Tuesday, October 18, 2016

यूपी चुनाव -सपा , बीजेपी और कांग्रेस में नर्तन




अखिलेश अखिल 

डांस ऑफ़ डेमोक्रेसी।  लोकतंत्र का नर्तन। सीधा सीधा कहा जाय तो दलीय चेहरो पर सतरंगी नकाब चढ़ाय चुनावी गिरोह का डांस ड्रामा।  ऊपर से कुछ और निचे से कुछ और।  दोहरे चरित्र से लैश हर एक चेहरे और हर एक दलीय गिरोह।  किसी को किसी पर ऐतवार नहीं।  एक की नजर में दुसरा झूठा और फरेबी।  धोखेबाज।  भ्रस्ट और बेईमान।  जिस दल  में जब तक रहे तब तक उसकी जैजैकार।  जब निकले तो वह दल बेकार।  लफंगा।  बेईमान।  धोखेबाज और पाखंडी।  यही है राजनीति।  यही है लोकतंत्र का असली चेहरा।  चुनावी राजनीति लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए है लेकिन देखा जा रहा है यह चुनाव ही लोकतंत्र को सबसे कमजोर और दगाबाज बना रहा है।  यहाँ हर कोई झूठ बोलता है।  सच से राजनीति को कोई सरोकार नहीं।  जो सच बोलेगा , राजनीति नहीं करेगा।  चुनाव नहीं जीतेगा।  हममभरत वासी आंकड़ो पर बहुत यकीं करते है।  १९५२ से लेकर अब तक के आंकड़ो को देख जाए तो पता चलता है की ६० के दशक के बाद राजनीति में जो गिरावट आयी उसकी  वजह से झूठे , मक्कारो , फरेबियों की राजनीति तेजी से आगे बढ़ी और सच्चा , ईमानदार आदमी के लिए राजनीति दुस्कर होता चला गया।  अब राजनीति किसी भी ईमानदार और देशप्रेमी के लिए नहीं रह गयी।  कुछ होंगे भी तो पार्टी और सरकार के किसी कोने में बैठकर अपना देह हाथ नोच रहे होंगे और कुंठित होकर परेशान होंगे।  राजनीति ऐसी हो गयी है की कुंठा में वे कुछ बोल भी नहीं सकते।  बोलेंगे तो पार्टी और सरकार उनकी ऐसी मरम्मत करेगी की वे कही  के रहेंगे भी नहीं। 
          ऊपर की भूमिका की जरुरत इसलिए पद गयी की उत्तरप्रदेश में चुनाव की राजनीति अब अपने पुरे शबाव पर है।  चुनाव होने में अभी ४ महीने बाकी है लेकिन कही जनता उनकी छतरी से बाहर ना चली जाए इसलिए सब काम धाम छोड़  कर चुनावी राजनीति में हर पार्टी और गिरोह अपने अपने तरीके से ताल ठोकता दिख रहा है।  सपा मुखिया मुलायम सिंह को ही पहले ले लेते है।  ३ रोज पहले प्रेस सम्मलेन करके उन्होंने देश और सूबे के लोगो को बताया कि सपा पहले चुनाव लड़ेगी और मुख्यमंत्री की घोषणा चुनाव के बाद पार्टी संसदीय बोर्ड करेगा।  राजनीति इस बात पर हो गयी की मुलायम सिंह अपने बेटे अखिलेश यादव से नाराज है और अपनी पत्नी और भाई शिवपाल के दबाब में आकर अखिलेश की राजनीति से परेशान है।  राजनीति के जानकार मुलायमसिंह के इस बयान पर पिल पड़े।  तरह तरह की बाते होने लगी।  अखिलेश के बारे में यह भी खबरे आने लगी की वे अकेले चुनाव लड़ेंगे और अलग पार्टी से चुनाव लड़ेंगे।  एक खबर तो यह भी बानी की अखिलेश बीजेपी में चले जाएंगे और मुख्यमंत्री के उम्मीदवार बने रहेंगे। हर राजनितिक चिंतक के पास आला दर्जे की खबरे।  