Wednesday, October 26, 2016

भारी असमंजस में फसे है यूपी के मुस्लिम मतदाता


अखिलेश  अखिल 
 सपा की पारिवारिक राजनिति सपा के चुनावी पर कितना सर डालेगा , इसकी जांच पड़ताल की जा रही है।  यह पड़ताल पत्रकाल भी कर रहे है एयर विपक्षी राजनितिक दल  भी।  लेकिन यादव कुनबे की यह राजनितिक खेल का सबसे ज्यादा असर मुस्लिमवोट पर पड़ता दिख रहा है।  अब तक सपा की राजनीति को आगे बढ़ाने वाले मुस्लिम वोटर परिवार की लड़ाई से असमंजस की हालत में देखे जा रहे है।  यूपी के मुस्लिम मतदाता क्या सोच रहे है या फिर मुस्लिम मतदाता का लाभ किसे मिल सकता है इस पर हम बात करेंगे लेकिन सबसे पहले मुलायम परिवार की राजनितिक खेल और मुलायम के दर्द पर एक नजर -
 रार पर रार। सपा में चचा भतीजे के रार में फसे है नेता जी मुलायम सिंह यादव। एक तरफ बेटा तो दूसरी तरफ भाई। कोई कुछ भी कहे मोह तो मोह है।  भला पुत्र मोह किसे नहीं होता ? यह तो चिरातन सत्य है। और भ्राता मोह की अपनी कहानी भी है।  कहते है की दुनिया में सब कुछ मिल जाता है लेकिन सहोदर भाई नहीं मिलता।  शिवपाल यादव को मुलायम सिंह का हनुमान भी कहते है सपा वाले।  साफ़ है कि शिवपाल यादव को भी अपने भाई पर यकीं है और मुलायम सिंह के प्रति आदर और इज्जत भी। मुलायम सिंह को प्यार तो चचेरे भाई रामगोपाल से भी है। यह बात और है कि मुलायम सिंह अभी रामगोपाल से खासे नाराज है और उन्हें पार्टी से निकाल देने के बावजूद भी अभी तक उनका गुस्सा रामगोपाल के प्रति शांत नहीं हुआ है। मुलायम सिंह के कुनबे में लगी आग की अंतिम परिणति चाहे जो भी हो लेकिन यह तो सत्य है कि यह मुलायम शिवपाल और  रामगोपाल जैसे भाई  ही है कि इतने बड़े कुनबे को आगे बढ़ाते रहे है। सबके नेता मुलायम सिंह यादव।  भाई का भी अपने भाई में विश्वास और बेटे का भी अपने पिता और चाचा पर पूरा यकीन।  अबतक तो ऐसा ही चल रहा था।  सपा परिवार में चल रहे दंगल का हश्र चाहे जो भी हो जाए , चाहे भाई - भाई बिछड़ जाए या बाप बेटे में अनबन हो जाए , या फिर राजनितिक कीमत ही चुकानी पड़े लेकिन इस समय सबसे ज्यादा कष्ट किसी को होगा तो वे है मुलायम सिंह यादव।  तिनका तिनका इकठा कर के पार्टी को , परिवार को और कुनबे को जो सहेजता है असली दर्द भी उसी को होता है।  सच यही है है कि आज मुलायम सिंह को बेइंतहां दर्द होगा। 
        यूपी में मुस्लिम मतदाता कोई १८ फीसदी है। सूबे में कोई २० जिले ऐसे है जहां मुसलमानो के वोट २५ फीसदी से ६० फीसदी तक है। करीब सौ सवा सौ सीट पर मुस्लिम वोटर निर्णायक होते है।  इन २० जिलो में से अधिकतर पश्चिम यूपी के जिले है जहां मुस्लिम मतदाता की राजनीति को अधिकतर राजनीति पार्टिया सलाम करती नजर आती है।  २०१२ के चुनाव में सपा की जीत के पीछे मुस्लिम वोट बैंक का ही हाथ रहा है। इससे पहले मुस्लिम वोट बसपा के पास गए थे , बसपा की जीत हुयी थी।  सूबे के मुस्लिम मतदाता अभी असमंजस की हालत में है।  उन्हें डर है की कही मुलायम का कुनबा बिखर ना जाए।  अगर ऐसा होता है तो क्या होगा ? मना जा रहा है कि  आज भी सूबे के अधिकतर मुस्लिम मतदाता सपा के साथ है।  लेकिन अगर पार्टी में किसी तरह का बटवारा होता है तो इस बटवारे का सबसे ज्यादा लाभ बसपा को होना माना जा रहा है , गाव के मुसलमान आज भी  के साथ है लेकिन ऐसे मुस्लिम मतदाता २० फीसदी से ज्यादा नहीं है।  अखिलेश की छवि बेहतर होने की वजह से मुसलमानो का एक तपका अखिलेश के गुट के साथ भी जा सकता है।  लेकिन ऐसी हालत में मुसलमानो को यह देखना होगा कि सरकार बनाने की हालत में कौन सी पार्टी है और बीजेपी को हारने वाली कौन सी पार्टी है।  जो पार्टी बीजेपी को हराये , मुस्लिम वोट उसी के साथ।  सपा में बटवारे के बाद सरकार बनाने की हालत में सपा नहीं रह जायेगी।  ऐसी हालत में बसपा को  मुस्लिम वोट का लाभ मिल जाएगा।  कुछ लाभ कांग्रेस को भी मिलेगा और और छोटे दलों  को भी।  दरअसल तलाक और सामान नागरिक संहिता के नाम पर मुस्लिम मतदाता डरे हुए है और उन्हें डर है की अगर उनके वोट बैंक बट  गए तो बीजेपी के आते ही सारा खेल खराब हो सकता है।  
           सपा की राजनीति करने वाले अधिकतर मुस्लिम नेता मान रहे है की सपा की आंतरिक राजनीति ख़त्म हो जायेगी और नेता जी हालत को सम्हाल लेंगे।  लेकिन जिस तरह शिवपाल और अखिलेश के बीच अभी अभी रार जारी है उससे पार्टी को चुनावी हानि होना तय माना जा रहा है।  

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