Friday, December 26, 2014

गैर आदिवासी, गैरझारखंडी के हाथ में कमान

भाजपा का हुआ झारखंड

अखिलेष अखिल
झारखंड में भाजपा की राजनीति कैसे सफल हुई और मोदी की राजनीति कितनी कारगर सावित हुई इस पर हम चर्चा करेंगे लेकिन सबसे पहले प्रदेष में बनने वाले पहले गैरआदिवासी गैर झारखंडी मुख्यमंत्री के बारे में कुछ जानकारी। भाजपा के केंद्रिय नेतृत्व ने पहले  रघुबर दास के नाम पर सहमति जताई और इसके बाद अपने सिखाए पढाए दूतों के जरिए रांची  में रघुबर के नाम की घोषना करवा दी। रधुबर दास इस राज्य के पहले गैरआदिवासी मुख्यमंत्री होने जा रहे है। रधुबरदास के बारे में अखवारों में कई तरह की खबरें छप रही है। उनके व्यक्तित्व, उनके परिवार, उनकी षिक्षा दीक्षा, उनके खान पान और न जाने और क्या क्या। राजनीति के उफान पर जो भी आदमी आगे बढता है मीडिया उसके साथ हो लेती है। इसके कई वजहें हो सकती है। सो रघुबरदास भी अब मीडिया के केंद्र में हो गए है। लेकिन सवाल है कि आखिर रघुबर दास ही राज्य के  गैर आदिवासी चेहरा क्यों बने? क्या इसलिए कि वे गैर आदिवासी के साथ ही गैर झारखंडी भी है? वे छत्तीसगढ से आते है। उनके दादा यहां आकर बस गए थे  लेकिन उनकी जड़े आज भी छत्तीसगढ में है।  यानि रधुबर दास झारखड के पहले गैरआदिवासी और गैरझारखंडी मुख्यमंत्री बनने जा रहे है। इसके पीछे की एक राजनीति यह ह ैकि छत्तीसगढ में  प्रधानमंत्री मोदी और पार्टी अध्यक्ष अमित ष्षाह रमण सिंह को हटाने के मूड में है। वहां किसी आदिवासी या फिर किसी पिछड़ी जाति के हाथ में नेतृत्व देने की राजनीति हो सकती है। संभव है कि झारखंड में गैरआदिवासी नेतृत्व के सावल पर भाजपा यह कह सकती है कि देष और ब्यवस्था को चलाने के लिए अलग अलग तरह के लोगो की जरूरत होती है । भाजपा आदिवासी विरोधी नहीं है। झारखंड की लूटवाली राजनीति को षांत करने के लिए उसने गैरआदिवासी के हाथ में नेतृत्व दिया है। और छत्तीसगढ में आदिवासी नेतृत्व देने जा रही है। दरअसल झारखंड में इस बार गैर आदिवासियों ने सबसे ज्यादा भाजपा को न सिर्फ वोट दिया वल्कि सबसे ज्यादा गैर आदिवासी, सदान और दीकू ही चुनाव जीतकर सामने आए। झारखंड और आदिवासी की राजनीति करने वाली प्रदेष की तमाम राजनीतिक दलों को गैरआदिवासी देखना नहीं चाहते। इस बार के चुनाव में अब साफ साफ प्रदेष की पूरी राजनीति दो धु्रवों में बुट गई है। आने वाले दिनों में खुद भाजपा के भीतर रहने वाले आदिवासी नेता इस खेल को कितना पचा सकेंगे अभी कहना ठीक नहीं है।
स्बसे मौजू सवाल तो ये है कि आखिर में रधुबरदास ही मोदी की पसंद क्यों बने? नीचे की राजनीति चाहे जो भी हो उपर से तो साफ हो गया है कि गैर आदिवासी नेतृत्व के नाम पर मोदी और ष्षाह  ने अपने समाज के लोग पर ही यकीन किया। जातीय नामाकरण पर किसीको भी थोड़ी आपत्ति हो सकती है लेकिन सवाल है कि अगर रधुबरदास बनिया नहीं होते तो क्या उन्हें यह मौका मिलता? जब गैर आदिवासी को ही मुख्यमंत्री बनाना था तो इसमें कई चेहरे भी हो सकते थे। किसी पुराने चेहरे पर यकीन नहीं था तो कोई नया खट्टर ही सामने लाया जा सकता था। