Sunday, July 3, 2016

पूरी दुनिया मिलकर आतंक को खत्म करे


अखिलेश अखिल 
दुनिया में आतंक का साया गहराता ही जा रहा है। अभी दो रोज पहले ही जिस तरह से बांग्लादेष में आतंकियों ने 20 लोगों को बंधक बनाकर और फिर बला काटकर सबकी हत्या कर दी है उससे साफ हो जाता है कि इस्लाम के नाम पर आतंकी पूरी दुनिया में दहषत फैलाने में लगे हुए है।  रमजान के इस पावन महीने में भी आतंकियों को सब्र नहीं है। जिस इस्लाम के नाम पर वह इंसान का खून करते फिर रहा है, इस्लाम इसकी कभी भी और कहीं भ्ज्ञी इजाजत नहीं देता। इस्लाम आवाद रहे इसे भला कौन स्वीकार नहीं करेगा। लेकिन दुनिया के सभी धर्म और सभी धर्म के अनुयायी भी आवाद रहे, इस पर आतंकियों को परहेज है। इन आतंकियों से कौन पूछने जाए कि वे किसके लिए खून कर रहे हैं और इसका अंत कहां होना है? इस्लाम के नाम अलग अलग गुटों में बंटे आतंकी पूरी दुनिया को तबाह करने में जुटे है। दुनिया अमन शांति से संचालित होती है जबकि आतंकियों को षांति से ही नफरत है। 
      आतंकी संगठन अलग अलग हो सकते हैं। उनके निशाने भी अलग हो सकते हैं लेकिन  सबकी लेकिन नृशंसता एक जैसी ही  है। अलग-अलग देशों में कहर मचा रहे इस्लामी आतंकवादी संगठनों पर गौर करें, तो यही तस्वीर उभरती है। तुर्की में इस्तांबुल के कमाल अतातुर्क हवाई अड्डे पर हुए आतंकी हमले में 42 लोग मरे, तकरीबन डेढ़ सौ जख्मी हुए। तुर्की सरकार ने इसके लिए इस्लामिक स्टेट आईएस को दोषी ठहराया। आहत दुनिया अभी इस खबर के असर से उबरी भी नहीं थी कि गुरुवार को अफगानिस्तान की राजधानी काबुल में हुए बम धमाकों ने उसे फिर हिला दिया। यहां 30 से ज्यादा जानें गईं। 50 से अधिक लोग घायल हुए। तालिबान ने हमले की जिम्मेदारी ली। जून में अफगानिस्तान में इस खूंखार संगठन का यह तीसरा बड़ा हमला है। 19 जून को काबुल में ही उसने एक बस पर आत्मघाती हमला कर 14 नेपाली सुरक्षा गार्डों को मार डाला था। पांच जून को इसी शहर में हुए बम विस्फोट में एक अफगान सांसद और तीन दूसरे लोग मारे गए।
    तुर्की में भी हाल में लगातार बम धमाके हुए हैं। बीते साल तुर्क सरकार और कुर्द अलगाववादियों के बीच संघर्ष-विराम खत्म हो गया। तबसे ऐसे धमाकों में इजाफा हुआ है। तुर्की नरमपंथी इस्लामी देश है। आईएस वहां कट्टरपंथी शासन लाना चाहता है। सीरिया और इराक की तरह ही आईएस ने तुर्की के मौजूदा शासकों के खिलाफ भी जंग का एलान कर रखा है। हालांकि अभी वहां सीरिया जैसी गृहयुद्ध की हालत नहीं है, किंतु वहां की सुरक्षा स्थिति को लेकर आशंकाएं लगातार गहराती गई हैं। कुछ ही दिन पहले अमेरिकी विदेश विभाग ने अपने नागरिकों को चेताया कि वे तुर्की जाएं तो वहां सावधानी बरतें।
             आईएस के आतंक का साया फ्रांस से लेकर बेल्जियम तक पर पड़ चुका है। अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए ने आगाह किया है कि इस्तांबुल जैसा हमला अमेरिका में भी हो सकता है। भारत में बुधवार को हैदराबाद में राष्ट्रीय जांच एजेंसी एनआईए ने आईएस के मॉड्यूल को ध्वस्त करने का दावा किया। पांच लोग गिरफ्तार किए गए। यानी खतरा हर जगह है। आईएस और तालिबान के रोजमर्रा के खूनखराबों के बीच अलकायदा का नाम फिलहाल पृष्ठभूमि में चला गया लगता है। लेकिन यह आतंकी संगठन खत्म हो गया है, यह मानने का कोई आधार नहीं है। ऐसे तमाम संगठनों का घोषित उद्देश्य पूरी दुनिया में इस्लामी राज कायम करना है। इस्लामी राज की समझ पर उनमें मतभेद हैं। खुद को ज्यादा इस्लामी बताने की होड़ भी उनके बीच है। मगर अपनी धर्मांधता और उन्माद से उन्होंने पूरी दुनिया में भय का माहौल बना रखा है। अफसोसनाक है कि उन्हें परास्त करने के लिए जैसी एकजुटता चाहिए, वह दिखाने में दुनिया अब तक नाकाम रही है। जबकि भारत ने विश्व मंचों पर इसकी लगातार वकालत की है। अब जबकि पानी सिर के ऊपर से गुजर रहा है, क्या विश्व समुदाय भारत की बातों पर ध्यान देगा?
     आतंक को परास्त करने के लिए अब एक ही रास्ता है। इमानदारी के साथ पूरी दुनिया को एक होकर इसके खात्मे की कोषिष करना। अगर कोई देष इस इमानदार कोषिष में साथ नहीं देता है तो विष्व विरादरी को उसे अपने तमाम संबंधों से अलग कर देना चाहिए। याद रखना होगा कि जिस तरह से आतंकी पूरी दुनिया में जहर फैलाने में लगा हुआ है, अगर कोई देष अपन लाभ के लिए उस जहर का अपरोक्ष सहयोगी है तो विष्व विरादरी सबसे पहले ऐसे देषों को ही अलग थलग करे। अब एक होने का समय है। छोटे छोटे गुटों में बंटे आतंकी एक दूसरे से ज्यादा खतरनाक बनने के फेर में लगे हुए हैं। भारत सदा से ही आतंक के खिलाफ विष्व मंच पर आवाज उठाता रहा है। दुनिया को अब भारत की बातों पर यकीन करना चाहिए  और मिलकर इस आतंक के नासूर को समाप्त करने में जुट जाना चाहिए। 
     

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