Thursday, June 16, 2016

भूख से हुई मौत पर विकास की दुदुंभी




    भूख से हुई मौत पर विकास की दुदुंभी
         अखिलेश  अखिल

एक लाईन की खबर यह है कि 40 वर्षीय श्रीकांत  दीक्षित की मौत भूख से हो गई। इस मौत पर सियासत जारी है। आगे भी जारी रहेगी। इंडिया में भूख से मौत की यह कोई पहली घटना नहीं है। बहुत समय तक अकाल और भूख से मौत की चर्चा के लिए उड़ीसा का कालाहांडी विख्यात था। लेकिन राजीव गांधी की कालाहांडी यात्रा के बाद वहां की तस्वीर बदली। अब कालाहांडी में कम से कम भूख से मौत नहीं होती। अभी हाल में ही बुंदेलखंड से भी ऐसी ही खबरे आई। राजनीति शरू  हुई। मरने वाले तो मर गए लेकिन झूठ की जमीन से पनपी राजनीति को देखकर बुंदेलखंड में भूख भी ष्षर्मा गई और अंत में पलायन का रास्ता पकड़ लिया।  पिछले साल भर के भीतर बुंदेलखंड से 50 लाख से भी ज्यादा लोग भूख से आहत होकर केवल बचे रहने के लिए पलायन कर चुके है। तो बात यह है कि एक तरफ भूख से मौत और दूसरी तरफ राज्य सरकार से लेकर केंद्र सरकार तक चमकता राज्य और चमकता देष की ब्रांडिंग करते फिर रहे हैं। 
          श्रीकांत की यह  मौत उत्तरप्रदेष के बाराबंकी जिला के पकरिहा गांव में हुई है। श्रीकांत की यह मौत उस प्रदेश  में हुई है जहां के निजाम युवा है जो हर रोज अखवार के पन्नें और टीवी  पर  हंसता ,मुस्कुराता और आगे बढता उत्तरप्रदेष का इष्तेहार  देने में कोई कंजुसी नहीं करते। श्रीकांत की मौत उस समाजवादी सरकार के रहते हुई है जहां न जाने कितने समाजवादी नेताओं के नाम पर तरह तरह की योजनाएं चलती दिखती है और सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव गर्व से कहतंे फिरते हैं कि यूपी की समाजवादी सरकार में सब कुछ बम बम है और सबके साथ न्याय है। इस श्रीकांत की मौत उस देष में हुई है जहां नरेंद्र मोदी अभी अभी अपनी सरकार की दो वर्ष की वर्षगांठ अरबों रूपए खर्च करके मना रही है और अपनी सरकार की छाप इस देष के तमाम जीव जन्तु पर छोड़ने को उद्ात है ताकि अगली राजनीतिक फसल गर्व के साथ काटी जा सके। कह सकते हैं कि जिस दिन श्रीकांत की मौत हुई उसी दिन वल्र्ड बैंक ने इंडिया को डिमोट करते हुए उसे  विकासषील देष से लो इंकम वाले सोमालिया और रवांडा जैसे देष की सूची में खड़ा कर दिया। हो सकता है यह श्रीकांत और उनके जैसे अन्य लोगों की भूख से हुई मौत की सच्ची तस्वीर को देखते हुए ही वल्र्ड बैंक ने ऐसा कदम उठाया हो। वल्र्ड बैंक ने मोदी सरकार के  कथित चमकदार इंडिया की तस्वीर को सिरे से नकार दिया है। इसकी और अलग कहानी भी है जिसपर चर्चा आगे फिर हो सकती है। 
            गरीब श्रीकांत अपनी मां के साथ रह रहा था। पिता की मौत होने के बाद अपना और अपनी मां का पेट भरने के लिए वह पहले मजदूरी करने बढा। लेकिन वहां ठोकरें मिली। अपमान मिला। साल भर के भीतर ही वह टूट गया और अपनी  जान बचाने के लिए वह भीख की पेषा को भी अपना लिया। कुछ दिनों तक भीख से जिंदगी कटती रही लेकिन एक ही जगह पर कोई कितने दिनों तक भीख दे? श्रीकांत दूसरे गांव की ओर बढा लेकिन ज्यादा बढ नहीं सका। अन्न का टूटा देह साथ नहीं दिया और कहीं गिर कर घायल हो गया।  कहते हैं  कि वह लगभग 12 दिनों तक अपनी टूटी झोपड़ी में भूख से लड़ता रहा  और जिंदगी के अंतिम दिन गिनता रहा। उसकी मां उसकी हालत को देखकर कभी कभी कच्चा आटा घोलकर पिलाती रही लेकिन श्रीकांत का षरीर अब उस आटे को भी  लेने से मना कर दिया। श्रीकांत स्वर्ग सिधार गए।  अब राजनीति यह हो रही है कि मौत भूख से नहीं बीमारी से हुई है। अगर प्रषासन की बात को ही सही माने तो भूख से बड़ी बीमारी कोई होती है क्या? जिसे भरपेट अनाज नहीं मिलता हो और विकास के झूठे दावे व अभाव के बीच जिंदगी झुलती हो, जो मानसिक संत्रास से गुजर रहा हो, ऐसे लोग बीमार नही ंतो और क्या होगे? लेकिन राजनीति के खेल से भला कोई जीत पाया है क्या? आसन्न विधान सभा चुनाव को देखते हुए सभी बटमार पार्टियां आहें भरती नजर आ रही है । इन राजनीतिक दलों और सरकार के लोगों को राजनीति से इतर इस बात की भी चिंता नहीं है कि देष के तमाम इलाके में ऐस लाखों श्रीकांत  जो भूख और बेवसी का जीवन जीने को अभिषप्त है , उसे बचा लिया जाए।  ऐसा करना किसी भी कल्याणकारी सरकार का पहला दायित्व है। 
        श्रीकांत की मौत सपा सरकार में हुई है। कह सकते हैं कि सपा को चुनावी राजनीति में किसी गरीब और फटेहाल जैसे श्रीकांत दीक्षित की कोई जरूरत नहीं है। लेकिन अगड़ी जाति की राजनीति करने  का दावा करने वाली भाजपा को भी श्रीकांत की मौत और उसकी मां की बेवसी से भला क्या लेना देना! भाजपा के मुखिया वोट की राजनीति करने किसी बिंद, किसी दलित और किसी खास पिछडी जाति के साथ गंगा स्नान करने से लेकर भोजन करने की राजनीतिक मार्केंटिंग से नहीं चुके। और कांग्रेस की तो वहां सब लुटिया ही डूबी हुई है।  लेकिन इंसानियत तो बची थी।  खबर ये है कि श्रीकांत की मौत के बाद कुछ लोगों ने चंदा के जरिए कुछ किलो अनाज श्रीकांत की मां को दिए हैं।  जीते जी श्रीकांत अनाज के लिए तरस रहा था ।  समाज और राजनीति के इस दोहरे रंग को क्या कहा जाए? हमें नहीं मालूम की श्रीकांत के कफन का इंतजाम कहां से कैसे हुआ? 

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