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। फिर दूसरा सवाल है कि रधुबरदास 10 सालों  तक सरकार में ष्षामिल भी रहे है। कई घपले घोटाले भी उनके नाम दर्ज है। फिर उनसे सुधार की उम्मीद कैसे की जा सकती है? खैर यह सब भाजपा की आंतरिक राजनीति हो सकती है।  आज जो अर्जुन मुंडा चुप्पी साधे सब देख रहे है अब वे अपने आदिवासी समाज को क्या कहेंगे? क्या अर्जुन मुंडा गैरआदिवासी को स्वीकार करेंगे? हार जीत राजनीति का हिस्सा है। लेकिन सिद्धांत को छोड़ा तो नहीं जा सकता? आगे की राजनीति पर गौर करने का समय आ गया है।
       झारखंड की जनता ने अपना फैसला सुना दिया। जात, धर्म, आदिवासी ,गैरआदिवासी और सादान की राजनीति में फंसा झारखंड को पहली दफा पूर्ण बहुमत वाली सरकार मिल गई।राजनीतिम हलकों में अब इस बात की चर्चा है कि भाजपा की इस जीत और कांग्रेस, राजद की भारी नुकसान के साथ ही बाबू लाल मरांडी की पार्टी झाविमों की हार के क्या कारण रहे है? क्या वाकई में इस चुनाव में मोदी का जादू चला?  और ऐसा है तो फिर भाजपा के कई दिग्गज फिर हारे क्यों? आजसू को 8 सीटें भाजपा ने दी थी। लेकिन आजसू के मुखिया सुदेष महतो खुद बूरी तरह से हार गए। सुदेष के साथ मोदी जी कई सभाओं में मंच ष्षेयर किए थे। फिर अर्जुन मुंडा क्यों हार गए? और सबसे बड़ा सवाल की भाजपा और और उसके सहयोगी दल आजसू के अधिकतर लोगों को हराने वाली पार्टी झामुमों कैसे हो गइ। इन तमाम सवालों को देखते हुए तो यही कहा जा सकता है  यहां मोदी का असर था भी और नहीं भी। लेकिन इस चुनाव के परिणाम देखने से साफ हो जाता है कि इस चुनाव में हार जीत के पीछे आदिवासी और गैरआदिवासी की राजनीति सबसे आगे रही और यही फैक््टर भाजपा को सरकार बनाने के पास ले गया।   इसी सवाल में  बड़े बड़े खिलाड़ी धराषायी हुए, पांच से ज्यादा पूर्व मुख्यमंत्री और उप मुख्यमंत्री बेआबरू होकर चुनाव हारे और राजद व जदयू जैसी पार्टी अपना खाता भी नहीं खेल सकी। भाजपा और उनके नेताओं ने झारखंडी समाज से पूर्ण  बहुमत की सरकार बनाने की अपील की थी, जनता ने मोदी और षाह की अपील को माना और विकास के मसले पर सरकार बनाने के लिए जीत दिलाई। अब प्रदेष की राजनीति में सरकार बनाने के लिए कोई अगर मगर की राजनीति नहीं रह गई है। भाजपा के लोग मुख्यमंत्री किसे बनाऐंगे इसको लेकर पार्टी के भीतर चिंतन जारी है । लेकिनएक बात और है कि   झारखंड में भाजपा को पिछली बार की तुलना में  भारी सफलता जरूर मिली है, और भातपा व आजसू को मिलाकर 42 सीटें आ गई है जो सरकार बनाने के लिए काफी है । लेकिन ऐसा लगता है कि आगे की राजनीति को देखते हुए उसे और गठबंधन का सहारा लेना होगा। यानी राज्य को गठबंधन-राजनीति से पूरी तरह मुक्ति नहीं मिलेगी। इसका मतलब यह भी है कि पार्टी ने सही समय पर वक्त की नब्ज को पढ़ा और आजसू से गठबंधन किया। झारखंड में भाजपा को उतनी सीटें नहीं मिलीं जितनी लोकसभा चुनाव के आधार पर मिलनी चाहिए थीं। लोकसभा चुनाव में पड़े वोटों का विश्लेषण करने से भाजपा की 56 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त थी। पर इतनी सीटों की उम्मीद किसी ने नहीं की थी। लोकसभा और विधानसभा चुनावों के मसले, मुद्दे और प्रत्याशी अलग तरह के होते हैं। अलबत्ता पार्टी स्पष्ट बहुमत की उम्मीद कर रही थी, जो नहीं मिला। भाजपा को 37 सीटें मिली और आजसू को 5 सीटें।
