Monday, July 18, 2016

देश का बदलता राजनीतिक मिजाज


 अखिलेश अखिल
देश का राजनीतिक मिजाज अब बदल रहा है। अब पहले वाली बात नहीं रही कि नेता और राजनीतिक दल के पीछे गंवई समाज और शहरी भीड आगे-पीछे कर रही थी। अब आगे आगे जनता है और पीछे पीछे नेता और राजनीति।  अब वह समाज भी बदल रहा है, जिसे शहरी या गंवई नेता एक बोतल शराब पिलाकर वोट उगाह लेते थे। अब तो  उन दबंग और गुंडे नेताओं की राजनीति पर भी आफत आ गई है, जो दबंगई के बल पर लोगों को डरा-धमकाकर बूथ कब्जा करने से लेकर वोटर बॉक्स बदलने की कारस्तानी करके संसद से विधानसभा में पहुंचकर देश, समाज और जनता के लिए कुछ करने के बजाय अपने गुंडई के लिए लोगों में ज्यादा लोकप्रिय होते थे।
देश बदल गया है। लोकतंत्र के मायने बदल गए हैं। अर्थनीति बदली है और सबसे विलग कि स्वास्थ्य, शिक्षा, सामाजिक परिवेश में बदलाव के साथ ही ग्लोबल दुनिया की समझ ने लोगों में एक नई तरह की राजनीतिक सोच पैदा कर दी है। समाज और लोगों में यह बदलाव वर्तमान राजनीति को बदलने को मजबूर कर रहा है।  राजनीति में यह  बदलाव पुराने नेताओं को अब  भारी पड रहा है। यकीन कीजिए, यही वजह है कि राहुल, केजरीवाल, अखिलेश  यादव और तमाम क्षत्रप नेता समेत मोदी सरीखे नेता इस बदलाव को भांपकर हर रोज राजनीति का एक नया आयाम गढते दिख रहे हैं।
            यह राजनीति बदली कैसे? ऐसा क्या हो गया कि बनती-बिगडती सरकार के सामने देश के विभिन्न भागों में उठ रहे आंदोलन एक नई लकीर खींच रहे है?चार साल पहले को याद कीजिए। आखिर अन्ना हजारे और केजरीवाल के पीछे कौन सी शक्ति आ गई थी  जो सालों से देश पर राज कर रहे राजनीतिक दलों को विशाल जनसैलाब के रूप में चुनौती दे दी थी । आखिर बाबा रामदेव इतने मुखर कैसे हो गए थे? और उनमें राजनीतिक चेतना कहांसे आ गई थी ? इससे जुडे  कई  और प्रश्न और प्रति प्रश्न आ सकते हैं। इन सभी सवालों के गर्भ में छुपा है एक उभरती ताकत का। एक नए मध्यम वर्ग के रूप में देश में एक विशाल ताकत उभर रही है।  कुछ साल पहले तक यह ताकत नेताओं, राजनीतिक दलों और धनी वर्ग के सामने नतमस्तक थी। यही वह वर्ग है, जिसे टॉरगेट करके सरकार नीति और योजनाएं बनाने का ताना-बाना गढती थी। अब यह दबे, कुचले वाली जमात नई आर्थिक नीति के साइड इफेक्ट के रूप में समाज को बदलने के लिए उद्वत है। इस नई जमात के कुछ सपने हैं। उनकी अपनी आकांक्षांऐं हैं। यह जमात भुख की समस्या से उपर उठ चुकी है। यह वही जमात है जो कुछ साल पहले तक गांव और छोटे शहरों में खेत खलिहानों में काम करती थी। शोषणकी शिकार थी। गांव की बदलती तस्वीर, बदलती राजनीति, नेताओं की गुंडागर्दी और सामंतों के शोषण के कारण अधिक कमाने की लालसा में यह जमात गांव से बाहर आ गई है। यह बात अलग है कि शहरों में आकर इनका जीवन और नरक हो गया है लेकिन बाजारवाद इन पर हावी है। यही बाजारवाद इनकी दमित इच्छाओं को और आगे बढने के लिए प्रेरित कर रही है। यह जमात रातों रात वह सब पा लेनेकी कोशिश कर रहा है जो उसके पुरखों ने नहीं किया। 
          अन्ना आंदोलन हो या फिर केजरीवाल की पार्टी आप जैसी पार्टी इसको  बल देने वाला यही न्यू मिडिल क्लास है, जो समाज को बदलना चाह रहा है। यह वही वर्ग है, जो वंचितों और मध्यम वर्ग के बीच खडा है। यह वही वर्ग है,जिसे सब कुछ पाने की आकांक्षा है और सालों से चल रहे भ्र्रष्टाचार पर चोट करने की तीव्रता है। अभी हाल में ऐसे लोगों पर नेशनल कौंसिल आॅफ एप्लाइड इकॉनामिक रिसर्च ने अध्ययन किया है। भारतीय समाज में आ रहे अहम बदलाव को ध्यान मेंरखकर हुए इस शोध में कहा गया है कि जो लोग सरकार को टक्कर देने के लिए जनांदोलनों में हिस्सा ले रहे हैं, उनके परिवारों की औसत आय डेढ लाख से लेकर साढे तीन लाख तक की है। इस वर्ग के लोग भले ही ज्यादा शिक्षित नहीं होते,लेकिन वह अपने बच्चों का भविष्य संवारना चाहता है, ताकि वह भी मध्यम वर्ग मेंशामिल हो सकें। मध्यम वर्ग में शामिल होने की इच्छा रखने वाला यह समूह ही भारत की बहुप्रचारित विकास गाथा का हिस्सा होना चाहता है और इसमें शिक्षा एकअहम हिस्सा बन रहा है। मध्यम वर्ग की यह इच्छा उसे अन्ना और केजरीवाल केआंदोलन में शामिल होने के लिए प्रेरित कर रही है।
