Friday, August 12, 2016

और संधि पत्र के जरिये हम आजादी मनाते रहे -------


अखिलेश अखिल
सारे जहां से अच्छा हिंदुस्तां हमारा, वंदे मातरम, झंडा ऊंचा रहे हमारा, स्वतंत्रता दिवस अमर रहे और देश की आजादी, राष्ट्रीयता, एकता को लेकर न जाने अनगिनत नारे, अमर शहीदों की कुर्बानियों से जुड़े किस्से और एक-एक साल आगे बढ़ती आजाद भारत के आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक विकास की कहानी। ऐतिहासिक लाल किला के प्राचीर से प्रधानमंत्री के संबोधन से लेकर देश के अखबारों और टीवी चैनलों पर राष्ट्रीयता और देशभक्ति से जुड़े गीत और दृश्य-श्रव्य के जरिए मनलुभावन व कर्णप्रिय कहानी। यही है हमारी आजादी दिवस के मायने। इस दिन पूरा देश एक। पूरी राष्ट्रीयता एक। अनेकता में एकता, सर्व-धर्म-समभाव। फिर 16 अगस्त से सबकी अपनी डफली अपने राग। फिर प्रधानमंत्री ने लालकिला के प्राचीर से बोला उसका छिद्रान्वेषन। पिछले 70 साल से तो यही हो रहा है। हमें अपनी आजादी पर गर्व है। भला गर्व किसे नहीं होगी
लेकिन इस आजादी को हमारे बापू ने छल और प्रपंच कहा था। गांधी ने कहा था कि मैं भारत के उन करोड़ों लोगों को यह संदेश देना चाहता हूं कि ये जो तथा कथित स्वतंत्रता सो काल्ड फ्रीडम आ रही है ये मैं नहीं लाया। ये सत्ता के लालची लोग सत्ता के हस्तांतरण के चक्कर में फंस कर लाएं हैं। मैं मानता नहीं कि इस देश में कोई आजादी आई है। गांधी ने यह प्रेस नोट नोआखाली से 14 अगस्त 1947 को भेजा था। यानि दिल्ली में आजादी के गीत के साथ ही जश्न की तैयारी चल रही थी और गांधी इस जश्न से दूर दंगा पीडि़त नोआखाली में कथित आजादी, अंग्रेज और भारतीय नेताओं के बीच हुए सत्ता हस्तानांतरण की संधि और भारत के बंटवारे को लेकर उपवास पर बैठे अल्ला ईश्वर तेरे नाम, रघुपति राघव राजा राम को जप रहे थे। गांधी ने कह दिया था कि यह पूर्ण स्वराज नहीं है, यह केवल अंग्रेजों द्वारा भारतीयों को कई शर्तों के साथ सत्ता का हस्तांतरण भर है।
तो क्या वाकई में हमारी आजादी की कहानी ऐसी ही हैं जैसा कि गांधी ने कहा है? आइए हम आपको ले चलते हैं भारतीयों और अंग्रेजों के बीच सत्ता हस्तांतरण के उन कुछ मुख्य बिंदुओं की ओर जो हमें यह एहसास दिलाता है कि आज भी हमें पूर्ण आजादी नहीं मिली है और जिसे हम आजादी कहते फिर रहे हैं वह सिर्फ संधि से ज्यादा कुछ भी नहीं। जब अंग्रेजों की बंदिशें आज भी हम पर लागू है तो फिर आजादी कैसी?
14 अगस्त 1947 की रात को जो कुछ भी हुआ था वह वास्तव में स्वतंत्रता नहीं आई थी बल्कि ट्रांसफर आफ पावर का एग्रीमेंट हुआ था। देश के नेताओं और लार्ड माउंटबेटन के बीच। स्वतंत्रता और ट्रांसफर आफ पावर दो अलग-अलग बातें हैं। किसी चुनाव के बाद जब नई सरकार बनती है और उस सरकार का प्रधानमंत्री जब शपथ लेता है, उसके तुरंत बाद वह प्रधानमंत्री एक रजिस्टर पर हस्ताक्षर करता है। उस रजिस्टर को ही ट्रांसफर आफ पावर बुक कहते हैं। उस बुक पर हस्ताक्षर हो जाने के बाद पुराना प्रधानमंत्री नए प्रधानमंत्री को सत्ता सौंप देता और चला जाता है। 14 अगस्त 1947 की रात्रि में यही खेल हुआ था।
