Wednesday, June 29, 2016

हे चाटुकार! अब तो कांग्रेस को बकस दो




अखिलेश  अखिल
कांग्रेस को लेकर आज देश  चिंतित है। कांग्रेस ,भारत की साझी सहादत और साझी विरासत की प्रतीक पार्टी रही है। जंगे आजादी की भूली बिसरी यादें इसी दल के साथ जुड़ी है।  वोटों की गिनती में कांग्रेस भले ही हार रही हो लेकिन देष की अंतःचेतना में कांग्रेस आज भी जिंदा है। कांग्रेस एक ऐतिहासिक राजनीतिक पार्टी है और लोकतंत्र में आज भी कांग्रेस की जरूरत है। कांग्रेस भारत की अस्मिता से भी जुड़ी है। कांग्रेस भले ही आजादी के मूल्यों से दूर और दीन होती रही है, भले ही कांग्रेस महात्मा गांधी से होकर राहुल गांधी तक आ पहुंची हो , बावजूद कांग्रेस शब्द ही अपने आप में प्रेरणा के शब्द हैं। मेरे भीतर का इतिहास बोध इस दीन हीन कांग्रेस पर लिखने पर मजबूर कर रहा है। इस कांग्रेस पर जिम्मेदारी  थी कि वह देष की बलिदानी विरासत की न केवल रक्षा करेगी वल्कि उसे आगे भी बढाएगी लेकिन  गैर जिम्मेदार   कांग्रेसी बापू के उस ताबिज को विस्मृत कर सरोकार से सरकार में बंध गई। गैर जिम्मेदार लोगों ने कांग्रेस को खत्म कर दिया  और वे अब मर्सिया पढने में लगे  हैं। क्या कांग्रेस सिर्फ राहुल और सोनिया की है? क्या कांग्रेस के बैनर पर कांग्रेसियों ने माल नहीं कमाए? क्या कांग्रेस के राज में घोटाले नहीं हुए? और फिर घोटाले किसने किए? फिर सोनिया और राहुल दोषी क्यों? लेकिन राजनीति के पीछे अगर केवल लूट की नीति छुपी हो तो इसे आप क्या कहेंगे? सच तो यह है कि कांग्रेस मरी नहीं , उसे मारी जा रही है। 
      राजनीति करना और बयान देना दोनों अलग-अलग बातें हैं। राजनीति, रणनीति और कूटनीति से की जाती है और बयान राजनीति का मात्र एक हथकंडा भर होता है। बयान सच भी हो सकता है और राजनीति से प्रेरित भी। आप देश की राजनीति के इतिहास में चले जाइए, तो पता चलेगा कि देश में सत्ता की राजनीति करने वाले लोग कभी बयानों की राजनीति नहीं करते। बयानों की राजनीति असली राजनीति के सामने ठहर भी नहीं पाती। बयानों की राजनीति असली राजनीति की साया भर होती है और संभव है कि इसे समझना सबके बूते की बात भी नहीं हो। यह सवाल आज इसलिए उठ रहा है कि तीन बरस पहले  कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता और तत्कालीन सरकार के कानून मंत्री सलमान खुर्शीद ने एक बयान  में सोनिया गांधी को देश की मां तक कह डाला। हालांकि इस बयान में किसी की इज्जत नहीं उछाली गई, और न ही किसी का अपमान ही किया गया है। संभव है कि खुर्शीद के इस बयान से देश की जनता का कोई सरोकार न हो, लेकिन इस बयान ने खुर्शीद की चाटुकारिता को सामने ला दिया । इसी खुर्शीद ने कुछ महीने पहले अपने एक साक्षात्कार में कांग्रेस को दिशाहीन कहने की गलती कर दी थी। इस बयान का कांग्रेस के अन्य चाटुकारों ने विरोध किया और अंत में खुर्शीद को अपने कहे के लिए माफी तक मांगनी पड़ी थी। लेकिन याद रखिए, कांग्रेस की चाटुकारिता करने वाले खुर्शीद कोई पहले आदमी नहीं हैं। जब इंदिरा गांधी का राज था, तब भी कांग्रेस में चाटुकारों की बड़ी फौज खड़ी थी। उस समय भी देवकांत बरुआ जैसे लोग थे, जो ‘इंदिरा इज इंडिया और इंडिया इज इंदिरा’ कहकर चाटुकारिता करते फिर रहे थे और कांग्रेस रसातल की ओर जा रही थी। आज फिर वही इंदिरा वाली संस्कृति सोनिया के सामने है। चार राज्यों में कांग्रेस की हार को लेकर कांग्रेस के भीतर मंथन जारी है। लेकिन मंथन फिर वही  जड़विहीन लोग कर रहे हैं, जिनका जनसरोकार से कोई वास्ता नहीं है। सबसे ज्यादा चैंकाने वाली बात यह है कि इस नाकामी का श्रेय लेने को कोई भी तैयार नहीं है, बल्कि सभी एक-दूसरे के माथे ठीकरा फोड़ने में लगे हैं। जरा मणिशंकर अय्यर और सत्यव्रत चतुर्वेदी सरीखे नेता को ही ले लीजिए। कांग्रेस में ये क्या करते हैं? क्या इनके कहने सुनने से कांग्रेस को कोई वोट डाल सकता है? लेकिन कांग्रेस ऐसे नेताओं को ढो रही है।  