Tuesday, October 25, 2016

लठैतो और नपुंसक के बीच राजनीति करते अखिलेश


अखिलेश अखिल 
उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भी कम नहीं है। वे अपने पिता और चचा का सम्मान भी करते है और लगे हाथ अपमान भी।  वे बात मानते भी है और नहीं भी। वे बहुत कुछ बोलते भी है और नहीं बोलने का नाटक भी करते दीखते है। वे सच भी बोलते है और झूठ पर पर्दा भी डालते नजर आते है। यह बात और है कि समाजवादियो का असली चरित्र भी यही है। झूठे चरित्र में रहने वाला आदमी ही आज का असली समाजवादी बनता रहा है।  यह  इसलिए कही जा रही है कि अगर अखिलेश यादव को अपनी पार्टी के लोगो , अपने सम्बन्धियो , अपने खून के रिस्तेदारो और फिर अपने बाप और चाचा से वाकई में कोई शिकायत है तो फिर पिछले डेढ़ महीने से वे किस तरह की राजनीति का इन्तजार कर रहे है ? उन्हें अगर इस बात की चिंता है कि उनके अपने उनकी राह के कांटे बने हुए है या फिर उनकी सरकार को डिस्टर्ब कर रहे है तो फिर उन्हें अपने पद से हट  जाना चाहिए।  अपनी शिकायत पार्टी अध्यक्ष से करनी चाहिए।  सबसे बेहतर होता कि वे चुनाव के समय में अपने पिता को ही कहते की उन्हें कुछ परेशानी हो रही है वे आकर सरकार चलाये।  लेकिन उन्होंने भी ऐसा नहीं किया।  फिर यह कैसे माना जाय की उनके खिलाफ अगर साजिस की जा रही है तो वे साजिस करने वालो के विरोध में चुप्पी साढ़े हुए है।  साजिस तो वे भी कर रहे है।  वर्तमान लोकतंत्र में राजनीति में आये कितने लोगो से उम्मीद की जा सकती है कि वह नैतिकता , सुचिता पर आधारित और ईमानदार राजनीति करे।  आज की हालात में इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती।  
            याद कीजिये अखिलेश यादव के सितंबर महीने के उस खेल को कि वे बिना मुलायम सिंह से बिना पूछे ही अपने मंत्रिमंडल से निकाल दिया था।  यह अलग बात है कि मुख्यमंत्री को अपना मंत्रिमंडल बनाने और किसी को हटाने का अधिकार है लेकिन अखिलेश को यह भी याद रखना चाहिए था कि हटाने वाल्व लोगो में उनके चाचा शिवपाल भी शामिल थे।  कौन नहीं जानता कि  उत्तरप्रदेश की राजनीति में और ख़ास कर सपा की राजनीति में शुवपाल की क्या भूमिका रही है ? आज जिस पद पर अखिलेश  यादव बैठे है क्या उसमे  भूमिका नहीं है ? हो सकता है चचा शिवपाल अखिलेश की उम्मीदों पर खड़े नहीं उतर रहे हो लेकिन शिवपाल की बर्खास्तगी क्या कम थी ?  फिर जस की तस वाली राजनीति शुरू हो गयी।  हटने हटाने का खेल। भारतीय राजनीति में इस तरह का खेल बहुत काम ही देखने को मिलता है।  
            अभी तक किसी को सपा परिवार के इस तरह के झगडे की असली कहानी की जानकारी नहीं लगी है।  घाघ वाली राजनीति है ये।  कोई कुछ बोलता ही नहीं।  सबके अपने अपने दल और गिरोह बने पड़े है।  शिवपाल यादव का अपना गिरोह है तो अखिलेश यादव का अपना।  उधर रामगोपाल यादव भी अपने गिरोह की बात कर रहे है।  जब अमर सिंह ने रामगोपाल यादव पर नपुंसक होने की बात कही तो झट से रामगोपाल यादव ने ऐलान किया कि अब के बाद उनके खिलाफ कोई भी कुछ बोलेगा तो वह सही सलामत नहीं रहेगा।  कोई गिरोह चलाने वाला ही ऐसा बोल सकता है। 
          लेकिन असली बात यह कि सपा की पूरी राजनीति को अगर देखा जाए तो यह लठैतो की पार्टी की रही है।  जिसकी लाठी उसकी भैस।  अब तक तो ऐसा ही होता रहा है।  मुलायम सिंह यादव को सपा को तैयार करने और उसे सत्ता सरकार तक पहुचाने में भले ही  लग गए हो लेकिन प्रदेश की जनता भी जानती है कि सपा लठैतो की ही पार्टी रही है।  रामगोपाल यादव सही ही कहते है कि लठैतो की बदनाम इस पार्टी को अखिलेश यादव जैसा चेहरा मिल गया जिसने सपा की  लठैतों वाली छवि बाद दी। 
          तो सवाल ये है की आखिर रामगोपाल यादव को अमर सिंह ने नपुंसक क्यों कहा ? इसके कल्याण मायने है ? इसके कोई राजनितिक मतलब है या फिर शारीरिक ? दुसरा सवाल है की अखिलेश यादव आखिर किस इन्तजार में पार्टी के भीतर बैठे है ? वे पार्टी को तोरे बगैर भी अलग हो सकते है।  अगर शिवपाल ही सरकार चलाना चाहते है तो अखिलेश को उन्हें सौप देना चाहिए।  यह बात इसलिये कहा जा रहा है कि अखिलेश खुद कहते है कि वे अपने पिता मुलायम सिंह की इज्जत करते है और उनकी हर बातो को मानते भी है।  उन्होंने यह भी कहा है कि वे आजीवन अपने पिता की सेवा भी  रहेंगे।  फिर समस्या क्या है ? अगर अखिलेश को इस बजबाजती राजनीति में अपने चेहरे पर दाग लगने का खतरा है तो उन्हें सबसे पहले सरकार से हट जाना चाहिए।  नहीं तो साफ़ तौर पर यह कहा जा सकता है की अखिलेश यादव भी राजनितिक रंग में ढल गए है और सत्ता के लोभ में वे फास भी गए है।  पिता ने उन्हें सत्ता सौपी थी।  आदर के साथ यह सत्ता अपने पिता को सौप देनी चाहिए।  

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