Thursday, August 4, 2016

और आनंदी ने इस्तीफा दे दिया......


अखिलेश अखिल 
 जो अटकलें  थी वही हुआ। गुजरात की पहली महिला मुख्यमंत्री आनंदी बेन पटेल ने इस्तीफा दे दिया।  दो महीने से लगातार यह चर्चा चल रही थी कि भारतीय जनता पार्टी का नेतृत्व गुजरात में मुख्यमंत्री बदलने पर विचार कर रहा है। आनंदीबेन पटेल सरकार की कथित नाकामियों से वहां भाजपा की परेशानी तो बढ ही गई थी आगे भी बढने वाली थी। भाजपा कह रही है कि आंनंदी की उम्र 75 साल की हो गई है इसलिए उन्हें हटना पड़ रहा है। लेकिन केवल यही बात नहीं है।  आनंदी की वजह से भाजपा को कई तरह की समस्याओं से जुढना पड़ रहा है।  आनंदी पर भ्रष्टाचार के भी आरोप लगे हैं। उनकी बेटी अनारा को लेकर आंनदी सरकार पर सवाल खड़े किए गए। 
     दरअसल, गुजरात में पिछले कुछ समय से लगातार ऐसी घटनाएं हुई हैं, जो भाजपा के लिए चिंता का कारण हैं। सबसे ताजा प्रकरण राज्य में भड़का दलित आंदोलन है, जो एक बड़े संकट का रूप ले चुका है। गौरक्षा दल की कथित ज्यादतियों के खिलाफ रविवार को हजारों दलित अहमदाबाद की सड़कों पर उतरे। उनके नेताओं ने भाजपा को सियासी नतीजे भुगतने के लिए तैयार रहने की चेतावनी दी। पिछले साल आरक्षण की मांग को लेकर पाटीदार समुदाय के आंदोलन ने भी हिंसक रूप ले लिया था। पाटीदारों के नेता हार्दिक पटेल हाल में जमानत पर जेल से रिहा हुए, तो उन्होंने फिर अगले विधानसभा चुनाव में भाजपा को सबक सिखाने की बात कही।
ऐसी बातें महज धमकियां नहीं रही हैं। बल्कि पिछले साल हुए स्थानीय निकाय चुनावों में भाजपा को अप्रत्याशित हार का सामना करना पड़ा। पाटीदारों की नाराजगी को ही इसका मुख्य कारण माना गया। गुजरात को भाजपा का गढ़ बनाए रखने में शायद सबसे खास रोल पाटीदार समुदाय का ही था। बताया जाता है कि आरक्षण आंदोलन के समय हुई सख्त पुलिस कार्रवाई से ये समुदाय गुस्से में है। पाटीदार खास तौर पर आनंदीबेन पटेल से खफा बताए जाते हैं। उनकी शिकायत है कि इसी समुदाय से आने के बावजूद उनकी मांग के प्रति मुख्यमंत्री असंवेदनशील रहीं। अब दलितों का आक्रोश भी फूट पड़ा है। इससे भाजपा नेतृत्व का आशंकित होना स्वाभाविक है। दो सामाजिक वर्गों को नाखुश रखते हुए भाजपा नवंबर-दिसंबर 2017 के विधानसभा चुनाव में अपनी जीत का सिलसिला कायम रखने के प्रति आश्वस्त नहीं रह सकती।
गुजरे दो दशक में गुजरात धीरे-धीरे भाजपा की पहचान और प्रभाव से जुड़ता गया। उस राज्य में कमजोर पड़ने का पार्टी के मनोबल पर काफी बुरा असर होगा। लिहाजा उचित ही है कि पार्टी नेतृत्व वहां की प्रशासनिक एवं राजनीतिक स्थिति पर दोबारा नियंत्रण कायम करने का प्रयास करे। फिर आनंदीबेन 75 साल की भी हो चुकी हैं। नरेंद्र मोदी-अमित शाह के काल में भाजपा ने इस उम्र के बाद नेताओं को बड़ी सरकारी जिम्मेदारी में ना रखने का अलिखित नियम बनाया हुआ है। इन सारी बातों के कारण ही आनंदीबेन को हटाने की अटकलें चल रही थीं। आखिरकार आनंदीबेन ने एक फेसबुक पोस्ट के माध्यम से खुद मुख्यमंत्री पद छोड़ने की पहल कर दी। अब उनका पद छोड़ना महज एक औपचारिकता रह गई है। आशा करें कि नए मुख्यमंत्री के सत्ता संभालने के बाद भाजपा गुजरात में उन हालात को संभालने में सफल होगी, जो पिछले डेढ़-दो साल में उसके हाथ से फिसलते नजर आए हैं।
       कहा जा रहा है कि आनंदी की विदाई भी भव्य तरीके से होगी। स्वयं प्रधानमंत्री मोदी भी उस विदाई समारोह में शामिल होंगे। आनंदी को पंजाब का राज्यपाल बनाने की भी बात की जा रही है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल ह ैकि आनंदी के बाद गुजरात किसके हाथ में सौंपेगी भाजपा? कई नाम सामने आ रहे हैं। कुछ नाम सामने करवाए भी जा रहे हैं । मुख्यमंत्री पटेल समुदाय से बने या फिर पिछड़े या आदिवासी समाज से? फिर अमित षाह की क्या भूमिका होगी? गुजरात में भाजपा को सत्ता में लाने अमित शाह की भूमिका को कमतर नहीं माना जा सकता। संभव  है कि अमित षाह की ही ताजपोषी कर दी जाए। इससे गुजरात की आगामी चुनावी राजनीति को शाह देख सकते हैं। 

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