Monday, October 10, 2016

गरीबी रेखा नहीं , अमीरी रेखा चाहिए पनगढ़िया जी !



अखिलेश अखिल 

सबसे पहले विदेश की धरती पर अपनी जवानी बीता कर  बुढापे में नीति आयोग के उपाध्यक्ष बने पनगढ़िया से एक सवाल यह है की उनकी नजर में अर्थशास्त्र क्या है ? पहले रोटी और रोजगार चाहिए या फिर आगामी दिनों में भारत की अर्थव्यवस्था कितनी बड़ी हो जायेगी जैसा सवाल।  पनगढ़िया जी को शायद पता भी नहीं होगा की गरीबी क्या है ? उनकी  गरीबी का मतलब कुछ और ही हो सकता है ? उम्मीद की जा सकती है की पनगढ़िया कभी भी किसी गाव की यात्रा नहीं किये होंगे।  गाव में बजबजाती , गरीबी , उपेक्षा , बेकारी , शोषण , भूख और लाचारी का इल्म शायद ही पनगढ़िया जी को हो।  एक दिन अगर पनगढ़िया जी को नीति आयोग से बहार निकाल कर बगल की सड़क पर ही नंगे पाँव चिलचिलाती धुप में गंदा पानी पिला पिलाकर खड़ा कर दिया जाय तब शायद उन्हें गरीबी की थोड़ी जानकारी हो जाए।  कह सकते है की पहले योजना आयोग और अभी नीति आयोग में पलने वाले तमाम कथित रणनीतिकार देश को लूटने और भ्रष्टाचार फैलाने के अलावा कुछ नहीं करते रहे है।  हम कुछ बातो को लेकर पनगढ़िया से सवाल पूछेंगे लेकिन पहले आज के हालात पर एक नजर --
    देश में  राष्ट्रभक्ति से ओतप्रोत है भारत का पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राइक। ऐसी भावना होनी भी चाहिए।  राष्ट्र सर्वोपरि। बीते १५ अगस्त को प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी की   लालकिले की प्राचीर से दी गयी नसीहते हमें बरबस बहुत कुछ सोचने को बाध्य करती रही है।  देश , राष्ट्र , विकास , दुनिया और देशवासियो।  मोदी जी के हर लफ्ज में कुछ यही शब्द उभर कर सामने आये थे।  गरीब, किसान और सबका साथ ,सबका विकास। लालकिला की तकरीरे सबको खूब भाती  है। ७० साल से लाल किला की प्राचीर इस बात की गवाह है की लाल किला के तकरीर मंच से उतरने के बाद वैसा कुछ नहीं होता जैसा की तकरीर में दर्ज किया जाता है। यही वजह है की तकरीर के बाद हम भारत के लोग और खासकर देश के दरिद्र नारायण और सुदामा सरीखे लोग हफ्ते , कांपते रह जाते है। किसी भूखे, नंगे और गरीब की लाचारी पर न देश रोता है और न देश का मुखिया। न किसानों की आत्महत्या की बात होती है ,न दलितों के उत्‍पीड़न की कोई फरियाद। मजलूम-उपेक्षित लोगों को कोई न्याय आज तक दिया है क्या ? 

