Saturday, August 13, 2016

रक्तरंजित विभाजन ने हमारी साझी विरासत को छीन लिया


अखिलेश अखिल

देष आजादी का 70 वां वर्षगांठ मनाने जा रहा है। सरकारी स्तर पर तैयारी चल रही है। लेकिन देश  के लोगों में कोइ्र हलचल नहीं। होगा भी क्यों? जिस मूल्क  में ’पहले अपना फिर देश ’ की सोंच स्थापित है उसके बारे में क्या कहना? खैर अभी इन मसलों पर बात करने की जरूरत नहीं है। आज हम इस रपट के जरिए आपको ले चलेंगे बंटवारें से पहले उस साझी संस्कृति की ओर जिसे देख सुन दुनिया इष्र्या करती थी। लेकिन बंटवारे के साथ मिली आजादी ने हमें अपनी साझी संस्कृति से भी अलग कर दिया। लेकिन सबसे पहले आजादी की पृष्टभूमि में देष बंटवारें पर कुछ चंद बातें।
       15 अगस्त 1947 को एशिया का उपमहाद्वीप कहलाने वाला भारत, ब्रिटिश हुकूमत से आजाद तो हो गया, लेकिन द्विराष्ट्र के सिद्धांत पर। अंग्रेजों ने भारत को आजादी इसी शर्त पर दी कि अखंड भारत खंडित होगा।  हिंदुस्तान और पाकिस्तान के रूप में। भारत का विभाजन माउंटबेटन योजना, भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 के आधार पर किया गया। बहरहाल, अंग्रेजों और लॉर्ड माउंटबेटन के लिए भारत और पाकिस्तान नक्शे पर महज एक लकीर के जरिये अलग हो गया, लेकिन जमीन पर विभाजन की यह रेखा पूरी मानवजाति के इतिहास की एक ऐसी भयावह, रक्तरंजित, अमानवीय, क्रूर और जघन्य घटना थी कि पूरे विश्व की मानवता शर्मसार हो गई।
           क्या आपको पता है भारत-पाक बंटवारे की ये सच्चाई? सुनकर दिल दहल उठता है। सिर चकरा जाता है बंटवारे की कथ जानकर। उस बंटवारें ने इतिहास का भी ष्षर्मिंदा कर दिया था। दरअसल, भारत और पाकिस्तान का बंटवारा महज 50 से 60 दिनों के भीतर  किया गया। उसमें लाखों लोगों का विस्थापन हुआ था। ऐसा विस्थापन पूरी दुनिया में कभी नहीं हुआ था।  10 किलोमीटर लंबी लाइन में लाखों लोग देशों की सीमा को पार कर रहे थे। महज कुछ ही समय में एक स्थान पर सालों से रहने वाले को अपना घर बार, जमीन, दुकानें, जायदाद, संपत्ति, खेती किसानी छोडकर हिंदुस्तान से पाकिस्तान और पाकिस्तान से हिंदुस्तान आना जाना पड़ गया था।
आपको जानकार आश्चर्य होगा कि मनुष्य जाति के इतिहास में इतनी ज्यादा संख्या में लोगों का विस्थापन कभी नहीं हुआ। यह संख्या तकरीबन 1.45 करोड़ थी। 1951 की विस्थापित जनगणना के अनुसार विभाजन के एकदम बाद 72,26,000 मुसलमान भारत छोड़कर पाकिस्तान गये और 72,49,000 हिन्दू और सिख पाकिस्तान छोड़कर भारत आए। धर्म के नाम हुए इस विभाजन में दंगे-फसाद और मारकाट के बीच मानवता जितनी शोषित, पीड़ित, और छटपटाई है उतनी किसी घटना में नहीं हुई। 10 हजार से ज्यादा महिलाओं का अपहरण किया गया, उनके साथ बलात्कार हुआ, जबकि सैंकड़ों बच्चे अनाथ हो गए, लाखों मारे गए।