देश में सन 2000 में जो तीन नए राज्य बने उनमें झारखंड सबसे अस्थिर राज्य साबित हुआ। प्रदेश में पिछले 14 साल में नौ सरकारें बनीं और तीन बार राष्ट्रपति शासन लगा. मतदाता को यह अस्थिरता पसंद नहीं आई। इस बार राज्य ने स्थिरता का वरण किया है, जिसमें मोदी की हवा का हाथ रहा। हेमंत सोरेन के खिलाफ एंटी इनकम्बैंसी का खतरा था, पर ऐसा नहीं हुआ। उनकी सीटें पिछली बार के मुकाबले कुछ बढ़ी हैं।यानी पार्टी का जनाधार सुरक्षित है। नुकसान कांग्रेस और दूसरी पार्टियों को हुआ. खासतौर से बिहार में जनता दल-यू, कांग्रेस और राष्ट्रीय जनता दल के गठबंधन ने जो उम्मीद जगाई थी, वह झारखंड में सफल नहीं हो पाया।
दूसरी ओर यह भी महत्वपूर्ण है कि राज्य में अब अपेक्षाकृत स्थिर सरकार बनेगी। संभव है कि भाजपा नेतृत्व को लेकर कोई नया  प्रयोग करे। संभव है कि इस बार किसी गैर-आदिवासी को राज्य का नेतृत्व करने का मौका मिले। झारखंड विधानसभा चुनाव 2014 में कई पूर्व मुख्यमंत्रियों को पराजय का मुंह देखना पड़ा है। गौरतलब यह कि ये पूर्व मुख्यमंत्री अलग-अलग राजनीतिक दलों से सरोकार रखते हैं और इनकी राजनीतिक शैली भी अलग है। भाजपा के कद्दावर नेता व राज्य के तीन बार मुख्यमंत्री रहे अर्जुन मुंडा अपने परंपरागत खरसावां निर्वाचन क्षेत्र से बड़े अंतर से लगभग 22 हजार वोटों से हार गये हैं। वहीं, राज्य के पहले मुख्यमंत्री व झारखंड विकास मोर्चा के प्रमुख बाबूलाल मरांडी  दोनों सीटों से हार गए। वहीं, पूर्व मुख्यमंत्री व जय भारत पार्टी के अगुवा मधु कोड़ा मंझगांव सीट से चुनाव हार गए।  हेमंत सोरेन भी इस बार दुमका सीट बचा नहीं सके। वे इसी सीट से जीतकर मुख्यमंत्री बने थे।
तो क्या, इस बार का चुनाव परिणाम राजनेताओं के लिए ठोस संदेश लेकर आया है या फिर यह सब नरेंद्र मोदी लहर का असर है। झारखंड के चुनाव परिणाम को सिर्फ मोदी लहर तो कतई नहीं माना जा सकता है। अगर ऐसा होता तो भाजपा के दिग्गज नेता माने जाने वाले अर्जुन मुंडा को चुनाव में हार का मुंह नहीं देखना पड़ता। इस बार के चुनाव परिणाम में अपराजेय माने जाने वाले दूसरे नेताओं मसलन कांग्रेस के कद्दावर नेता राजेंद्र सिंह को बेरमो सीट से हारना पड़ा है। ़ वहीं, कई नये लोग चुनाव जीतने में कामयाब हुए हैं। जैसे सुदेश महतो का गढ़ सिल्ली में झाविमो के अमित महतो 29 हजार वोटों से जीत गये। गूंज महोत्सव का आयोजन कर सिल्ली में हाइप्रोफाइल राजनीति करने वाले सुदेश महतो की गूंज पर फिलहाल ब्रेक लग गया है।
यह हाल तब है, जब उन्होंने नरेंद्र मोदी की छवि से प्रभावित होकर भाजपा से गंठजोड़ किया और मात्र आठ सीटों पर चुनाव लड़ने की शर्त को कबूल कर लिया और सार्वजनिक रूप से यह घोषणा भी की कि वे मोदी के साथ हैं।  पर मोदी मंत्र की जाप भी उनके काम नहीं आया। उन्हें चुनाव परिणाम के बाद अपनी राजनीति की समीक्षा करनी होगी। खुद के लिए निरपेक्ष भाव से यह आकलन करना होगा कि उनकी राजनीति कितनी जनसरोकारी है और वे लोगों के दिल में उतरने में कितना कामयाब रहे हैं?
