Sunday, July 3, 2016

कई और हैं स्वामी के निशाने पर


अखिलेश अखिल 

सुब्रमण्यम  स्वामी भाजपा के लिए अब नुकसान पहुंचाने वाले  सावित हो रहे हैं।  स्वामी के बारे में लोगों की धारणा यही बनी है।  लेकिन क्या भाजपा भी ऐसा ही सोंच रही है। पक्के तौर यह नहीं कहा जा सकता। स्वामी किसी के उपर कहीं भी आरोप लगा सकते हैं। उनके पास तथ्य भी होते हैं। स्वामी के आरोपो वाली राजनीति से भाजपा को कई दफा कुछ लाभ भी हुए हैं। वहां तक तक भाजपा चुप रही। लेकिन अब स्वामी ने भाजपा और मोदी सरकार के लोगों को ही निषाने पर ले लिया है। रिजर्व बैंक के गवर्नर रघुराम राजन पर हमले करते रहने के बाद सुब्रह्मण्यम स्वामी ने जिस तरह मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रह्मण्यम पर निशाना साधा और साथ ही उन्हें हटाने की मांग भी कर डाली उससे भाजपा के साथ-साथ मोदी सरकार की भी किरकिरी हुई है। इसमें संदेह है कि सुब्रह्मण्यम स्वामी के बयानों को उनके निजी बयान करार देने भर से बात बनने वाली है। अहम पदों पर बैठे लोगों के प्रति स्वामी के हमलावर रुख को आंतरिक लोकतंत्र से भी नहीं ढंका जा सकता, क्योंकि उनके बयान सरकार की छवि को नुकसान पहुंचा रहे हैं। इसके साथ ही वह विपक्षी दलों और आलोचकों को चुभते हुए सवाल उठाने का मौका भी दे रहे हैं।
           स्वामी पर लगाम लगाना इसलिए जरूरी है, क्योंकि उनकी सूची में दो दर्जन से अधिक ऐसे नाम बताए जा रहे हैं, जिनके खिलाफ वह अभियान छेड़ने का इरादा रखते हैं। इसकी अनदेखी भी नहीं की जा सकती कि रघुराम राजन को निशाने पर लेने के बाद उन्होंने दिल्ली के उपराज्यपाल के खिलाफ टिप्पणी की और अब मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रह्मण्यम के पीछे पड़ गए। पता नहीं उनकी सूची में और कौन-कौन है, किंतु ये स्पष्ट है कि इनमें कई अहम पदों पर हैं, जो उनका प्रतिवाद करने की स्थिति में नहीं। ऐसे में यह और जरूरी हो जाता है कि उन्हें ऐसे लोगों के बारे में सार्वजनिक तौर पर उल्टे-सीधे बयान देने से रोका जाए। उन पर लगाम नहीं लगी तो अन्य छोटे मगर बड़बोले नेताओं को भी काबू में रखना मुश्किल होगा।
          यह ठीक है कि सुब्रह्मण्यम स्वामी बेलगाम बयानबाजी के लिए ही अधिक जाने जाते हैं, लेकिन उन्हें यह बताया ही जाना चाहिए कि वह सत्तारूढ़ दल के वरिष्ठ सांसद के तौर पर वैसा आचरण नहीं कर सकते जैसा विपक्षी दल के नेता के रूप में करते रहे हैं। उनके संदर्भ में एक मुश्किल यह भी है कि किसी व्यक्ति विशेष की नीतियों के बजाय उस व्यक्ति की ही आलोचना करने लग जाते हैं। ऐसा लगता है कि उन्हें विदेश में रहे और वहां कार्य किए व्यक्तियों से कुछ ज्यादा ही एलर्जी है। अच्छा हो कि कोई उन्हें यह बताए कि वह खुद भी हार्वर्ड में पढ़ा चुके हैं। सुब्रह्मण्यम स्वामी जिस तरह रघुराम राजन के बाद अरविंद सुब्रह्मण्यम के पीछे पड़े उसकी विदेश में भी प्रतिकूल प्रतिक्रिया हो सकती है, क्योंकि आज दुनिया भारत पर निगाह लगाए हुए है। स्पष्ट है कि सिर्फ यह जाहिर करने से काम नहीं चलने वाला कि स्वामी तो बिना सोचे किसी के खिलाफ कुछ भी बोलते ही रहते हैं। भाजपा नेतृत्व इस बात को भी ओझल नहीं कर सकता कि स्वामी वित्त मंत्रालय के तौर-तरीकों के प्रति कुछ ज्यादा ही तीखे तेवर अपनाए हुए हैं। क्या वह सरकार में अपने लिए कोई भूमिका चाह रहे हैं? पता नहीं सच क्या है, किंतु उन्हें यह स्पष्ट संदेश देने में ही भलाई है कि उनका मौजूदा रुख-रवैया तो पार्टी के लिए, सरकार के लिए और ही खुद उनके लिए ठीक है।  भाजपा , स्वामी को केतना और कब तक छुट देती है इसे भी देखना होगा। अगर भाजपा ऐसा नहीं कर पाती तो तय है कि आगे सरकार के लिए कोई भी बड़ा निर्णय लेना मुष्किल होगा। स्वामी राजनीति के औघर बाबा हैं। उनके लिए पक्ष और विपक्ष का कोई मतलब नहीं। वे परोक्ष तरीके से भी वार करने में यकीन नहीं करते। सीधा वार और सीधी बात। इसे गलत भी नहीं कह सकते। लेकिन राजनीति तो झूठ और प्रपंच पर आधारित होती है। सरकार चलाने के लिए तमाम तरह के रसायन की जरूरत होती है। स्वामी को इससे कितना मतलब है? आज भी जनता की उम्मीदों पर मोदी सरकार पूरी तरह उतर नहीं पायी है,ऐसे में लगातार स्वामी के बम से सरकार को नुकसान हो सकता है।

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