याद किया जाएगा तो सिर्फ गांधी के बलिदान को। लेकिन उस गांधी के बलिदान के मर्म को समझने का दुस्साहस कोई न करेगा, क्योंकि आज गोडसे के मंदिरों ने शहीद के तीर्थस्थल का दर्जा जो ले लिया है। बात हो रही है  तो बुरहान बानी की, लेकिन कश्मीर की आवाम को पैलेटगन से न्याय की चर्चा कदापि न होगी। बात होगी आजादी के दौर की शहादत किलेकिन आज बेकसूर मर रहे सैनिकों से कोई रिश्ता नही जोड़ेगा। अपनी जान की बाजी लगाकर हमारे वीर सैनिक हम पर जो अहसान कर रहे है , उसका भला क्या मोल ? सेना की कुर्बानी पर राजनितिक रोटियां सेकी जाती है।  कहकहे लगाए जाते है।  भारत को किसानों का देश बोलकर लालकिले से अब तक  भारत को विश्वगुरु बनाने का छद्म प्रपंच  ही तो होता रहा है।  करोड़ों भूखे, नंगे, लाचारों की लाचारी की  आड़ में अपनी हार को छुपाने के लिए ना जाने हमारी सरकार क्या क्या नहीं करती।  
        ऐसे में नीति आयोग वाले पनगढ़िया जी से कुछ सवाल पूछे जा सकते है।  सवाल  उनके अर्थशास्त्र से ही जुड़े है।  पहला सवाल है की  संविधान के मुताविक सबको जीने , रहने , पढ़ने , खाने और संपत्ति इकठा करने का अधिकार है।  जैसा की आप लोग ही बोलते है।  ऐसा हो भी सकता है।  लेकिन किसी के पास सब कुछ और बाकी के पास कुछ भी नहीं ऐसा क्यों? फिर समानता वाली बात कहा है ? मुठ्ठी भर अमीर और उनके पास ही लगभग सारी  संपत्ति बाकी की आबादी दरिद्रनारायण और सुदामा।  पनगढ़िया जी को कृष्णा और सुदामा की कहानी भी याद होगी।  ऐसा क्यों?  यह कौन सा आर्थिक न्याय है? यह कौन सा अर्थशात्र है ? मूर्खो की भाषा में बात की जाए तो मनुष्य के उपभोग के काम आने वाले सभी पदार्थो को अर्थ या धन कहा जता है। और उपभोग से बचा धन ही संपत्ति है। न्याय की जरुरत वहा होती है जहां दो लोगो के बीच किसी तरह का विवाद होता है। अधिकतम सहमति का बिंदु ही न्याय है  और सत्य पर आधारित सहमति स्थाई होती है। और न्याय का आधार समानता है।  तो आर्थिक न्याय का अर्थ ये है की प्रकृति में पाए जाने वाले उपभोग के सारे संसाधनों पर सभी मनुष्यो का सामान अधिकार है। मतलब साफ़ है की इसका सम्बन्ध व्यक्ति की योग्यता , क्षमता या पुरुषार्थ से नहीं है। जाहिर है कि देश में प्राकृतिक सामानों के बटवारे में समानता नहीं है।  हम नहीं कहते की कोई आदमी ज्यादा धन नहीं कमाए।  धन कमाना चाहिए लेकिन कितना ? कब तक ? एक सीमा तो होनी चाहिए ? एक सीमा के बाद कमाए गए धन पर टैक्स लगनी चाहिए।  ऐसे में सवाल यह भी है की देश में गरीबी रेखा की बात क्यों होती है ? सामाजिक अर्थशास्त्री रौशन लाल अग्रवाल की हालिया पुस्तक में इस बात का जिक्र किया गया है की देश को गरीबी रेखा नहीं , अमीरी रेखा बनाने की जरुरत है।  समाज को सुखी बनाने के लिए समाज में अमीरी रेखा की जरुरत है ना की गरीबी रेखा की। न्याय के आधार पर समाज में योग्यतम व्यक्ति को अधिकतम अधिकार और अयोग्यतम व्यक्ति को न्यूनतम अधिकार परिभाषित होने चाहिए। इसके बिना कमजोर व्यक्ति के मौलिक अधिकारों की रक्षा नहीं की जा सकती।  अग्रवाल कहते है की गरीबी रेखा बनाना या तो अज्ञानता है या फिर समाज के साथ धोखा है। 
            पनगढ़िया जी शायद इस पर राजी नहीं होंगे। जैसा होता आया है वैसा ही करेंगे।  इस सवाल को लेकर आगे और भी चर्चा की जा सकती है।  लेकिन अभी  हालात ये है की मुठ्ठी भर अमीरो ने देश में सुदामाओं की फ़ौज खड़ी कर दी है।  सबके संसाधन पर मुठ्ठी भर लोगो का कब्जा है।  सीमा पर हमारी सेनाये जान की बाजी लगा रही है और हमारी सरकार और विपक्ष सुदामाओं को ठगने के लिए वोट की राजनीति में ध्यान भटका रही है। 

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