Thursday, October 20, 2016

निजी संपत्ति की गोपनीयता ख़त्म हो जाए तो देश मुस्कुरा उठेगा


अखिलेश अखिल 

न्याय का शासन, न्याय पर आधारित अर्थव्यवस्था और कल्याणकारी राज  सबको चाहिए लेकिन सरकार ऐसा नहीं चाहती।  अगर ऐसा हो गया तो संपत्ति के मालिक और सम्पत्तिहीन में भला अंतर कैसे होगा ? फिर धन और धनधारी की क्या विसात ? कौन पूछेगा इन्हें ? समानता की बात कहने के लिए तो ठीक है लेकिन समानता लाना भला कौन चाहता ? क्या लोकतंत्र के चारो स्तम्भ से जुड़े धनधारी समानता चाहते है ? क्या सरकार वाकई में समानता पर आधारित समाज चाहती है ? इन तमाम सवालो के उत्तर ना में है।  कोई नहीं चाहता की समाज में गरीबी और अमीरी की खाई काम हो।  जिस दिन कम होगी धनधारियो की राजनीति , सम्पाती लुटेरो की राजनीति और दलाल संस्कृति समाप्त हो जायेगी। 
           हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में कहा जाता  है कि वे संत प्रवृति के है और संपत्ति से उन्हें कोई लोभ ,मोह नहीं है।  वे देश को सर्बशक्तिमान बनाना चाहते है और  आर्थिक रूप से मजबूत।  देश के बहुत सारे लोग भी यही चाहते है।  इसे लिए सबसे पहले जरुरी है निजी सम्पति की गोपनीयता ख़त्म कर दिया जाय।  हमारे देश में निजी संपत्ति की गोपनीयता का कानून बना हुआ है। इस कानून के मुताविक देश के नागरिक जो केंद्र सरकार को अपना आयकर रिटर्न भरते है , उसके बारे में देश का कोई अन्य नागरिक न तो कोई जानकारी ले सकता है और न ही उसकी प्रतिलिपि प्राप्त कर सकता है।  एक आजाद देश में ऐसा कला कानून।  यह कानून देश के नागरिको के सम्मान ,देश की संपत्ति के स्वामित्व के अधिकार , गरिमा।  स्वतन्त्रता और लोकतंत्र की पारदर्शिता के प्रावधानों के विपरीत है। 
          देश का नागरिक देश की सारी  सम्पाती का मूल स्वामी होता।  सरकार केवल उसके प्रतिनिधि के तौर पर काम करती है तो सरकार को दी जाने वाली कोई भी जानकारी उस नागरिक के लिए गोपनीय कैसे हो सकती है। किसी गुलाम देश में तो ऐसा हो सकता है लेकिन किसी आजाद देश में इस तरह के काले कानून की क्या जरूरत है ? यही वह कानून है जो देश को खोखला किये हुए है।  इसी कानून के दम  पर लुटेरे देश को लूट रहे है , सरकारी तंत्र उसे बढ़ावा दे रहा है ताकि उसे भी उसका मिलता है और अधिकतर जनता रुदाली करती नजर आती है। ऐसा नहीं है  कि हमारे देश के अर्थशास्त्री , रिज़र्व बैंक के लोग , वित्त मंत्रालय में बैठे लोग और प्रधानमन्त्री से लेकर राष्ट्रपति इस खेल को नहीं जानते।  लेकिन यहाँ सबकी मौन स्वीकृति है।  सामाजिक अर्थशास्त्री रौशन लाल अग्रवाल की चर्चित पुस्तक 'गरीबी रेखा नहीं अमीरी रेखा ' सरकार की नियति और देश की भयावह होती तस्वीर पर बहुत कुछ कह रही है।  रौशन लाल अग्रवाल कहते है कि 'निजी संपत्ति की गोपनीयता वाली कानून ही सभी बुराइयो की जड़ है। इसी कानून की वजह से सत्ताधीशो ,धनपतियों  और नौकरशाहों के हाथो देश को केवल लूटते देखा जा सकता है। इस कानून के जरिये ही सरकार आर्थिक अपराधियो को खुला संरक्षण देती है और इसकी पूरी जानकारी देश के नागरिको को नहीं दी जाती। आज देश में जितने भी लोग आय कर रिटर्न भरते है बिना किसी अपवाद के अस्पस्ट , अधूरा या झूठा होता है।  देश में फैला कालाधन का मकड़जाल भी इसी से पैदा होता है। यदि सम्पाती की गोपनीयता कानून को ख़त्म कर दिया जाय तो देश की जनता ही इन लोगो से निपट लेगी। इस कानून की आड़ में सारे उद्योगपति ,व्यापारी ,शासक ,प्रशासक ,बुध्धिजीवी , भूपति और समपण लोगो के साथ साथ सर्वोच्च पदों पर बैठे राष्ट्रपति , प्रधानमन्त्री ,लोक सभा अध्यक्ष ,सर्वोच्य न्यायालय के न्यायाधीश तक झूठा रिटर्न भरकर समाज को धोखा दे रहे है। केवल निजी संपत्ति की गोपनीयता कानून की वजह  से यह अपराध समाज से छुपा रहता है और समाज लुटता रहता है।'
        सबको आर्थिक न्याय।  प्रधानमन्त्री मोदी जी भी यही चाहते है।  फिर संपत्ति की गोपनीयता कानून क्यों ? उम्मीद की जा सकती है कि हमारे प्रधानमंत्री जी इस तरफ नजर  रखेंगे। देश , समाज और अर्थव्यवस्था की मजबूती के लिए ही इतना बड़ा तंत्र काम करता है।  सरकार की कोशिश होती है कि समाज को अभावमुक्त कैसे बनाया जाय ? लोगो को समृद्ध कैसे बनाया जाय ?योग्यतम व्यक्ति को उसकी योग्यता का पूरा लाभ मिले कइँती अयोग्यतम  व्यक्ति को भी  उसका न्यूनतम न्यायपूर्ण अधिकार बिना किसी कठिनाई के मिलनी ही चाहिए। इसी लिए देश में अब अमीरी रेखा बनाने की जरुरत है।  इसी अमीरी रेखा के जरिये केवल औसत से अधिक संपत्ति पर कर लगाकर अभावपूर्ण समाज को समृद्ध किया जा सकता है। एक औसत आय से अधिक संपत्ति रखने वाले लोगो से अधिक आय का ट्रस्टी माना जाय।  अधिक आय से सम्पाती कर लिया जाय।  देश में ऐसे १० से १२ लाख लोग ही होंगे जिनके पास देश की अधिकतर संपत्ति है। ऐसे में इन लोगो से कर लेने की जरुरत है बाकी नागरिको को कोई कर भी नहीं देना पडेगा। ऐसे संपत्ति वाले लोगो से हर साल करीब २०० लाख करोड़ की आय हो सकती है जबकि आज की हालत में सभी तरह के कर लागाने के बाद भी सरकार को २५ से ३० लाख करोड़ के बजट के लिए परेशानी होती है। फिर यही यही वजह है की हर साल घाटे का बजट बनता है जिससे देश में बेरोजगारी , अभाव, शोषण ,की कहानी से देश ट्रस्ट और अभिशप्त है।     

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