 इस बार के चुनाव परिणाम में एक राष्ट्रीय पार्टी भाजपा व एक क्षेत्रीय दल झामुमो को छोड़ कर ज्यादातर राजनीतिक दलों की जमीन सिकुड़ी है।  झामुमों  ने पूरी ताकत से भाजपा का मुकाबला भी किया और अपने कुनबे को भी बचाने में सफल रहा। इस चुनाव ने हेमंत सारेन को झारखंड के एक  मजबूत  नेता के रूप में भी क्षड़ा किया है। यह चुनाव परिणाम उन सभी दलों व उसके नेताओं के लिए एक सबक है, जिसमें वे भविष्य की झारखंड की राजनीति को अधिक सकारात्मक, जन सरोकारी और विकासवादी बनायें. दिलचस्प बात यह कि लगभग यही संदेश जम्मू कश्मीर चुनाव परिणाम का भी है।
भाजपा का हुआ झारखंड
Ûैर आदिवासी, Ûैरझारखंडी  के हाथ में कमान
अखिले’ा अखिल
झारखंड में भाजपा की राजनीति कैसे सफल हुई और मोदी की राजनीति कितनी कारÛर सावित हुई इस पर हम चर्चा करेंÛे लेकिन सबसे पहले प्रदे’ा में बनने वाले पहले Ûैरआदिवासी Ûैर झारखंडी मुख्यमं=ी के बारे में कुछ जानकारी। भाजपा के केंद्रिय नेतृत्व ने पहले  र?ाुबर दास के नाम पर सहमति जताई और इसके बाद अपने सिखा, पढा, दूतों के जरि, रांची  में र?ाुबर के नाम की ?ाो’ाना करवा दी। रधुबर दास इस राज्य के पहले Ûैरआदिवासी मुख्यमं=ी होने जा रहे है। रधुबरदास के बारे में अखवारों में कई तरह की खबरें छप रही है। उनके व्यक्तित्व, उनके परिवार, उनकी ’िा{ाा दी{ाा, उनके खान पान और न जाने और क्या क्या। राजनीति के उफान पर जो भी आदमी आÛे बढता है मीडिया उसके साथ हो लेती है। इसके कई वजहें हो सकती है। सो र?ाुबरदास भी अब मीडिया के केंद्र में हो Û, है। लेकिन सवाल है कि आखिर र?ाुबर दास ही राज्य के  Ûैर आदिवासी चेहरा क्यों बने? क्या इसलि, कि वे Ûैर आदिवासी के साथ ही Ûैर झारखंडी भी है? वे छत्तीसÛढ से आते है। उनके दादा यहां आकर बस Û, थे  लेकिन उनकी जड़े आज भी छत्तीसÛढ में है।  यानि रधुबर दास झारखड के पहले Ûैरआदिवासी और Ûैरझारखंडी मुख्यमं=ी बनने जा रहे है। इसके पीछे की ,क राजनीति यह ह ैकि छत्तीसÛढ में  प्रधानमं=ी मोदी और पार्टी अध्य{ा अमित ‘’ााह रम.ा सिंह को हटाने के मूड में है। वहां किसी आदिवासी या फिर किसी पिछड़ी जाति के हाथ में नेतृत्व देने की राजनीति हो सकती है। संभव है कि झारखंड में Ûैरआदिवासी नेतृत्व के सावल पर भाजपा यह कह सकती है कि दे’ा और ब्यवस्था को चलाने के लि, अलÛ अलÛ तरह के लोÛो की जरूरत होती है । भाजपा आदिवासी विरोधी नहीं है। झारखंड की लूटवाली राजनीति को ’ाांत करने के लि, उसने Ûैरआदिवासी के हाथ में नेतृत्व दिया है। और छत्तीसÛढ में आदिवासी नेतृत्व देने जा रही है। दरअसल झारखंड में इस बार Ûैर आदिवासियों ने सबसे ज्यादा भाजपा को न सिर्फ वोट दिया