Sunday, June 12, 2016

भारत रिश्तों के नए दौर की ओर



भारत रिश्तों के नए दौर की ओर

अखिलेश अखिल

प्रधानमंत्री मोदी  की राजनीति अभी देश  के अनुकुल है।  अंतरराष्टीय स्तर पर मोदी सरकार की नीति और कूटनीति साफ तौर पर देष को गति प्रदान करने वाली है। जिस कांग्रेस सरकार की कुछ नीतियों का लाभ  आज मिलता दिख रहा है उसी तरह मोदी की इन नीतियों का लाभ कुछ समय बाद मिलता दिखेगा। अपने पांच देशों के दौरे में अमेरिका पहुंच गए हैं, जहां उन्हें अमेरिकी कांग्रेस को संबोधित करने का मौका मिलेगा। 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद यह उनकी तीसरी अमेरिका यात्रा है। अमेरिकी कांग्रेस के जरिए वह एक राजनेता के रूप में अपनी विश्वसनीयता पुनः सुदृढ़ करेंगे, ताकि ना सिर्फ भारत के आर्थिक सुधार कार्यक्रम को आगे बढ़ाया जा सके, बल्कि भारत-अमेरिका संबंधों को नई ऊंचाई दी जा सके। आज अमेरिका में कतिपय राजनीतिक मतभेदों के बावजूद हर तरफ भारत के साथ मजबूत संबंधों के पक्ष में माहौल है। अमेरिकी प्रशासन ने 2014 के आम चुनावों के बाद हालात को भांपते हुए नरेंद्र मोदी से संपर्क स्थापित करने में तनिक भी देरी नहीं की। अब जब अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा का कार्यकाल खत्म होने वाला है, तब अमेरिकी कांग्रेस भारत के समर्थन में खुलकर बोल रही है। अमेरिका में प्रभाव रखने वाले दोनों दलों के नेता हर मुद्दे पर भारत का समर्थन कर रहे हैं।
एक तरफ अमेरिकी कांग्रेस पाकिस्तान को दी जाने वाली सैनिक सहायता का विरोध कर रही है, वहीं दूसरी ओर गत हफ्ते अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने भारत के साथ रक्षा संबंधों को मजबूत करने के लिए एक विधेयक को मंजूरी दे दी। उसका मकसद भारत को नाटो के दूसरे सहयोगियों के समतुल्य खड़ा करना है, ताकि रक्षा उपकरणों की बिक्री और तकनीकी हस्तांतरण में कोई अड़चन पैदा ना हो। इसमें अमेरिकी सरकार से भारत की रक्षा क्षमताओं को मजबूत करने और हथियारों के साझा विकास के अवसरों को बढ़ाने को कहा गया है। इसके साथ नई दिल्ली से उम्मीद की गई है कि वह साझा हितों की पूर्ति के लिए अमेरिका के साथ मिलकर संयुक्त सैन्य योजनाओं पर आगे बढ़ेगी। ऐसा ही एक विधेयक सीनेट में भी लाया गया है।
मोदी सरकार के शासनकाल में भारत-अमेरिका रक्षा संबंधों को गति मिली है। 2015 में दोनों देशों के बीच 14 अरब डॉलर का रक्षा कारोबार हुआ। दोनों देश महत्वपूर्ण सामरिक योजनाओं पर साझा कदम बढ़ा रहे हैं। संयुक्त सैन्य अभ्यास अब दोनों सेनाओं की दिनचर्या का हिस्सा बन गया है। लंबी खटपट के बाद गत महीने भारत ने सैद्धांतिक रूप से भारत में अमेरिका को सैन्य बेस खोलने की सहमति दे दी। अपने-अपने साजोसामान को एक-दूसरे से साझा करने और आदान-प्रदान करने से जुड़ा यह समझौता दोनों देशों की नौसेनाओं को मजबूती प्रदान करेगा। कठिन परिस्थितियों में दोनों देश एक-दूसरे की मदद से ईंधन आदि जरूरतों की पूर्ति कर सकेंगे।
यह सच है कि चीन की शत्रुतापूर्ण नीति ने भारत को अमेरिका की ओर झुकने को मजबूर किया है। मोदी सरकार ने अपने आरंभिक काल में ही चीन की ओर कदम बढ़ाया था, लेकिन द्विपक्षीय संबंधों पर उसका कोई खास सकारात्मक असर नहीं हुआ है। उल्टे चीन का भारत विरोधी रवैया नई ऊंचाई पर पहुंच गया है। पिछले महीने उसने जैश--मोहम्मद के आतंकी सरगना और जनवरी में पठानकोट में हुए आतंकी हमले के मास्टरमाइंड मसूद अजहर पर प्रतिबंध लगाने से संयुक्त राष्ट्र को रोक दिया। यह गंभीर मामला है। यदि संयुक्त राष्ट्र उसे प्रतिबंधित कर देता तो विश्व में उसकी पहचान एक आतंकी की हो जाती। इन दिनों चीन पाकिस्तान के साथ मिलकर परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) में भारत के प्रवेश को रोकने में लगा है। एनएसजी 48 देशों का एक समूह है जो परमाणु संबंधित निर्यात को नियंत्रित करता है। अमेरिका एनएसजी में भारत के प्रवेश का समर्थन करता है।

चीन का यह रवैया भारत-अमेरिका संबंधों में आई मजबूती का एक बड़ा कारण है। हालांकि स्वयं मोदी सरकार के प्रयासों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। वह अपनी पूर्ववर्ती सरकारों के वैचारिक बोझ से आजाद है। मोदी भारत को एक अंतरराष्ट्रीय शक्ति के रूप में उभारना चाहते हैं, जो विश्व व्यवस्था को एक नया आकार देने में सक्षम हो। वह अच्छी तरह जानते हैं कि इसके लिए नई दिल्ली को वाशिंगटन के सहयोग और समर्थन की दरकार होगी। इसके लिए वह खतरा उठाने को तैयार दिख रहे हैं। उम्मीद है कि वह अमेरिकी कांग्रेस में संबोधन के दौरान कहेंगे कि उनकी सरकार अमेरिका को भारत के प्रमुख रणनीतिक सहयोगी के रूप में देखती है और वाशिंगटन के लिए यह महत्वपूर्ण होगा कि वह उन्हें ध्यानपूर्वक सुने और भारत के संबंध में अपनी प्रतिक्रिया दे। इसलिए और भी, क्योंकि मोदी के शासनकाल में भारत में एक ऐसी पीढ़ी का उभार हुआ है जो भारत-अमेरिकी संबंधों को नई दिशा दे सकती है।

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