हुई है। ऐसे दरिद्र नेताओं को वोट देने से क्या मिल सकता है?
               नेता एक झूठ बोलते हैं और बाजार तंत्र  उस एक झूठ को कई गुणा झूठ में बदल कर जन मानस को सनका रहा है।  2009 में भी ऐसा ही  खेल हुआ था। चुनाव के दौरान बहुत सारे वादे प्रदेषवासियों से किए गए थे। सपने दिखाए गए थे। वादे किए गए थे। चुनाव जीतने के लिए तमाम तरह के तिकड़म किए गए थे और साफ षब्दों में कहें तो वे सारे काम सारे नेताओं ने किए थे जो व्यवहारिक जीवन में नहीं किए जाते हैं हरिया, दारू, मुर्गा और बकरा का चढावा चढा था। अपनी जीत और विरोधी के हार के लिए। तब भी यही कहा गया था कि पूर्ण बहुमत की सरकार बने तो राज्य का भला हो जाएगा। सिर्फ झामुमों की सरकार बने तो आदिवासी समाज का कल्याण हो जाएगा। सिर्फ भाजपा की सरकार बने तो पूरे प्रदेष की हालत सुधर जाएगी। कांग्रेस और झाविमो और राजद से लेकर आजसू और जाने कौन कौन सी पार्टी ने सबसे पहले इसी स्लोगन के साथ जनता को भरमाने का काम किया था। चुनाव हुए और परिणाम आए तो वही हुआ जो होना था। जो चुनाव से पहले एक दूसरे को गरिया रहे थे, एक हुए। जो साथ साथ रहने की बात कर रहे थे, अलग हुए। सरकार बनी। सरकार गई। फिर बनी। वही चेहरे, वही लोग, वही खेल तमाषा और फिर वही जनता की रूदन। यही एक प्रदेष है जहां हर नेता अपनी बात में सबसे ज्यादा जिस ष्षब्द का प्रयोग करता है वह विकास षब्द है। सत्ता वाले भी विकास पर बहस करते है और विपक्ष वाले भी विकास को दोहराते थकते नहीं। लेकिन राज्य में विकास दिखाई कहीं पड़ता। आज से 14 साल पहले इस राज्य के जो हालत थे आज भी वहीं हैं। 14 साल में किसी भी षहर का विकास नहीं हुआ। 14 साल में किसी भी गांव में मूलभूत जरूरते नहीं पहुंची। 14 साल में षिक्षा की हालत नहीं बदली। 14 साल में यहां की राजनीति नहीं बदली। और 14 साल में जिन आदिवासियों की हिफाजत के लिए राज्य का निर्माण हुआ उसकी हालत नहीं बदली। रोजगार नहीं बढे, महिलाओं की हालत नहीं सुधरी। नक्सल समस्या पर काबू नहीं हो सका और इन्हीं 14 साल में नेताओं, ठेकेदारों, कारपोरेट घरानों से लेकर नौकरषाहों की जेंबे भरी। और खूब भरी। कह सकते हैं कि इन 14 सालों में सभी दलों ने सत्ता की कुर्सी सम्हाली और राज किया। फिर आजश्उन्हें षिकायत किससे हैं? राजनीतिक दलों और नेताओं के बारे में  कहना मुष्किल है।

              सभी राजनीतिक दल और खास कर भाजपा वाले कहते फिर रहे है कि इस बार प्रदेष की जनता उसे पूर्ण बहुमत की सरकार बना दे तो प्रदेष का काया पलट जाएगा। लेकिन इन दलों के नेताओं को भला कौन कहें कि जब एक ही घर  के  वोट जब कई दलों में बंट जाते है तो फिर प्रदेष की जनता आखिर किस बात पर एक ही दल को वोट देदे। क्या मोदी के नाम पर? अगर मोदी की राजनीति आज सामने नहीं होती तो भाजपा का क्या होता? कांग्रेस वाले तो चोरी और सीना जोरी में रसातल में जा रहे है। और झामुमों वाले थेथरई में। जनता को सब पता है। नेताओं को भी सब पता है कि उसने कुछ नहीं किया। फिर भी उन्हें जीत चाहिए। उन्हें कुर्सी चाहिए। मूर्ख नेता पढे लिखें जनता को महामूर्ख बनाते फिर रहे हैं। दलाल लोग जनता को समझा रहे हैं। कारपोरेट लोग पैसा बहा रहे हैं  ताकि आने वाले दिनों में उनकी लूट चलती रहे। होना तो यह चाहिए कि प्रदेष के लोग सभी पुराने नेताओं को हरा दे। नए लोगों पर दांव लगाए। संभव हो कि नए लोग जनता की रूदाली को षांत करे। सभी घाघ नेता हारे उनको सबक मिलेगी। अभी कांग्रेस की लगातार हार कांग्रेस को सबक सिखा रही है। और अंत में यही कहा जा सकता ैकि अगर राजनीति  जन विरोधी है तो जनता भी कम कम नहीं है। नेताओं के पीछे दौड़ते रहने और  उनके सामने दंडवत होना आखिर जनता की मजबूरी क्यों है? कही कही जनता भी इस खेल में षामिल है। लगभग हर घर में ठगी, चोरी और इेईमानी के पैसे जा रहे है लेकिन कोई अपने को चोर और गलत मानने को तैयार नहींहै। हर एक की नजर दूसरों की चोरी पर टिकी हैं इसी का फायदा नेता और राजनीति करने वाले लोग उठाते फिर रहे है। अपने को जटोले जनता और तब वोट की ताकत से नेताओं को नंगा करे।

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