Thursday, December 11, 2014

 झारखंड में अष्वमेध  घोड़े को लग सकता है लगाम
 अखिलेष अखिल   आपके
झारखंड में चल रहे चुनाव बड़े ही रोचक मुकाम पर हैं। एक तरफ मोदी जी की  आयातित - निर्यातित सेनाएं  अलग अलग रंग रूप, बोल वचन के साथ सज धज कर झारखंड की राजनीति को अपने कब्जे में करने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ रही है तो दूसरी तरफ झारखंडी अस्मिता की राजनीति से लवरेज दिषोम गुरू षिबू सोरेन और उनके मुख्यमंत्री पुत्र हेमंत सोरेन झामुमों की बागडोर संभाले झारखंड की भूगोल पर तीर धनुष लिए विचरण करते फिर रहे हैं। कह सकते हैं एक तरफ कौरब सेना है तो दूसरी तरफ पांडव। कोई किसी से कम नहीं। इस चुनाव से पहले झारखंड की धरती पर इस तरह के मारक चुनाव देखने का अवसर  यहां की जनता को नहीं मिला था।  प्रदेष की जनता हतप्रभ है। आदिवासी समाज समाज मौन है तो गैर आदिवासी बेचैन। गैर आदिवासियों की बेचैनी इस बात को लेकर है कि आखिर में झामुमो जैसी आदिवासी पार्टी मोदी की राजनीति को कैसे चुनौति दे सकती है? यह उनकी सोंच थी। लेकिन अब तो चुनौति दिख रही है। मोदी और उनके लोग गुरूजी और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की राजनीति को लूटने वाली राजनीति बताकर जनता के बीच पूर्ण बहुमत वाली भाजपा की सरकार बनाने की अपील  करती फिर रही है। उधर झामुमों के लोग भाजपा के 10 सालों की सत्ता की राजनीति को पोल जनता के सामने खोल रही है। वार पर वार। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन अपने भाषन में एक लाईन और जोड़ रहे हैं। 10 साल की भाजपा  सरकार पर   14 महीना भारी। इसकी कोई काट भाजपा अभी तक नहीं ढूढ पायी है। और विज्ञापन की राजनीति की तो बात ही मत पूछिए। नहले पर दहला। टीवी, रेडियों, एफएम से लेकर अखवारों से लेकर पोस्टर और विषालकाय होर्डिंग को देखकर लोगों की  आंखें चैधिया जा रही है। लगता है मोदी जी को पहली दफा झारखंड में किसी क्षेत्रिय पार्टी से पाला पर गया हो। कहते है ंकि आदिवासी लोग जब अपनी ताव में आते हैं तो किसी को छोड़ते नहीं। जल जंगाल और जमीन की राजनीति से लैष झामुमो इस बार के चुनाव में अभी नहीं तो कभी नहीं की राजनीति करती फिर रही है।
          कह सकते हैं कि इस चुनाव में मोदी जी की प्रतिष्ठा दांव पर लग गई है। इस चुनाव में  प्रदेष भाजपा का कोई चेहराप सामने नहीं है। ष्षाह और मोदी हर जगह बिराजमान है। जीत होगी तो ष्षाह और मोदी की और हार भी होगी तो इन्हीं दोनों की।  राज्य बने 14 साल हो गए। इन 14 सालों में भाजपा के नेतृत्व में 10 साल तक सरकार चली है। मोदी जब राज्य में भ्रष्टाचार की बातें करते है तो इसकी जद में सबसे पहले उनकी पार्टी के लोग ही आ जा रहे है। जनता भी इसे समझ रही है। जनता यह भी कह रही है कि अगर मोदी नहीं होते तब इस प्रदेष भाजपा और उनके नेताओं का क्या होता? जनता की इस आवाज को मोदी भी जानते है। मोदी के लच्छेदार भाषन से जनता उब जा रही है। स्थानीय जनता मोदी के भाषन में जुम रहे है लेकिन एक बात जरूर कह रहे हैं कि लोक सभा चुनाव में भी अच्दे दिन की बात कर गए थे मोदी लेकिन अभी तक नहीं आया। कालाधन के मामले पर मोदी जी यू टर्न मार गए। अदानी को आस्ट्लिया में खान खरीदने के लिए 6500 करोड़ रूपए दे दिए। हमें तो यहां क्ी कोई सरकार 500 के लोन भी नहीं देती। अभी तक तो अच्छे दिन अमित ष्षाह, माया कोडनानी और अदानी जैसे लोगों के ही आए है। जनता यह भी पूछ रही है कि लोक सभा चुनाव से पहले पाकिस्तान का भूत ष्षांत करने की बात मोदी जी कर रहे थे। लेकिन अब तो पाकिस्तान पहले से ज्यादा खेल कर रहा है। नक्सलवाद अपने चरम पर है। महंगाई वहीं की वहीं है। और सबसे बड़ी बात की जिन राज्यों में आदिवासी वास करते हैं वहां की हालत पहले जैसी ही है। फिर किस बात की राजनीति मोदी कर रहे है?
