Thursday, September 1, 2016

राजधारी और धनधारी दलित नेताओ के खेल से शापित दलित समाज


अखिलेश अखिल 
कांग्रेस के दलित नेता और पूर्व सांसद  कमल किशोर कमांडो का नजरिया साफ़ है। कमांडो की नजर में संघ और बीजेपी की दलित राजनीति सिर्फ सत्ता पाने के लिए है जबकि सच ये है की संघ और बीजेपी नहीं चाहते की देश के दलितों की हालात सुधरे।  संघ और बीजेपी की  राजनीति दलित शोषण  पर आधारित है और इसका प्रमाण यही है  कि  बीजेपी की मातृ संस्था संघ में आज भी दलितों के लिए कोई जगह नहीं है।  बीजेपी यूपी चुनाव में भी तिकड़म के जरिये दलित वोट पाने के लिए हर कोशिश तो कर रही है लेकिन संघ आज भी दलितों को अछूत ही मानता है। संघ दलित समाज को शापित मानता है।  फिर बीजेपी सरकार के  साथ आज जितने भी दलित नेता जुड़े हुए है उनकी राजनीति केवल सत्ता में बने रहने की है। ये सारे सत्ता लोलुप और सरकारी दलित के रूप में कुख्यात हो चुके है।  उनका दलित कल्याण से कोई मतलब नहीं। कांग्रेस की दलित राजनीति, और दलो की दलित राजनीति से अलग है।  इस देश के दलितों ने कांग्रेस को मजबूत किया है और दलित कांग्रेस के केंद्र में है। कमांडो का दलित राजनीति पर यह बयान कितना सच है इसकी जानकारी हम लेंगे और दलित नेताओ की राजनीति में दलित कहा है इसे भी देखेंगे। 
         आजादी के ७० बरस पुरे हो गए लेकिन दलितों की हालत नहीं बदली। देश के ८० फीसदी से ज्यादा दलित आज भी वही खड़े है जहां ७० साल पहले खड़े थे। बदलाव के नाम पर जो दिख रहे है वह है बाज़ार का प्रभाव।  बाजार के आने या फिर बाजार के संग हो जाने की वजह से उनकी चेतना में थोड़ा  बदलाव दिखाई पड़ता  है लेकिन दलितों की  सामाजिक और आर्थिक हालात में आज भी कोई परिवर्तन नहीं हुए। वे आज भी छुआछूत के शिकार है और आज भी समाज का दवंग तबका कानून की धज्जिया उड़ाते हुए दलित समाज को उनके हक़ , हकूक और इज्जत पर प्रहार करते है। इस पुरे खेल में दलितों का अशिक्षित होना प्रमुख कारण माने जा सकते है।  हां एक बात साफ़ हो गयी की दलित राजनीति के नाम पर कुछ रसूख चेहरे वाले लोग दलित नेता और दलित चिंतक जरूर बन  गए।  दलित वोट के नाम पर दलित  नेताओ की सूची हमारे देश में छोटी नहीं है। हर राज्य के दलित नेता।  फिर हर पार्टी के अपने दलित चेहरे। जो चेहरे कुछ समय के लिए चमक गए वे पार्टी के स्तर पर केंद्रीय राजनीति में आ गए।  लेकिन राजनीति का खेल देखिये कि कोई भी दलित नेता दूसरी पार्टी के दलित नेता को तरजीह नहीं देते।  देखना तक पसंद नहीं करते।  
         बिहार के एक महान नेता है रामविलास पासवान। ये रामविलास राम विरोधी समाजवादी आंदोलन के बड़े नेता रहे है.   इन्होंने दलित  राजनीति की लंबी पारी खेली है और आज भी मोदी सरकार में शामिल है।  कहते है की पासवान जी सरकार किसी भी दाल की हो इनका मंत्री बनना तय है।  हर सरकार में ये  जुगाड़ लगा ही लेते है। इसलिये लालू भी इन्हें मौसमी नेता पुकारते है। ये  सत्ता के बिना रह नहीं सकते।  पत्नी को छोड़कर इनका पूरा परिवार नेता है। दुसाध दलित समाज से आने वाले पासवान जी पिछले कई वर्षो से अलग पार्टी भी चलाते है।  