Sunday, November 13, 2016

बेईमान देश में ईमानदार राजनीतिक स्ट्राइक

अखिलेश अखिल 

कालेधन पर पीएम मोदी का आर्थिक या मौद्रिक स्ट्राइक। बड़ा अच्छा लग रहा है।  पुरे देश में मेला जैसा माहौल है।  चारो तरफ एक ही चर्चा। नोट की नशबंदी।  कालाधन पर प्रहार।  कांग्रेस सरकार के भ्रष्टाचार पर चोट।  घोटालेबाजो, चोर , ठग , गिरहकट ,आतंकी ,सूदखोर ,बेईमान ,घूसखोर और पाखंडी पर नकेल कसने की मोदी की कोशिश।  इसी की चर्चा चल रही है।  चर्चा होनी भी चाहिए।  लोकतंत्र है।  एक बात साफ़ है कि जिस मकसद से नोट नशबंदी की बात कही जा रही है , वैसा ही हो गया तो देश की दशा बदल सकती है। ब्लैक मनी बहार निकल जाए और अर्थव्यवस्था ठीक हो जाय इसे भला कौन नहीं चाहेगा ? इधर पक्ष विपक्ष के बीच कई तरह के राजनितिक खेल खेल भी जारी है। कुछ जान संगठन भी इस पर सवाल उठा रहे है।  इसी बीच गोविंदाचार्य भी कुछ सवाल उठा रहे है।  उनका सवाल है कि जिस जल्दबाजी में यह सब हुआ है , इसके क्या लाभ हानि है और इस खेल से आम जनता को क्या मिलेगा इन तमाम बातो पर सरकार को स्वेत पत्र जारी करना चाहिए। उधर प्रधानमंत्री मोदी ने अपने गोआ के संबोधन में साफ़ किया है कि कालेधन की निकासी को लेकर वे और शख्त कदम उठाएंगे।  मोदी जी ने कुछ भावुक भाषण भी दिए है जो जनता में उनके प्रति आदर के भाव पैदा कर रहे है।  इसमें राजनितिक खेल भी है।  कोई लाख विरोध करे , गाली ही क्यों ना दे, राजनितिक खेल भी इस नोटबंदी के पीछे है।  
      अब कुछ और बातो पर भी चर्चा कर ली जाए।  गौर से देखने से पता चलता है की इस पुरे मामले में कुछ ऐसे लोग भी नाच कूद रहे है जो जिंदगी भर भ्रष्टाचार के अगुआ रहे है।  आजाद भारत में भ्रष्टाचार अगर एक संस्कृति रही है तो यह भी सत्य है कि देश में ऐसे बहुत काम ही लोग बचे होंगे जिनके घर में भ्रष्टाचार के पैसे नहीं आये होंगे। बहुत कम ही लोग होंगे जिन्होंने भ्रष्टाचार के पैसे नहीं खाये होंगे।  ज्यादातर सरकारी नौकरी करने वाले लोगो के घर में कालाधन जाता रहा है।  ज्यादातर नेता कालाधन पर ही राजनीति करते रहे है। तमाम राजनितिक पार्टिया कालाधन पर राजनीति करती रही है।  सभी कारोबारी कालाधन कमाते रहे है और भ्रष्टाचार को बढ़ावा देते रहे है।  करीब ५० फीसदी से ज्यादा मीडियाकर्मी भ्रष्टाचार में शरीक रहे है।  कस्बा और छोटे शहरो  में काम करने वाले अधिकतर पत्रकार गलत काम करते रहे है।  देश के लगभग सभी एनजीओ ,ट्रस्ट कालाधन को बढ़ावा देते रहे है।  बाजार का दुसरा नाम ही भ्रष्टाचार का अड्डा।  नकली सामान भी और ज्यादा दाम भी।  देश भर में संचालित सभी दुकाने कालाधन को बढ़ाता रहा है।  चोरी करता रहा है।  तमाम जांच एजेंसिया भ्रष्टाचार में लिप्त रही है।  कोर्ट , कचहरी जज भी इसी में शामिल है।  कह सकते है कि पूरा देश भ्रष्ट है या फिर उसके पैसे पर जी रहा है।  
