Monday, July 11, 2016

फिर सुलगी कश्मीर घाटी!


अखिलेश  अखिल
हिजबुल के कुख्यात आतंकी बुरहान वाणी को मुठभेड़ में मारा गया। तीन रोज पहले की घटना है यह। बुरहान की मौत के बाद सुरक्षाबलों को चाहे जितनी बधाईयां दी जाए कम ही है।  बुरहान ने कश्मीरी जनता के नाक में दम कर रखा था। 10 लाख रूपए का इनामी बुरहान पर न जाने कितने लोगों की हत्या करने के मामले दर्ज थे। भारत का होकर भारत से बैर करने वाला बुरहान की तरह ही कई आतंकी हमें परेषान किए हुए है लेकिन बुरहान बुरहान की कु्ररता कई मामलों में औरों से अलग थी। उसे मारना ही था और अंत में मारा ही गया।  इसे सुरक्षाबलों के लिए बड़ी कामयाबी  माना जा सकता है। लेकिन यह भी सच है इसके चलते पहले से ही अशांत चल रही कश्मीर घाटी अचानक एक बार फिर सुलग उठी है। राज्य का एक हिस्सा तो पूरी तरह हिंसक भीड़ और असामाजिक तत्वों के हवाले है। अब तक 18 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है जिसमें एक पुलिसकर्मी भी है। इस घटना की जितनी निंदा की जाए कम ही है।
       बुरहान की मौत पर प्रदर्शन कर रहे लोग और सुरक्षाबल पूरी तरह आमने सामने हैं। भीड़ का  असली निशाना सुरक्षाबल और सरकारी मशीनरी है।  बुरहान का मौत के बाद कष्मीरी युवको में जिस तरह का गुस्सा दिख रहा है वह 2010 की घटना की याद दिला रही हैं । लग रहा है कि कहीं फिर हम उसी दौर में तो नहीं पहुंच रहे हैं ।  2010 में हिंसक पथ्थरवाजी की वजह से 150 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई थी और सैकड़ों लोग घायल हुए थे। इस घटना के बाद महीनों राजनीति होती रही और अलगााववादी नेता अपनी रोटी सेकते रहे।  तब की राजनीतिक रोटी का ही कमाल था कि पिछले चुनाव में सत्ता बदल गई और महबूबा की राजनीति भाजपा के साथ हो गई। यह वही महबूबा है जिसकी राजनीति हमेषा अलगाववादियों और आतंकियों के सपोर्ट में होती रही है। लगभग आज भी वही हालात हैं । केवल सरकार बदल गई है। तब कांग्रेस की सरकार थी और आज भाजपा और महबूबा की मिलीजुली सरकार है। लेकिन तय मानिए वहां जो भी हो रहा है वह ना तो वहां के आवाम के लिए ठीक है और नहीं केंद्र सरकार के लिए ही।  देर बैठा पाकिस्तान इनत माम गतिविधियों को हवा दे रहा है।
     कश्मीर की इस अशांति का खामियाजा वहां की आम जनता को भुगतना पड़ रहा है इसके चलते सरकार की नीतियों पर भी सवाल उठने लगे हैं। सवाल राज्य सरकार पर भी है और केंद्र सरकार पर भी। सवाल ये भी है कि क्या सरकारें जनता के मिजाज को भांपने और भावी हालातों को समझने में हर बार चूक कर बैठती हैं। जिसके चलते करोडों की सरकारी संपति को तो नुकसान पहुंचता ही है लाखों लोगों को भी अनजानी दहशत के चलते घरों में कैद रहने को मजबूर होना पड़ता है।
    महत्वपूर्ण सवाल ये है क्या सरकार को ऐसे प्रदर्शनों और परिस्थिति से और सख्ती से निपटना चाहिए या राजनीतिक और कूटनीतिक स्तर पर इस समस्या का हल तलाशना चाहिए। केंद्र और भाजपा समर्थित राज्य सरकार को इस ओर मजबूत कदम उठाने की जरूरत हैं । कोई भी चूक हमें परेषानी में डाल सकती है। ध्यान रहे आतंकवादी और अलगाववादी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं । वहां जो कुछ भी हो रहा है उसके लिए ये दानों गुट जिम्मेदार है। इन पर कब्जा पाए वगैर राज्य में न तो अमन चैन आ सकता है और न हीं राज्य के लोगों का राज्य और कानून के प्रति विष्वास ही कायम हो सकता हैं । जनता का विष्वास टूट जाए तो भला वर्वादी से हमें कौन बचा सकता है?

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