लेकिन आज मुलायम सिंह अपने पुराने बयान से पलट गए।  घोषणा कर गए की अगले चुनाव में अखिलेश ही पार्टी के चेहरा होंगे और मुख्यमंत्री उम्मीदवार भी।  मुलायम सिंह को ३ दिन के भीतर ही इस तरह के दो बयान क्यों देने पड़े समझ से पड़े है।  राजनितिक झूठ और राजनितिक जुमला का इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है।  यही राजनीति की असलियत है।  अंतिम राजनीति यही है की आखिर चुनाव मैदान में अंतिम जीत किसकी होती है ? जो जीता वही सिकंदर। 
         अब  ज़रा बीजेपी की राजनीति देखिये।  बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष केशव मौर्या का बयान आया है की यूपी चुनाव में पार्टी को ३०० से ज्यादा सीट मिलेगी।  उनका दुसरा बयान आया की पार्टी इस चुनाव में मुख्यम्नत्री उम्मीदवार की घोषणा नहीं करेगी।  यहाँ तक तो सब ठीक है।  आप ३०० सीट जीतो या ४०३।  क्या फर्क पडेगा।  सरकार पहले भी आप चला चुके हो , जीत होगी तो फिर चलाओ।  जनता को इससे क्या लेना देना।  यह बयान केवल इस लिए दिया गया है की बीजेपी सरकार बना रही है और जो लोग बीजेपी के वोटर नहीं है वे भी हारने वाली पार्टी को वोट ना देकर जीतने वाली बीजेपी को वोट दे।  इसके अलावा बीजेपी का यह भी सन्देश है की चुकी मुस्लिम समाज बीजेपी को वोट नहीं डालेगा इसलिए सभी हिन्दू समाज एकमुश्त बीजेपी के पक्ष में वोट दाल दे।   दूसरी बात यह है की बीजेपी का कोई सीएम चेहरा नहीं होगा।  क्यों नहीं होगा यह कौन पूछे ? १२ से ज्यादा लोग सीएम की कतार में खड़े है बीजेपी में।  १२ लोग १२ विचार।  यह तो संघ की राजनीति है की सबको बाँध कर रखे हुए है बरना बीजेपी की राजनीति के क्या कहने ? सूबे के पार्टी अध्यक्ष यह नहीं कह रहे है सीएम को लेकर दर्जन भर लोग बीमार पड़े है।  जनता को धोखा केवल इस बात पर दिया जा रहा है की केंद्र में मोदी की सरकार है और यही सरकार राष्ट्र भक्त होने के नाते पहली बार पाकिस्तान को पानी पिला रही है।  धोखे की राजनीति में सूबे की जनता को समेटना है। 
       उधर सुनने में आ रहा है की कांग्रेस की नेता रीता बहुगुणा बीजेपी में जाने वाली है।  अजीब बात है।  किसी को जाना है तो खेल क्यों ? अब रीता बहुगुणा का परिवार कांग्रेसी नहीं रहा।  और रीता कांग्रेस में है तो सिर्फ लोभ और लालच के लिए।  अब तक उनकी कोई सफलता नहीं रही।  जब शिला दिक्षित वहा राजनीति करने पहुच गयी तो रीता को परेशानी होने लगी।  रीता से पूछ जाना चाहिए की उनके साथ कितने और लोग बीजेपी में जाएंगे ? कोई नहीं मिलेगा।  रीता की पूरी राजनीति ही नकली है।  वह सपा से कांग्रेस में आयी थी फिर जहां लाभ हो जायेगी।  जनता को कितना मुर्ख बना सकती है रीता ?  कह सकते है की अभी चुनाव होने में ४ महीने बाकी है लेकिन प्रदेश की राजनितिक नर्तन से जनता ओत प्रोत है। 

No comments:

Post a Comment