Thursday, June 16, 2016

यूपी की बहू शीला पर कांग्रेस लगाएगी दांव





अखिलेश अखिल 
कांग्रेस की शीला दीक्षित फिर फोकस  में है।  राजनीति से लगभग हासिए  पर जा चुकी शीला पर कांग्रेस फिर दांव लगाने को तैयार है। १९९८ से २०१३ तक तीन टर्म दिल्ली की मुख्यमंत्री  रही शीला दीक्षित को कांग्रेस अब उत्तरप्रदेश में मुख्यमंत्री उम्मीदवार के तौर पर उतारने की तैयारी में लगी है।  गुलाम नवी आजाद पिछले दो दिनों से लखनउ में ब्लॉक स्तर के नेताओ से बैठक कर रहे है।  मना जा रहा है की कोई १००० से ज्यादा जमीनी नेता इस बैठक में हिस्सा ले रहे है और प्रदेश की हर कूटनीति से लेकर रणनीति से आजाद को वाकिफ करा रहे है।  गुलाम नवी आजाद  स्थानीय नेताओ की हर बात और सुझाव को नोट कर रहे है और हर सुझाव पर कई तरह के क्रॉस प्रश्न भी कर रहे है।  कह सकते है कांग्रेस पहली बार उत्तरप्रदेश चुनाव को लेकर इतना गम्भीर हो पायी है।  इस पूरी रणनीति के पीछे कांग्रेस के रणनीतिकार प्रशांत किशोर की भूमिका भी है जिन्होंने साफ़ साफ़ सोनिया गांधी को कह रखा है की राहुल , प्रियंका को अगर उत्तरप्रदेश चुनाव में उतारा जाय तो कांग्रेस की हालत बेहतर हो सकती है।  प्रशांत किशोर  हर हाल में गांधी परिवार के उम्मीदवार को आगे बढ़ा कर चुनाव को कांग्रेस  में करना चाह रहे है।   प्रशांत किशोर ने गांधी परिवार के चुनाव में ना आने की हालत में शीला दीक्षित को उतारने की बात कही थी।  गुलाम नवी आजाद को इसी रणनीति के तहत लखनऊ भेजा गया है। 
          दो दिनों के मंथन के बाद जो खबर आ रही है उससे पता चलता है की सोनिया गांधी ने शीला को मुख्यम्नत्री उम्मीदवार के रूप में उतारने की हरी झंडी दे दी है।  यह बात और ही शीला के लिए उत्तरप्रदेश में कांग्रेस के फेवर में चुनाव को टार्न करना आसान नहीं है लेकिन यह भी तय है की ब्राह्मण चेहरा होने की वजह से उत्तरप्रदेश ब्राह्मण और सवर्ण कांग्रेस के पाले में लौट सकते है।  माना जा रहा है की शीला आगे आगे रहेगी और पीछे से राहुल और प्रियंका युवा वोटरों को प्रभवित करने का काम करेंगे। 
           सवाल है की आखिर शीला पर कांग्रेस का दांव क्यों?  क्या दिल्ली की तरह शीला उत्तर प्रदेश में  राजनितिक खेल कर सकती है ? ७८ साल की शीला  क्या मुलायम , मायावती  और बीजेपी के सियासी खेल को चुनौती दे पाएगी ? सवाल कई और भी है।  लेकिन सबसे सरल जबाब है की शीला यूपी की बहु है।  प्रदेश के ब्राह्मण नेता रहे  उमाशंकर दीक्षित की पत्नी शीला में पंजाबी और ब्राह्मण वोट के साथ ही दलित और पिछड़ा वोट अपनी ओर  खींचने की ताकत है।  मुस्लिम वोटरों के बीच में भी शीला की राजनीति बेहतर ही रही है।  १५ साल तक दिल्ली में ऐसा वह कर चुकी है। 
          शीला दीक्षित पंजाब कपूरथला की रहने वाली है।  उमाशंकर दीक्षित से उनका विवाह हुआ था। शीला पहली दफा १९८४ में कनऔज से सांसद चुनी गयी थी और राजीव गांधी के मंत्रिमंडल में शामिल हुयी थी।  यह बात और है की कुछ ही साल बाद शीला को अलग थलग भी होना पड़ा था। पूर्वी  दिल्ली से लोक सभा चुनाव लड़ी हर गयी।  कांग्रेस ने फिर उन्हें दिल्ली का कमान सौंपा।  फिर क्या था।  शीला ने पूरी मजबूती के साथ दिल्ली की राजनीति को साधा और १९९८ से १९१३ तक दिल्ली की मुख्यमंत्री रही।  २०१३ के विधान सभा चुनाव में हार के बाद शीला को राज्यपाल बनाया गया। 
           जाती और धर्म में बटी उत्तरप्रदेश की राजनीति में कांग्रेस करीब २५ साल से राजनीति बनवास की हालत में है।  इसके लिए क्षेत्रीय पार्टी की मजबूती अगर एक कारण है तो दूसरा कारन वहा कांग्रेस में नेता का अभाव भी रहा है।  इसके साथ ही  की राजनीति कांग्रेस को और रसातल में ले गयी।  जो  ब्राह्मण , दलित और मुसलमान कांग्रेस के वोट बैंक हुया करते थे , वक्त के साथ दूसरी पार्टियों में चले गए।  संभव है की शीला की राजनीति कांग्रेस को  प्रदेश में नवजीवन दे सकती है।  

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