Tuesday, June 28, 2016

आठ फीसदी वोट, तीन आरोपित नेता और भाजपा की नजरे



अखिलेश  अखिल
कहते हैं कि यूपी में कोइरी,कुर्मी और कुश वाहा की आवादी आठ फीसदी है। इसी 8 फीसदी वोट को लेकर छिना झपटी मची हुई है। प्रदेश  के 9 फीसदी यादव वोट पर मुलायम सिंह की राजनीतिक पकड़ है। 20 फसदी वोट दलितों के हैं जिनमें 12 फीसदी जाटव वोट की पूरी राजनीति मायावती करती है। कुल 20 फीसदी दलित वोट में 12 फीसदी जाटव वोट पूरी तरह से मायावती के पक्ष में ही अब तक जाते रहे हैं। कुल 40 फीसदी वोट ओ बी सी के हैं।  इनमें 9 फीसदी सपा के पास माने जाते हैं।  18 फीसदी मुस्लिम वोट किसी के पास नहीं हैं। यह  वोट बैंक समय के मुताविक बदलते रहे हैं। पहले मुस्लिम, दलित कांग्रेस के साथ होते थे। बसपा के आने के बाद दलितों का जाटव वोट मायावती के पास चला गया। मुस्लिम कभी बसपा के पक्ष में गए तो कभी सपा के पक्ष में। कांग्रेस का यह वोट बैंक दो बसपा और सपा जैसी दो क्षेत्रिय पार्टी के बीच पिछले कई सालों से परिक्रमा कर रहा है। यूपी में ब्राम्हणों का वोट करीब 13 फीसदी है और करीब 8 फीसदी क्षत्रिय वोट हैं। ब्राम्हण और क्षत्रिय को मिलाकर कोई 21 फीसदी वोट बनते हैं।  बड़ा वोट बैंक है यह।  लेकिन यह सवर्ण वोट बैंक भी बंटे हुए है। 2014 के लोक सभा चुनाव में सवर्णों के इस वोट बैंक का अधिकतर हिस्सा  से भाजपा के पक्ष में चला गया था। लेकिन यह भी सत्य है कि क्षत्रिय और ब्राम्हण आज भी कई दलों में बंटे हुए हैं । ये बंटवारा बसपा, कांग्रेस और सपा के साथ भाजपा के बीच है। 
       2014 के चुनाव में राजनीतिक गणित बदल गए । सारे दलों के गणित धराषायी हो गए। सबके गणित को मोदी की आंधी ने घ्वस्त कर दिया। कैसे भाजपा ने सबकी लुटिया डूबो दी किसी को पता भी नहीं चला। राजनीतिक दल मोदी की आंधी से जब बाहर निकले तो सामने विधान सभा चुनाव खड़ा मिला। अब सारे दल अपने अपने वोट बैंक को फिर से संजाने में लगे है।  बड़ी मारकाट मची हुई है। चोरकट और गिरहकट नेताओं की पूछ बढ गई है। गिरोह चलाने और जातियों को हांकने वाले राजनीतिक दलों के पसंद हो गए। भाजपा की राजनीति यह है कि किसी भी सूरत में उत्तरप्रदेष फतह किया जाए। लेकिन कैसे? यह बड़ा सवाल है। लोकसभा की राजनीति यहां चलती नहीं दिख रही है। सारे प्यादे, तीर तरकस भी जीत के दावे नहीं करते। भाजपा के अमित ष्षाह  बोल गए है कि उनकी राजनीति 265 से ज्यादा सीट जीतने की है। लेकिन सच्चाई यह भी है कि प्रदेष की राजनीति में भाजपा अब तक 100 से ज्यादा सीटों पर कभी खाता भी नहीं खोला। 45 से ज्यादा ऐसी सीटे हैं जहां भाजपा कभी चुनाव भी नहीं लड़ पायी। खैर भाजपा की राजनीति यह है कि गैर यादव और गैर जाटव पिछड़े और दलित जातियों को समेट ले। भाजपा को यह भी उम्मीद है कि 21 फीसदी ब्राम्हण और राजपूत वोटों में से ज्यादातर उनके पक्ष में आऐंगे। ऐसा संभव भी हो । लेकिन चुनावी मैदान इतना आसान भी नहीं है। बसपा की राजनीति पहले से ज्यादा आक्रमक और धमकदार दिख रही है। प्रदेष में अभी पूरी राजनीति बसपा और सपा के बीच है। 
      ल्ेकिन अभी भाजपा की राजनीति तीन लोगों के बीच घूम रही है। इन तान में नए पुराने दो तो मौर्य हैं और एक अनुप्रिया पटेल। तीनों अपने अपने फन के माहिर। तीनों की राजनीति काइरी, कुर्मी और कुषवाहा के इर्दगिर्द घूमती रही है। भाजपा के प्रदेश  अध्यक्ष केश व मौर्य सांसद हैं। इन पर 54 मुकदमें है। इनपर हत्या के भी आरोप हैं। बसपा से अभी अभ्ज्ञी निकले स्वामी प्रसाद मौर्य भी कुषवाहा समाज की राजनीति के सौदागर रहे है। कहते हैं कि इनकी धमक कुछ और पिछड़ी जातियों के बीच है। बसपा से निकले  स्वामी भाजपा से मिले हैं। भाजपा ने उन्हें आत्मसात नहीं किया। भविष्य की राजनीति को देखते हुए स्वामी को एक पार्टी बनाने की बात कही। इसके पीछे की राजनीति यह है कि स्वामी पार्टी बनाए और अपना जनाधार दिखाए। इसके बाद भाजपा उसे अपने में विलय करेगी। अद्भुत राजनीति। कुछ लोग यह भी कह रहे हैं कि स्वामी को सीएम उम्मीदवार बनाने की भी बात कही गई है। लेकिन यह सारा खेल जातीय राजनीति को साधने भर का है। स्वामी मौर्य पर भी हत्या के प्रयास समेत 16 से भी ज्यादा  आपराधिक मुकदमे दर्ज है। अनुप्रिया पटेल अपना दल चलाती है। इसी दल से सांसद भी है और अभी एनडीए की सहयोगी है। वहीं कुर्मी, कोइरी और कुषवाहा की राजनीति। इनके उपर भी 17 से ज्यादा आपराधिक मुकदमें दर्ज है। 
     ये तीन फीगर कुश वाहा समाज से आते हैं। एक भाजपा के हैंए दूसरे भाजपा की सहयोगी है और तीसरे बसपा से आयातित हैं। 8 फीसदी वोट के लिए तीन नेताओं का राजनीतिक टेस्ट भाजपा कर रही है। दिसंबर के अंत तक इन्ही तीनों में से भाजपा किसी एक पर दांव लगाने के फिराक में है।

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