Monday, August 22, 2016

एक क्रांति के सम्पूर्ण वाहक सुलभ -पाठक का अद्भुत खेल


अखिलेश अखिल 
पिछले दिनों कंस की नगरी मथुरा , बृदावन की राजनितिक ताप का एहसास करने पहुचा था। दिल्ली में जानकारी मिली थी कि मथुरा की राजनितिक फिजा इस बार के प्रदेश चुनाव में बदल जायेगी। बीजेपी की सांसद हेमा मालिनी से मथुरा सम्हल नहीं रहा है। मथुरा की जनता में मालिनी जी बदनाम हो गयी है।  मालिनी जैसी कथित नेता से मथुरा नाराज है।  लेकिन असली सच यही है की मथुरा के लोग स्थानीय सांसद को अब देखना तक पसंद नहीं करते।  कुछ महीने पहले इसी मथुरा में एक और कंस रूपी राजनितिक खिलाड़ी ने यहाँ की सत्ता को चुनौती देने की कोशिश की थी ,रसातल में चले गए। मालिनी जी के भाग्य का फैसला तो २०१९ में ही तय होगा। मथुरा , वृन्दावन से सटे गाव की राजनितिक ताप और लोगो की दारुन हालात को देख कर मन खिन्न हो गया। फिर लौट गया धर्म का माला फेरने।  कुछ शान्ति की आस में।  कुछ बरस पहले इसी मथुरा की धरती पर रह रही देश की विधवाओं की दारुन हालात पर एक रिपोर्ट बनाई थी ---- कंस के कोप से कापती विधवाएं। वहा के पंडितो , पुजारियो , ठेकेदारो और धर्म रक्षको के चंगुल में किस तरह से जवान और बूढी हमारी विधवा और जवान माँ - बहने फसी थी , कैसे वे शोषण की शिकार थी , उनके रहने , खाने , भजन करने और सौच जाने के पीछे के  सच को अपने रपट का आधार बनाया था मैंने।  उसी सच को टटोलने फिर मथुरा और वृन्दावन के मंदिरो पर मैंने दस्तक दी। आगे मेरी यह दस्तक कासी और बाराणसी के मठ , मंदिरो और घाटों पर भी पड़ी। लेकिन सब कुछ बदल चुका था। तब की  रोती  विलखती विधवाएं आज है हँस रही थी।  मानो वह कंस के कोप से आजाद हो चुकी हो। 
        लेकिन यह आजादी मिली कैसे ? इन्हें भोजन , कपडे देता कौन है ? इनकी सौच जाने की व्यवस्था किसने की ? तब तो ऐसा नहीं था ! सदा रोने वाली विधवाएं आज मगन कैसे है ? कई तरह के सवाल खड़े हो गए।  आजाद भारत में इस बदलाव से मैं  मूर्छित हो गया। आजादी के ७० वर्षो में इस देश की कोई भी आधारभूत समस्या समाप्त नहीं हो सकी तो फिर घर से निकाली गयी , प्रताड़ित और शोषित विधवाओं के दिन कैसे फिर गए ? पता चला की सुलभ इंटरनेशनल वाले विन्देश्वरी पाठक का यह सब करामात है। स्तब्ध करने वाला जवाब मिला था।  हम कह सकते है की विन्देश्वरी पाठक कभी भी मेरे पत्रकारीय खबरों के दायरे के करेक्टर नहीं रहे थे।  उनके बारे में ना जाने कितनी कहानिया मेरी डायरियों में पैबस्त रहे है , कह नहीं सकता।  कभी काली सूचि की कहानी तो कभी उनके निजी जीवन से लेकर तमाम सामाजिक और राजनितिक खेलो से जुड़े किस्से।  मेरा मन नहीं माना।  एक नहीं , दो नहीं , दर्जनों लोगो , विधवाओं से जानकारी मांगी।  वे सब पाठक बाबा की जय जैकार कर रहे थे। काम , दाम , भोजन , वस्त्र और सबसे ऊपर उनके लिए सौच जाने की बेहतर व्यवस्था।  भोजन , वस्त्र के दानी तो कई और भी थे।  लेकिन पाठक जी ने जिस तरह से इन विधवाओं के लिए नहाने धोने और सौच जाने की व्यवस्था की है , उनके प्रति मेरी धारण बदल गयी। यही सब हाल मथुरा से काशी तक देखा और समझा। 
           दुनिया के इतिहास को पढ़े और समझे तो हमें कई सामरिक क्रांतियों के साथ ही सामाजिक क्रांतियों की जानकारी मिलती है।  सबके हिस्से की अपनी अपनी क्रांतिया रही हो लेकिन विन्देश्वरी पाठक की खुले में सौच के विरोध में जारी क्रांति तमाम क्रांतियों पर भारी पड़ती दिखती है। सुलभ इंटरनेशनल की राजनितिक सोच क्या है , विन्देश्वरी पाठक किस दाल की राजनीति के पास है यह हमें नहीं मालुम।  लेकिन भारत के गाँव और शहरो में जिस क्रांति को वे आगे बढ़ा रहे है उसे सलाम करने की जरुरत है।  यह क्रांति हमारी महिलाओं की इज्जत से जुडी है।  पाठक जी की क्रांति गाँधी के दर्शन पर आधारित है,उन दलितों , सफाईकर्मियों के जीवन में रौशनी लाने की क्रांति है जो सदियो से अपने ही समुदाय के दूसरे इंसान का मल उठाने के लिए अभश्प्त है। कितनी सरकार आयी और गयी किसी ने ना तो महिलाओ शारीरिक और मानसिक  हालात को समझा और ना ही मैला ढोने  वाले समाज के सामने इस अमानवीय व्यवस्था के विरुद्ध कोई काम किया।  आजादी के बाद न जाने कितनी योजनाए वोट की राजनीति के तले बनी और आज भी बनायी जा रही है लेकिन पाठक बाबा की क्रांति के सामने सब बौना है। 
      अगर सामाजिक सुधार के नाम पर कोई व्यववस्था मैग्सेसे , नावेल जैसे पुरस्कारों से किसी को सम्मानित करती है तो पाठक बाबा की क्रांति ऐसी व्यवस्था की जद  में होनी चाहिए।  सुलभ - पाठक की यह मौन क्रांति आजाद भारत के इतिहास की सम्पूर्ण क्रांति कही जा सकती है। 

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