Monday, August 22, 2016

आधुनिक लोकतंत्र पर ठहाका लगा रहे है रूदल चमार


अखिलेश अखिल 
७० साल के  लोकतंत्र  ने रूदल चमार की दीन  दशा बदल दी है।  दलित रुदला अब रूदल राम की दहलीज पर पहुच गए है। रुदला से रूदल।  जबसे रूदल चमार ने होश सम्हाला था तब से ही मालिक , जमींदारों ने गालियो के साथ ही पुकारा था।  किसी ने ज्यादा खुश होकर पुकारा था तो रुदला तक कहा था। रूदल चमार अपना नाम सुनते ही सुध बुध खो कर केवल दौड़ता ही था। मालिको ,  उनके छोटे छोटे बच्चे के मुह से रुदला शब्द की पुकार से हरकत में आ जाते और आदेश की तालीम में जुट जाते थे रूदल। ५ बजे भोर में ही रूदल अपने परिवार के साथ रूखी सुखी रोटी की पोटली बांधे मालिक के देहरी पर हाजिर हो जाते।  उनके परिवार में पत्नी , छोटे छोटे बेटे  और कई  बेटियां होती थी। सब के सब सूखे हुए। मालिक के घर पर सबके लिए काम होता था।  कोई खेत का  काम करता तो कोई घर के लिए छोटे मोठे काम।  दोपहर को थक हार रूदल अपने परिवार के साथ एक जगह बैठ जाते और मालिक की तरफ देखते रहते।  मालिक की तरफ से कुछ रोटियां दे दी जाती।  सब मिल बाँट कर खाते और पेट भर  पानी पीकर फिर अपने अपने काम में लग जाते।  शाम को खाली हाथ परिवार तो लौट जाता लेकिन रूदल अपने मालिक के कई और बेगार काम करने के लिए बैठा रहता।  रात गए रूदल अपने घर लौटता।  खाली हाथ।  बेगारी की कोई कीमत तो होती नहीं।  मालिक की मर्जी होती तो कुछ मिल जाता।  रूदल का पूरा परिवार अपने मालिक के रहमो करम पर था।  कुछ खा लेता तो पानी पिने के लिए माटी का वर्तन लिए घंटो कुआ या नल के पास खड़ा रहता की कोई उसके वर्तन में थोड़ा पानी दाल दे।  भूखा रूदल तब लगभग ५ लीटर पानी पीता  था।  मालिक के घर के फाटे पुराने कपड़ो से रूदल के परिवार की इजात ढकती  थी।  जारा की रात पुआल , चटाई और बोरा  से काट जाती थी रूदल के परिजनों की। दिन रात खटने के बाद भी रूदल के परिवार को भर पेट खाते कभी नहीं देखा था।  इसी कंगाली में रूदल की जनानी काम उम्र में ही काल के गाल में समा गयी।  लेकिन रूदल डिगे नहीं थे।  २ बेटे और तीन बेटियो को रूदल अपनी कंगाली में ही अपने मालिक के रहमो करम पर पाल ले गए।  सबकी शादी भी की।  रूदल भी कम  उम्र में ही बूढ़े से हो गए थे। बाल पाक गए।  कमर झुक गयी।  करीब २० बरस पहले रूदल की यही हालात थी। मैंने भी रूदल को ऐसा ही देखा था।  रूदल के बारे में तब हमारी यही धारणा थी की अन्न का टूटा हुआ रूदल कामचोर है और बतबनौना। लेकिन रूदल से हमारी हमदर्दी थी।  जब भी कभी घर जाता तो रूदल मिलने आता।  अक्सर मैं  उसकी मदद करता।   