ऐसे नेता न तो ये अपनी सीट जीत सकते हैं और न ही पार्टी की जीत में योगदान दे सकते हैं। कांग्रेस की विडंबना यही है कि सत्ता में दस जनपथ के आस-पास ऐसे ही लोगों का वर्चस्व रहा है, जो बिना रीढ़ के नेता हैं। जो जितना कमजोर और जड़विहीन, कांग्रेस के गलियारों में वह उतना ही मजबूत। मिसाल के तौर पर अहमद पटेल को ही लिया जाए। अहमद भाई उसी गुजरात से आते हैं, जहां के नरेंद्र मोदी  कई साल तक मुख्यमंत्री बने रहे लेकिन अहमद की राजनीति मोदी को डिगा नही सकी। फिर राजनीति किस बात की? और सलाह कैसा? आज कांग्रेस के लिए अहमद  सबसे बड़ी चुनौती बन चुके हैं। सोनिया के राजनीतिक सलाहकार के गृह-प्रदेश गुजरात में कांग्रेस काफी दयनीय हालात में है। चाणक्य कहे जाने वाले अहमद भाई अपने ही राज्य में लगातार मात खाते जा रहे हैं। अहमद पटेल कांग्रेस की लगातार हार के लिए अपने को दंड दे सकते हैं? जो अहमद पटेल आज तक लोकसभा से लेकर विधानसभा का चुनाव नहीं लड़ सके, वह भला चुनाव की राजनीति कैसे कर सकते हैं? और राजनीति करते भी हैं, तो अपनी राजनीतिक हार की जिम्मेदारी क्यों नहीं लेते? इसी अहमद पटेल से एक और सवाल है कि क्या वे अपनी ही पार्टी के  कनिष्ठ नेताओं से मिल पाते हैं? कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष का राजनीतिक सचिव होने के नाते उनका पहला काम तो यही था कि वे देश के राजनीतिक मिजाज को पहचानते और सोनिया गांधी तक देश की असली तस्वीर रखते, लेकिन ऐसा उन्होंने नहीं किया। उन्हें किस श्रेणी में रखा जाए?
    उस दिग्विजय सिंह को क्या कहेंगे? अजीत जोगी को क्या कहेंगे? उस शकील अहमद को आप किस श्रेणी में रखेंगे? उस गुरुदास कामत की राजनीति को आप क्या कहेंगे? इन्हें किस आधार पर नेता कहा जाए ? ऐसे नेताओं के लिए आखिर किस संसदीय शब्द का इस्तेमाल किया जाए? प्रदेश के तमाम अध्यक्षों को आप क्या कहेंगे, जो अपने अपने प्रदेशों में कांग्रेस को जीत दिलाने में असफल हैं। आज की हालत यह है कि इस देश में डंके की चोट पर दस आदमी भी कांग्रेस के पक्ष में बोलने को तैयार नहीं हैं। कांग्रेस के नेताओं से कार्यकर्ता की मुलाकात और बात नहीं होती। गौर करके देखिए, कांग्रेस में आज अधिकतर नेता 60 से 70 बरस के हो गए हैं, जो वोट की राजनीति पुराने ढर्रे पर कर रहे हैं, जबकि आज की पीढ़ी तमाम पुराने नेताओं से अलग सोच रख रही है। आंध्र प्रदेश  की राजनीति को देखें। आखिर जगनमोहन रेड्डी कांग्रेस के मुख्यमंत्री ही, तो बनना चाहते थे। आज उन्हें नकार कर कांग्रेस वहां बदतर हालात में पहुंच गई है। कहने की जरूरत नहीं कि दस जनपथ के इर्द-गिर्द आज चाटुकारों का जमावड़ा है। और जो लोग आज राहुल गांधी को नकार रहे हैं, उन्हें यह समझना होगा कि कभी स्वर्गीय इदिरा गांधी को भी लोहियावादियों ने ‘गूंगी गुड़िया’ की उपाधि दी थी। उसी गूंगी गुड़िया ने लोहिया समेत तमाम नेताओं की बोलती बंद कर दी थी। आज भ्ज्ञी चाटुकार से कांग्रेस मुक्त हो जाए तो राहुल आज भ्ज्ञी कांग्रेस को नवजीवन दे सकते हैं। 
        

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