           ज्नता के मन में मोदी को लेकर कई और तरह के सवाल उठ रहे है। एक सवाल तो यही है कि अगर मोदी के नाम पर भाजपा को वोट दिए भी जाएं तो क्या मोदी यहां के मुख्यमंत्री बनेंगे? जनता के मन में प्रतिसवाल यह है कि भाजपा मोदी के नाम पर जीत भी जाती है तो सत्ता की राजनीति तो वही लोग करेंगे जिन्होने 10 साल तक राज्य को लूटा है। कई और सवाल है। लेकिन मोदी की राजनीति अभ्ज्ञी चल रही है। और इस चलने के पीछे की राजनीति हिंदुत्व को लेकर है। आज देष भर में मोदी के साथ जो भी लोग अपने को जोड़ने की बात कह रहे हो उसके पीछे की असली राजनीति धर्म की राजनीति है। और झारखंड में भी अन्य राज्यों की तरह यह राजनीति खूब फली है। समाज दो वर्गोंं में बंटा जा रहा है। राजनीति के इसी खेल मे कांग्रेस , जेबीएम, राजद और अन्य पार्टियों की राजनीति भी अभी जिंदा है। यहां हरियाणा और महाराष्ट् की राजनीति संभव नहीं हो सकती। षहीदों की यह झारखंड भूमि संघ को भी आश्रय दिए हुए है और चरम वामपंथ को भी। मिषनरी और मुसलमानों  की राजनीति भी यहां है और दलित पिछड़ों की राजनीति के साथ ही आदिवासियों के बीच की अलग राजनीति भी कुलाचे मार रही है। यही राजनीति तजमाम लोकतांत्रिक राजनीतिक दलों को जगह देती है। केंद्र से सत्ताविहीन कांग्रेस की राजनीति को समाप्त करने का दावा करने वाली भाजपा की झारखंड की राजनीति यहां उसे अमृत देती लग रही है। यहां कांग्रेस अभी मरी नहीं है। जेवीएम आज भ्ज्ञी जीवित है। और वाम राजनीति कम ही सही उसकी पकड़ को भला कौन कमजोर कर सकता है?
        तो परिणाम क्या है? सत्ता के राजनीतिक परिणाम तो 23 दिसंबर को आऐंगे। उसी तारीख को मोदी लहर पर असली चर्चा होगी। उसी तारीख को प्रदेष और देष की राजनीति और मोदी-षाह के खेल पर समाचार छपेंगे। लेकिन  पिछले तीन चरण के  चुनाव को देखते हुए साफ हो गया है कि त्रिषंकु विधान सभा के अलावा कोई चारा नहीं है। मोदी का पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनाने के सपने यहां टूट सकते है। जिस तरह राम मंदिर आंददोलन के समय बिहार में आडवाणी के रथ को तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू यादव ने रोक दिया था ठीक उसी तरह ऐसा लगता है कि मोदी के जीत वाली अष्वमेध घोड़े को यहां झामुमों रोक दे तो कोई अतिषियोक्ति नहीं होगी। झारखंड  के लोग बदलाव चाहते हैं लेकिन फरेबी राजनीति और फरेब नेता से आजीज यहां की जनता अब किसी कारपोरेट लूट की जगह अपने दरबों में चुप चाप रहना ज्यादा पसंद करेगी।

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