Monday, September 26, 2016

यादव परिवार का कैकेई हठ ड्रामा


अखिलेश अखिल 

समय होत बलवान।  समय और काल के सामने इंसान की भला क्या औकात ! काल के इशारे पर हैं नाचने को विवस है।  और अब तक नाचते भी रहे है।  आगे भी नाचेंगे।  उत्तप्रदेश के मुलायम परिवार में जो भी फॅमिली ड्रामा दिख रहा है उस पर काल का ही तो प्रभाव है।  कल तक अखिलेश यादव के पक्ष में काल था।  पिता मुलायम का सारा आशीर्वाद अखिलेश पर ही लुटता दिखता था।  मुलायम का तारा और सपा का भविष्य अखिलेश।  अखिलेश ने भी पिता मुलायम की प्रतिष्ठा को बनाये रखा।  राजनितिक स्तर से लेकर अपने संस्कार और संस्कृति के जरिये पुत्र -पिता धर्म के बीच हमेशा अपने पिता का सर ऊंचा रखने का प्रयास किया अखिलेश ने।  सपा मुखिया मुलायम सिंह ने पुत्र मोह में आकर अपनी विरासत की बागडोर अखिलेश को सौपी थी तो पुत्र अखिलेश ने भी अपनी ईमानदार छवि के जरिये सरकार चलाकर सपा और अपने पिता की  प्रतिष्ठा बढ़ाने में कोई कंजूसी नहीं की।  आज भी अखिलेश के लिए पिता से बढ़कर कोई नहीं। लेकिन काल को क्या कहेंगे ?  तबके काल अब बदल चुका है।  काल ने तब अखिलेश और मुलायम के बीच जो मोह पैदा किया था अब वह मोह किसी और  हो गया है।  अब मुलायम सिंह के लिए केवल अखिलेश नहीं रह गए है।  उनकी परिधि में प्रतिक यादव भी आ गए है।  मुलायम सिंह की दूसरी पत्नी साधना गुप्ता भी राजनीति के केंद्र में आ गयी  है।  जाहिर है अखिलेश की सौतेली माँ साधना गुप्ता और सौतेला भाई प्रतिक यादव सपा मुखिया मुलायम सिंह की राजनीति को ज्यादा हांक रहे है।  कह सकते है मुलायम सिंह लाचार और बेवस होकर राजा दशरथ की भाँती केकई का कोप सहने को विवश है।  
         तो क्या मुलायम की दूसरी पत्नी और प्रतिक यादव की माँ साधना गुप्ता अखिलेश की जगह प्रतिक को मुख्यमंत्री बनाने का दवाब मुलायम सिंह पर बना रही है ? संभवतः ऐसा कुछ भी नहीं है।  ऐसा हो भी नहीं सकता।  १९८८ में जन्मे प्रतीक यादव की राजनीति में रूचि भी कम है और राजनितिक समझ भी कमजोर है।  प्रतिक राजनीति करना भी नहीं चाहते।  लेकिन वे अपने पैतृक राजनीति के दम पर सता और शासन पर नियंत्रण रखना तो चाहते ही है।  उनकी माता साधना गुप्ता भी तो यही चाहती है। 
        दरअसल , मुलायम सिंह यादव की दूसरी पत्नी साधना गुप्ता राजनीति में नहीं रहते हुए भी अखिलेश मंत्रिमंडल के कई मंत्रियो को नियंत्रित करती रही है।  गायत्री प्रजापति की पूरी कहानी साधना गुप्ता से जुडी मानी जा रही है।  कहते है कि दागदार गायत्री प्रजापति को साधना गुप्ता के जरिये ही मुलायम सिंह ने मंत्रिमंडल में शामिल किया था।  अखिलेश की चाहत प्रजापति नहीं थे।  बाद में साधना गुप्ता ने अपने पति मुलायम  सिंह पर दबाब बनाकर प्रजापति को राज्य का खनन मंत्री बनवाया था।  कहते है की खनन मंत्री बनते ही प्रजापति स्टोन खनन की बड़े स्तर  पर काम शुरू कर दिया।  अबैध खनन की शुरुआत की और लूट की राजनीति शुरू की।  किसी का डर  तो था नहीं।  कहते है की हर महीने अवैध खनन से 200 करोड़ की वसूली की जाने लगी। एक तरफ वसूली और दूसरी तरफ साधना गुप्ता का आशीर्वाद।  प्रजापति की लूट से आजिज आकर और आगे के चुनाव में खनन लूट की विपक्षी राजनीति को भापकर ही अखिलेश ने प्रजापति को हटाया था।  लेकिन प्रजापति को हटाना माता साधना गुप्ता को बर्दास्त नहीं हुआ।  वह केकई  की भूमिका में आ गयी। कोप भवन में चली गयी।  मुलायम मजबूर होकर अखिलेश को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटा दिया।  फिर बारी शिवपाल यादव की आयी।  फिर मुख्य सचिव अखिलेश के राडार पर आये।  ये सभी साधना गुप्ता के करीबी बताये जाते है।  कहते है कि अमर सिंह के जरिये ही साधना गुप्ता और मुलायम सिंह के बीच शादी हुयी थी।  
        कहते है की सपा के भीतर की लड़ाई दो गुट की है।  एक गुट में अमर सिंह , शिवपाल यादव , प्रजापति है।  यह गुट साधना गुप्ता के नजदीक है।  दूसरी तरफ अखिलेश और रामगोपाल यादव है।  दोनों गुट एक दूसरे का विरोधी है।  बीच में फसे सपा मुखिया पारिवारिक कलह के सिर्फ गवाह बने हुए है।  मुलायम सिंह के लिए अखिलेश भी प्रिय है और प्रतिक भी।  शिवपाल भी प्रिय है और रामगोपाल भी।   
         आज सपा में सब कुछ ठीक ठाक नहीं है।  चुनाव से पहले घर में ड्रामा को देखकर समाजवादी भी दांग है।  यह बात और है साधना गुप्ता को खुश करने के लिए अखिलेश के कई फैसलो पर वार किये गए है।   अखिलेश मौन है।  पितृ भक्त पुत्र इससे ज्यादा कुछ कर भी क्या सकता ? पिता का आदेश ही उसके लिए सबकुछ है।  और सपा की राजनीति का क्या होगा ? यह तो वक्त बताएगा।  क्योकि सत्य विचलित हो सकता है लेकिन परास्त नहीं हो सकता। सपा की राजनीति को इसी कसौटी पर कसने की जरुरत है। 

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