       अब कुछ उदाहरण भी आपके पास रख दू -- . मान लीजिये कोई कर्मचारी २० -२५ या लाख रुपये की नौकरी करता है।  उस कर्मचारी के पुरे घर वालो को यह जानकारी रहती है कि उसके परिजन को कितनी सैलरी है।  लेकिन जब वह कर्मचारी हर महीने लाख।  २ लाख , १० लाख घर ला रहा है और उसका प्रदर्शन भी कर रहा है तो उसके घर का कोई आदमी उससे नहीं पूछता की ये पैसे कहा से आ रहे है ? पुरे गाव , समाज के लोग भी नहीं पूछते।  उलटा लोग ये भी कहते है कि फलां आदमी धनि हो गया है।  उगता सूरज है।  कोई उसे भ्रष्ट नहीं कहता।  ऐसे समाज को सुधारना मुश्किल है।  बेईमान और चालाक आदमी बालू से भी माल कमाने लगता है।  
         तमाम अधिकारियों , नेताओ , कुछ पत्रकारों , अदालत से जुड़े लोगो और कारोबारियों ने ही इस देश को सबसे ज्यादा बर्बाद किया है।  आज भी आप किसी दफ्तर में चले जाए आपको बिना पैसा दिए कोई काम नहीं हो सकता।  जबकि सरकार ने बहुत सारे कानून बना रखे है। फिर ऐसे में देश भक्त और राष्ट्रभक्त होने की बात बेईमानी है। 
        कहते है कि देश के संसद और विधान सभाओं में अब अधिकतर आबादी चोरो , ठगों , बेईमानो , खुनी ,बलात्कारी के आरोप झेल रहे है।  जेल में भी बंद है।  करोड़पति से संसद और विधान सभा भरे पड़े है।  ये धन कहा से आये है सब जानते है।  चुनाव के दौरान जो रुपये खर्च होते है वे कहा से आते है ,सबको पता है।  प्रधानमन्त्री के पद पर पहुचे मोदी से लेकर सांसद , विधायक और तमाम मंत्री संतरी बता पाएंगे की उन्हें अपनी जगह बनाने के लिए कहा से पैसे लाये थे।  इसका जबाब किसी के पास नहीं है।  जबाब मिलेगा भी  नहीं।  सीबीआई , मिलिट्री अफसर , इनकम टैक्स विभाग , सेल्स टैक्स विभाग , इंफोर्समेंट विभाग , और ना जाने कितनी जांच एजेंसिया क्या क्या करती है किसको पता नहीं।  सरकारी डॉक्टर से लेकर शिक्षक क्या करते है किसे पता नहीं।  तमाम योजनाए कागज़ के पन्नो पर कैसे बनते है और कैसे मिट जाते है कौन नहीं जानता ? और उनके परिजन खाते नहीं अघाते।  बेचारा गरीब आदमी ही केवल टुकुर टुकुर ताकता रहता है।  पानी वाले देशमें पानी बिक रहा है क्यों? किसानी वाले देश में किसान मर रहे है क्यों ? पढ़े लिखे लोग बेरोजगार रो रहे है क्यों ? अब तक यही होता रहा है।  सबने अपने अपने हिस्से के देश को लुटा है।  
        फिर यहाँ ईमानदार कौन है ? कोई बताये तो।  पार्टी में बंटे लोग , पार्टी में बंटे छात्र ,पार्टी में बंटे किसान , और पार्टी में बंटे अधिकारी और जज ,पत्रकार इनसे क्या अपेक्षा की जा सकती है।  लूट लाओ और खूब खाओ की नीति पर चलने वाला हमारा देश पूरा बेईमान है।  मोदी जी के प्रयास की सराहना की जा सकती है लेकिन जब हमारे खून में ही गंदगी है भला उसे कौन निकाल सकता है।  बाकी की तमाम बाते राजनीति है। 

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