       माना जा रहा है कि 2016-17 तक इस जमात में शामिल लोगों की तादात बढकर 44.40 करोड़ हो जाएगी यानी आवादी का 34 फीसदी । इसी बीच मघ्यम वर्गकी तादाद बढकर करीब 26 करोड़ हो जाएगी। आप कह सकते हैं कि इस दशक के अंत तक इन दोनेां वर्गों की तादाद पूरी आवादी का 54 फीसदी पहुंच जाएगी। इसका साफ मतलब यह है कि आने वाले समय में गरीब सबसे बड़ा या प्रभावी वर्ग नहीं रह जाएगा जिसे खुश करने  के लिए राजनीतिक दलों को खून पसीने बहाने पर रहे हैं। अब आर्थिक मुद्दे चुनाव के नतीजे तय करेंगे और तमाम चुनावी हथकंडे गौण हो जाऐंगे। आज मोदी,राहुन पटनायक, नीतीश से लेकर जयललिता और पूर्वोत्तर में जोराजनीति चल रही हैवह सब विकास के आगे पीछे ही घूम रही है। मामला अब जातीय, धार्मिक और गुंडई समीकरण से अलग होकर किसने जनता के लिए क्या किया इस पर आकर टिक गई है।यकीनन समाज के इन दो वर्गों की राजनीतिक चेतना का असर 2014 में तो पड़ा ही  2019 के राजनीतिक परिणामों पर भी पड़ेगे।
           लेकिन ये सभी बाते सिक्के का एक पहलू है। दूसरा पहलू ये हैं कि जिस जमात का उफान इन दिनों हो रहा है।वह न सिर्फ भविष्य में अर्थनीति को तय करेंगे वल्कि लोकतंत्र और राजनीति का मिजाज भी बदल देंगे। इसके वजह भी हैं। उदारीकरण के इस दौर में बड़ी और शिथ्खत होने वाली इस  पीढी को देखते हुए एनसीएइआर के अर्थशास्त्री राजेश शुक्ला का मानना है कि ‘ इस जमात की पीढी समान अवसर और योग्या के सिद्धांत में विश्वास करती है। सिस्टम में भ्रस्टाचार और संसाधनों के लगातार कुछ हाथें तक सिमट जाने कंइ स दौर में उसे लग रहा है किसमावेशी विकास  का नारा कितना खोखला या उसके सामने किस तरह की दिक्कतेखड़ी है।इसके अलावा समतावादी समाज की बातें भी उनके मन में उमर घूमर रहीहै।’
       ऐसा नहीं है कि देश या दुनिया में यह कोई पहली घटना घट रही हैं। हर समाजमें मध्यम वर्ग का उभार सामाजिक ब्यवस्था में बदलाव से जुड़ा रहा है।जैसे जैसे इसजमाज की तादाद बढती है यह यथास्थितवाद को चुनौती देती है और सत्ता की ताकतोंमें संतुलन बनाने की कोशिश करता है।सत्ता और नीति निर्माण में उन्हें अपना वाजिब हक चाहिए होता है और राजनीतिक खिलाडियों को चुनौती देता है। राजनीति को चुनौती अगर मिल रही ह ैतो यकीन कीजिए कि सत्ता और विपक्ष की राजनीति को बदलनी होगी और ऐसा हुआ तो एक नए समाज का निर्माण संभव है।यह भी सही है कि कोई भी राजनीतिक या सामाजिक नियम या बदलाव लंबे समय तक ठकरता नहीं है। लेकिन वर्तमान में जो बदलाव के लक्षण दिख रहे ं हैं वह राजनीति को बदलने के लिए काफी है।
     समाजिक बदलाव के इस दौर में राजनीति चिंता में फंसी है। यही वजह है कि मीडिया में भी राजनीतिक सोंच बदल रही है। एक ही अखबार या टीवी चैनल एक दिन किसी पार्टी या नेता के बारे में कोई और राय रख रहा है और दूसरे दिन वही मीडिया अपनी अलग राय रख रही है। ऐसे हालात में सवाल उठते हैं कि क्या राहुल मोदी से डर रहे हैं?या फिर कांग्रेस भाजपा का कब्र खोदने में लगी है? क्या मान लिया जाए कि मोदी देश की विकास गाथा लिखनेे चले हैं और कांग्रेस समेत तमाम क्षेत्रिय दल एक दूसरे को मात देने में लगे हैं?ऐसा नहीं है। इन तमाम राजनीतिक पुरोधाओं के सामने उभरती नए मघ्यम वर्ग की जमात एक बड़ी चुनौती है। इसी उभरती जमात को जो जितना साध लेगा वहीं आगे की राजनीति कर सकेगा। आज की तमाम राजनीतिक पार्टियां इसी उभरती ताकत को समझ रही है और आगे कैसे कदम बढाए जाए इस पर मंथन कर रही है। बदलाव के इस दौर में नई जमात क्या खेल करती है इस पर आगे की राजनीति टिकी है। 


      

No comments:

Post a Comment