         लंबे समय के बाद घर गया तो  हमारे चाचा जी बड़े नाराज दिखे।  कह रहे थे कि  ' रुदला  बदल  गया।  नेता हो गया।  अब वह रूदल राम कहलाने लगा है।  कोई काम नहीं करता।  भर दिन नया  धोती कुर्ता , गोर में चप्पल पहने रहता  है और कुर्सी पर बैठे गोर हिलाता रहता है। इस सरकार ने सबको ख़राब कर दिया।  बिना काम किये सबको पैसा दे रही है सरकार। घोर कलयुग आ  गया है।'  चिल्लाते बोलते चाचा जी चमरटोली की तरफ चले गए। घर में पता चला की चाचा जी अब दिन भर चमरटोली में ही बैठे रहते है।  बेगारी या काम मजदूरी पर खानदान दर खानदान काम करने वाले दलितों के साथ ही चाचा जी भी वहा कुर्सी पर बैठे उन्ही के बीच खैनी खाते रहते है।  जिसे पहले गाली विशेषण के साथ रुदला कहते थे अब उसके सामने वही चाचा जी 'हो रूदल' कह कर पुकारते नजर आते है। 
           हमारी भेंट रूदल से हो गयी।  मेरे घर आने की सुचना रूदल को चाचा जी ने ही दी थी।  रूदल को मैं  बचपन से ही देखता रहा हु। रूदल बदल गए थे।  मिलते ही मालिक प्रणाम कहा और बोला कि  कहिया अइली ह---. बड़ा दुबारा जेल छी।[ कब आये है , बहुत दुबले हो गए है ] परिवार बच्चो का हाल चाल भी रूदल ने पूछा।  मैं  विस्मृत होकर रूदल को देखता रहा।  मैं  रूदल के भूत में चला गया। इसी बीच रूदल दो कुर्सी ले आए और हमदोनो अगल बगल बैठ गए। 
         मैंने रूदल से चमरटोली , मुसहर टोली और बीन टोली के लोगो का हाल पूछा।  रूदल नेता के रौ में आ गए। रूदल  पहले अपने झकास कुर्ता की ऊपरी जेबी से खैनी निकाल कर लटियाए।  मुह में रखा और बोलने लगे ----' मालिक ! आंहा  त बड़ी दिन पर  अइली  ह  . अब खेती बारी कहा है।  सब जमीन परते है। सब चमार , मुसहर , बीन , यादव और धानुक के बच्चा दिल्ली और पंजाब चला गया है। हमरे दुनो बेटा दिल्ली से पैसा भेजता है।  कपड़ा भेजता है।  सरकार ने पक्का का घर बना दिया है। और हम भी अब रोज थाना और प्रखंड  जाते  है। हम भी २ -३ हजार दलाली कर लेते है।  पहले यही काम मालिक लोग करते थे।  अब कोई मालिक वहा नहीं जाते। हमारे टोला में भी स्कूल हो गया है।  अपने जमीं पर। बच्चा सबको सरकार भोजन देता है।  और पैसा भी। अपने के यहाँ जेतना लोग काम कर रहा था सब नेतागिरी कर रहा है।  ठीकेदार हम लोगो को भी देता है। अब मालिक और मजदूर में कौन अंतर है ? हमरो  घर पर ६ कुर्सी है।  बेटा दिल्ली से चाय के वर्तन भी भेजा  है। अब तो मालिक लोग भी चाय पीते  है वहा पर।  चुनाव के समय में भी कमाई हो जाता है।  बड़ा बढ़िया सरकार है मालिक।  न कोई काम ना धाम और पैसा आ जाता है। अब तो मालिक सबके ही हालात ख़राब है।  चमरटोली में आकर देख लीजिये।'
          रूदल ने हमें अपने घर आने का न्योता दिया था।  हम गए भी।  २० बरस पहले की जो कहानी हमारे मन में थी , सब बदल गया था।  ना कोई झपड़ी ना कोई दरिद्रता।  कुलाचे मार रहा था लोकतंत्र।  हर घर पर किसिम किसिम के झंडे।  यह बात और है की शिक्षा के बदले अभी यहाँ के लोग पैसा बना रहे है।  मालिक अपने औकात में आ गए है और दलित समाज पुरे रौ में है।        

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