जगजीवन राम के बाद बिहार की राजनीति में लंबे समय तक अपनी पैठ रखने वाले पासवान जी ने अब तक बिहार के दलितों के साथ कितना न्याय किया है इसकी जानकारी तो उनके पास ही होगी लेकिन सच यही है की उनके परिजनों के इलाके को छोड़ बिहार का कोई भी दलित उनके नाम पर या उनकी पार्टी के नाम पर वोट नहीं डालता।  करीब ४५ साल से ज्यादा हो गए पासवान जी को दलित राजनीति करते हुए।  इनसे किसी दलित की दीनता तो नहीं बदली ,हां निज की दीनता जरूर बदल गयी।  पत्र पत्रिकाओं में रामविलास या भोगविलास जैसे शीर्षक के तहत इनकी मनोरंजक कहानिया भी छपती रही है।  रामविलास 'पासवान'  से शर्मा  होते होते रह गए। पासवान जी के परिजन दलित होते हुए भी राजनितिक रूप से सवर्ण होते गए। 
        उस मायावती को क्या कहा जाय ? दलित पुरोधा कांशी राम की विरासत को आगे बढ़ाने का दम्भ भरने वाली मायावती को दलित उत्थान से भला क्या मतलब ? अगर सवर्ण समाज ने वर्षो से दलितों का सामाजिक शोषण किया है तो उस शोषण का प्रतिकार यही है की दलित को इतना सबल और सशक्त बना दो की वह समाज की मुख्य धारा से जुड़ जाए।  लेकिन मायावती ने ऐसा कुछ भी नहीं किया। मायावती पर कई तरह के आरोप लगते रहे है।  धन बनाने का आरोप भी उन पर चस्पा है।  आय से अधिक संपत्ति का मामला भी उन पर चल चुका है।  उनकी आमदनी के श्रोत क्या है , कभी वह  बताती नहीं। ताकात के रूप में उनके पास है जाटव और दलित वोट बैंक। सवाल है की मायावती ने एक आम दलित वोटर के लिए क्या किया ? क्या उनकी आर्थिक या सामाजिक हालत को बदल सकी? माया ,नारे और नीतियों को बदलने में माहिर रही है। इनकी मायावी राजनीति में जूते कभी इनके बाथरुम  में तो कभी इनके पूजा घर में विराजमान हो जाते है। इनको मारो जूता  चार वाले नारे वक्त पर बदल जाते है और फिर हाथी नहीं गणेश है ,ब्रह्मा विष्णु महेश है के नारे बन जाते है।  मायावती कहती है कि  वही असली दलित नेता है बाकी सब फर्जी।  यही बात पासवान साहब भी कहते है की वही दलित के पुजारी है बाकी फर्जी। यानी पासवान ना तो माया को देखना चाहते है और ना ही माया पासवान को। 
       मामला यही तक नहीं है उस बीजेपी वाले दलित नेताओ  को क्या कहेंगे ? एक से बढ़कर एक दलित नेता।  सवर्ण और बनियो के वोट पर टिकी बीजेपी की राजनीति में पिछले एक दशक से दलित  प्रेम जगा है। अब दलित उनके केंद्र में है।  सत्ता की कुर्सी दलित मिजाज पर टिकी है. बीजेपी सवर्णो को ताकत देती है और दलितों का वोट लेती है। कहते है की सवर्णो ने  दलितों का शोषण किया।  लेकिन दलित वोटरों का शोषण सवर्ण नहीं करे इसका इंतजाम बीजेपी नहीं करती। एक समय के संजय पासवान जैसे  दलित नेता  आज कहाँ  है इसकी जानकारी बीजेपी को भी नहीं होगी। कब संजय पासवान का इस्तेमाल होगा और कब त्याज्य हो जायगा यह किसी को पता नहीं। संजय पासवान आज हासिये पर है। उनके हासिये के  महसूसा जा सकता है।  फिर वही कहानी।  बीजेपी के दलित नेता बसपा और लोजपा के दलित नेताओ को भाव नहीं देते। उस उदित राज को क्या कहेंगे जिन्होंने कभी बीजेपी को क्या क्या नहीं कहा लेकि बीजेपी में आने के बाद और सत्ता मिलने के बाद उनका दलित प्रेम बीजेपी के सामने नतमस्तक हो गया।  