अब आइए भारतीय नेताओं और अंग्रेेजों के बीच के सत्ता हस्तांतरण की संधि की ओर। इस सत्ता हस्तांतरण संधि के मुताबिक आज भी हम अंग्रेजों के गुलाम हैं। उस संधि में एक शब्द है कामनवेल्थ नेशन। यानि समान संपत्ति वाला देश। कह सकते हैं कि ब्रिटेन की महारानी की समान संपत्ति। कामनवेल्थ नेशन की प्रमुख वही हैं। ऐसे 71 देश हैं जो कामनवेल्थ नेशन के तहत आते हैं। इन सभी 71 देशों में ब्रिटेन का शासन रहा है। इन सभी देशों में जाने के लिए ब्रिटेन की महारानी को किसी वीजा की जरूरत नहीं होती है। संधि के मुताबिक वे अपने ही देश में जाती हैं। 
हमारे राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री बिना वीजा के ब्रिटेन नहीं जा सकते। वीजा के स्तर पर सोचे तो कह सकते हैं कि ब्रिटेन की महारानी आज भी हमारे देश की नागरिक हैं या भारत आज भी ब्रिटेन का उपनिवेश है। याद रखिए कामनवेल्थ नेशन में भारत की इंट्री एक डोमिनियन स्टेट के रूप में है न कि स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में। ब्रिटेन की महारानी जब जब भारत आती हैं तो उन्हें 21 तोपों की सलामी दी जाती है। जबकि यह प्रोटोकाल केवल हमारे देश के राष्ट्रपति के लिए ही हैं। इस खेल का क्या मतलब है? ब्रिटेन अपने तमाम कामनवेल्थ नेशन के देशों में अपना हाई कमीशन खोलता है। अन्य देशों की तरह उसे एंबैसी नहीं कहा जाता।
संधि की एक बिंदू है भारत के नाम को लेकर। एग्रीमेंट के अनुसार-भारत का नाम इंडिया रहेगा और पूरी दुनिया में इसे इंडिया के नाम से ही जाना जाएगा। हम भले ही भारत-भारत चिल्लाते रहें लेकिन अंग्रेज हमें इंडिया बनाकर जा चुके हैं। संधि की अगली बिंदू में कहा गया है कि भारत की संसद में वंदेमातरम अगले 50 सालों तक नहीं गाया जाएगा। 
ऐसा हुआ भी। 1997 तक इसका पालन होता रहा। पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने इस मसले को उठाया तब जाकर 1997 में वंदेमातरम संसद के भीतर घुस पाया। इसी संधि के अनुसार नेताजी सुभाष चंद्र बोस को जिंदा या मृत अंग्रेजों के हवाले करना था। यही वजह है कि नेता जी अपने ही देश के लिए लापता रहे और उनकी मृत्यु कैसे और कहां हुई आज तक पता नहीं चला। सत्ता के हस्तांतरण की संधि में बहुत सारी बातें रखी गई है जिसका हम आज तक पालन करते आ रहे हैं। इस संदर्भ में कुछ और जानकारी हम आपको अगले अंक में देंगे, लेकिन एक बात मान लीजिए कि आज भी हम अंग्रेजों की नीति से घायल होकर भटक ही रहे हैं। इस संदर्भ में हमारे राष्ट्रपिता की आत्मा भी संभवत: भटक ही रही है।


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