वल्कि सबसे ज्यादा Ûैर आदिवासी, सदान और दीकू ही चुनाव जीतकर सामने आ,। झारखंड और आदिवासी की राजनीति करने वाली प्रदे’ा की तमाम राजनीतिक दलों को Ûैरआदिवासी देखना नहीं चाहते। इस बार के चुनाव में अब साफ साफ प्रदे’ा की पूरी राजनीति दो धु्रवों में बुट Ûई है। आने वाले दिनों में खुद भाजपा के भीतर रहने वाले आदिवासी नेता इस खेल को कितना पचा सकेंÛे अभी कहना ठीक नहीं है।
स्बसे मौजू सवाल तो ये है कि आखिर में रधुबरदास ही मोदी की पसंद क्यों बने? नीचे की राजनीति चाहे जो भी हो उपर से तो साफ हो Ûया है कि Ûैर आदिवासी नेतृत्व के नाम पर मोदी और ‘’ााह  ने अपने समाज के लोÛ पर ही यकीन किया। जातीय नामाकर.ा पर किसीको भी थोड़ी आपत्ति हो सकती है लेकिन सवाल है कि अÛर रधुबरदास बनिया नहीं होते तो क्या उन्हें यह मौका मिलता? जब Ûैर आदिवासी को ही मुख्यमं=ी बनाना था तो इसमें कई चेहरे भी हो सकते थे। किसी पुराने चेहरे पर यकीन नहीं था तो कोई नया खट्टर ही सामने लाया जा सकता था। लेकिन ,ेसा नहीं हुआ। फिर दूसरा सवाल है कि रधुबरदास 10 सालों  तक सरकार में ‘’ाामिल भी रहे है। कई ?ापले ?ाोटाले भी उनके नाम दर्ज है। फिर उनसे सुधार की उम्मीद कैसे की जा सकती है? खैर यह सब भाजपा की आंतरिक राजनीति हो सकती है।  आज जो अर्जुन मुंडा चुप्पी साधे सब देख रहे है अब वे अपने आदिवासी समाज को क्या कहेंÛे? क्या अर्जुन मुंडा Ûैरआदिवासी को स्वीकार करेंÛे? हार जीत राजनीति का हिस्सा है। लेकिन सि)ांत को छोड़ा तो नहीं जा सकता? आÛे की राजनीति पर Ûौर करने का समय आ Ûया है।
       झारखंड की जनता ने अपना फैसला सुना दिया। जात, धर्म, आदिवासी ,Ûैरआदिवासी और सादान की राजनीति में फंसा झारखंड को पहली दफा र्पू.ा बहुमत वाली सरकार मिल Ûई।राजनीतिम हलकों में अब इस बात की चर्चा है कि भाजपा की इस जीत और कांÛ्रेस, राजद की भारी नुकसान के साथ ही बाबू लाल मरांडी की पार्टी झाविमों की हार के क्या कार.ा रहे है? क्या वाकई में इस चुनाव में मोदी का जादू चला?  और ,ेसा है तो फिर भाजपा के कई दिग्Ûज फिर हारे क्यों? आजसू को 8 सीटें भाजपा ने दी थी। लेकिन आजसू के मुखिया सुदे’ा महतो खुद बूरी तरह से हार Û,। सुदे’ा के साथ मोदी जी कई सभाओं में मंच ‘’ोयर कि, थे। फिर अर्जुन मुंडा क्यों हार Û,? और सबसे बड़ा सवाल की भाजपा और और उसके सहयोÛी दल आजसू के अधिकतर लोÛों को हराने वाली पार्टी झामुमों कैसे हो Ûइ। इन तमाम सवालों को देखते हु, तो यही कहा जा सकता है  यहां मोदी का असर था भी और नहीं भी। लेकिन इस चुनाव के परि.ााम देखने से साफ हो जाता है कि इस चुनाव में हार जीत के पीछे आदिवासी और Ûैरआदिवासी की राजनीति सबसे आÛे रही और यही फैक््टर भाजपा को सरकार बनाने के पास ले Ûया।   