         एक अनुमान के मुताबिक विभाजन की इस रूह कंपा देने वाली और मानवजाति के इतिहास को शर्मिंदा कर देने वाली इस त्रासदी में तकरीबन 20 लाख से ज्यादा लोग मारे गए। इसके बाद आजाद पाकिस्तान और आजाद भारत दोनों में ही विस्थापन के बाद अपना सबकुछ छोड आए लोगों को अपने जीवन को पटरी पर लाने के लिए, घरबार काम धंधा दोबारा जमाने के लिए शरणार्थी बनकर जिस अमानवीय त्रासदी से गुजरना पड़ा वह तो एशिया के इतिहास का काला अध्याय है। विभाजन का यह काला अध्याय आज भी इतिहास के चेहरे पर विस्थापित हुए, भगाए गए, मारे गए, भटक कर मौत को गले लगाने वाली मनुष्यता के खूने के छींटों से भरा है। इतिहास गवाह है, सियासत ने अपने ख्वाबों को तो पूरा किया, लेकिन धर्म के नाम पर, जाति के नाम भोले-भाले इंसानों को हिंदू और मुसलमानों में बांटकर। सियासतदान तो चले गए, लेकिन जनता के दिलों में, पीढ़ियों के दिलों में खूनी विभाजन और विस्थापन यह दर्द आज भी आधी रात को रह-रहकर उठता है।
    भारत का विभाजन दो मुल्को में हो गया । एक भारत और दूसरा पाकिस्तान । करीब 20  लाख से ज्यादा लोगो की मौत का गवाह भी है यह भारत पाक बटवारा । कहते है की 2 करोड़ से ज्यादा लोग विस्थापित हुए थे उस दर्दनाक बटवारे में । भाई से भाई बिछुर गया। बहन से भाई बुछुर गया । मां से बेटा और बाप से बेटी बिछुर गयी । हमारी साझी वरासत बिछुर गयी । हमारी तमीज और तहजीब बदल गयी । एक जान दो शरीर में बंट गए । हम , मैं और तुम में बदल गए । हिंद-पाक विभाजन ने हमसे जो छीना, वो आज भी दोनों देशों के लिए एक दुखती रग है। 
          14 अगस्त 1947 से पहले पाकिस्तान नहीं था। हम सब हिंदुस्तानी थे। दोनों देशों की सीमाऐं 1947 से ही खींची गई हैं। त बवह पतली सी रेखा थी । बस आज वो गहरी हो चुकी हैं। विभाजन के बाद बहुत से आशियाने तबाह हुए, तो बहुत से दर्द दिलों में बसे। आज भी कई दर्द जिंदा हैं। लेकिन आज उनकी बात करेंगे जो विभाजन ने हमसे छीन लिया। उनमें कुछ शख्सियतें भी शामिल होंगी।
        सआदत हसन मंटो को भला कौन नहीं जानता। देष के बंटवारे ने हमें मंटों को अलग कर दिया। बंटवारे की त्रासदी ने मंटो पाकिस्तान में पटक दिया। कह सकते हैं कि साहित्य जगत का जाना-माना नाम सआदत हंसन मंटो हमारे देश की सीमाओं के बीच पिस गया। उनकी कहानियां ‘टोबा टेक सिंह’ और ‘टिटवाल का कुत्ता’ इस बात की गवाही देती हैं कि मंटों दोनों देशों को एक मानते थे और दोनों के लिए ही दर्द लेते जीते रहे। और उस फैज अहमद फैज को क्या कहेंगे? फैज अहमद फैज अपनी षायरी से लोगों के दिलों पर राज करते थे। उनकी षायरी आज भी हमें मस्त कर देती है। बंटवारे से पहले  फैज सिर्फ हिंदुस्तानी थे। लेकिन बंटवारे के बाद वे पाकिस्तानी हो गए। आज भी फैज की षायरी हमें सोने नहीं देती। अपनी शायरी से और दिल के जज्बातों से ही फैज सीमाओं को लांघते गये थे। उन्होंने पाक और हिंदुस्तान, दोनों के लिए लिखा, सोचा, समझा। पर अंत में क्या मिला... सिर्फ दर्द। विभाजन के शोरगुल में उन्हें भी बंटना पड़ा और हमारी आंखें बस देखती रहीं।
