Wednesday, October 12, 2016

माया , मुलायम और मुसलमान के सियासी पैतरे


अखिलेश अखिल 

उत्तर प्रदेश में  मुस्लिम  वोट को लेकर जो खेल अभी चल रहा है , इससे पहले ऐसा खेल कभी नहीं देखा गया था।  सपा और बसपा मुस्लिम वोट के लिए सभी तरह के कुकर्म और सुकर्म करने को तैयार है।  मायावती  को अपना अस्तित्व बचाना है तो सपा के लिए अपनी सत्ता बचाना जरुरी है।  सूबे की राजनीति देखने वाले लोग कहते है की अगर इस बार बसपा सत्ता में नहीं आयी तो बसपा का खेल हमेशा के लिए बिगड़ सकता है।  मायावती की राजनीति ख़त्म हो सकती है।  बसपा टूट की शिकार हो सकती है और मायावती राजनितिक सन्यास भी ले सकती है।  यह बात और है की भ्रष्टाचार के सबसे ज्यादा आरोप मायावती पर लगे है लेकिन यह भी सच है की मायावती आज भी दलितों के बीच असरदार और बफादार बनी हुयी है।  पिछले दिनों की माया की रैली प्रदेश और देश के लोगो को यह बता चुकी है की आज भी मया बसपा की ताकतवर नेता है और दलितों के बीच आज भी उनकी पैठ है।  मया मतलब दलित और दलित राजनीति मतलब मायावती। 
प्रदेश में   सबसे ज्यादा मारामारी मुस्लिम वोट के लिए है। मायावती ने  लखनऊ में अपनी पार्टी की रैली में खुल कर कहा कि मुसलमानों को गुमराह नहीं होना चाहिए और उनको एकमुश्त बसपा को वोट देना चाहिए। माया की यह अपील मुसलमानो को कितना प्रभावित करेगी इस पर कुछ नहीं कहा जा सकता लेकिन इतना तय है की मुस्लिम वोट मायावती के राडार पर है और मुसलमान भी मायावती की राजनीति को हवा देने में अभी तक कोई कसर नहीं छोड़ रहे है।  मायावती के रैली में जिस तरह की  जुटी थी उससे साफ़ तौर पर कहा जा सकता है कि इस बार मुस्लिम वोट माया के पक्ष में जा सकता है।  अगर ऐसा हो गया तो जाहिर है सपा को बड़ा झटका लगेगा और इसका लाभ बीजेपी को मिल जाएगा।  दरअसल , बसपा को दलित मुस्लिम का समीकरण बना कर उसे मजबूत करना है तो दूसरी ओर समाजवादी पार्टी को मुस्लिम और यादव का समीकरण मजबूती से लागू करना है। लेकिन ऐसा लग रहा है कि मुस्लिम वोट इन दोनों के बीच बंटेगा। उनका वोट रणनीतिक रूप से पड़ेगा और इन दोनों में से जो जहां जीतने की स्थिति में होगा, उसे मुस्लिम वोट मिलेगा। साफ़ है की जिसे मुसलमानो का पूरा वोट मिलेगा उसकी सत्ता होगी।  २०१२ में कुछ ऐसा हुआ था। लेकिन इस बार मुस्लिम वोट बसपा और सपा में बटेगा।  
 बसपा की पूरी राजनीति यह है कि  पश्चिमी उत्तर प्रदेश  उसे मुसलमानो के सौ फीसदी वोट मिले।  इसके लिए वह हर मुस्लिम परिवार से सीधा संबाद भी कर रही है और सपा की राजनीति का पोल भी खोल रही है।  हरित परदेश कहे जाने वाले इस इलाके में  नोएडा से लेकर आगरा तक विधानसभा की  कुल 120 सीटें हैं, जिसमें मुस्लिम और दलित वोट एक साथ मिले तो बसपा को बड़ा फायदा होगा। लोकसभा चुनाव में सपा की वजह से इस इलाके में वोट बंटे थे, जिसका फायदा भाजपा को हुआ था। इसलिए इस बार माना जा रहा है कि सपा इधर फैक्टर नहीं होगी। इसी तरह पूर्वी उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी को मुस्लिम वोट मिलने की संभावना है। वाराणसी के आसपास कई इलाकों खास कर बलिया, मऊ आदि में अंसारी बंधुओं का बड़ा असर है, जिनको सपा ने अपने साथ लिया है। इसके अलावा मुलायम सिंह परिवार के अपने असर वाले इलाके जैसे इटावा, मैनपुरी, कन्नौज, आजमगढ़ आदि हैं, जहां यादव और मुस्लिम का मजबूत समीकरण बनता है। इन इलाकों में मुस्लिम वोट बसपा को शायद नहीं मिलें। लेकिन जानकारों का कहना है कि इस बार मुसलमानो का वोट कांग्रेस के साथ भी जुड़ेगा।  कितना जुड़ेगा इस पर इस पर सब चुप है।  उधर राहुल गाँधी की किसान यात्रा के बाद किसानों के बीच कांग्रेस के प्रति कुछ सहानुभूति बढ़ी है और मुस्लिम आबादी भी राहुल के सुर में सुर मिलाते दिखे है।  
         उधर सर्जिकल स्ट्राइक को लेकर बीजेपी की राजनीति कुलाचे मार रही है।  देशभक्ति को लेकर मोदी की इमेज बढ़ी है।  लेकिन यह भी साफ़ है की प्रदेश का पढ़ा लिखा  तपका  मोदी की देशभक्ति वाली राजनीति की असलियत को भी समझ रहा है।  सभी पार्टी के अपने अपने वोट बैंक है। कांग्रेस इसमें कही नहीं खड़ी है। यदि मुसलमानो ने कांग्रेस को फिर गोद ले लिया तो पासा  पलट सकता  है।   बीजेपी को अभी देशभक्ति का लाभ मिलता दिख रहा है लेकिन सपा और बसपा की राजनीति को कमजोर नहीं माना  जा सकता।  

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