इसी सवाल में  बड़े बड़े खिलाड़ी धरा’ाायी हु,, पांच से ज्यादा पूर्व मुख्यमं=ी और उप मुख्यमं=ी बेआबरू होकर चुनाव हारे और राजद व जदयू जैसी पार्टी अपना खाता भी नहीं खेल सकी। भाजपा और उनके नेताओं ने झारखंडी समाज से र्पू.ा  बहुमत की सरकार बनाने की अपील की थी, जनता ने मोदी और ’ााह की अपील को माना और विकास के मसले पर सरकार बनाने के लि, जीत दिलाई। अब प्रदे’ा की राजनीति में सरकार बनाने के लि, कोई अÛर मÛर की राजनीति नहीं रह Ûई है। भाजपा के लोÛ मुख्यमं=ी किसे बना,ेंÛे इसको लेकर पार्टी के भीतर चिंतन जारी है । लेकिन,क बात और है कि   झारखंड में भाजपा को पिछली बार की तुलना में  भारी सफलता जरूर मिली है, और भातपा व आजसू को मिलाकर 42 सीटें आ Ûई है जो सरकार बनाने के लि, काफी है । लेकिन ,ेसा लÛता है कि आÛे की राजनीति को देखते हु, उसे और Ûठबंधन का सहारा लेना होÛा। यानी राज्य को Ûठबंधन-राजनीति से पूरी तरह मुक्ति नहीं मिलेÛी। इसका मतलब यह भी है कि पार्टी ने सही समय पर वक्त की नब्ज को पढ़ा और आजसू से Ûठबंधन किया। झारखंड में भाजपा को उतनी सीटें नहीं मिलीं जितनी लोकसभा चुनाव के आधार पर मिलनी चाहि, थीं। लोकसभा चुनाव में पड़े वोटों का विश्लेष.ा करने से भाजपा की 56 विधानसभा {ो=ों में बढ़त थी। पर इतनी सीटों की उम्मीद किसी ने नहीं की थी। लोकसभा और विधानसभा चुनावों के मसले, मुद्दे और प्रत्याशी अलÛ तरह के होते हैं। अलबत्ता पार्टी स्पष्ट बहुमत की उम्मीद कर रही थी, जो नहीं मिला। भाजपा को 37 सीटें मिली और आजसू को 5 सीटें।
देश में सन 2000 में जो तीन न, राज्य बने उनमें झारखंड सबसे अस्थिर राज्य साबित हुआ। प्रदेश में पिछले 14 साल में नौ सरकारें बनीं और तीन बार राष्ट्रपति शासन लÛा- मतदाता को यह अस्थिरता पसंद नहीं आई। इस बार राज्य ने स्थिरता का वर.ा किया है, जिसमें मोदी की हवा का हाथ रहा। हेमंत सोरेन के खिलाफ ,ंटी इनकम्बैंसी का खतरा था, पर ,ेसा नहीं हुआ। उनकी सीटें पिछली बार के मुकाबले कुछ बढ़ी हैं।यानी पार्टी का जनाधार सुर{िात है। नुकसान कांÛ्रेस और दूसरी पार्टियों को हुआ- खासतौर से बिहार में जनता दल-यू, कांÛ्रेस और राष्ट्रीय जनता दल के Ûठबंधन ने जो उम्मीद जÛाई थी, वह झारखंड में सफल नहीं हो पाया।
