Saturday, July 23, 2016

हे राजनीतिक बहेलियों! हमें मत बांटो


अखिलेश  अखिल
 याद रखिए अचानक जिस तरह से जातीय उन्माद से हम तर बतर हो रहे हैं एसके पीछे सिर्फ राजनीति है और ये राजनीतिक बहेलिए हमें आपस में लड़ाकर अपना उल्लू सीधा करने में लगे हैं। मायावती की राजनीति चाहे जैसी भी रही हो उस पर चर्चा करना अभी ठीक नहीं। भाजपा वाले दयाषंकर ने मायावती की राजनीति की तुलना वेष्या से कर दी थी। इसमें कोई राय नहीं कि दयाशकर ने मायावती की राजनीति पर ही उस रोज टिप्पणी की थी लेकिन वह टिप्पणी न सिर्फ एक महिला की राजनीति  पर थी वल्कि एक मजबूत दलित महिला की राजनीति पर भी थी। राजनीति के षिकारी दयाशंकर  के बयान को भांप गए और इसे दलित वनाम सवर्ण की राजनीति की ओर ढकेल गए। यहां यह भी साफ करना देना जरूरी है कि इस देष में दलितों के के प्रति सवर्ण समाज अक्सर नाजायज कर्म करते रहें है, इसका ऐतिहासिक साक्ष्य भी है। गुजरात में दलित उत्पीड़न से षुरू हुआ मसला गाली की राजनीति पर आ टिकी और अब पूरा देश  इस गाली की राजनीति में जात की राजनीति तलाष रहा है। याद रहे दयाशंकर  का बयान सिर्फ मायावती के इर्द गिर्द था। ठीक उसी तरह से दयाषंकर के बयान को दलित आइने में पिरोकर बसपा वाले नसीमुद्दीन जैसे नेताओं ने जिस तरह की हरकत की है और दयाशकर के परिजनों को कथित रूप से गाली देने का जो अपराध किया है उसे कतई वर्दास्त नहीं किया जा सकता। राजनीति की बातें घर और बहु- बेटी तक पहुंच जाए, इसकी कल्पना भी नही की जा सकती । मान भी लिया जाए कि दयाशंकर  ने मायावती को गाली दी तो उसके जववा में मायावती ने भी दयाषंकर के परिजनों को इसी लहजे में गालियां दी थी। बातें वहीं पर समाप्त हो जाती। लेकिन बसपा वालों ने इसे राजनीतिक और दलित रंग दे दिया।  मायावती को लगा कि आने वाले चुनाव में इस दलित रंग की राजनीति बसपा को फलीभूत करा सकती है। फिर जिस दयाषंकर को भाजपा वालों ने  तो पार्टी से तो हटा दिया लेकिन उनकी पत्नी स्वाति सिंह भला अपनी और अपनी बेटी की गाली को भला कैसे वर्दास्त कर सकती थी। अपनी हक की लड़ाई के लिए उसने मैदान में मोर्चा संभाला अपने अकाट्य तर्कों के सामने लोगों को यह सोंचने को वाध्य कर दिया कि राजनीति के खेल में उनकी इज्जत क्यों लूटी जा रही है। भाजपा का काला मूंह फिर सफेद हो गया।  अब वह बेटी सम्मन की लड़ाई लड़ने पर उतारू है।  
भाजपा  अब बेटी के सम्मान में आंदोलन कर रही  है। फिलहाल बसपा नेता नसीमुद्दीन के खिलाफ अ बवह सड़क पर खड़ी हो गई है। मांग हो रही है कि दयाषंकर की तरह ही मायावती भी नसीमुद्दीन को पार्टी से हटाए। पार्टी का कहना है कि बसपा की ओर से महिला सम्मान में छेड़ी गई कथित लड़ाई में ही महिला सम्मान की जिस तरह से धज्जियां उड़ाई गईं, इस मुद्दे को हम जन-जन के बीच में ले जाएंगे। उधर राजनीतिक विश्लेषक इसमें कुछ और ढूंढ  रहे हैं। उनका कहना है कि इसमें कुछ वोटबैंक की राजनीति भी छिपी  है। इससे सवर्ण तबके में पहले से बनी पैठ को और मजबूत बनाने का भाजपा को मौका मिलेगा। दरअसल दूध में गिरी मक्खी की तरह जिस तरह से दयाशंकर को पार्टी ने निकाला, उससे फीडबैक गया कि कुछ सवर्ण वोट भाजपा से नाराज हो रहा।
         बहुजन समाज पार्टी के कार्यकर्ताओं ने पार्टी मुखिया मायावती पर गलत टिप्पणी के विरोध में किए प्रदर्शन में भी जिस तरह से स्त्री मर्यादा तार-तार किया, उसने भाजपा को भी पूरा मौका दे दिया है बसपा को जवाब देने का। भाजपा ने पूरे प्रकरण में हुई किरकिरी का बसपा के विवादित और अश्लील नारों का मुद्दा उछालकर कलंक धोने की तैयारी की है। भाजपा की यूपी इकाई के पदाधिकारियों का कहना है कि मायावती पर अभद्र टिप्पणी पर पार्टी ने तत्काल दयाशंकर को बाहर कर दिया। अब हमारी मांग है कि जिस तरह से बसपा के नेताओं ने दयाशंकर की पत्नी-बेटी के बारे में अभद्र टिप्पणी की, उन्हें भी बाहर किया जाए। नसीमुद्दीन को पार्टी से निकाला जाए। तभी आंदोलन थमेगा।
          एक छोटी सी गलती कब आपसे जनसमर्थन छीन ले और विरोधी को फायदा पहुंचा दे, यह दयाशंकर-मायावती प्रकरण में देखा जा सकता है। मायावती के खिलाफ अभद्र टिप्पणी करने से मामला गरमाया तो सहानुभूति की लहर मायावती के पक्ष में पैदा हुई। मगर जैसे ही अगले दिन भाजपा ने लखनऊ के हजरतगंज चैराहे पर दयाशंकर की जुबान में ही महिला सम्मान की लड़ाई छेड़ी, उसने पूरी बसपाई मुहिम को कमजोर कर दिया। दयाशंकर अपनी बेटी पेश करो के नारे ने बसपा की भद्द पिटवा दी। नतीजा  जो आम जनसमर्थन मायावती के पक्ष में था वह समर्थन दयाशंकर की पत्नी स्वाति सिंह और उनकी बेटी के पक्ष में खड़ा गया।
    और राजनीतिक खेल देखिए गुजरात दलित मामला सामने आने के बाद अचानक दलितों पर हमले के केस सामने आने लगे हैं। बिहार के मुजफ्फरपुर  , दरभंगा से भी इस तरह की खबरें आने लगी है। साफ तौर पर यह वोट की राजनीति है और इसके पीछे सोंची समझी रणनीति है।

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