क्या आज की तारीख में उदित राज बीजेपी को देश के किसी कोने में दलित वोट दिला सकने की हालात में है ? चिंतक और दलित नेता उदित राज भले ही दलितों की काया नहीं बदली हो , अपनी काया को बदल लिया है। बामसेफ की राजनीति करने वाले उदित राज आज निश्तेज और निष्प्राण हैं. दलित बंचितो का इन्होंने पायदान की तरह इस्तेमाल किया।  इनकी दलित राजनीति केवल  संसद तक पहुचने के लिए थी। अब बाबा साहब इनके आदर्श नहीं है , आदर्श तो इनके मोहन भगवत है।  उदित राज का असली नाम रामराज है।  अब ये राम राज संघ के रामराज की सीधी बने हुए है।  बीजेपी के साथ स्वांग रचाने वाले उस रामदास अठावले का दलित प्रेम अब बीजेपी के प्रेम में फस गया है।  क्या महाराष्ट्र में अठावले के वोटर अगले चुनाव में बीजेपी को मजबूत कर सकेंगे ? अठावले भी मायावती और पासवान को नहीं लगाते।  सबके आदर्श बाबा साहब आंबेडकर है पर आंबेडकर की दुकाने हर दलों ने खोल राखी है। इन दलित नेताओ ने आंबेडकर को एक पोलिटिकल प्रोडक्ट के रूप में इस्तेमाल किया है. बाबा साहेब इनके लिए केवल पार्सल प्रोडक्ट के अलावे और है भी क्या ?   उनके दायरे में दलित विकास , दलित कल्याण ना के बराबर है। 
         उधर कांग्रेस की तो बात ही कुछ और है।  कहते है की ४५ साल तक कांग्रेस ने सत्ता की कुर्सी अपने पास रखी।  दलित मुस्लिम और ब्राह्मण वोट ही कांग्रेस की मजबूती रही।  लेकिन अब ऐसा नहीं है।  जब तक कांग्रेस की राजनीति चलती रही कांग्रेस के ही दलित नेता देश भर में दलितों के बीच जाने जाते रहे। कांग्रेस की राजनीति कमजोर हुयी , दलित वोट बिखडे  , कांग्रेस कमजोर हो गयी।  सत्ता से बाहर होती गयी।  सवाल कांग्रेस पर भी है।  ७० में ४५ साल की सरकार चलाकर भी दलितों की हालात नहीं बदली। लेकिन यही पर कांग्रेस नेता कमांडो कहते है कि 'कांग्रेस ने एक काम जरूर किया समाज को जोड़ने का।  हर जाति  के लोगो के बीच भाईचारे की स्थापना का ।  नेहरू से लेकर राजीव तक की राजनीति इस बात का गवाह है कि उसने कभी समाज को तोड़ने का काम नहीं किया।  दलित कल्याण की तमाम योजनाए इंदिरा काल से ही चली आ रही है' . लेकिन हमारा मानना है कि इस खंडित दलित चेतना का गुनाहगार कांग्रेस भी काम नहीं है। आजादी के बाद कांग्रेस का जो नेतृत्व था वे सारे के सारे सामंत , संप्रभु और सवर्ण थे।  आजादी के बाद  कच्छ से लेकर कामरूप और कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक सभी सूबे के मुख्या मंत्री सवर्ण ही थे।  आंबेडकर की काट के लिए जगजीवन राम को खड़ा करने का काम कांग्रेस ने ही किया था। दलित और बंचित कांग्रेस के लिए महज एक मतदाता सूची के रूप में ही रहे। परंतु कमांडो का कहना है कि 'कांग्रेस ने कभी भी विकृति को संस्कृति के रूप में स्वीकार नहीं किया। यही कारण है की राहुल गाँधी दलितों के घर ठहरते है और दलितों के सवाल पर संघर्ष करते है। कांग्रेस बदल रही है और यह बदलाव २७ साल बाद दिखने जा रहा है।  यूपी चनाव में छद्म दलित प्रेम की धज्जिया उड़ जायेगी आप देखते रहिये। '   ऐसे में साफ़ दिखता है कि  देश में आज जितनी भी राजनीतिक  पार्टिया चल रही है और उन पार्टियों में दलित नेता के तौर पर जो चेहरे चमक रहे है उनमे अधिकतर धनधारी बने हुए है। इन धनधारियो में आज सबसे आगे है मोदी सरकार में शामिल दलित चेहरे।

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