Thursday, September 1, 2016

इंसान की इंसानियत कठघरे में



अखिलेश अखिल 
कालाहांडी के दाना माझी की कहानी अब सबको पता है। पूरा देश और विदेश के लोग भी जान गए है की आदिवासी दाना माझी की पत्नी मर जाती है और अस्पताल वाले उसकी लाश को घर तक नहीं पहुचाते है। अस्पताल से दाना माझी का घर कोई 60 किमी  दूर है।  बेबस दाना अपनी पत्नी को पीठ पर लादकर पैदल घर की और चल देता है।  कहानी यही है।  लेकिन इस कहानी में शिर्फ़ सरकारी अस्पताल की बेरुखी ही नहीं छुपी है ,इसमें सामाजिक मानवीय कर्त्तव्य बोध की नीचता भी सामने दिखती है।  १२ किमी तक दाना माझी पत्नी की लाश को लेकर चलते दीखते है , हजारो लोग उसकी दशा को देखते है लेकिन किसी ने उसकी इस हालात पर दया नहीं की।  आजादी के बाद लगभग 70 सालों में हमारी व्यवस्था आदिवासियों के जीवन स्तर को मानवीय नहीं बना पाई और हम भी इतना मनुष्य नहीं बन पाए कि विपदा में पड़े एक आदिवासी की मदद कर सकें।  कह सकते है कि  हमारी संवेदना नष्ट हो चुकी है और समाज में स्वस्फूर्त पहल कम होती जा रही है।  धर्मप्राण लोग गंगा को मां मानते हैं, लेकिन कचरे और लाशों से निरपेक्ष डुबकी लगाकर पाप धोते हैं, महिलाओं को छेड़ा जाते देखकर आंखें फेर लेते हैं, सड़कों पर घायल घंटों मर जाने तक पड़े रहते हैं, हर दिन किसी न किसी अप्रिय घटना से, जिसमें कोई कमजोर सताया जा रहा होता है, मुंह फेर लेते हैं। कई लोगों को यह दृश्य देख केविन कार्टर की याद आ गई, जिसने सूडान में अकाल के दौरान 1993 में भूख से मरते बच्चे के पीछे खड़े गिद्ध की तस्वीर खींची थी।
गिद्ध उस बच्चे के मरते ही खाने को तैयार खड़ा था। इस तस्वीर के लिए केविन को पुलित्जर पुरस्कार मिला, लेकिन वह इतने गहरे अपराधबोध में चला गया कि पुरस्कार मिलने के तीन महीने बाद ही उसने खुदकुशी कर स्वयं को खत्म कर लिया। क्या कालाहांडी में दाना मांझी की बेबसी और उसकी बेटी के आंसुओं को अपने कैमरे में उतारने वाला पत्रकार भी किसी अपराधबोध में होगा? बेशक उसने हमारी व्यवस्था को नंगा कर दिया, लेकिन कैमरे पर अपनी आंख लगाते वक्त उसका अपना जमीर क्या बोल रहा था?
फोटो खींचना या रिपोर्ट लिखना एक पत्रकार के पेशे का अंग है, लेकिन कोई भी पेशा मानवता से बड़ा नहीं। इसलिए ऐसे कठिन वक्त में जब मानवीय कर्तव्य और पेशागत कर्तव्य के बीच द्वंद्व दिखाई पड़े, तब मानवीय कर्तव्य को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। यह संदेश वह डॉक्टरी, वकालत, अध्यापन सभी पेशों पर लागू होता है। यदि फोटो लेने वाला शख्स ही मांझी की मदद को आगे बढ़ जाता तो अन्य भी आगे आते। मांझी हमारे समाज का ही अंग था, कोई विजातीय नहीं कि जिसके आंसुओं का हमारे लिए कोई मोल ही न हो।चाहिए थी।
यदि एंबुलेंस उपलब्ध नहीं थी तो अस्पताल के अधिकारी वैकल्पिक व्यवस्था कर सकते थे। कोई विकल्प नहीं हो सकने पर दाना मांझी मजबूरन पत्नी की लाश कंधे पर रखकर चल दिया। वह आदिवासी अपने शोक में अकेला था, साथ में बेटी थी, जिसे पता नहीं होगा कि इस घटना का अर्थ क्या है। रास्ते भर उसे देखने के लिए लोग उमड़ते रहे, लेकिन वे दूर से तमाशा देख रहे थे। उनमें से किसी के भी मन में इतनी-सी सहानुभूति नहीं उमड़ी कि उसके लिए एक गाड़ी का इंतजाम कर दें। उन्हीं में एक कैमरामैन था, उसे न्यूज वैल्यू तुरंत समझ में आ गई। उसने मांझी का वीडियो बनाया और फेसबुक पर लगा दिया। 
      लेकिन यह सब केवल एक दाना माझी की कहानी नहीं है।  हमारे समाज में न जाने कितने ऐसे माझी है जिनकी जिंदगी अभावो में ही कटती रही है और अभावो में ही वे मौत के मुह में जाते रहे है।  जाति , धर्म के नाम पर देश की राजनीति तो खूब फलती फूलती है लेकिन एक भी ऐसी राजनीति पार्टी इस देश में नहीं है जो लोगो को इंसान बनने के सन्देश देती हो।  मनुष्य , मनुष्य के काम नहीं आये तो फिर मनुष्य बने रहने का क्या लाभ ? बड़े , छोटे , हिन्दू , मुसलमान और अगडे - पिछड़े की राजनितिक खेल में पूरा समाज मानो अंधा बना घूम रहा है।   

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