Wednesday, August 17, 2016

अखंड भारत तो राजनितिक खेल भर है , पहले भारत को तो बचाइए


 अखिलेश अखिल 
इंडिया दैट इज  भारत।   हमारे साथ संधि पत्र पर हस्ताक्षर करते हुए आज से ७० साल पहले अंगेजो ने  हमारे देश को इसी नाम से परिभाषित  किया था। सत्ता की लोलुपता ऐसी थी कि हमारे नेताओ ने इंडिया दैट इज भारत की  जगह भारत दैट इज इंडिया भी करवा पाने में  असफल रहे। अंग्रेजो का दिया यह नाम आज भी  हम ढो  रहे है। आज हमें  इंडिया के नाम से ही दुनिया जानती  है। दुनिया की  नई पीढ़ी तो हमें  भारत नाम से  जानती भी नहीं होगी।  लेकिन  देखए कि देश का एक तपका आज भी अखंड भारत  की  राजनीति करता फिर रहा है।  इस अखंड भारत के पीछे की राजनीति १९४७ से ही चली  आ रही है। आधुनिक दुनिया में अखंड  राजनीति केवल हमारे देश में है।  पूरी दुनिया आज भू राजनीति के मकड़ जाल  में फसी है।  छोटे छोटे जमीं  के टुकड़ो को लेकर पूरी दुनिया  दूसरे की नजर  चढ़ी हुयी है।  एक दूसरे का दुश्मन।  ऐसे में अखंड भारत  की राजनीति हमें क्या सन्देश देती है समझ से पड़े है। लेकिन   राजनीति  को भला कौन चुनौती दे सकता है ?  कहते है कि  प्राचीन भारत कई नामो से जाना जता रहा है।  वेद , पुराणों और प्राचीन संदर्भो से पता चलता है की यही भारत कभी आर्यावर्त , कभी हिदुस्तान , कभी हिंदुस्थान  और कभी सिंधु देश के नाम  से  भी जाना जाता रहा है। तब अखंड भारत की कल्पना रही होगी।  तब का अखंड भारत आज कई देशो में विभक्त है। इस आधुनिक जमाने में  अखंड भारत के पुराने हिस्से को आप मिलाने की बात  करते है तो जाहिर है की आप अपने पडोशी देशो से युद्ध  बात कर रहे है।  ऐसे में अखंड भारत की पूरी बात राजनीति और ठगी से ज्यादा कुछ भी नहीं। 
          ये सार्क या दक्षेश देश क्या है ? इसे हम मोटे तौर पर अखंड भारत की परिकल्पना ही कह सकते  है।  लेकिन देखिये कि आज तक हममें एका  नहीं  हो सका।   जब हम मानसिक तौर पर एक नहीं हो सकते तो फिर भूगौलिक स्तर पर एक कैसे हो सकते हैं? लेकिन इस तरह की बातें इस देष में होती रहेगी क्योंकि इससे राजनीति को बल प्रदान मिलता है। आखिर इस तरह की बातें आज हम क्यों कर रहें हैं? इसके पीछे वह राजनीति है जिसकी ओर कल हमारें प्रधानमंत्री ने लालकिले की प्राचीर से संबोधित करते हुए रेखांकित कर रहे थे। अपने डेढ घंटे के भाषन में प्रधानमंत्री मोदी ने देष की तमाम समस्याओं की ओर अपनी बातें रखते हुए पाक अधिकृत कष्मीर से लेकर बलुचिस्तान और गिलगिट से लेकर बाल्टिस्तान की बातें कह गए। हम कह सकते हैं कि भारत पाकिस्तान बंटवारे के समय भी बलुचिस्तान एक स्वतंत्र रियरसत के रूप में रहने का निर्णय लिया था। बाद में बडे ही छल से पाकिस्तान ने उसे हड़प लिया। पड़ोसी होने के नाते हम बलुच लोगों से सहानुभूति तो रख सकते हैं और उनके दुख सुख में भागीदार तो बन सकते हैं लेकिन अभी हम बलुच मामले को अपनी राजनीतिक जद में लेकर कई और फा्रंट को नहीं खोल सकते। हमारे लिए पाक  अधिकृत कष्मीर पर बातें करना ज्यादा महत्वपूर्ण है। पूरा कष्मीर भारत का रहा है और हमें घोखें में रखकर पाकिस्तान ने हमारे उस हिस्से को अपने पास रखा हुआ है। पाकिस्तान ने यहीं तक अपनी राजनीति नहीं खेली। हमारे एक हिस्से को उसने चीन के हवाले भ्ज्ञी कर रखा है। हमारी सरकार की सबसे ज्यादा जोर उस पाकिस्तान अधिकृत कष्मीर की तरफ होनी चाहिए ।
         ल्ेकिन इससे पहले कुछ बातें और भी है। हमारे देष में अलगावबाद की राजनीति भ्ज्ञी कुछ कम नहीं है। पूर्वोत्तर के कई राज्य इसी राजनीति के षिकार है। कई राज्यों में उगवादियों ने हमें जीना मुहाल कर रखा है। देष के 13 राज्य नक्सलवाद से पीड़ित हैं। ये नक्सल आंदोलन वाले भी दंडकारण्य राज्य की परिकल्पना पाले हुए हैं । सबसे पहले हमें इन समस्याओं को भी देखना होगा। जब तक आंतरिक ष्षांति नहीं होगी तब तक विदेषी ताकतों से हम मजबूती से लोहा नहीं ले सकते। 
      और इसके लिए जरूरी है सबको काम और सबको वे सारी बुनियादी सुविधाऐं जो एक मनुष्य को जीने के लिए जरूरत होती है। दो सालों में मोदी की सरकार ने क्या कुछ किया है उसकी लंबी सूची सरकार की ओर से जारी हो सकती है लेकिन असलियत यही है कि आज भ्ज्ञी हम वहीं खड़े हैं जहां से चलने की ष्षुरूआत किए थे। भाषा, जाति,धर्म के नाम पर बढती राजनीति हमारी एकता और अखंडता को ही बाधित कर रही है। चुनावी राजनीति ने हमारी सामाजिक व्यवस्था को गडमड किए हुए है। आज हमें अखंड भारत से ज्यादा एक मजबूत भारत की जरूरत है । मोदी की सरकार को हम राष्ट्वादी सरकार भी मान ले तो सबसे पहले उसे अंग्रेजों का दिया नाम इंडिया को बदलकर उसे भारत में बदलने का प्रयास करना चाहिए।  अगर ऐसा होता है तभी  हम भारत की तरह सोंच पाऐंगे। आज देष में भारत और इंडिया अलग अलग दिख रहा है। 

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