       अलम्मा इकबाल को भला कौन नहीं जानता। आजादी की लड़ाई साथ साथ लड़ने वाले हमारे इकबाल को बंटवारे ने पाकिस्तान जाने पर मजबूर पर कर दिया।  सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा, हम बुलबुले हैं इसके ये गुलस्तां हमारा... इन पंक्तियों को कोई भूल सकता है भला? विभाजन के बाद इकबाल पाकिस्तान में ही रह गये। हमारे देश के लिए लिखने वाले लोग बहुत थे, लेकिन इकबाल जैसा कोई नहीं हुआ।
     बंटवारे ने हमसे लाहौर का बाजार छीन लिया।  लाहौर के बाजार में क्या हिंदू क्या मुसलमान और सिख हुड़दंग मचाया करते थे। तरह तरह की चीजें आखिर मिलती भी वहीं थी। लाहौर के अनारकली बाजार से बहुत लोगों का दिल का रिश्ता होता था, हालांकि भारत में बसते कई लोग अभी भी इससे अपना नाता जोड़ लेते हैं। लेकिन उन गलियों के नजारे हमसे दूर चले गये। क्रांतिकारी विचारों को अपने दिलों में ले कर चलने वाली ये शख्सियत सिर्फ अपने विचारों की वजह से ही आज भी जिंदा है। लेकिन आज के पाकिस्तान और उस समय के भारत में भगत का घर, जहां उसने बचपन जिया, जहां उसके अंदर अपने से अलग हटकर दूसरों के लिए सोचने का बीज उपजा, वो घर... वो रियासत हमसे छीन गई। सियालकोट मसालों के लिए जाना जाता है और था भी। यहां के मसाले हालांकि आज पुरानी दिल्ली में मिल सकते हैं, लेकिन वो फील नहीं आयेगी जो सियालकोट के बाजारों में आती है। पाक के सिंध में हमारी विरासत, हमारे इतिहास, हमारे पूर्वजों के निशां मोहनजोदड़ों में देखने को आज भी मिल सकते हैं। लेकिन आज वो देखने के लिए इजाजत लेनी पड़ती है। कभी हमारी नजरें आजाद हुआ करती थीं सब देखने के लिए।
          उर्दू में अपनी गजलों को एक मुक्कमल जगह दिलवाने वाले फराज भारत के लोगों की जान हुआ करते थे। उन्होंने दोनों देशों को अपना देश समझा लेकिन बॉर्डर ने इन बातों को नहीं माना और वो हमसे दूर रहे। जो लोग अपने पूर्वजों से ये बातें सुनते हैं कि उनके गांव में सब सही था, दोनों धर्मों में प्यार था, दोनों एक धर्म थे, बस दिलों में स्नेह था मोहब्बत थी, जिंदादिली थी... वो जानते हैं कि विभाजन ने दो देशों का बंटवारा नहीं किया बल्कि हजारों घरों का बंटवारा किया। पाक के संगीत को आज भी हम लोग सलाम करते हैं। वहां के संगीतकार हमसे दूर हो गये हालांकि उनकी आवाज आज भी हमारे कानों में पड़ती है तो दर्द के वो आलम पसर जाते हैं। इन महान लोगों को  देशों की सीमाओं में बांधने की कोशिश कोई  नहीं कर सकता क्योंकि ये शख्सियतें अपने आप में पूरी हैं। बाकी दर्द दोनों देशों के दिलों में हैं इसीलिए आज भी दोनों एक ही हैं।

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