दूसरी ओर यह भी महत्वर्पू.ा है कि राज्य में अब अपे{ााकृत स्थिर सरकार बनेÛी। संभव है कि भाजपा नेतृत्व को लेकर कोई नया  प्रयोÛ करे। संभव है कि इस बार किसी Ûैर-आदिवासी को राज्य का नेतृत्व करने का मौका मिले। झारखंड विधानसभा चुनाव 2014 में कई पूर्व मुख्यमं=ियों को पराजय का मुंह देखना पड़ा है। Ûौरतलब यह कि ये पूर्व मुख्यमं=ी अलÛ-अलÛ राजनीतिक दलों से सरोकार रखते हैं और इनकी राजनीतिक शैली भी अलÛ है। भाजपा के कद्दावर नेता व राज्य के तीन बार मुख्यमं=ी रहे अर्जुन मुंडा अपने परंपराÛत खरसावां निर्वाचन {ो= से बड़े अंतर से लÛभÛ 22 हजार वोटों से हार Ûये हैं। वहीं, राज्य के पहले मुख्यमं=ी व झारखंड विकास मोर्चा के प्रमुख बाबूलाल मरांडी  दोनों सीटों से हार Û,। वहीं, पूर्व मुख्यमं=ी व जय भारत पार्टी के अÛुवा मधु कोड़ा मंझÛांव सीट से चुनाव हार Û,।  हेमंत सोरेन भी इस बार दुमका सीट बचा नहीं सके। वे इसी सीट से जीतकर मुख्यमं=ी बने थे।
तो क्या, इस बार का चुनाव परि.ााम राजनेताओं के लि, ठोस संदेश लेकर आया है या फिर यह सब नरेंद्र मोदी लहर का असर है। झारखंड के चुनाव परि.ााम को सिर्फ मोदी लहर तो कतई नहीं माना जा सकता है। अÛर ,ेसा होता तो भाजपा के दिग्Ûज नेता माने जाने वाले अर्जुन मुंडा को चुनाव में हार का मुंह नहीं देखना पड़ता। इस बार के चुनाव परि.ााम में अपराजेय माने जाने वाले दूसरे नेताओं मसलन कांÛ्रेस के कद्दावर नेता राजेंद्र सिंह को बेरमो सीट से हारना पड़ा है। ़ वहीं, कई नये लोÛ चुनाव जीतने में कामयाब हु, हैं। जैसे सुदेश महतो का Ûढ़ सिल्ली में झाविमो के अमित महतो 29 हजार वोटों से जीत Ûये। Ûूंज महोत्सव का आयोजन कर सिल्ली में हाइप्रोफाइल राजनीति करने वाले सुदेश महतो की Ûूंज पर फिलहाल ब्रेक लÛ Ûया है।
यह हाल तब है, जब उन्होंने नरेंद्र मोदी की छवि से प्रभावित होकर भाजपा से Ûंठजोड़ किया और मा= आठ सीटों पर चुनाव लड़ने की शर्त को कबूल कर लिया और सार्वजनिक रूप से यह ?ाोष.ाा भी की कि वे मोदी के साथ हैं।  पर मोदी मं= की जाप भी उनके काम नहीं आया। उन्हें चुनाव परि.ााम के बाद अपनी राजनीति की समी{ाा करनी होÛी। खुद के लि, निरपे{ा भाव से यह आकलन करना होÛा कि उनकी राजनीति कितनी जनसरोकारी है और वे लोÛों के दिल में उतरने में कितना कामयाब रहे हैं?
 इस बार के चुनाव परि.ााम में ,क राष्ट्रीय पार्टी भाजपा व ,क {ो=ीय दल झामुमो को छोड़ कर ज्यादातर राजनीतिक दलों की जमीन सिकुड़ी है।  झामुमों  ने पूरी ताकत से भाजपा का मुकाबला भी किया और अपने कुनबे को भी बचाने में सफल रहा। इस चुनाव ने हेमंत सारेन को झारखंड के ,क  मजबूत  नेता के रूप में भी {ाड़ा किया है। यह चुनाव परि.ााम उन सभी दलों व उसके नेताओं के लि, ,क सबक है, जिसमें वे भविष्य की झारखंड की राजनीति को अधिक सकारात्मक, जन सरोकारी और विकासवादी बनायें- दिलचस्प बात यह कि लÛभÛ यही संदेश जम्मू कश्मीर चुनाव परि.ााम का भी है।

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