Wednesday, September 28, 2016

'मया ' के हाथ में नाचता ब्राह्मण जन


अखिलेश अखिल 
किसी 'माया' की ब्रह्म-साधना सकारात्मक और संस्कृतिजन्य है। पर ब्रह्म का माया के चक्कर में पड़ना दुर्भाग्य है. सियासत में सौभाग्य और दुर्भाग्य का कोई स्थान नहीं होता । जो जीत गया  वही  सिकंदर। राजनीति में माया का जन्म ही ब्राह्मण-द्रोह से हुआ। पर सत्ता जो ना कराये ?यहाँ माया और राम का मिलन भी होता है। समय बदल रहा है। सर्वशक्तिमान आज दया के पात्र हैं। सियासत की मंडी में ब्राह्मण की बोली लग रही है। ब्राह्मण नेतृत्व इस चुनावी सौराठ सभा में सजधज कर बैठे हैं कि कोई वोट के सौदागर तो मिले। प्रदेश के चुनाव में ब्राह्मण ऊंट को मनचाहा करबट दे सकता  है। पंडित यहाँ वो पारस साबित हो रहे हैं जिनके स्पर्श से हर लौहपुरुष कुंदन बनकर चमक उठना चाहते हैं। गरीब ब्राह्मण के नाम से चर्चित ब्राह्मण समुदाय आजकल उत्तरप्रदेश में राजनीतिक-पूजन के टारगेट पर है। ब्राह्मण लोग फुले नहीं समा रहे हैं। चारो तरफ से पूजन आरतियां उनके सामने परिदक्षना करने के लिए जगमगा रही है। अचानक ब्राह्मणों की पूजा भक्ति से समुदाय के लोग भी अचंभित है। भयभीत भी। कल तक जो जातियां सभी सामाजिक दोषो के लिए ब्राह्मण को गाली बकते नजर आते थे ,आज शाष्टांग करजोरी करते नहीं अघा रहे। ऐसी राजनीति से ब्राह्मण भ्रमित भी है। किसने -किसने गालिया नहीं दी। किसी ने मनुवादी तो किसी ने शोषक।  किसी ने समाज को विभाजित करने वाला तो किसी ने लुटेरा। सबने अपने अपने हिस्से की गालियां दी। लेकिन आज कांग्रेस,सपा , बसपा और बीजेपी ब्राह्मणों के सामने नतमस्तक है। सिर्फ वोट पाने के लिए। कोई ब्राह्मणों को  अपना खोया हक़ दिलाने के लिए ब्राह्मण मुख्यमंत्री उम्मीदवार उतारने की उदारता दिखाता फिर रहा है तो कोई ब्राह्मण वोट को पाने के लिए ब्राह्मणों को फटाफट मंत्री बना देने में कोई परेशानी नहीं देख रहा है। बसपा वाले तो कुछ ज्यादा सयाना है। सतीश मिश्रा और रामवीर उपाध्याय को बसपा वालो ने ब्राह्मणों को अपने खेमे में लाने के लिए कुछ भी करने की छूट दे दी है।और बीजेपी वाले का क्या कहना ? जब से कांग्रेस की लुटिया यूपी में डूबी तबसे ब्राह्मण भगवान् तो उसी दरबे में शरण लिए हुए है। सूबे के १४ फीसदी पंडित वोट बैंक सभी राजनीतिक दलों के लिए जीवन-मरण का हिस्सा बना हुआ है।
      भाजपा की बात छोड़ दीजिये। बीजेपी वाले तो पंडितो को अपना मानते ही है। जहां राम वहा पंडित। पंडितो ने कई दफा ऐसा दिखाया भी है। लेकिन होशियार पंडित भी जानते और समझते है।  इधर सबसे बड़ी राजनीति बसपा  और सपा  शुरू की है।  बसपा के सतीश मिश्रा और रामवीर उपाध्याय दलित ब्राह्मण गठजोड़ करने निकल गए है। बसपा को लगता  है कि दलित ,मुस्लिम तो  बैंक है ही अगर पंडित  मिल जाए तो काम बन जाए।  ऐसा पहले हो  चुका है। बसपा के  जबाब में अखिलेश ने मंत्रिमंडल विस्तार में तीन ब्राह्मणों चेहरे जोड़कर पंडित कार्ड चल दिया है । मंत्रिमंडल विस्तार के जरिए संदेश देने की कोशिश हुई कि सपा भी ब्राह्मणों की खैरख्वाह है। उधर कांग्रेस ने तो सीएम के दावेदार के रूप में शीला दीक्षित के रूप में ब्राह्मण चेहरा ही उतार दिया है। यानी हर पार्टी के पंडित आम पंडितों को अपने दल से जोड़ने को आतुर हैं। ऐसे मे यूपी का ब्राह्मण मन अब इस उधेड़बन में फंसा है कि आखिर इस बार किसके लिए जीत का शंखनाद किया जाए। दो दिन पहले  मंत्रिमंडल विस्तार में अखिलेश ने प्रतापगढ़ की रानीगंज सीट से विधायक शिवकांत ओझा को फिर से कबीना मंत्री बना दिया। वहीं बर्खास्त हुए मनोज पांडेय को भी मंत्री पद का ताज वापस कर दिया तो मुख्यमंत्री अखिलेश ने अपने करीबी अभिषेक मिश्रा को प्रमोशन देकर कैबिनेट मंत्री बना दिया। इस प्रकार मंत्रिमंडल में तीन ब्राह्मणों को जगह देकर सपा ने भी ब्राह्मण कार्ड खेल दिया। 
2007 के चुनाव में सवा सौ सीटों पर ब्राह्मण प्रत्याशियों को बसपा मुखिया मायावती ने उतारा था तो दलित-ब्राह्मण वोटों के गठजोड़ से बसपा सत्ता तक पहुंचीं। 2012 के चुनाव में ब्राह्मणों पर थोड़ा कम भरोसा जताते हुए महज 80 सीटों पर ही टिकट दिया गया। इस बार ब्राह्मण व दलित समीकरण टूट गया। नतीजा बसपा को झटका लगा और पार्टी को हार का सामना करना पड़ा। इससे सबक न लेते हुए बसपा मुखिया मायावती ने इस बार भी शुरुआत में मुस्लिमों को तरजीह देना शुरू किया। पहले जितने टिकट ब्राह्मणों को मिलते थे,उसे मुस्लिमों को सौंपा। करीब सवा सौ सीटों पर मुस्लिमों के टिकट तय हुए। बमुश्किल 25 से 35 सीटों पर ब्राह्मणों को उतारने की तैयारी रही। मगर मूड भांपकर अब जाकर पार्टी सूत्र बता रहे कि बसपा मुखिया ने ब्राह्मणों की टिकट में सहभागिता बढ़ाने की तैयारी की है। वहीं 2007 के चुनाव के बाद से उपेक्षा से नाराज ब्राह्मणों को फिर से पार्टी से जोड़ने के लिए सतीश मिश्रा को मायावती ने पूर्वांचल की कमान संभालने को कहा है तो रामवीर उपाध्याय को पश्चिम यूपी की जिम्मेदारी दी है। 

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